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बल बहुमत का या सत्ता का

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शुक्रवार, 30 दिसम्बर 2011, 22:00 IST

मैं न तो अन्ना हज़ारे का अंध समर्थक रहा हूँ और न ही लोकपाल के मामले में सरकार के फ़ैसलों को हज़म कर पाया हूँ.

बीबीसी का पत्रकार होने के नाते ये गुण या हर चीज़ को शक़ की निगाह से देखने का दुर्गुण जैसे ख़ून में शामिल हो चुका है.

ऐसे में लोकपाल विधेयक को लेकर संसद में जारी कार्रवाई के बीच ही आंदोलन करने की टीम अन्ना की ज़िद पर एक ओर जहाँ खीझ उठती रही तो वहीं इस विधेयक को टालने की हरसंभव सरकारी कोशिश ने मेरे अंदर के संसदीय लोकतंत्र के समर्थक को कुछ हद तक मौन करने पर मजबूर किया.

अब जबकि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है या किया जा चुका है मैं कुछ हद तक टीम अन्ना की ज़िद को उनके नज़रिए से समझ पा रहा हूँ.

गुरुवार को दिन भर बहस पर ऑफ़िस में नज़र रखने के बाद देर रात तक घर पर भी टीवी से चिपका मैं वही बहस देख रहा था. उस समय तक कुछ समाचार चैनल ये ख़बरें चलाने लगे थे कि राज्यसभा में हंगामा कराकर कार्यवाही अनिश्चितकाल तक स्थगित करने की साज़िश हो सकती है.

मैं उपहास के नज़रिए से उन ख़बरों को देख रहा था कि सरकार की ओर से इतना बचकाना क़दम तो कम से कम नहीं उठाया जाएगा. पूरा देश इस बहस पर नज़रें लगाए है और इसका ये अंत तो कम से कम नहीं हो सकता.

मगर रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे से जो होना शुरू हुआ वहाँ से वंदे मातरम् तक सिवाय ग़ुस्से के मन में कुछ नहीं आया.

विपक्षी सांसद ये जानने की कोशिश करते रहे कि रात 12 बजे के बाद क्या होगा. माकपा नेता सीताराम येचुरी ने खुलकर ये सवाल किया मगर सभापति की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं था.


मैं अभी तक ये नहीं समझ पाया हूँ कि सदन के नेता ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वहाँ बैठे थे और इस पूरे दौरान उनके चेहरे के भाव बिल्कुल भी नहीं बदले.

क्या उन्होंने इस बात की ज़िम्मेदारी बिल्कुल भी नहीं समझी कि इस विधेयक पर सरकार के मुखिया होने के नाते उस मौक़े पर उन्हें कुछ कहना चाहिए, हस्तक्षेप करना चाहिए.

विपक्ष रात भर बैठने की चुनौती देता रहा और सरकार ने दंभ भरे स्वर में कहा कि सत्र को लेकर फ़ैसला सरकार का 'विशेषाधिकार' है.

विधेयक को लेकर आए 187 संशोधनों में सरकार को साज़िश दिख रही है मगर क्या उसका दूसरा मतलब ये नहीं था कि विधेयक में ऐसी कमियाँ हैं जिसे ठीक करने के लिए इतने संशोधन प्रस्ताव लाए गए हैं.

अंत के हंगामे के दौरान सरकार की ओर ये कहा जाना कि अगर आप लोकसभा वाला प्रस्ताव जस का तस पारित करना चाहते हैं तो हम अभी मतदान के लिए तैयार हैं- आश्चर्यचकित करता है.

राज्य सभा में अल्पमत वाली सरकार ने बहुमत के नज़रिए को क्या सिर्फ़ अपनी सत्ता और विशेषाधिकार के अहंकार में दरकिनार कर दिया.

सुबह मैंने उस सांसद के दल के एक नेता को टीवी पर सुना जिसने मंत्री महोदय के पास से काग़ज़ लेकर फाड़कर सदन में उछाल दिए थे. बचाव ये था कि आदमी भावावेश में ऐसे कुछ क़दम उठा बैठता है.

मुझे सहज याद आया कि ये सभी वही सांसद हैं जिन्होंने अन्ना हज़ारे के मंच से सांसदों पर हुई कुछ अशिष्ट टिप्पणी पर विशेषाधिकार हनन के नोटिस जारी करवाए थे. ऐसा नहीं है कि मैं उन टिप्पणियों का समर्थन कर रहा हूँ मगर स्पष्ट है कि वो टिप्पणी करने वाले लोग भावावेश में कुछ भी बोलने के हक़दार नहीं हैं.

