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मृत्यु शय्या पर 'अमर' दोस्त

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|शुक्रवार, 13 जनवरी 2012, 02:47 IST

रात के 11 बजे थे. ऑफ़िस से घर लौटा ही था कि फ़ोन की घंटी बजी. देखा बचपन के एक दोस्त का फ़ोन था. पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे हमेशा ही असमय आने वाले फ़ोन किसी अनिष्ट की आशंका से झकझोरते हैं. फ़ोन उठाया, मित्र की आवाज़ भारी-भारी थी.

सदमा, दुख और विषाद उसकी आवाज़ से साफ़-साफ़ प्रतीत हो रहा था. हाल न चाल, सीधे सपाट शब्दों में पूछा- अमर के लिए कुछ कर सकते हो. मेरे पास सवालों का अंबार था. लेकिन उसके पास कहने के लिए बहुत कम शब्द थे. कैसी विडम्बना है 'अमर' दोस्त मृत्यु शय्या पर है.

अमर का नाम आते ही दिलो-दिमाग़ फ़्लैश बैक में चला गया. बचपन के वो दिन. कोई दूरी नहीं, कोई अंतर नहीं, कोई भेद नहीं, पढ़ने-लिखने के कम, खेलने-कूदने और हँसने-हँसाने के दिन. पिताजी की पोस्टिंग एक छोटे से ब्लॉक में थी. एक प्राइवेट स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत की और फिर सरकारी स्कूल में आ गए. उन दिनों दोस्त की परिभाषा सिर्फ़ दोस्त थी. भेद नहीं था. बाल मन पर उसका कोई असर भी नहीं था.

अमर हँसने-हँसाने और ख़ूब बतियाने वाला लड़का था. कभी उसने न अपनी पीड़ा बताई और न ही पूछ पाया. बहुत दिन बाद जाना कि उसकी पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी और छोटे-मोटे व्यवसाय से घर चलता था. लेकिन उन दिनों इन सब चीज़ों की फ़िक्र कहाँ होती थी. पापा का तबादला होने के बाद भी वहाँ से नाता नहीं टूटा. हाँ कई दोस्त रोज़गार पाने की होड़ में वहाँ से बांबे-दिल्ली और न जाने कहाँ-कहाँ चले गए.

जितना हो सका, वहाँ के दोस्तों से संपर्क रहा. पुराने दोस्तों का हाल-चाल भी मिलता रहता था. पता चला अमर पारिवारिक परिस्थितियों से परेशान उड़ीसा चला गया है और ट्रक चलाता है. महीनों और कभी-कभी तो दो-तीन साल में एक बार घर आना होता है.

वर्ष 2007 की बात थी, लंदन से घर आया था. अमर भी उन दिनों आया था. उसे पता चला तो मोटरसाइकिल पर मिलने आया. वर्षों बाद उससे मिला था. एकदम चंगा, हँसता-हँसाता वही अमर. लगता था जैसे कई वर्षों की भड़ास कुछ घंटों में निकाल लेगा. पुरानी बातें खुली, ख़ूब हँसी-ठिठोली हुई और फिर वो चला गया.

उसी अमर के बारे में एक बुरी ख़बर ने मुझे झकझोर दिया. दोस्त फ़ोन पर बोल रहा था- अमर का आख़िरी स्टेज़ है, कुछ कर सकते हो. सवाल कई थे, लेकिन दोस्त के एक जवाब ने चुप करा दिया.

बोला- अमर को एड्स है. किसी को उसने बताया नहीं. पिछले दो साल से परेशान था. उड़ीसा से लौटा भी तो चुपचाप पटना चला गया. वहाँ महीनों भर्ती रहा. लेकिन मामला गंभीर था, इसलिए डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है और उसकी बूढ़ी माँ को उसे घर ले जाने को कहा है.

मैं चुप था, कुछ बोल नहीं पा रहा था. क्या कर सकता था सिवा कुछ आर्थिक सहायता के. फिर भी ग़ैर सरकारी संगठनों से जुड़े मित्रों और कुछ पहचान के डॉक्टरों से बात की. सबका जवाब नकारात्मक था. पता चला कि उसका बोलना-चालना भी बंद है और वो कई दिनों से बेहोश है.

