'' मुस्कुराइए जनाब ये.... ''
मेरा ननिहाल लखनऊ का है. गर्मियों की छुट्टियों में लखनऊ जाना, तपती दोपहर में दशहरी आम की दावत उड़ाना और नानी के साथ अमीनाबाद, हज़रतगंज की सैर का हमें साल भर इंतज़ार रहता था.
हम उन दिनों एक छोटे शहर में रहते थे और लखनऊ हमारे लिए बड़े शहर की वो खिड़की थी जिससे हर पल कुछ नया, कुछ रंगीन दिखता था.
गर्मियों की ऐसी ही एक शाम अमीनाबाद की भीड़भाड़ से गुज़रते हुए अचानक मेरी नज़र चाय की एक दुकान पर पड़ी जिसके एक कोने में लटकी तख़्ती पर लिखा था, ''मुस्कुराइए जनाब ये लखनऊ है.....''
गलियों, दीवारों, जगहों से प्यार हो जाने की मेरी आदत पुरानी है और इस एक पंक्ति ने जैसे लखनऊ शहर के लिए मेरे प्यार को शब्द दे दिए.
पिछले 16 साल से मैं दिल्ली में रह रही हूं लेकिन इसे मेरी बेरुखी कहें या इस शहर में बस आगे बढ़ते रहने की गफ़लत कि 16 साल तक दिल्ली से मेरा नाता केवल बस और उसके कंडक्टर सा रहा. जो बस में सफ़र तो हर दिन करता है लेकिन पहुंचता कहीं नहीं.
लेकिन नई दिल्ली के सौ साल की कहानी को बीबीसी के पाठकों से साझा करने के लिए पिछले कुछ महीनों में इस शहर को मैंने जिस नज़रिए से देखा और महसूस किया उसे शब्दों में बयां करना ही इस ब्लॉग को लिखने का मकसद है.
सौ साल की इस कड़ी ने पहली बार मुझे उस दिल्ली से रूबरू कराया जो गुमनाम इतिहास की तरह सड़कों के किनारे, गलियों के बीच, घरों के पिछवाड़े हर जगह बसती है. ये वो दिल्ली है जिसके दरवाज़े कभी लाहौर, तुर्क़िस्तान, कश्मीर या अजमेर को जाया करते थे, वो दिल्ली जिसमें सराय थे, किले थे, रौशनारा बाग़ थे.
ये वो दिल्ली है जिससे बुलबुल-ए-खाना की गलियों से गुज़रते अचानक मुलाकात हो जाती है. जो मुझे ले जाती है मलिका-ए हिंदुस्तान रज़िया सुल्तान की उस गुमशुदा कब्र पर जिसकी आखिरी सल्तनत अब वाकई सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन है.
इतिहास के ऐसे कितने की पीले पन्ने इस शहर में बिखरे पड़े हैं लेकिन अफ़सोस कि उन्होंने सहेजने का टेंडर अभी पास किया जाना बाकी है! रज़िया सुल्तान को वहीं सोता छोड़ कर और इतिहास के इन पन्नों के कोने मोड़कर हर बार मैं आगे तो बढ़ी लेकिन वापस लौटने के कई वादों के साथ.
कुलमिलाकर दिल्ली अब मेरे लिए सिर्फ़ घर का पता नहीं है. ये वो शहर है जिसकी कई गलियों, बाज़ारों ने मुझसे अपने सुख-दुख की कहानी बांटी है. यही वजह है कि इस शहर की हवा अब मेरे लिए और ज़्यादा ताज़ी है.
इस शहर के हर बुज़ुर्ग से अब किस्से-कहानियों की महक आती है और सड़कों से गुज़रते अब मुझे लगता है कि हर खंडहर-इमारत से मेरी पुरानी रिश्तेदारी है.
दिल्ली के सामने अब मैं भले ही खुद को बहुत छोटा और बौना महसूस करती हूं लेकिन यही वो एहसास है जिसके साथ इस शहर में बाकी की उम्र गुज़रेगी. शहर की भीड़ में अब मैं जब-जब अकेली पड़ूंगी इन गलियों, इलाकों, इमारतों से ही गुफ़्तगू होगी.