कुछ और सृजनात्मक काम के लिए मैं जीवन के किसी मोड़ पर राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाला वो व्यक्ति हूँ जो इन सब घटनाओं के बाद ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि लोकतंत्र में बहुमत का बल होता है या सिर्फ़ सत्ता का.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 23:30 IST, 30 दिसम्बर 2011 ALTAF HUSAIN, Saudi Arabia:

    अब तो बीबीसी हिंदी के लोगों को और उन सभी लोगों को समझ में आ गया है कि अण्णा हज़ारे और उनकी टीम को सरकार पर भरोसा क्यों नहीं है.

  • 2. 04:12 IST, 31 दिसम्बर 2011 ashish yadav,hyderabad:

    मुकेश जी एक अच्छे लेख के लिए बधाई. आख़िर वही हुआ जो सरकार चाहती थी. एक तयशुदा नीति के तहत सदन में हंगामा करवाया गया और लोकपाल विधेयक एक बार फिर से लटक गया. टीम अण्णा के लोगों ने रामलीला मैदान में जो टिप्पणियाँ कीं उनके लिए ओमपुरी और किरण बेदी को विशेषाधिकार नोटिस थमा दिया गया. अब सदन के भीतर ही इन माननीयों ने किस क़दर सदन की गरिमा भंग की ये पूरे देश ने देखा. तो क्या सदन में छीना झपटी और लोकपाल विधेयक की प्रतियाँ फाड़ना ही इनके विशेषाधिकार हैं? अण्णा के आंदोलन ने अभी सिर्फ़ विराम लिया है, ख़त्म नहीं हुआ. एक बार फिर देश में अण्णा की आँधी ज़रूर चलेगी. क्योंकि अब जो हुआ है उसकी आशंका अण्णा को पहले से ही थी. इन नेताओं को देश जवाब देगा. इंतज़ार कीजिए.

  • 3. 07:43 IST, 31 दिसम्बर 2011 नवल जोशी:

    मुकेश जी, आपने कहा है कि लोकतंत्र में बहुमत का बल होता है या सिर्फ सत्ता का? मुझे लगता है कि यदि लोकतंत्र बहुमत या बल के आधार चल रहा है तो यह अराजकता और तानाशाही दोनों का ही मिश्रित रूप है, लोकतंत्र तो कदापि नहीं. लोकतंत्रीय प्रणाली में बल शब्द का प्रयोग भी अशिष्ट माना जा सकता है. अगर शासन प्रणाली में किसी भी प्रकार के बल का प्रयोग किया जा रहा है तो इसमें पशु स्वभाव अथवा मशीन जैसी यांत्रिकता होगी ही,लोकतंत्र बल से नही, प्रभाव से चलते हैं. यह प्रभाव व्यक्तियों का भी हो सकता है और संगठनों का भी. लेकिन यह विडम्बना है कि राजनीति में वे ही लोग हैं जो कान्तिहीन, श्रीहीन और प्रभाहीन हैं. इसलिए इनका कोई प्रभाव होगा इसकी कोई सम्भावना ही नही है. इस तथ्य को ये लोग भलीभाँति जानते हैं इसलिए आज नोट फॉर वोट के लिए किसी दलाल टाईप व्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं तो कल उसे जेल भिजवा देते हैं. यही काम कभी झामुमो जैसे क्षेत्रीय दलों से भी लिया गया. यह किसी से छिपा नहीं है कि आज बहुमत कैसे हासिल किया जाता है? संसद और विधान सभाओं में निर्दलीय सदस्य तो लगभग इसी उम्मीद में रहते हैं कि बहुमत के लिए जहॉ से भी उनके लिए मलाईदार मंत्री पद का ऑफर आये तो वे समर्थन के लिए तत्पर हों बड़े राजनीतिक दलों की सत्ता के लिए खुलेआम सौदेबाजी तो अक्सर दिखाई पड़ती है, लेकिन इस तरह के निर्दलीय सदस्य कथित लोकतंत्रीय बहुमत में मुख्य भूमिका निभाते आ रहे हैं और अब तो यह बहुत बड़े काले धंधे के रूप में फैलता ही जा रहा है. या कहा जा सकता है कि प्रभावहीन नेताओं और राजनीतिक दलों के कारण ही जुगाड़ लोकतंत्र का इंजन इसी से चल रहा है. कल को यह भी हो सकता है कि और बडे बाहुबली इसी प्रयोग को फैला दें जैसा कि कौंडा मामले में किया भी जा चुका है कि एक निर्दलीय उम्मीदवार को दोनों बड़े विरोधी दल समर्थन दें और बिना किसी जिम्मेदारी के पूरे प्रदेश में खुली लूट का खेल खेलें. ऐसे में बहुमत हासिल करने का क्या मतलब रह जाता है? बल ही अब शासन का मुख्य आधार है खतरा इस बात का है कि यह बल जल्द ही लोकतंत्र का नकाब फेंक कर अपने नग्न रूप में लोगों के सामने आ सकता है. अन्यथा देश को ये लोग अराजकता में तो धकेल ही रहे हैं.

