ये दिल्ली और वो दिल्ली!
जब दिल्ली के बारे में अपने विचार काग़ज़ पर उतारने का मौक़ा मिला, तो यमुना किनारे जाने से ख़ुद को रोक नहीं पाई...क्योंकि शायद यमुना नदी ही सबसे बड़ी गवाह है दिल्ली में तेज़ी से हुए बदलाव की.
मजनूँ का टीला गुरुद्वारे के पास और तिब्बती कॉलोनी के ठीक पीछे, सड़क की भीड़-भाड़ से दूर एक ठहराव है, जो मजबूर करता है अपने अतीत को फिर से जीवित करने को.
कहने को तो मैं 'असली दिल्लीवाली' हूं, क्योंकि मेरा जन्म और परवरिश यहीं हुई, लेकिन जिस दिल्ली में मैंने बचपन गुज़ारा, वो आज की दिल्ली से बहुत अलग है.
मुझे याद है, जब मैं पांच साल की थी, तब इसी दिल्ली में मेरे दादा-दादी के पास खेत और गाय-भैंसें हुआ करती थीं. शहर का जो इलाक़ा आज रोहिणी के नाम से जाना जाता है, वो एक समय जंगल हुआ करता था. वहीं हमारे खेत थे, जो बाद में सरकार ने ज़बरन ख़रीद लिए थे.
याद है मुझे, मेरी मां खेत से लौटते हुए अपने सिर पर गाय-भैंसों के लिए चारा लेकर आती थी. हमारे 'घेर' (तबेले) में चार भैंसे और एक गाय थी. मुझे और मेरे भाई-बहनों को हर साल बस नए बछड़े या बछिया को देखने की उत्सुकता रहती.
अब न तो वो 'घेर' अपनी जगह है, न ही वो हमारा वो देहातनुमा जीवन... हम अब 'रोहिणी वाले' जो हो गए हैं.
अजीब विडंबना है कि जिस ज़मीन पर कभी हमारे ही खेत होते थे, उसी ज़मीन की एक टुकड़ी हमें सरकार से ख़रीद कर अपना आशियाना बनाना पड़ा.
इसकी पृष्ठभूमि ये है कि उस समय दिल्ली में हो रही 'उन्नति' की लहर ने मेरे मां-बाप के सपनों को भी छुआ.
और फिर एक दिन उन्होंने ठानी कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और प्रगतिशील वातावरण देने के लिए उन्हें गांव (समयपुर, बादली) से निकल कर किसी मॉडर्न कॉलोनी में जा कर बस जाना चाहिए. और फिर हम रोहिणी आ गए.
यहां आकर हमें दिल्ली की 'शहरी हवा' लगी और उसके अनुरूप हमने अपनी ज़िंदगी को ढाल लिया.
ये ब्लॉग लिखते समय मैं ये दावे से कह सकती हूं कि दिल्ली में ऐसे सैंकड़ों नौजवान होंगें, जिनके जीवन ने भी मेरे जीवन जैसा ही मोड़ लिया होगा.
आख़िरकार, ऐसे कितने ही जंगलों और खेतों में इस शहर का विस्तार हुआ है पिछले कुछ दशकों में.
मेरी नज़र में दिल्ली उस विशाल वृक्ष का नाम है, जिसकी शाखाएं तेज़ी से फैल रहीं हैं, लेकिन फिर भी इसकी छाया सभी पर एक समान नहीं पड़ती.
इस पेड़ पर 'सपने' नामक करोड़ों रंग-बिरंगे फल लटकते हैं. किसी की छलांग उन फलों को लपक लाती है, तो किसी को सिर्फ़ उन फलों को दूर से देखकर ललचाने का ही मौक़ा मिल पाता है.
बड़ा ही विचित्र शहर है दिल्ली.
यहां की सड़कें और चौड़े फ़्लाईओवर दिन के उजाले में इसकी समृद्धि बयान करते हैं, तो रातों को वही सड़कें और फ़्लाईओवर चीख-चीख कर यहां की ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते हैं.
आज तक ये 'दिल्लीवाली' भी इस शहर के विरोधाभासी स्वरूप को समझ नहीं पाई है. आख़िर है क्या दिल्ली?
