कौआ कान ले जाए तो क्या करें?
अभी जयपुर से लौटा हूँ. गया था एक कहानी के सिलसिले में. हुआ यह कि ख़बर आई कि जयपुर के हवा महल के साथ ज़्यादती हो गई. हालाँकि यह ख़बर एक दिन पहले रेडियो पर सुनाई जा चुकी थी पर एक दो शताब्दी से भी पुरानी धरोहर से छेड़छाड़ इतनी महत्वपूर्ण ख़बर थी कि इसे बिना अपनी आँख से देखे माना नहीं जा सकता था.
हालाँकि प्रथम दृष्टि में ख़बर उतनी बड़ी नहीं लगी थी लेकिन दूसरे अख़बारों और चैनलों में जिस तरह से इस घटना को पेश किया जा रहा था, मन में शक उपजा कि कहीं ऐसा न हो कि हम ग़लती कर बैठे हों और अपने श्रोताओं पाठकों को हमने घटना की सही तस्वीर नहीं पेश की हो.
बीबीसी में काम करने के कुछ फ़ायदे हैं तो कुछ नुक़सान भी हैं. फ़ायदा यह है कि आपकी बातों को लोग गंभीरता से लेते हैं, सच मानते हैं नुक़सान यह है कि आप को बड़े बुज़ुर्गों की बनाई हुई इस साख को बनाये रखने के लिए बहुत ही ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. तो क़िस्सा मुख़्तसर यह कि मैं पहुंचा जयपुर यह देखने कि हवा महल को सही में कोई बड़ा नुकसान तो नहीं हो गया.
वहां जा कर अपनी आँख से देखा तो पता लगा कि हवामहल अपनी जगह पर खड़ा हुआ है और उसकी सेहत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है.
पहले लगा कि वही क़िस्सा हो गया बचपन वाला कि कौआ कान ले गया तो दौड़े कौए के पीछे कान नहीं टटोला. ख़ैर ज़रा घूमा-भटका तो पता लगा कि इस ख़बर को जिस तरह से पेश किया गया उसके पीछे कई चीज़ें थीं.
पहली तो थी सरकार के भीतर की खींचतान. हवा महल को पानी की तेज़ बौछारों से धोने का आदेश जिस किसी ने भी दिया हो लेकिन बाद में उसे कोई अपने सर लेने तैयार नहीं था. हाँ हर किसी की कोशिश यह थी कि यह ठीकरा उस सर पर जा कर फट जाए जो सर उसको पसंद ना हो.
लेकिन इसके अलावा भी कुछ था.
मीडया के मेरे अपने भाई बन्दों ने ख़बर को बहुत ही बढ़ा चढ़ा कर सनसनीखेज़ तरीके से पेश किया था. ख़ैर कारण जो भी हो हवा महल के चारों तरफ़ रहने वालों से प्रतिक्रया मांगी तो लोगों ने कहा कि उन्होंने हंस कर बात उड़ा दी.
यानी जो जानते थे वो हँसे पर मैं नहीं हंसा एक बार फिर डर गया.
डर गया क्योंकि याद आया कि दिसंबर 1992 में मैं भोपाल में रहता था, शहर में अयोध्या में विवादित ढांचे के गिरने के बाद दंगे कुछ काबू में ही आये थे कि एक अख़बार में ख़बर छप गई कि एक समुदाय के लोगों ने एक लड़कियों के कॉलेज के हॉस्टल में घुस कर दूसरे समुदाय कि कई लड़कियों के स्तन काट लिए और दंगे फिर बुरी तरह से भड़क गए.
मैं अपने एक परिचित के साथ शहर भर के अस्पतालों में घूमा कि चलो कुछ लड़कियां आई होंगीं इलाज कराने, लेकिन एक लड़की नहीं पहुँची क्योंकि ख़बर सरासर झूठ थी जो कि मेरी नज़रों में साबित हुआ.
इस ख़बर से जिनको जिस-जिस तरह के फ़ायदे नुकसान होने थे हो गए, लेकिन जिन महोदय ने यह जानकारी सामने रखी थी वो आज भी मेरी जानकारी में पत्रकार हैं.
अगर सरकार या अदालत को मीडिया पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंप दीजिये तो वो ग़लत ख़बरों का छपना नहीं बंद करेगें बल्कि वो केवल उन ग़लत ख़बरों का छपना रोकेंगे जो कि उन्हें नहीं भातीं.
