हंगामा है क्यूँ बरपा
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस परिषद के वर्तमान प्रमुख मार्कंडेय काटजू ने भारत रत्न को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है.
एक ओर वे ग़ालिब और शरत चंद्र को भारत रत्न देने की वकालत कर रहे हैं दूसरी ओर खिलाड़ियों और फ़िल्मी कलाकारों को यह सम्मान देने का विरोध कर रहे हैं.
खिलाड़ियों के विरोध को सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के विरोध के रूप में देखा जा रहा है. और शायद दिलीप कुमार को भी.
भारत सरकार ने हाल ही में भारत रत्न की पात्रता की शर्तों में बदलाव किया है और प्रथमदृष्टया दिखता है कि सचिन तेंदुलकर को ही ध्यान में रखकर ये बदलाव हुआ है.
इस बीच ध्यानचंद से लेकर अभिनव बिंद्रा तक को भारत रत्न देने की मांग की जा चुकी है.
देश में बहुत से लोग होंगे जो मार्कंडेय काटजू की तरह सोचते होंगे. उनके मन में भी सवाल उठते होंगे कि आख़िर सचिन तेंदुलकर का सामाजिक सरोकार कितना है? वो तो अपने लिए खेलते हैं और अपने लिए पैसा कमाते हैं. लेकिन ऐसा सोचने वाले अल्पमत में ही हैं क्योंकि इस देश का बहुमत सचिन को ईश्वर मानता है.
ये मानने को जी नहीं चाहता कि मार्कंडेय काटजू को इस देश में (और बहुत हद तक दुनिया भर में) पुरस्कारों की राजनीति की जानकारी नहीं है.
राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के डॉक्टरों को किस तरह पद्म सम्मानों से नवाज़ा जाता रहा है इसे क्या वे नहीं जानते? क्या वे नहीं जानते कि मुख्यमंत्री किस तरह से चाटुकार क़िस्म के दोयम दर्जे के कवियों, लेखकों और कथित संस्कृतिकर्मियों को भी पद्मश्री दिलवाते रहे हैं.
ये मानना होगा कि कुछ ऐसे लोग भी इस बीच इस सम्मान के लिए चुने गए हैं जो वाकई इसके हक़दार थे.
भारत रत्न की सूची में कुछेक नामों को छोड़कर बाक़ी के बारे में कोई विवाद नहीं हो सकता.
विवाद इस बात पर भी नहीं हो सकता कि जीवन की हर किसी चीज़ की तरह पुरस्कार और सम्मान भी देश-काल की राजनीति के आधार पर तय होते हैं. ख़ासकर इस आधार पर कि इस देश-काल की राजनीति में उम्मीदवार की राजनीति क्या है.
शासक-प्रशासक अक्सर रेवड़ियाँ बाँटने के अंदाज़ में फ़ैसला लेते हैं. इसके पीछे किसी सुविचारित प्रक्रिया की उम्मीद उनसे नहीं की जानी चाहिए.
जब देश के बहुमत का राजनीतिज्ञों के ऊपर भरोसा ही उठ गया है तो फिर इस बात की ज़िद ही क्यों करना कि वे पुरस्कारों और सम्मानों के लिए सही या क़ाबिल लोगों को ही चुनेंगे.
आख़िर में वही शेर याद आता है, जिससे मार्कंडेय काटजू ने एक अख़बार में अपना लेख शुरु किया था -
जब तवक़्क़ो ही उठ गई ग़ालिब
क्यूँ किसी का गिला करे कोई.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
आपने बिलकुल सही कहा. पुरस्कार की राजनीति तो दशकों से हो रही है. मेरे एक गुरू कहा करते थे कि एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज अपने लेखकों, कवियों और कलाकारों का महिमा मंडल करता है. वहीं पिछड़े समाज सिर्फ़ नेताओं की पूजा करते हैं.
सचाई तो यही है कि अंधा बाँटे रेवड़ी, अपनों अपनों को दे. विनोद भाई अगर स्वयं प्रधानमंत्री होते तो उन पर भी ये कहावत चरितार्थ होती. जय हिंद.