  • 4. 08:23 IST, 31 दिसम्बर 2011 vikas kushwaha:

    ये देश का दुर्भाग्य है.

  • 5. 09:41 IST, 31 दिसम्बर 2011 BHEEMAL Dildarnagar:

    मुकेश जी को धन्यवाद. किन्तु मुझे कुछ कहना है. संसद के 540 सदस्य बहुमत के ज़ोर पर टालमटोल कर रहे हैं. फिर अण्णा और पत्रकार बहुमत का सम्मान करना सीखें तो अच्छा. ये विधेयक तो सांसद-नेताओं के खाने पीने के रास्ते बंद करता है. अण्णा और हम सबको क़ानून बनाने का अधिकार बिलकुल भी नहीं है. एक बात और - जब आप राजनीतिक नेता बन जाएँगे, नैतिकता भूल जाएँगे. यही परिपाटी रही है. जय हिंद.

  • 6. 18:36 IST, 31 दिसम्बर 2011 डा० उत्सव कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड, :

    केवल लालू प्रसाद ने ईमानदारी पूर्वक स्वीकार किया कि सरकारी लोकपाल (जो कि सचमुच कमज़ोर है ) सांसदों के लिए "डेथ वारंट" है. जब कमज़ोर लोकपाल का ये हाल है तो सशक्त लोकपाल भ्रष्ट सांसदों के लिए कितना भयंकर होगा, इसकी कल्पना हम आप भले न कर पायें, हमारे ये सांसद अच्छी तरह से जानते हैं. सशक्त लोकपाल के विरुद्ध ये सारे सांसद एक ओर हैं और दूसरी तरफ़ भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता है. अब जन-संसद में ये तय होगा कि जीत किसकी होती है.

  • 7. 20:15 IST, 31 दिसम्बर 2011 सौरभ:

    मुकेश, आपने बस दिल की बात कह दी. बात अंततः पक्ष लेने पर आकर रुक ही गई. लाख बार सोचा कि अन्ना और सरकार के बीच का कोई अच्छा-सा रास्ता निकल कर सामने आएगा और लोगों का (ख़ास करके मेरा) विश्वास लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था पर और बढ़ेगा. किन्तु हुआ क्या? सत्ता का बल आख़िरकार घमंड में बदल गया और हमारा विश्वास धोखे में. काश साल के बीतने के साथ-साथ बुरी चीज़ें भी बीत जातीं.

  • 8. 10:46 IST, 01 जनवरी 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    मुकेश जी, धन्यवाद बीबीसी के स्रोताओं को समझाने के प्रयास के लिए.

  • 9. 11:18 IST, 01 जनवरी 2012 himmat singh bhati:

    मुकेश जी आपने संसद के आखिरी दिन को ख़ूब अच्छे से देखा और उसका आंकलन भी बहुत सुंदर किया है. लेकिन आपका राजनीति में जाने का ख़्याल कुछ हजम नहीं हुआ. आप अभी बहुत ख़रा लिख पाते हैं लेकिन राजनेता बनने के बाद शायद ऐसे ना कह पाएं. आज के दौर की राजनीति तो अपने निजी हितों के लिए बदनाम है. आप अपने इस फैसले पर दोबारा विचार करें.

  • 10. 13:36 IST, 01 जनवरी 2012 ravi sawle:

    राज्यसभा में क्या होना चाहिए था, इस बारे में भी कृपया लिखिए.

  • 11. 19:00 IST, 01 जनवरी 2012 pramokumar.muzaffarpur:

    जब अल्पमत में ये हाल है तो अगर दोनों सदनों में बहुमत रहता तो क्या हाल होता. मुकेश जी 'सह' और 'मत' के ख़ेल में कौन कहां हैं आप ये सब जान रहे हैं.

  • 12. 12:41 IST, 02 जनवरी 2012 Sandeep Mahato:

    पहले बहुमत का बल दिखाकर सत्ता हासिल करना, तत्पश्चात सत्ता का बल दिखाना अर्थात चित भी मेरी और पट भी मेरी. यही परिभाषा रह गयी है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की. संसद की मर्यादा को छिन्न भिन्न कर दिया गया है. प्रधानमंत्री की बात जो आपने कही वो बिलकुल सही है सिर्फ़ इस सत्र के दौरान ही नहीं किसी भी सत्र में और किसी भी परिस्थिति में उनकी मुद्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता. ऐसा लगता है उन्हें कोई परवाह ही नहीं है. ब्लॉग बहुत अच्छा है मुकेश जी बहुत बहुत धन्यवाद.