कहने वाले कह देंगे कि झूठी ख़बरों की वजह से मीडिया की साख ख़त्म हो जाएगी और वही इसका सबसे बढ़िया हल होगा. मिलावट वाले जन्म जन्मान्तरों से दूध में पानी और सब्जी में रंग मिला रहे हैं. उपभोक्ता इस बात को जानता है, लेकिन फिर भी लेता है क्योंकि कोई और चारा नहीं.
इसी तरह से ख़बर वाला मिलावट करे तो भी क्या चारा है.
तो भैया एक पत्रकार के रूप में तो यही सही है कि जितनी बार कोई कहे पकड़ो कौआ तुम्हारा कान ले गया, उतनी बार कान टटोलो फिर भी कौए के पीछे दौड़ो लेकिन एक पाठक के तौर पर क्या करूँ.
आपके पास है कोई हल? हो तो ज़रूर बताना.

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अविनाश जी हमेशा की तरह बढ़िया लेख है. ये जयपुर वाली ख़बर मैंने भी बीबीसी रेडियो पर सुनी थी. और चूंकि बीबीसी पर सुनी थी तो गंभीर तो होनी ही थी. और फिर आपने एक जानकार पुरातत्वशास्त्री की बाइट भी सुनवाई थी जिन्होंने कहा था कि हवा महल को पानी से धोना उसी तरह है जैसे बारिश में मकान धुलता है, जिसके बाद चिंता कुछ कम हुई. लेकिन आपने सही कहा कि मीडिया को निष्पक्ष होकर ख़बर देनी चाहिए.
अविनाश जी, आपने बहुत ही सटीक लिखा है, जिस अख़बार की आप बात कर रहें है उसकी वेबसाइट पर अगर एक बार आप निगाह डालेंगे तो पाएंगे की सत्तर फ़ीसदी ख़बरों को इसी तरीके से पेश किया जा रहा है. हालाँकि ये बहुत ही दुखद है, समाचार पत्र एक तरीक़े से समाज का आईना होते हैं. अगर उनमें दोयम-सोयम दर्जे की ख़बरें प्रकाशित होंगी तो जनता का उन पर से विश्वास उठना लाजिमी है. ये बात उस समय और भी गंभीर हो जाती है जब एक राष्ट्रीय स्तर का समाचार पत्र इस तरह की बातों को तरजीह दे और बढ़ा-चढा कर पेश करे.
खबरें बेचने वालों और उस से कमाई करने वालों का हाल तो अविनाश दत्त जी आप ने बता दिया. अफ़वाह फ़ैलाने और सनसनी फैलाने वाली खबरें कितनी घातक होती हैं या हो सकती हैं उसे किसी नाप में नहीं नापा जा सकता. कुछ दिन में मीडिया के साथ भेड़िया आया भेड़िया आया वाला किस्सा हो जाएगा उसकी बातों पर कोई भरोसा नहीं करेगा.
आप जैसे पत्रकार ही बी. बी. सी. की विश्वसनीयता बनाए रखे हुए हैं. शानदार लेख के लिए धन्यवाद.
ऐसी सच्ची बात केवल बीबीसी पर ही संभव है.
अविनाश जी, हवा महल के बारे में मिडिया द्वारा फैलाई गई खबर के बारे में आप क्यों परेशान हो रहे हैं लोगों को अब इसकी आदत सी हो गयी है.
मिडिया के अलग अलग ब्रांड भी अपनी ओर लोगों का ध्यान चाहते हैं और इसके लिए वह तमाम हथकंडे अपनाते हैं मिडिया अब कम्पनियों का सामान बेचते बेचते थक चुका है, अब वह अपनी हैसियत जतलाना चाहता है कि हममें समाज को प्रभावित करने की ताकत है इसलिए हमारे बांड को मिडिया के अन्दर एक खास दर्जा मिलना चाहिए । हवा महल के बारे में जो सनसनी बनाने की कोशिश की गयी वह इसी का नतीजा हो सकती है.