बेहतरीन लेख
विनोद जी आपकी बात बिल्कुल ठीक है लेकिन अंदाज थोडा जुदा है. आपने गालिब को उधृत करते हुए कहा है कि
जब तवक्को ही उठ गयी गालिब,
क्यों किसी का गिला करे कोई.
लेकिन लोग गिला शिकवा करना ही छोड देगें तो यह शासकों को मनमानी करने की छूट नहीं मिल जाऐगी? शासकों की मानसिकता कितनी जटिल होती है इस पर शायद बहस की गुंजाइश नहीं है. यदि लोक भय इन शासकों के मन में न हो तो कल्पना करना भी कठिन है कि ये क्या-क्या न कर गुजरें. इस तरह की बहस शासकों को नियन्त्रित करने में सहायक होती है, पहले लोग नेतृत्व देते थे अब शासक बनना चाहते हैं.
पटवारी से लेकर सत्ता शिखर पर बैठे व्यक्तियों की सारी भाव-भंगिमा और लटके-झटके शासक होने या दिखने की कुठां को तृप्त करने से अधिक कुछ भी नहीं है. आज शायद ही कोई ऐसा नेता हो जिसके हटने से रिक्तता का अनुभव होगा ,बल्कि स्थिति इसके विपरीत ही है लोग इनसे इतना उकता जाते हैं कि इसी कारण दूसरी पार्टियों अथवा व्यक्तियों को पॉच साल बाद बदल देते है. यह बदलाव ऊब के कारण अधिक होता है.
काटजू साहब की बात में दम हो या न हो लेकिन किसी एक व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए नीतियों में परिवर्तन किया जा रहा हो तो यह अति है. कुछ समय पहले एक कलाकार ने भारत रत्न पाने के लिए इसी तरह सांसदों के बीच लॉबिग की थी उनकी बडी फजीहत भी हुई थी. और अब सचिन के लिए नियमों में परिवर्तन किया जा रहा है. यह बात अखरती है कि तिकडमों के जरिये भी भारत रत्न पाने की कोशिशें की जा रही है. भारत रत्न एक खास किस्म की उपलब्धि है इसे उसके मौलिक रूप में ही बने रहने देना चाहिए था. जैसे कोई जिद्दी बच्चा हर फूल को अपने लिए तोडकर ही संतुष्ट होना चाहता है तो यह गलत है. सब कुछ एक को ही नहीं मिल जाना चाहिए इस प्रकार की मानसिकता यह देश प्रेम की बात नहीं सिर्फ अंहकार है कि हर प्रकार की समृद्धि और सम्मान के शिखर पर मेरा ही अधिकार होना चाहिए. चाहे इसके लिए जोड-तोड ही क्यों न करनी पडे. यदि इस विवाद को छोड भी दिया जाए तो कौन ऐसा भारतीय है जिसे भारत रत्न नहीं कहना चाहिए, क्या जिन्हें नियमों से परे जाकर भी इस तरह भारत रत्न घोषित किया जाऐगा वे ही भारत रत्न होगें और हम नुक्कड के पत्थर ही रह जाएगें? हम सब भारत रत्न है. जिन्हें राजनीति करनी है वे ही रेवडियां बॉटें!
यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ हर मामले पर राजनीति शुरू हो जाती है.प्रतिष्ठित सम्मान्नों ने ही कुछ सम्मान बचा रखा था पर अब वो भी विवादों में घिर गए हैं. सर्वोच्च नागरिक सम्मान देश के नागरिकों को ही मिलना चाहिए जो वास्तव में इसके हक़दार हैं. चाहे वे जिस क्षेत्र से हों.
काटजू जी की खिलाडियों और कलाकारों की सामाजिक सरोकारिता के तर्क से मैं भी सहमत हूं, ये रूपए लेकर किसी भी चीज का....किसी भी चीज का विज्ञापन कर सकते हैं, बगैर ये देखे कि इससे आम लोगों पर क्या असर होगा, लोगों के सेहत पर क्या असर होगा.
गत वर्षों दुनिया का सबसे बड़ा और सम्माननीय नोबुल शांति पुरष्कार ओबामा को मिल जाने पर मेरे मुंह से अनायास फूट पड़ा:
नेहरु रहे तरसते , बोलें लोग लुगैय्या,
बिन नोबुल के गांधीजी नोबुल थे भैय्या.