घर में बूढ़ी माँ और एक बेटी है. पत्नी और पिता गुज़र चुके हैं. बाक़ी रिश्तेदार एड्स का नाम सुनकर ही उस परिवार से नाता तोड़ चुके हैं. ट्रक ड्राइवरों में एड्स आम बात है. वर्षों तक घर से दूर रहने के कारण वे यौनकर्मियों के संपर्क में आ ही जाते हैं.

लेकिन 2012 के भारत में आज भी कई इलाक़ों में सुरक्षित सेक्स की बात करना वर्जनीय है और एक बार एड्स से पीड़ित हो जाना श्राप. अमर शायद इन दोनों पाटों में पिस गया और समय पर मुँह नहीं खोल पाया.

दो-तीन महीने बाद घर जाना है. नहीं जानता कि मैं उसे देख पाऊँगा या नहीं. ये भी नहीं जानता कि किसी अनिष्ट की स्थिति में उसकी बूढ़ी माँ का कैसे सामना करूँगा.

लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि ये सिर्फ़ मेरे दोस्त अमर की कहानी नहीं. हम बहुत आधुनिक हो गए हैं, लेकिन अब भी कई मामलों में पुरातनपंथी ही हैं. एड्स और एड्स पीड़ितों को लेकर रुढ़िवादी सोच की गहरी पैठ है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:51 IST, 13 जनवरी 2012 ashish yadav,hyderabad:

    पंकज जी मार्मिक लेख है, लेकिन सोचने कि बात है आज हर आदमी रंग रूप और कपड़ों से आधुनिक दिखना चाहता है लेकिन विचारो में आज भी खोखलापन है. बातें आदर्शवादी करेंगे लेकिन मौका पड़ते ही गिरगिट कि तरह रंग बदल लेते हैं. एड्स जैसी बीमारी के प्रति कितने ही जागरूकता अभियान. चलाये जाये लेकिन जब तक हम अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे अमर जैसे लोगो को अछूत ही समझा जाएगा. भोले भाले ग्रामीण लोगो को दोष देना ठीक नहीं पढ़े लिखे लोग और कई बार तो डॉक्टर तक एड्स के मरीजो से दूरी बना लेते हैं. आखिर गलती किसकी है हमारी सोच कि या एड्स के प्रति डर या सरकारी कोशिशो कि.

  • 2. 17:24 IST, 13 जनवरी 2012 Y K SHEETAL:

    जिन्दगी जीना भी एक ट्रक चलाने जैसा ही है, कभी किसी होटल में ठहर जाना तो कभी तेजी से किसी का ओवरटेक करना, इस दौर में सब कुछ पीछे छुट जाता है और रफ़्तार ही सब कुछ बन जाता है. बेहद मार्मिक पोस्ट.

  • 3. 22:00 IST, 13 जनवरी 2012 kumar abhimanyu:

    एक आदमी को कैसे पता चलेगा कि उसे एड्स है. क्रुप्याबताने का कष्ट करें.

  • 4. 11:28 IST, 14 जनवरी 2012 Masood Khan:

    ये वाक़ई ये छू लेनेवाला और मार्मिक प्रसंग है. ये सच है कि समाज की सोच की वजह से आज भी लोग एड्स के बारे में बात करने से बचते हैं. लोगों में जानकारी का अभाव भी इसकी एक बड़ी वजह है.

  • 5. 13:57 IST, 14 जनवरी 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    प्रियदर्शी भाई, बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है दिल को झकझोर के रख दिया.
    विषय बड़ा ही गंभीर है और गहराई से अधिक गहरी आप की अपनी भावना. किन्तु आप और हम संसार की सोच को नहीं बदल सकते.
    आजकल यदि कोई खातापीता पढ़ालिखा परिवार दहेज ना मांगे विनम्र हो ऐसे परिवार को समाज हीन दृष्टी से देखता है. यही कोई गुंडा नेता या घूसखोर अधिकारी हो तो हज़ारों लड़कीवाले उसके आगे पीछे फिरेगें. यही सच है भारत का प्रियदर्शी जी.