सफ़र अभी लंबा है और दिल्ली की ये कहानी सिर्फ एक पड़ाव था. खबरें और होंगी, श्रृंखलाएं और बनेंगी लेकिन इस शहर में जीते जी सबसे पहले अब मेरी खोज एक ऐसे कोने की है जहां मैं भी हर आने-जाने वाले के लिए लिख सकूं, मुस्कुराइए जनाब ये दिल्ली है.....

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पारुल जी, मेट्रो शहर बहुत तेजी से अपना स्वरूप खो देते हैं...पर हमारी दिल्ली अभी भी कुछ बची है और बचा है आपका ननिहाल भी. लखनऊ अपनी पुरानी शान-शौकत में अभी भी इस कदर समाया हुआ है कि कभी कभी कोफ्त होती है कि कब बदलेंगे हमारे लखनवी नवाब. दिल्ली में आए हुए मुझे बस एक साल हुआ है, इससे पहले दिल्ली में 1991 में एक साल रहा था. दिल्ली शहर वाकई नई हवा और पुरानी बयार को साथ ले कर चल रहा है.
मुस्कुराहट लाने को बेबस कर दिया आपके लेख ने.... :-)
दिल्ली में बाहर से आकर पहले-पहल रहने/बसने वालों के लिए आपका लिखा एक वाक्य ही काफी है: "...दिल्ली से मेरा नाता केवल बस और उसके कंडक्टर सा रहा. जो बस में सफ़र तो हर दिन करता है लेकिन पहुंचता कहीं नहीं..." लोगों के सपनों की दिल्ली के दिल में जगह ढूँढने की जद्दोजहद कभी बेरुखी-सा पैदा करती हैं, कभी प्यार की झप्पी देती हैं. इससे पहले की हम दिल्ली को अपना बनाएँ, हमको पता चलता है कि ये तो कब का हमें अपना बना चुकी है! पुरानी यादों और आधुनिक सपनों का अद्भुत संगम है दिल्ली. हर लोगों के लिए उसकी अपनी दिल्ली है ये, बच्चो की अपनी दिल्ली, बुज़ुर्गों की अपनी दिल्ली, किशोरों की अपनी दिल्ली और यहाँ नहीं आने वालों की अपनी दिल्ली (जो दूर है!). यहाँ रहने वालों के लिए रोज एक 'नई दिल्ली' बनती है और एक और एक 'पुरानी दिल्ली' हमेशा के लिए दिल में बस जाती है! जो यहाँ रहा, यही का होकर रह जाता है, दिल्ली आसानी से जाने नहीं देती:
इन दिनों गर्च-ए-दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुखन,
कौन जाए 'जौक' पर दिल्ली की गालियाँ छोड़कर!
आप जो भी कहें, दिल्ली में सबकुछ है लेकिन दिल नहीं है. आज की दिल्ली निष्प्राण दिल्ली है. दिल्ली में दिल होता तो दिल्लीवाले इस तरह लूटपाट नहीं करते. 29 साल दिल्ली में धूल फांकने के बाद मैं तो अब मुंबई का हो गया हूं. दिल्ली निर्जीव है जिसकी नज़र पत्थर की, दिल पत्थर का.
यहाँ की गालियाँ भी यहाँ की गलियों की तरह अपनापन देती है, वैसे सही शेर है:
इन दिनों गर्च-ए-दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुखन,
कौन जाए 'जौक' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर!
आपके लेखों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि आज भी दिल्ली दिलवाली है. यही कारण है कि जितना भी हम इसके बारे में जानते हैं और जानने की ललक बढ़ जाती है. पारुल जी आपके लिखने की शैली मनमोहक है और लेखों की श्रृंखला सरहानीय है. आपके और लेखों का इंतज़ार रहेगा.
पारुल जी रज़िया सुल्तान को महज़ दो गज़ जमीन नसीब होने से वो लोग प्रेरणा लें जो सबकुछ हासिल करने की दौड़ में आगे बढ़ते रहे हैं. मेरे ख्याल से सौ साल के नई दिल्ली के इतिहास में राजघाट ही एक स्थल है जो हर मायने में स्मरणीय है.
