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विरोध एक मौलिक हथियार है

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 03 जनवरी 2012, 11:28 IST

साल बदले तो बदले ईमान न बदले. बीता साल ईमानदारी और विरोध का रहा है.

भारत की युवा पीढ़ी ने विरोध को देखा, सुना और समझा. अरब देशों की पीढ़ियां विरोध को उसकी राजनीतिक चरम सीमा तक ले गईं और बिना रक्तपात के तख्तापलट भी हुआ है. विरोध की अवधारणा कोई नई नहीं है लेकिन आवाज़ उठाने की हिम्मत में एक नयापन ज़रुर महसूस हुआ है.

वैश्वीकरण के इस दौर में विद्रोही और विरोध के मायने नकारात्मक बना दिए गए हैं लेकिन अगर दुनिया अपने इतिहास पर गौर करे तो विरोध जितनी सकारात्मक सोच कोई और नहीं है.

हर नया विचार पुराने विचार के विरोध पर ही खड़ा होता है. बदलाव विरोध से ही शुरु होता है चाहे वो बदलाव वैचारिक हो, सामाजिक हो या राजनीतिक.

भारत के महाकाव्यों को ही उठा कर देख लीजिए चाहे रामायण हो या महाभारत. हर विचार के पीछे विरोध महत्वपूर्ण है. क्या सीता ने विरोध नहीं किया था जब उन पर श्रीराम ने सवाल उठाए थे. सीता का विरोध इस स्तर पर था कि उन्होंने वापस राम के महल में जाने से उचित धरती में समा जाने को समझा.

अगर अर्जुन ने अपने धर्म के विरोध में शस्त्र त्यागने की कोशिश न की होती तो श्रीकृष्ण गीता का पाठ शायद ही पढ़ाते. बौद्ध धर्म की अवधारणा हिंदू धर्म की कुरीतियों के ख़िलाफ़ ही जन्मी होगी और यही बात जैन धर्म के बारे में भी कही जा सकती है.

चारवाक का उदाहरण सबके सामने है जिन्होंने अपने समय में प्रचलित धार्मिक अवधारणाओं का विरोध किया और भोगवादी जीवनशैली को अपनाने का विचार दिया.

कबीर का 'निर्गुण' विरोध का ही प्रतीक है कुरीतियों के ख़िलाफ़ जिस पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं.

यही कारण है कि विरोध को हमेशा महत्व दिया जाता रहा है. हां क्षणिक लाभ के लिए लोग भले ही विरोध न करने का मंत्र देते रहे हों लेकिन हम सभी जानते हैं कि सही मुद्दे पर विरोध कभी बेकार नहीं होते.

बिना विरोध के न तो कोई सुधार हुआ है और न होगा. हम जहां और जिन परिस्थितियों में रहते हैं उसको बेहतर करना सभी की ज़िम्मेदारी है और इसके लिए विरोध एक मौलिक हथियार.

इसलिए विरोध जारी रहे बस मुद्दे ईमानदार हों.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:03 IST, 03 जनवरी 2012 रातुल सौम्य त्रिपाठी :

    सच कहा आपने ...विद्रोह अतिआवश्यक तत्व है विद्रोह ही पुनर्निर्माण कि वज़ह है , परन्तु एक बात यहाँ यह समझनी ज़रुरी है कि विद्रोह पहले स्वयं के अंदर का समाप्त करना होगा जो कि प्रत्येक अंतर्मुखी के अंदर स्वतः ही उपजता है ! बहुत सी वज़ह हो सकती हैं ..और होती भी है ! परन्तु जब हम स्वयं के विद्रोह के साथ किसी अन्य पुनर्निर्माण कि योजना बनाते हैं तो वह दिशाहीन हो जाता है और वहीँ से हम ही इस विद्रोह का नाम बदनाम करते हैं !

  • 2. 13:33 IST, 03 जनवरी 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIAARABIA:

    सुशील जी लिखा तो बहुत शानदार है लेकिन लगता है आप ने कांग्रेसी चश्मा (ऐनक ) लगा रखा है इसलिए पर्दे के पीछे आप कांग्रेसियों कि वकालत करते है .रहा सवाल विरोध का न जाने कितने बीबीसी श्रोताओ ने हर तरह का विरोध जताया पर बीबीसी के सिर पर जूँ तक नही रेंगती है .