ये सवाल ख़ुद से करते ही, मेरे दिमाग़ में विभिन्न तस्वीरें उभर आती हैं--
दिल्ली उस गुफ़्तगू में बसती है, जो डीटीसी की बसों में बैठे सरकारी 'बाबुओं' के बीच होती है.
दिल्ली उस मेट्रो ट्रेन में बसती है, जिसमें अमीर से अमीर और ग़रीब से ग़रीब लोग एक दूसरे से चिपक कर सफ़र करते हैं.
दिल्ली उस नन्हे से बच्चे में बसती है, जो चंद रुपए कमाने के लिए सड़क के बीचों-बीच कलाबाज़ियां दिखाता है.
दिल्ली उस मध्यम-वर्गीय इंसान में बसती है, जो नोएडा, गुड़गांव या ग़ाज़ियाबाद में एक घर ख़रीदने का सपना रखता है.
दिल्ली उस बूढ़ी अम्मा में बसती है, जो निज़ामुद्दीन दरगाह आने वालों के जूते-चप्पल संभालने के लिए तीन रुपए चार्ज करती है लेकिन आशीर्वाद मुफ़्त देती है.
दिल्ली उस रिक्शेवाले में बसती है, जो यहां रहते-रहते, यहां के तेज़ी से भागते संघर्ष का आदी हो गया है.
वैसे दिल्ली उस मिज़ाज में भी बसती है, जिसमें हर नियम का तोड़ किसी न किसी तरीक़े से निकाल ही लिया जाता है.
मेरे दिमाग़ में घूम रही इन सभी तस्वीरों के बीच का आपस में एक नायाब कनेक्शन है, जो कई ख़ामियों के बावजूद भी इस शहर को सही मायनों में 'सपनों का शहर' बनाता है.

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शालू जी, एक अच्छा चित्रण करने का प्रयास किया आपने. लेकिन आपने जिन बिंदुओं को छोड़़ दिया, वे हैं दिल्ली की रामलीला, दिल्ली के जागरण...दिल्ली की एक और छवि है. आधुनिक राजा-रानी (मंत्रिगण और उनके चेले) को अकूट संपत्ति देने वाली दिल्ली. समस्त भारत का शोषण करने वाली दिल्ली. सड़ते नालों, कचरे के पहाड़ वाली दिल्ली. भूख से मायूस दिल्ली, लाचार दिल्ली.
ये सोच कर बुरा लगता है कि दिल्ली भारत की राजधानी है और एक अंतरराष्ट्रीय शहर है. जो लोग यहां पैदा हुए हैं और यहीं रहते हैं, वो शायद दिल्ली के आदी हो जाते हैं. लेकिन यहां निरंकुश विकास हो रहा है, सरकार का ढीला नियंत्रण है और कमाने में व्यस्त यहां की जनता अपने ही अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के बारे में नहीं जानती.
वैसे जिस तरह से आपने दिल्ली का चित्रण किया है, वो ठीक है परंतु कुछ उसके सकारात्मक पहलु, जो गांवों में रहने वाले शिक्षित लोग अपने सपनों को साकार कराते हैं, मुझे लगता है आपने कुछ ऐसा ही किया न?
शालू जी, पुरानी दिल्ली को आपने बखूबी शब्दों में ढाला है. आज की दिल्ली हाई-टेक और तेज़ रफ़्तार दिल्ली है. जहां आदमी मशीन बन गया है. लोग दो जून की रोटी की ज़द्दोजहद में फंसे हैं, तो एक दूसरे के लिए समय नहीं बचता है. गाय, भैंस पालना तो दूर की बात, लोगों के लिए सर छिपाने के लिए भी नगर-निगम के पाइप का सहारा लेना पड़ता है. निर्मल नीर बहाने वाली यमुना गंदे नाले में बदल चुकी है. बुज़ुर्गों और महिलाओं की जान असुरक्षित है. और ये सब उस दिल्ली में होता है जो सत्ता का केंद्रहै. बरसों का गौरवमई इतिहास समेटे दिल्ली आज घपलों, घोटालों की दिल्ली बन चुकी है. फिर भी दिल्ली के हमदर्दों को उसकी दुर्दशा दिखाई नहीं देती है.