  • 13. 13:33 IST, 02 जनवरी 2012 PRAVEEN SINGH:

    50 साल प्रधान -मंत्री बन कर माल मलाई मारी , और भविष्य में लोकपाल का पकौड़ा आम जनता को दिखा कर खुद लोकपाल बन जायेगें , और माल पानी की दूसरी पारी चालू .
    तेल देखो , तेल कि धार देखो .

  • 14. 16:42 IST, 02 जनवरी 2012 Chaand Shukla Hadiabadi:

    मुकेश साहब आपके सुलेख पे अर्ज़ किया है
    मनमोहन बन मोम का पुतला मौन मुद्रा में बिना भाव
    संसद में बैठा देख रहा था सोच रहा था दंतहीन हूँ
    प्रभाहीन हूँ दिशाहीन हूँ रोम राज के मैं अधीन हूँ

  • 15. 17:26 IST, 02 जनवरी 2012 उमेश कुमार यादव:

    हमारे नेताओं के गुणों को बेचारे अन्ना या उनके साथी क्या खाक समझेंगे. नेताओं के सामने ये सब बच्चे हैं. ये मरते मर जाएं पर लोकपाल कभी नही बनेगा इस देश में. क्या कोई नेता अपने डेथ वारंट पर खुद हस्ताक्षर करेगा. अगर लोकपाल बना भी तो इतना कमजोर कि उसकी हालत राष्ट्रपति जैसी ही होगी.

  • 16. 09:31 IST, 03 जनवरी 2012 PRAVEEN SINGH:

    पाठक और ब्लॉग लेखक , तनिक ठंडे दिमाग से सोचें .
    भारत में सीबीआई का दुरूपयोग होता है , विपक्ष को , और विरोध को कुचलने के लिए , कोई शक . लोकपाल का उपयोग भी ऐसे ही कार्य के लिए होगा , निश्चित मानिये , बाहुबली और सत्ताधीश अभिजात्य लोग मनमोहन जैसे मोहरे को लोकपाल बना लेगें और रिमोट कंट्रोल का प्रयोग करेगें .

  • 17. 10:14 IST, 03 जनवरी 2012 PUSHPAK:

    मेरे प्रिय भारतवासी मित्रगण , और ब्लॉग लेखक , आप के मनोरंजन हेतु , मैं वस्तुस्थिति के विषय मैं एक बात बताना चाहूँगा . सर्व श्री श्रीमान अटलजी ,आडवाणी जी ,सुषमाजी , और बीजेपी चौकड़ी को कुछ समय निकाल कर , सुबह और शाम , सोनिया मौसी से राजनीति की क्लास ले लेना ठीक होगा . वरना समय निकल जायेगा , जब राहुल भाई और तिकड़ी लोकपाल पद शुशोभित करगें , और तुम बगलें झांकते रहोगे .

  • 18. 13:46 IST, 03 जनवरी 2012 Devwrat Bhagat:

    मुकेश जी आपने सही और निष्पक्ष तरीके से अपनी बात रखी है,लेकिन राजनीति में प्रवेश के बाद शायद आपको अपनी पार्टी का पक्ष लेना ज़रुरी होगा,क्योंकि पत्रकारिता निष्पक्ष हो सकती है लेकिन राजनीति में जाने के बाद कोई भी नेता अपनी पार्टी का समर्थन करता ही है.बहरहाल इस ब्लॉग के जरिए अपना निष्पक्ष नज़रिया रखने के लिए धन्यवाद और सृजनात्मक कर्यों के राजनीति में कदम रखने के लिए शुभकामनाएं भी प्रेषित करता हूं.पर राजनीति में प्रवेश के बाद अगर आप ऐसे ही निष्पक्ष तरीके से लिखते रहे तो शायद यह एक बड़ा परिवर्तन ज़रुर लायेगा

  • 19. 10:53 IST, 04 जनवरी 2012 PUSHPAK:


    बेचारे मनमोहन , शायद सोच रहे होंगे ; कि ये डेमोक्रेसी है , तो फिर गुलामी कैसी होती होगी, दुविधा में होंगे कि मैं गुलाम वंश का हूँ या कि शेरे पंजाब .

  • 20. 12:56 IST, 05 जनवरी 2012 Shailendra Mishra:

    अगर आप किसी चीज़ या किसी इंसान का विद्रोह करते हैं तो इस बात का आख़िर कैसे विश्वास करेंगे कि आपकी मांग के अनुसार कार्रवाई भी होगी जब तक कि ऐसा करने के लिए ईमानदार लोग मौजूद ना हों. कुछ ऐसा ही अन्ना हज़ारे की टीम और सत्ताधारी यूपीए के बीच हुआ. मैं लोकपाल बिल के पास ना होने के लिए ना सिर्फ सरकार बल्कि विपक्षी बीजेपी को भी ज़िम्मेदार ठहराता हुं. अगर बिल एक बार संसद में पास हो जाता तो उसमें बाद में कई संशोधन किए जा सकते थे.
    .

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