  • 3. 13:47 IST, 03 जनवरी 2012 BHEEMAL Dildarnagar:


    विरोध करना ही एक मात्र लक्ष्य न बन जाये हमारा . ये पूर्ण नकारात्मक है.
    हिन्दू जीवन धर्मं एक विशाल वट वृक्ष है और इसके पत्ते - डाली को काट काट कर फेंकने वाले मीडिया और बुद्धिजीवी लोग हैं . किन्तु वट वृक्ष अपनी जगह जमा है , बाहर और घर दोनों के विरोध के उपरांत भी .

  • 4. 14:19 IST, 03 जनवरी 2012 naval joshi:

    सुशील जी आपने कहा कि विरोध जारी रहे बस मुद्दे ईमानदार हों. इसके लिए रामायण और दूसरे अनेकों प्रसगों का आपने हवाला दिया है, खाडी देशों में हो रही उथल-पुथल सहित जिन घटनाओं और तर्को से आप आशान्वित हैं निश्चित ही वे आज, विरोध के प्रखरतम प्रतीक हैं और ये मुद्दे भी ईमानदार हैं लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि खाडी देशों में उभर रहे इस विरोध को कैसे व्याख्यायित किया जाएगा?यह विरोध अन्ततः कहॉ तक जाएगा ,यह किसी के सामने स्पष्ट नहीं है लोगों में अब घबराहट भी पैदा होने लगी है कि कौन सा मार्ग सही है. पहले विध्वंस कर लिया जाए फिर निर्माण के बारे में चिंतन किया जाएगा या जिस तरह की क्रान्तियां समाजवादी दौर में हुई वह सही मार्ग है कि बेहतर सपने के साथ शुरूआत हो और इसका पूरा ब्लू प्रिंट हो ,विरोध इसलिए ही न हो कि दूसरे को मिटा ही देना है विरोध का मतलब बेहतर तक पहुॅचने की जद्दोजहद ही हो इससे अधिक कुछ नहीं ,जो लोग विरोध करते हैं अथवा विरोध का दमन करते हैं वास्तव में एक समान उद्वेग और आवेश से भरे होते हैं इस तरह के विरोध में कोई सृजनात्मकता हो सकती है यह मानना कठिन है. यह मौके की बात है कि किसका पासा सही बैठता है. विरोध और सही मुद्दे के बावजूद यदि नजरिया साफ नहीं है तो अराजकता जैसी ही स्थिति हो सकती है. खाडी के देश और कमोवेश हम भी उसी दौर से गुजर रहे हैं जहॉ लोगों में विरोध की भावना है और मुद्दे भी सही हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि सही क्या है.लोग गलत को नकार रहे हैं यहॉ तक बात सही है लेकिन यह नकार गलत लोगों द्वारा भी प्रायोजित हो सकता है , या गलत लोग इस विरोध में अपना हित साध सकते हैं जैसा कि बहुत से पश्चिमी देशों ने खाडी क्षेत्र में किया भी है.यह गम्भीर ख़तरा है बेहतर बात यह है कि हम सही मार्ग को चुनकर उस पर चल पडें जो राह में रोडा अटकाएगा उसका अपनी भाषा और अपने तरीके से जवाब दिया जाएगा इसके लिए गोलीबारी और सशस्त्र विद्रोह प्रारम्भिक कदम नहीं हो सकता है यह अन्तिम और न्यूनतम मात्रा में ही हो सकता है. विरोध शस्त्र से पहले शास्त्र से किया जाना जरूरी है शास्त्र के आभाव में किया गया कोई भी विरोध लोगों को भटकाता ही है. विरोध उतना ही हो जैसे कि एक सर्जन शल्य क्रिया में कुशलता से खराब अंग को बाहर निकाल देता है. लेकिन विरोध के नाम पर अराजक लोगों के हाथ में चाकू का समर्थन नहीं किया जा सकता है.

  • 5. 14:27 IST, 03 जनवरी 2012 Manmohan:

    आजकल जो विरोध विश्व भर में हो रहे हैं वे पूर्णतयः निस्वार्थ नहीं है उनके पीछे राजनीतिक उद्देश्य छिपे है

  • 6. 14:43 IST, 03 जनवरी 2012 Sanjay Kareer:

    मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि बदलाव विरोध से ही शुरू होता है. देखने का नज़रिया है... आप नकारात्‍मक ढंग से देखेंगे तो विरोध से बदलाव होता नजर आएगा, सकारात्‍मक ढंग से देखेंगे तो समर्थन से भी ऐसा होता दिखेगा. फिर भी अंतिम बात से सहमत हूं कि विरोध जारी रहे बस मुद्दे ईमानदार हों..अच्‍छा ब्‍लॉग.