मिडिया प्रतिष्ठान भी अब अपनी कीमत के बारे में न सिर्फ सचेत है बल्कि एक उत्पाद की तरह बेचने के लिए तरह-तरह के उत्पात तक करने को तत्पर है। मिडिया का आशय माध्यम से है, माध्यम जितना सुचालक हो या कहा जाना चाहिए कि अपने प्रति जितना अनजान हो वही ठीक मिडिया हो सकता है लेकिन इन लोगों को लगता है कि अखबार और टेलीविजन ही मिडिया होता है तो यह गलत है अखबार और टेलीविजन मिडिया की भूमिका निभा रहे हैं जब तक ये माध्यम बने रहेगें तभी तक ये मिडिया हैं लेकिन ये मिडिया के पर्याय नही हैं आज हर चीज बिकने को तैयार है । नेता से लेकर डाक्टर, वकील,अध्यापक हर संवेदनशील वर्ग अपने को बेचने की मारामारी में है फिर पत्रकार अथवा प्रकाशकों से ही ईमानदारी की उम्मीद करना कुछ ज्यादती ही हैं.
अविनाश जी हर हार कि तरह आपने इस बार भी कमाल कर दिया.
अविनाश जी, सही कहा आपने कि बुजुर्गों की बनाई साख को बनाए रखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है. बीबीसी को लोग आज भी उसकी साख के लिए याद करते हैं. हवामहल वाली खबर खूब चर्चा में रही है. भारत में एक महान टी.वी. चैनल भी जिसे इस तरह की घटनाओं को नमक मिर्च लगा कर पेश करने में पी.एचडी. हासिल है. कभी उसे दुनियां खत्म होने का अंदेशा होता है...कभी भूत दिख जाता है....कभी आत्मा नृत्य करती है। आपका आलेख बढ़िया है...पर प्रश्न का उत्तर मेरे पास भी नहीं है.
क्या बात है. शाबाश बीबीसी हिन्दी. इसी तरह से लिखते रहें.
अविनाश जी क्या बात है, अपने व्यंग के साथ गहरी बात कह डाली... अभी तक तो बस हम ही मीडिया वालों को गालियाँ देते थे पर वो तो आपके रिश्तेदार ही हैं आपने तो खुद ही उनके खिलाफ मोर्चा दाल दिया. पर सच्चाई तो सच्चाई है मीडिया वाले तील का ताड़ और मसालेदार तो बनाते ही है और कॉपी पेस्ट भी करते हैं लेकिन उससे भी खतरनाक तब होता है जब वो ख़बरों को अपने हिसाब से रंग दे डालते हैं.पर आज की मीडिया बहुत ही भ्रमित है और समाज के वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर अप्रासंगिक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है.
एक समय था जब राजा राम मोहन राय जैसे लोग सती प्रथा, बालविवाह जैसे समस्याओं पर लिखकर समाज को भ्रमित होने से बचाया. प्रेमचंद जैसे लेखकों ने अपनी लेखनी से समाज में फैले कुरीतियों से समाज को बचाने का प्रयास किया. पत्रकारों को अपने धर्म का अहसास होना चाहिए.कई समाचार संस्थाएं जो भ्रष्ट नेताओं द्वारा पोषित होते हैं खबरों को अपने हिसाब से ढाल कर सरकार की गलतियों को नज़रंदाज करते हैं.
ऐसे में बस बीबीसी का ही भरोसा है इसलिए तो आज भी इतने सारे टीवी चैनलों और इन्टरनेट समाचार माध्यमों के रहते हुए भी जब तक बीबीसी पर समाचार नहीं सुन लेता लगता है कुछ अधूरा रह गया. धन्यवाद है बीबीसी को और उसमें काम करनेवाले लोगों को.
आपने बहुत अच्छा लिखा है. यह बिलकुल सही बात है. अखबारों की अफवाहों से हम भी हैरान हो गए थे. लेख के लिए धन्यवाद
आँखे भर आयी.बेहद अच्छा लेख है वुसतुल्लाह जी,
अविनाश दत्त जी आपकी प्रतिक्रिया बढ़िया है.
मैं आपकी लेखनी से बहुत प्रभावित हूँ. मीडिया को चाहिए कि वो जो भी समाचार मिले उसे पुष्टि कर के ही प्रसारित या प्रकाशित करे,
शानदार ब्लॉग के लिए धन्यवाद. ये वाकई दिलस्चप और ज्ञानवर्धक है.
मैं पहली बार आपका ब्लॉग पढ़ रहा हूँ, आपके ख़याल वाजिब हैं, लिखते रहें, मैं हमेशा पढ़ूँगा.