  • 6. 14:03 IST, 14 जनवरी 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    क्या कहें किससे कहें, आँख मैं आंसू आ जाते हैं पंकज जी.
    एक मेरे रिश्तेदार हैं, हॉस्पिटल में, मैं उनको कहूं कि चलिए मरने से पहले
    मैं एक बार कोशिश करता हूँ सेवा से स्वस्थ करने कि.
    उधर से जवाब आता है, तेरी नीयत ठीक नहीं है मेरे प्रति.
    अब मैं क्या करूँ क्या कहूं किससे कहूं या चुप रहूँ

  • 7. 15:13 IST, 14 जनवरी 2012 Talib Anwer:

    पंकज जी अमर की कहानी पढ़ी तो आँख से आंसू आ गए. न जाने लोग अपनी जिन्दगी को इतनी परेशानी मैं क्यों डाल लेते है. बहुत ही मार्मिक कहानी है लकिन ये तो सच है के बुरे दिनों को मनुष्य खुद ही अपनी जिंदिगी मैं लाता है

  • 8. 22:14 IST, 14 जनवरी 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH ,SAUDIA ARABIA:

    पंकज जी मेरे ख़्याल से तो आपका दोस्त अमर बहुत क़िस्मत वाला है जिसके बारे में बीबीसी के ज़रिए करोड़ों लोग जान सके लेकिन ऐसे न जाने कितने अमर होंगे जिनके बारे में कोई जान तक नहीं पाता. आपने इस मार्मिक घटना के ज़रिए एड्स के बारे में बीबीसी के स्रोताओं और पाठकों को जो सोचने पर मजबूर किया है उसकी हम सराहना करते हैं.

  • 9. 23:39 IST, 14 जनवरी 2012 Umesh Yadav:

    आपका लेख पढ़कर प्रतिक्रिया देने से ख़ुद को रोक न सका. अभी बीती एक जनवरी को पता चला कि गांव का एक बचपन का साथी बिछुड़ गया. उसे भी एड्स हुआ था. वो ट्रक चलाता था. घर वाले एक वर्ष से बस उसकी मृत्यु का इंतेज़ार कर रहे थे. दवा नहीं थी, दुआ का भी सहारा नहीं था. जिसे एड्स हो उसे दुआ तो दूर कोई उसे देखना भी नहीं चाहता. ऐसे वाक़ये अब अब आम हो गए हैं.

  • 10. 14:20 IST, 15 जनवरी 2012 Munish Katiyar:

    ये एक बहुत ही भावुक कर देनेवाली ख़बर है और साथ ही इससे ये भी पता चलता है कि आधुनिक भारत में शिक्षा की वास्तविकता क्या है. हमें लोगों को शिक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए.

  • 11. 16:09 IST, 15 जनवरी 2012 abhinav singh:

    पंकज जी आपकी संवेदनशीलता अनुकरणीय है.

  • 12. 17:59 IST, 15 जनवरी 2012 राम शंकर:

    सच में यह केवल 'अमर' की कहानी नहीं है बल्कि हज़ारों इंसानों की कहानी है जो एड्स से पीड़ित हैं. चलो माना कि अमर ने एक अनजान गलती की जिसका वह फल भुगत रहा है, पर इसमें भला उसकी बेटी का क्या कसूर जो उसे यह सब भोगना पड़ रहा है. और फिर कई एड्स रोगी तो ऐसे भी हैं जो मां के गर्भ से इस विभीषिका को सा‌थ लेकर आते हैं...इसमें उनका क्या दोष....आखिर इंसान कब जागेगा...

  • 13. 11:16 IST, 17 जनवरी 2012 M Dhayal:

    मुझे लगता है कि आपकी कहानी का एक दूसरा भी पहलू है जिसपर ध्यान नहीं दिया गया. आपके दोस्त की पत्नी की भी मृत्यु हो चुकी है और संभव है कि वो भी संक्रमित हो गई हों और उन्हें इसका पता लगने का मौक़ा भी नहीं मिल पाया हो. अब गंभीर प्रश्न ये है कि आपके दोस्त को पता था कि वो जो कर रहा है उससे संक्रमण हो सकता है, उसकी जान जा सकती है. मगर हो सकता है कि पत्नी निर्दोष रही हो, उसकी पत्नी अपने पति की ग़लतियों के कारण मारी गईं. अगर आपके कार्यक्रम या लेखों से किसी भी एक निर्दोष पति या पत्नी की जान बचती है तो ये मानवता के लिए बड़ा उपकार होगा.भारत में अभी इसे लेकर जागरूकत जगाने की ज़रूरत है.