  • 7. 17:29 IST, 03 जनवरी 2012 suresh kumar pandey:

    यह बहुत अजीब बात है कि विद्रोह किसी सत्ता के प्रति उपजती है तो यह समझ लेना चाहिए कि सत्ता में ज़रूर कोई बुराई है . एक प्राचीन कहावत है. लेकिन यह तथ्य सार्वभौमिक सत्य नही है . मैं बात करना चाहोंगा मुग़ल हुकूमत की जिसमें सलीम (जहाँगीर ) अपने पिता के ख़िलाफ विद्रोह कर दिया था . वह पर मामला सत्ता की बुराई नही बल्कि अनारकली का प्यार था .

  • 8. 18:28 IST, 03 जनवरी 2012 rahul kumar:

    पर सुशील भाई विरोध की ईमानदारी कौन परखेगा . अपने समय के हर विरोध के मुद्दे को ईमानदार नही माना जाता है . मुद्दों की ईमानदारी की अवधारणा तो समय के साथ बदलती रहती है .

  • 9. 20:42 IST, 03 जनवरी 2012 archana chaturvedi:

    सुशील जी आपने लेख बहुत ही अच्छा लिखा है. ये बात अपनी जगह बहुत सही है कि विरोध का नाम भले ही नकारात्मक प्रभाव डालता हो पर परिणाम सदैव सकारात्मक ही रहता है.वैसे अभी बहुत से मुद्दे है जिन्हें विरोध की आवश्कता है.

  • 10. 21:16 IST, 03 जनवरी 2012 himmat singh bhati:

    सुशील जी, आपने बहुत कुछ खरा-खरा लिखकर अपनी सूझबुझ का परिचय दिया है और जो भारत सहित दुनिया की जनता क्या चाहती है उसका उल्लेख शानदार तरीके से किया है , नए साल खुशियों से भरा हो हम सब के लिए यह कमाना करता हूँ ,सुशील जी जब स्कूल की छुट्टी होती है तो नादान बच्चे तेज़ी से स्कूल से बहार घर की ओर भागते है ,उन्हें छुट्टी मिलने पर कितनी ख़ुशी होती है ,जैसे किसी कैद से निकल कर भाग रहे है ,पर उन के अभिभावक उसके भले के लिए उस पर बंदिश लगाने का क्रम जारी रखते है ,दूसरी और आप देखे ट्रैफिक की लाल लाइट के बाद समझदार लोग भी इसी तरह से भागते हुआ दिखाई देते है ,और टकराते भी है फिर भी सबक नही लेते इन स्कूली बच्चों की तरह ,क्या फर्क रह जाता है नादान और समझदारो में , बच्चे अबोध की तरह उछल कूद कर खेलना चाहते है ,अब यहाँ देखने वाली बात है कि बच्चे अपनी तरह से चलना चाहते है और घर वाले ऐसा नही चाहते है ,याही हालत जाति और धर्म पर चलने वालो की है या आज के युग में यह कहे कि राजनीतिक लोगो की है ,वह बदलाव नही चाहते है और अपनी हकूमत आज भी थोपना चाहते है ,यह आज भी यही समझते है कि वह यही चाहते है कि बदलाव न हो और उन की बाते मानी जाती रहें , पर वह यह भूल रहे है कि समय किसी की बंदिश में नही. समय को कोई रोक नही सकता है समय परिवर्तनशील है मौसम की तरह पर उस में समय लगता है , अब वैश्वीकरण और मुक्त बाज़ार का चलन निकल चला है और नयी नयी खोजें और नयी तकनीकि इधर से उधर पहुच रही है ,तो परिवर्तन आना स्वाभाविक है ,इस परिवर्तन को कट्टर पंथी और लगातार सता का सुख भोगने वाले नही पचा पा रहे है इसलिए उन का इमान डोल रहा है , और खूसट लोगो को यह बर्दाश्त नही हो पा रहा है ,सुशील जी यहाँ इमान दोल रहा है ,खुशहाल लोग परिवर्तन को सहन नही कर पा रहे है ,पर वह यह नही समझ पा रहे है कि उन्होंने मुक्त बाज़ार के चलन को अपनाया है ,जिससे लोगो में परिवर्तन आ रहा है उसे रोकने की नाहक गलती कर रहे है ,जब कि संविधान में मिले अधिकारों को हटा नही सकते है ,भारत या दुनिया में देखो संविधान में मिले हक़ हर कोई चाहता है ,विधि का विधान और प्राकतिक नियम या हमारा संविधान या हमारा कानून जब यह वचन रखता है कि सभी को न्याय मिलेगा तो यह जनता के चुने हुए नाटक क्यों कर रहे है और जनता हित की बात क्यों नही सुन रहे है ,जो बहुमत में नही है . बहुमत जनता ने दिया है इसका विरोध कितने समय कर पायेगे यह एक झूटी तसल्ली से ज़्यादा नही है.