जब दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार की ये हालत है तो भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले पद्मश्री से लेकर भारत-रत्न तक की तो बात ही करना मूर्खता होगी. लेकिन यह भी तो सोचिये कि जो पुरसाकार डा० राजेंद्र प्रसाद को मिला वही श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी मिला. क्या ये दोनों राजनेता एक जैसे सम्माननीय थे? कल हो सकता है ये पुरस्कार लालू और मायावती को भी मिल जाय. तब तो सब लोग मानेंगे कि इससे अच्छे तो सचिन तेंदुलकर ही थे. बहरहाल काटजू साहब को इतनी खरी बात कहने के लिए बधाई. इसलिए भी की ऊँचाइयों पर पहुँच जाने के बाद ज़बां दराज़ भी अपनी ज़बाने कटा देते हैं या प्रायः इसी लिए ऊँचाइयों पर पहुंचते हैं कि वे अक्सर बेज़ुबान होते हैं.
डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड, अमेरिका
प्रियवर वर्मा जी,
मेरी आपसे गुज़ारिश है कि हमारी पत्रकारिता रचनात्मक होनी चाहिए, पत्थरफेंकू नहीं.
मैंने महँगाई की एक रामबाण औषधि ईजाद की है. जब प्याज़ महँगा होता है तो मैं उसे नहीं ख़रीदता. सब्ज़ी महँगी होने पर भी मैं नहीं ख़रीदता. इसी तरह चीनी-गुड़ महँगा होने पर मैं लेना बंद कर देता हूँ. कपड़े सिर्फ़ एक-दो रखता हूँ. फ़ैशन नहीं करता. भात-रोटी सिर्फ़ चटनी या नमक के साथ ले लेता हूँ. इसलिए मुझे महँगाई बिलकुल नहीं सताती. आप ये समझ लें कि सरकार व्यापारी गणों का कुछ नहीं कर सकती. सरकार को कोई सरोकार ही नहीं आपसे हमसे.
विनोद जी आपका कहना उचित है कि सरकारें पुरस्कार देने में मनमानी करती हैं लेकिन अब तक इस प्रकार की मनमानियां एक दायरे में ही होती थी नियमों को ही किसी के लिए बदल दिया गया हो याद नहीं आता है।चाँद तक पहुँचने की कोशिश करना तो ठीक है लेकिन चाँद को ही अपने लिए घसीटने की मानसिकता गलत हैं, इसके निहितार्थ भयानक हैं. कल को कोई जिद कर सकता है कि मुझे परमवीर चक्र चाहिए क्योंकि मैने क्रिकेट के मैदान पर बहुत ही बहादुरी का काम किया है तो क्या इसके लिए भी परिवर्तन किया जाना चाहिए? विज्ञान, साहित्य समेत बहुत से क्षेत्र हैं जहाँ लोगों की उपलब्धियाँ दिल को लुभाती हैं. हमें उनका सम्मान करना सीखना होगा. जोड़तोड़ के ज़रिए इस प्रकार कुछ भी हासिल करना गलत है.
काटजू साहब अपने महत्वपूर्ण फ़ैसलों से चर्चित हुए. कोई अपने जीवन में अच्छा काम करता है तभी उसकी प्रशंसा होती है. कबीर साहब को भी भारत रत्न दिया जाना चाहिए क्योंकि उनके दोहे इस देश के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा हैं.