शालू जी ने जिस दिल्ली की कथा लिखी है, वैसी ही कथा कुछ दूसरे राज्यों की भी है. इनके ढोर,घेर,खेत खलिहान और वो महिलाएं जिनकी तस्वीर अब दिल्ली को ख़राब लगती हैं, यानि भारत के गाँव जिन्हें दिल्ली मुहँ फाड़कर रोज निगल रही है, केवल दिल्ली ही नहीं हरियाणा, राजस्थान,उत्तर प्रदेश के आलावा भी और प्रदेशों के गाँव और उनकी पहचान को निगलती हुई. 'दिल्ली की नियति' दिल्ली बड़ी सुहानी लगती है और हर आदमी दिल्ली की चाह और आस रखता है, क्या उसकी भी एक दिल्ली है जहाँ उसके लिए आशियाने गढ़े जा रहे हैं. पता नहीं........
पर इस दिल्ली में जब पूरब की ओर से आने वाली ट्रेनें अपनी छतों पर लादकर "सर पर बोझा ढ़ोने वाली औरतें" लेकर आती हैं तो उनकी वापसी पर उनकी शक्लें देखने लायक होती हैं, जैसे कभी शालू जी की माएं सर पर चारा लेकर आती हुई नज़र आती रही होंगीं. आज वह गाँव कहीं न कहीं खोता जा रहा है. अब जो गाँव नज़र आता है उसमे खेत पर जाती हुई महिलाएं भी कानों पर मोबाईल से सुसज्जित होती हैं और स्कूल जाने वाली लड़कियाँ भी 'यूनिफार्म और मोबाईल से लैस". शालू जी अभी मैं दो दिन पहले ही गाँव से लौटा हूँ वहां भी चाइना मेक 'चोर बत्तियां ही नहीं' नाना प्रकार के एल ई डी लेम्प और आधुनिक यन्त्र धड्दले से फल रहे हैं सड़कें भी कुछ चौड़ी हो रही हैं और आधुनिक कारें भी खेतों के किनारे दिखाई देने लगी हैं , क्योंकि "यमुना एक्सप्रेस वे" किसौगत उधर भी पहुँचाने का अंदेशा अब उन गाँव को भी है, पर दिल्ली तो न जाने कब से दिल्ली ही है. नई भी पुरानी भी, पर उत्तर प्रदश आने वाले दिनों में केवल 'इतिहास का उत्तर प्रदेश होगा. नए बंटवारे में उत्तर प्रदेश को ही नहीं छोड़ा है. सब कुछ बनेगा पर उत्तर प्रदेश नहीं होगा. तब हमें बहुत याद आयेगा अपना गाँव 'उत्तर प्रदेश का वह गाँव जिसमें वैसे ही ........बहुत सारी माएं सर पर 'गट्ठर उपला घड़ा और न जाने क्या लादे नज़र आती थीं. पर दिल्ली तो दिल्ली ही रहेगी गाँव को निगलकर भी.
शालू जी, आपने सही लिखा है कि किसी भी सत्य की गवाह नदियां ही होती हैं. यमुना ने दिल्ली के पाप और पुण्य, दोनों को धोया और बटोरा है. नतीजातन, वो आज खुद मैली हो गई है. केंद्र सरकार का संस्कृति विभाग यमुना आरती की प्रथा शुरू करावाता, तो नई पीढ़ी को इससे प्रेरणा मिलती.
शालू जी, आपने एक गांव की पली पीढ़ी की मानसिकता को अच्छे से उजागर तो किया है लेकिन अगर लुट्यंस की दिल्ली की बात करें, तो ये हमेशा से ही ऐसी रही है. तब गोरे अंग्रेज़ थे, आज काले अंग्रेज़ वहां हैं, और लूट जारी है. कहने को तो ज़ाहिर है कि विकास अपने साथ कुछ लोगों की बर्बादी ही लाता है, पर उसे उन्नति का अभिन्न अंग मान कर कुछ मुआवज़ा दे कर पल्ला झाड़ लिया जाता है. हमारे आज के भारत में ऐसे कई शहर हैं जिनकी दासतां एक दम मिलती-जुलती है, परंतु गांवों की मानसिकता को त्याग कर शहरी मानसिकता में आम आदमी अपनी आम ज़रूरतों को भूल गया है. आप जैसे मिजाज़ रखने वाले शायद इसमें कुछ बदलाव ले आएं. पर उम्मीद बहुत कम है. हमारी सुभीक्षा.
शालू जी नमस्ते !!