  • 14. 03:14 IST, 18 जनवरी 2012 पुष्पक मेहता:

    प्रिय पंकज भाई, अपना अनुभव हमसे बाँटने के लिए धन्यवाद. बहुत सारी चीज़ें हैं जो हमारे हाथ में नहीं, मगर एक चीज़ है, कि हम अमर भाई की बेटी और माँ का ध्यान रख सकें. हम उनके लिए कुछ वित्तीय मदद का प्रबंध कर सकते हैं.

  • 15. 16:15 IST, 18 जनवरी 2012 E. A. Khan, Jamshedpur :

    इस मतलबी दुनिया में बहुत कम लोग मिलते हैं जो आपकी तरह दोस्ती का हक अदा करते हैं और उनसे जो कुछ हो सकता है करने में नहीं चूकते. आपने अपने दोस्त की पीड़ा को महसूस किया और अपने गम को बाँटने के लिए ब्लॉग में जगह दी. यह आपके विशाल और संवेदनशील दिल की गवाही देता है. आप की इस पीड़ा में हम आप के साथ हैं.

  • 16. 19:16 IST, 18 जनवरी 2012 आनंद:

    पंकज जी, एक एड्स पीड़ित की कहानी को आपने बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया है. दोस्ती का धर्म निभाने के साथ-साथ आपने एड्स पीड़ितों की हालत का सजीव चित्रण किया है. काबिले तारीफ़. लेकिन एड्स पीड़ितों की सुनता कौन है. ख़ून का रिश्ता रखनेवाले ही छोड़ देते हैं तो दूसरे कौन हमदर्दी दिखाएँगे. डॉक्टर भी उससे नफ़रत करते हैं, इलाज के बजाय उसकी जेब काटने की फ़िराक में रहते हैं.

  • 17. 22:23 IST, 18 जनवरी 2012 अखंड प्रताप सिंह:

    धन्यवाद पंकज जी.

  • 18. 19:12 IST, 19 जनवरी 2012 हिम्मत सिंह भाटी:

    हम दुआएँ ही कर सकते हैं पंकज जी.

  • 19. 20:35 IST, 23 जनवरी 2012 योगेश दुबे:

    प्रिय पंकज जी, आपके दोस्त के बारे में जानकर बहुत दुःख हुआ.

  • 20. 18:45 IST, 25 जनवरी 2012 BINDESHWAR PANDEY BHU:

    केवल आत्मसंयम ही ऐसे दुर्दिन से बचने का उपाय है. हाँ जहाँ तक अमर का सवाल है हम उसके तथा उसके परिवार के खुशहाली की कामना करते हैं.

  • 21. 03:20 IST, 26 जनवरी 2012 खगेंद्र:

    इतना ही कहना चाहूँगा कि एड्स को लेकर अभी भी जनसाधारण में जागरूकता की अत्यंत कमी है, अभी भी हम पुराने आदर्शों और रूढ़िवादी विचारधाराओं को ढोते जा रहे हैं पर इसके दुष्परिणाम अत्यंत पीड़ादायक एवम् अमानवीय हैं. जागरूकता बढ़ाने के लिए धन्यवाद.

  • 22. 09:43 IST, 26 जनवरी 2012 pankaj:

    अत्यंत दुःखद कहानी.

  • 23. 16:58 IST, 27 जनवरी 2012 Sehar:

    दुःखद मगर आँखें खोलनेवाला.

  • 24. 17:50 IST, 07 फरवरी 2012 amit thakur:

    मैं लेख से पूरी तरह सहमत हूं. लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि हम इस बात को समझें कि एड्स क्या है और इससे कैसे बचा जा सकता है. मेरे ख़्याल से इसका एक ही हल है और वो है जागरुकता बढ़ाना और हमें इसी पर ध्यान देना केंद्रीत करना चाहिए.

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