काटजू जी अब एक ज़िम्मेदार नागरिक की तरह हर विषय पर अपनी राय व्यक्त करते नज़र आते हैं. और जैसा कि ऐसे हर नागरिक की तरह होता है, उनकी बातें अब ज़्यादा प्रभावित नहीं करतीं. हो सकता है कि सचिन को भारतरत्न देने की बात करने वाले लोग किसी खास मक़सद से ऐसी बातों पर राजनीति कर रहे हों, लेकिन सचिन तेंदुलकर सिर्फ एक 'खिलाड़ी' नहीं है, ये मानने में ज्यादा दिक्क़त नहीं होनी चाहिए. जिस सचिन के 'मैं पहले भारतीय हूँ' कहने पर कुछ लोग राजनीति करने का बहाना ढूंढते हों और ऐसे लोगों का मुंह बंद करने के लिए सारे राजनेता, बुद्धिजीवी और अन्य लोग अगर एक सुर में बात करते हैं तो वो सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं हो सकता. जिस 'खिलाड़ी' के बारे में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति अगर ये कहें की 'मैं क्रिकेट देखता हूँ, इसलिए नहीं कि मैं इस खेल के नियम जानता हूँ. मैं उस व्यक्ति को देखना चाहता हूँ जो जब भी खेलता है, मेरे देश की उत्पादकता 50% फीसदी कम हो जाती है.' तो वो महज़ एक खिलाड़ी नहीं हो सकता! लता मंगेशकर सिर्फ़ एक गायिका नहीं हैं, बिस्मिल्लाह ख़ान सिर्फ़ एक वाद्ययंत्र नहीं बजाते थे. कभी कभी ऐसा होता है कि कोई एक खिलाड़ी/कलाकार खेल से ऊपर उठ जाता है और बाहर के लोग सिर्फ़ उस खिलाड़ी की वज़ह से पूरे देश को जानने लगते हैं.
ये मानने की वजहें हैं कि खिलाड़ियों को पुरस्कार देने में राजनीति हो, लेकिन क्या केवल पुरस्कार देने में ही राजनीति नहीं होती? विनोद वर्मा जी ने सच लिखा है कि "ये मानने को जी नहीं चाहता कि मार्कंडेय काटजू को इस देश में (और बहुत हद तक दुनिया भर में) पुरस्कारों की राजनीति की जानकारी नहीं है." और ऐसे अलोकतांत्रिक और अपारदर्शी संस्था के अंदर पूर्ण आदर्शवाद की उम्मीद बचकाना ही है और कुछ नहीं!
मार्कंडेय काटजू का कहना बिल्कुल सही है कि सचिन या किसी भी खिलाड़ी को भारत रत्न बिलकुल नहीं मिलना चाहिए. सचिन सिर्फ़ अपने रिकॉर्ड के लिए खेलते हैं देश के लिए नहीं. कल कोई भारत रत्न जब टीवी पर मंजन और साबुन बेचता नज़र आएगा तो अच्छा लगेगा? मिर्ज़ा ग़ालिब और अल्लामा इक़बाल जैसा कोई शायर नहीं हुआ है, मोहम्मद रफ़ी जैसा कोई गायक नहीं हुआ है आखिर इन्हें भारत रत्न क्यों नहीं मिलना चाहिए?
विनोद जी आपका और काटजू जी का विचार सही है. ये तो सदियों से चल रहा है. पहले राजा महाराजा इतिहासकारों को पैसा देकर अपना इतिहास लिखवाते थे. ये परंपरा लगभग हर जगह पर देखी जा सकती है कि तुम हमारा बखान करो हम तुम्हें सम्मानित करेंगे. सबको मालूम है कि ये ग़लत है पर फिर भी ऐसा होता है.
मै काटजू जी के इस विचार से सहमत नहीं हूँ कि खिलाडियों (खेलों) और फिल्म जगत का कोई सामाजिक सरोकार नहीं होता. आज अगर देखा जाय तो परोक्ष रूप से ही सही खेल और फिल्में ही पूरे भारत को एकजुट किये हुए है भले ही सचिन सिर्फ अपने लिए खेलते हों उनकी सेंचुरी पर खुश सारा देश होता है. और समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित फिल्में ही करती है.
नेताओं का क्या है , कुछ रत्न इन्हें दीजिए ये आपको पुरस्कार में भारत दे देगे.
भैय्या ये तो सब राजनीती का खेल है और हिंदुस्तान में 98% जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सार्थक है . अब तो पब्लिक में बोलने का दम भी नही बचा है क्योंकि उनके बचे खुचे दम को महंगाई नाम के कीड़े द्वारा खोखला करवा दिया गया है .
बहुत हद तक परिस्थितिवश ये सब कुछ हो रहा है.
काटजू जी की खिलाडियों और कलाकारों के सामाजिक सरोकार के तर्क से मैं भी सहमत हूं,