बदलते परिवेश और सहरों का अच्छा चित्रण है यह लेख. अथार्थ भी यही है. परिवर्तन ही है जो नियत और निरंतर है. दिल्ली ही नहीं हमारे देश के हर शहरों का यही हाल है और उन सहरों के आस-पास के गाँव का भी. अच्छा लेख है, लेख लिए धन्यवाद!!
शालू जी, आपका ये अवलोकन अत्यधिक सराहनीय है. आपने इतने सूक्ष्म ढंग से अपने बात रखी है कि दिल्ली की याद ताज़ा हो गई. इसके लिए आपका धन्यवाद.
दिल्ली का दिल्ली होना केवल दिल्ली की वजह से नही है. हमें और दिल्ली को दिमाग में यह भी रखना होगा कि दिल्ली की दमक तभी अच्छी लगेगी जब उसमें सारे देश की चमक झलके ..दिल्ली को इस गुमान में बिलकुल नही रहना चाहिए कि भारत तो बस दिल्ली में बसता है..
शालू जी, दिल को छू गया आपका लेख. मैं भी मूल रूप से गांव का ही रहने वाला हूं पर पिछले 22 साल से महानगरों की ठोकरें खा रहा हूं. आज भी जब मौका मिलता है, तो गाय को दुलारने और बछड़ों की अल्हड़ अदाएं देखने गांव चला ही जाता हूं. धान की कटाई के बाद फेरी वाले मुरमुरे लेकर खेतों में आते हैं तो उनकी मिठास मुंह में पानी भर देती है. अभी भी पानी आ रहा है. रोहिणी के दिल्ली होने का दर्द मैं समझ सकता हूं. मुझे लगता है कि बहुत जल्द ही बुलंदशहर से लेकर सोनीपत तक सब दिल्ली हो जाएगा. पर क्या आपको लगता है कि दिल्ली इतना बड़ा बोझ संभाल पाएगी या फिर आमची मुंबई की तरह ये भी दम तोड़ता शहर बन कर रह जाएगा?
बहुत अच्छा लिखा है. दिल्ली ने हमेशा बाहर से आने वाले अनजान लोगों को अपनाया है. मैंने यहाँ रोज़ी रोटी कपड़ा और मकान के सपने देखने वालों की हसरतें पूरी होते देखी हैं. दिल्ली का दिल बहुत बड़ा है. दिल्ली तो बस दिल्ली है.
शालू जी , आपने दिल्ली कि वास्तविक स्थिति को बदलते परिवेश के साथ हम भारतीयों के दिलो दिमाग में उपस्थित किया. हम भी यही सोचते है कि जिस दिल्ली में अधिकतर सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक संस्थानों का केंद्र है तथा जो राष्ट्रमंडल खेल पूरे देश में विकेन्द्रित कर करवाने चाहिए था, वह भी सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित रहा तब भी हमारी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अपनी बुनियादी समस्यायों से क्यों नहीं ऊपर उठ पा रही है .
धन्यवाद , शालू जी
यहां की सड़कें और चौड़े फ़्लाईओवर दिन के उजाले में इसकी समृद्धि बयान करते हैं, तो रातों को वही सड़कें और फ़्लाईओवर चीख-चीख कर यहां की ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते हैं.
कितनी सच्ची बात कहा है आपने.
वाह वाह
शालू जी, आपका लेख अच्छा लगा. दिल से या देहाती दिल से लिखा है क्योंकि आज की दिल्ली के बच्चे से पूछो की दूध कौन देता है तो वो कहेगा मदर डेरी के अंकल या मशीन. खैर, मैं जब सात साल पहले नोएडा की एक सोसायटी में रहने आया तो उसकी आठ मंजिला छत पर खड़ा हो कर देखा कि कुछ ही दूर खेतों में हरी-हरी फसल लहलहा रही है, तभी मेरे मन में ये विचार आया.
शहर 'गाँव' खा रहा है
और किसान बोझ या मुआवजा उठा रहा है.
कई मुआवजा जदा किसानों के बच्चे आज बोझ भी उठा रहे हैं.
शालू जी ने आपने दिल्ली की बहूत ही सुंदर व्याख्या की है..वाकई दिल्ली उस विशाल वृक्ष का नाम है, जिसकी शाखाएं तेज़ी से फैल रहीं हैं, लेकिन फिर भी इसकी छाया सभी पर एक समान नहीं पड़ती.