  • 11. 22:25 IST, 03 जनवरी 2012 Sandeep Mahato:

    आपने बिलकुल सही कहा "बदलाव विरोध से ही शुरू होता है" भारत में बीते साल जो कुछ भी हुआ वो दर्शाता है की समाज एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. और समाज जब इस दौर से गुजरता है तो काफ़ी उथल पुथल होती है. मगर विरोध तो हमेशा ही होती है व्यवस्था के खिलाफ परन्तु जब तक विरोध का स्वरुप बड़ा नहीं होता वह नज़र नहीं आता. इस साल के हुए विरोध प्रदर्शनों से लगता है, विरोध कब कौन सा विराट रूप ले ले कहा नहीं जा सकता एक थप्पड़ ने पुरे अरब जगत में तहलका मचा डाला सिंहासन उलट गए सत्ता बदल गयी.

  • 12. 16:44 IST, 04 जनवरी 2012 E A Khan, Jamshedpr:

    इस बात से तो कोई इंकार नहीं कि विरोध प्रोग्रेस की पहली कड़ी है लेकिन इसको अरब देशों के सन्दर्भ में देखना वाजिब नहीं. जिस तरह के हिंसात्मक विरोध अरब देशों में हुए हैं इस को वही लोग उचित मान सकते हैं जो इसको प्रायोजित करने में अपना योगदान देते रहे हैं. इस तरह की खूनी क्रांतियाँ मानवता को शर्मशार करती हैं. जिन हुक्मरानों को बुरी तरह मारा गया है उन्हीं को वहां की जनता सर आंखों पर उठाये रखती थी. उनकी जय जयकार करते नहीं थकती थी. इन क्रांतिकारियों ने उन्हें उनके जीने का अधिकार भी उनसे छीन लिया. उन्हें बुरी तरह से मारने में अपनी शान समझी. उन्हें अपनी बात कहने का भी अवसर तक नहीं दिया. यह कौन सा न्याय है. इस तरह के हिंसात्मक विरोध तो उस युग में हुआ करते थे जब एक कबीला दूसरे कबीले पर आक्रमण कर के हारने वाले कबीले को मौत के घाट उतार दिया करता था.

  • 13. 05:01 IST, 05 जनवरी 2012 ashish yadav:

    सुशील जी, आपने सही कहा है व्यवस्था परिवर्तन विरोध से ही होती है, लेकिन आजकल विरोध करने का तरीका बदल गया है .देश में विरोध क नाम पर तोड़- फोड़ .रेल पटरियो को उखाड़ना ,सार्वजानिक संपत्तियो को नष्ट करना ,और हंगामे ने ले लिया है .कम से कम ये विरोध का तरीका नही है ,लेकिन बिडम्बना है कि हमारे देश के नेताओ को विरोध का गाँधीवादी तरीका समझ में ही नही आता और अन्ना हज़ारे का आन्दोलन इसकी जीती जागती मिसाल है .