पारुल जी कहते हैं की दिल्ली दिलवालों की है, पर जिस दिल्ली को मैं जानता हूँ वह दिल्ली ऐसे लोगों को समेटे हुए है जो केवल और केवल लोगों को 'स्वप्न' ही दिखाते हैं; भूतों के स्वप्न और वर्तमान के लिए भुलावा या कहें भ्रम की भरमार से सराबोर, अतिचालाक कुटिल और अवसरवादियों का 'अड्डा' नज़र आती है. जहाँ कहते हैं देश के दरिद्र और दौलतमंद की तकदीर लिखी जाती है. यहीं गलियों की जिंदगी महलों की तकदीर लिखती हैं और यही तकदीर लिखने वाले 'अन्ना' की भीड़ बनते हैं. और अडवानी के 'राम भक्त' और 'बाबा' के अनुयायी. यहीं की गलियों में संसद को ध्वस्त करने का ख्वाब देखते हैं तो उन्ही गलियों के वासिंदे उसी संसद की रक्षा के खातिर अपने प्राण न्योछावर कर देते हैं. यहाँ रात के और दिन के अलग अलग 'चहरे' होते हैं. यहाँ सफेदपोश और चोर उचक्के कितने घुले मिले होते हैं, जिसका अहसास भी हो ही जाता है इस दिल्ली में, ज्ञान के क्षेत्र के 'भ्रष्टाचार' आर्थिक क्षेत्र के 'भ्रष्टाचार' 'न्याय' और चौथे खम्भे के क्षेत्र के 'भ्रष्टाचार' सब से सराबोर यह दिल्ली 'न' भूकंप से हिलती है और न ही टिकैत से हिली. देखना है 'अन्ना' कब तक हिलाते हैं, आशा है आप इन सब पर भी दृष्टि डालेंगीं.
पारूल जी बेहद अच्छा लेख , बधाई.
पारूल जी, पहले तीन पैराग्राफ़ मुझे मेरे बचपन की याद दिला गए.पूरा लेख बेहद शानदार है. ये हमें सोचने का मौका देता है कि हम कैसा जीवन जी रहे हैं और मूल जीवन कैसा था, हम उस प्यार और सच्चाई की कमी महसूस कर रहे हैं.
दिल्ली के इतिहास पर शालू जी के बाद अब पारूल जी का ब्लॉग आया है. बीबीसी ने दिल्ली को अंग्रेजों द्वारा राजधानी बनाये जाने के 100 वर्ष पूरे होने पर विस्तृत कवरेज की है, लेकिन अफसोस, इसमें, विवरणात्मक चित्रण और कुछ नये प्रंसगों के अलावा रूचि जगाने वाला कुछ भी तत्व इसमें नहीं है. इसका कारण शायद यह भी हो सकता है कि भारत की राजधानी में मकबरों ,स्मारकों,तांगें वालों ,पराठे वालों, फ्लाई ओवर या गगनचुंबी इमारतों के अलावा और भी बहुत कुछ है जिसका ज़िक्र नहीं किया गया ,दिल्ली एक शहर ही नहीं बल्कि देश की राजधानी भी है इसका भरोसा दिल्ली लोगों को नहीं दे पाती है. राजधानी का मतलब यह नहीं है कि जार्ज पंचम से लेकर आज मनमोहन सिंह तक शासकों ने किस तरह शहर का ढांचा विकसित किया. महत्वपूर्ण यह है कि देशवासी इस शहर को अपनी राजधानी महसूस कर सके या नहीं,लेकिन यह स्पष्ट महसूस होता रहा है कि चाहे अंग्रेज़ों द्वारा स्थापत्य के लिहाज से बेमिसाल इमारतें हों या फिर आधुनिकता की दौड में बिल्डरों द्वारा नित नये क्षेत्रों तक फैलती जा रही इमारतों का जाल हो इसमें एक हनक है एक आक्रमकता है न जाने ऐसा क्यों लगता है कि दिल्ली मगरूर होती ही चली जा रही है.ताकत का केन्द्र होने में राजधानी की पूर्णता अथवा सार्थकता नहीं है लोगों की उम्मीद जहॉ से पूरी हो सके वही राजधानी है. इस मायने में दिल्ली एक शहर ही है जो लोगों को राजधानी होने का झूठा भरोसा देता है इससे अधिक कुछ नहीं.राजधानी के 100 वर्ष पूरा होना यदि क्रिकेट के एक शतक जैसा आंकडा भर है तो कोई बात ही नहीं लेकिन 100 वर्षों में कितने दिन या पलों के लिए भी राजधानी से लोगों को ऐसी उम्मीद रही जैसी कि राजधानी से होनी चाहिए उन्हीं क्षणों का जश्न मनाया जा सकता है. बाकी तो सब बातें हैं बातों का क्या?