  • 14. 11:37 IST, 05 जनवरी 2012 शकील अहमद:

    सुशील जी आपने विरोध को सही ठहराया है आपकी इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि विरोध करने की क्षमता ,विकास के लिए बहुत जरूरी है. लेकिन विरोध की क्षमता और पहलमदमी ही पर्याप्त नहीं है हममें विरोध करने की योग्यता भी हो यह बहुत जरूरी है. आपने खाडी देशों में घट रही घटनाओं का जिक्र किया है और परोक्ष रूप से इनका समर्थन भी किया है, लेकिन मुझे लगता है कि यहॉ आपका आंकलन गलत हो सकता है क्योंकि खाडी क्षेत्रों में सत्ता विरोध की जो लहर चली है वह एंकागी है केवल सत्ता प्रतिष्टान ही गलत है यह नहीं कहा जा सकता है हमारे वे सामाजिक मूल्य परम्परायें और हमारी आध्यात्मिक चेतना सभी कुछ इसके लिए जि़म्मेदार है जो कि वर्षों से तानाशाही और राजशाहियों को न सिर्फ सहन करती आ रही थी बल्कि इनके पोषण के लिए भी यही ज़िम्मेदार थी.अनके आभाव में कोई राजशाही या तानाशाही हम पर शासन नहीं कर सकती थी यदि पहले इनको चिन्हित किया जाता तथा राजशाही और तानाशाही के साथ-साथ इनके ख़िलाफ़ भी आन्दोलन का रूख होता तो इसे शायद यह वास्तविक और सार्थक विरोध कहा जा सकता था लेकिन ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है, किसी भी परिस्थिति के लिए सारी जिम्मेदारी दूसरों पर डालकर उनका सिर कलम कर देना ही क्रान्ति अथवा विरोध नहीं है. आज वहॉ कथित क्रन्तिकारी भी वही कर रहे हैं जैसा कि अब तक शासक करते आये हैं फिर दोनों में फ़र्क क्सा है? 84 वर्ष के एक व्यक्ति कों न्याय के नाम पर स्ट्रेचर में इधर-उधर घसीटने को न्याय कैसे कहा जा सकता है ? उन उपायों के साथ इस गुनाहगार को सहन भी किया जा सकता था कि भविष्य में इस तरह की मानसिकता के लोग कम से कम राज्य के शिखर तक न पहुँच सकें. जहॉ तक गुनाहगार को सजा देने का तर्क है तो इस कडी को कहीं न कहीं तो समाप्त करना ही होगा अन्यथा यह अनवरत रूप से चलती ही रहेगी जिसके पास ताकत और सत्ता होगी वह पराजितों को मारता ही रहेग.मुझे लगता है कि विरोध के नाम पर खाडी देशों में आंदोलनों का भविष्य बहुत ही सिमित होता जा रहा है यह विरोध नहीं बल्कि बदला अघिक दिखाई देने लगा है विरोध बहुत ही व्यापक बात है वह पहले अपनी कुवृत्तियों, वासनाओं और महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ जाग्रत होता है ,सडकों पर इसका प्रदर्शन तो बाद में ही दिखाई देता है. कुवृत्ति,वासना और महत्वाकांक्षा मेरी या दूसरे की नहीं होती कि अपनी को बचा लिया जाए और दूसरों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक दिया जाए इसे वास्तविक विरोध नहीं कहा जा सकता है।विरोध समग्रता में ही हो सकता है. अधूरा विरोध राजनीति है आंदोलन नहीं.

  • 15. 02:20 IST, 06 जनवरी 2012 Rohit Shrivastava:

    एक सकारात्मक दृष्टिकोण पर रौशनी डालने के लिए धन्यवाद. मेरी नज़र में विद्रोह एक क्रिया है जो समाज में सकारात्मक बदलाव और नवीनता की नींव रखता है,लेकिन विद्रोह का तरीका हमेशा शांतिपूर्ण और तर्कपूर्ण होना चाहिए क्योंकि विद्रोह भले ही समाज को नए रास्ते दिखाता हो लेकिन कई दफ़ा इसका नकारात्मक पहलू हमें शर्मसार करता है. इतिहास गवाह़ है कि विद्रोह से हमने कुछ हासिल किया है तो बहुत कुछ गंवाया भी है. विद्रोह के पीछे उचित और पाक-साफ़ नीयत होनी चाहिए,अगर विद्रोह के पीछे की नीयत ठीक नहीं है तो उससे समाज और राष्ट्र में अशांति होती है. हर चीज़ और क्रिया के दो पहलू होते हैं फर्क सिर्फ देखने वालों में होता है,जिसके हक़ में कार्य किया गया हो वो उसे सकारात्मक दृष्टिकोण से और जिसके खिलाफ़ किया गया हो वो उसे नकारात्मक दृष्टिकोण से देखता है.


  • 16. 19:45 IST, 07 जनवरी 2012 manish abhinandan:

    आपने बिलकुल सही फ़रमाया.

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