मेरा बस चलता तो दिल्ली का नाम बदल कर लूटनगर या फिर नेहरूपुरम रख देता.
बहुत अच्छा लेख लिखा है. मानो कोई लेखक अपनी कल्पनाओं में डूब गया हो. धन्यवाद, बहुत-बहुत धन्यवाद दिल्ली पर आपके तमाम लेखों के लिए.
पारुल जी एक अच्छे लेख के लिए आपको बधाई. सही मायनों में तो दिल्ली को मुग़लों, लोदियों, खिलजियों और अंग्रेज़ों ने बसाया है. हमने दिल्ली को अबतक क्या दिया है. आज हमारे लोग ही दिल्ली को दिल खोल कर लूट रहे हैं. कितने घोटाले सामने आ चुके हैं और न जाने कितने फ़ाइलों में दबे पड़े होंगे. मुझे तो कभी पढ़ने में नहीं आया कि अंग्रेज़ों या मुग़लों ने कभी यहां कोई घोटाला किया था. आज की दिल्ली के लिए दो पंक्तियां ही काफ़ी हैं - सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है.
बहुत अच्छा लिखा है आपने. असल में ये मानव स्वभाव है कि जहां कहीं भी आप अपना सबसे अच्छा वक़्त गुज़ारते हैं उस जगह से आपको बेहद प्यार होता है.
आप दिल्ली की बेहतरी के लिए अपनी ओर से योगदान दे सकते हैं. कुछ नहीं तो इस शहर के बारे में अच्छे विचार रखिए और प्रार्थना कीजिए. इतना तो आप कर ही सकती हैं?
बकौल ज़ौक : कौन जाये ज़ौक पर दिल्ली की गलियां छोड़कर.
मगर ग़ालिब का सवाल भी तो है: हमने माना ये कि दिल्ली में रहें खाएँगे क्या?
दिल्ली अभी दूर है, भारत के आम लोगों के लिए, जो दिल्ली तो क्या , जिला मुख्यालय के आगे जाते हैं तो केवल रोजी रोटी की तलाश में और दिल्ली जैसे नगरों की भव्यता और गन्दगी हसरत और वितृष्णा भरी नज़रों से देखते हैं. उन्हें दिल्ली से कोई लगाव नहीं होता, चार पैसे कमा कर घर आते हैं तो भले ही दिल्ली की बातें गाँव भर को सुनाते हैं. ये लोग जिस दिन अपने गाँव घर में कोई रोज़गार पा लेंगे, दिल्ली देखने लायक हो जाएगी. ये वहां कभी कभार ही जायेंगे: कमाने के लिए नहीं बल्कि तफरीह के लिए और कुछ खर्च करने के लिए .
डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड, अमेरिका
पारुल जी,
दिल्ली का अपना कोई नहीं है. जिस तरह से अपनी मातृभाषा लिखवाते समय हर भारतीय मैथिली, अवधी या ब्रज भाषा लिखवाता है इसी तरह अपने को सभी बिहारी, राजस्थानी या बंगाली बताते है. दिल्ली को कोई नहीं है.
दिल्ली की ख़ूबसूरती बताने के लिए पारूल जी को धन्यवाद. बढ़िया लेख.
दिल्ली हिन्दुस्तान का दिल है. पर इस दिल में छेद होने लगा है. बहुत ही सुंदर शब्दों में दिल्ली की गाथा को पिरोया है आपने.
आप बिल्कुल सही कह रही हैं पारुल. मैं आप से सहमत हूं.
पारूल जी बेहद अच्छा लेख , बधाई.