घबराइए कि आप दिल्ली में हैं
नई दिल्ली के सौ साल साल पूरे हो गए, चारों तरफ़ धमाचौकड़ी मची हुई है.
कोई चचा ज़ौक की पंक्तियाँ दोहरा रहा है कि कौन जाए ज़ौक पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर. कोई दिलवालों की दिल्ली को लेकर तुकबंदियां गढ़ रहा है.
पर तमाम दिल्ली प्रेमियों से क्षमायाचना सहित मैं कुछ कहना चाहता हूँ.
मुझे दिल्ली में रहते सात-आठ साल हो गए और मुझे लगता है कि कौन जा पाएगा दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर.
यहाँ तो आदमी की हालत राशन की दुकान में रहने वाले चूहे जैसी है. यहाँ रहे तो किसी न किसी दिन किसी शिकंजे में फंस कर मारे जाएँगे. छोड़ कर चले गए तो भूख से मरेंगे.
अटाटूट भरी दिल्ली की इस दुकान में जो है बस पेट में है, लेकर कहीं नहीं जा सकते.
मैं जबलपुर-भोपाल से आया हूँ, गाँव देखे हैं, पत्रकारिता में बाल पूरे तो सफ़ेद नहीं हुए, मगर खिचड़ी हो चले हैं.
राजनीति और शासन-प्रशासन के पीछे-पीछे ख़बर की तलाश में घूमा हूँ. भारत के कुछ देहात घूमे हैं. एक बात कह सकता हूँ कि दिल्ली का और भारत का कोई ख़ास रिश्ता नहीं है.
भारत के गाँवों में बहुत विविधता है लेकिन मुझे एक दृश्य हर जगह मिल जाता है. हर गाँव में पानी के पास भैस को कीचड़ में पड़े अलसाते पगुराते देखा जा सकता है. कीचड़ से लथपथ उस भैंस के ऊपर अमूमन झक सफ़ेद बगुला बैठा होता है जो कि भैंस की पीठ पर बैठा-बैठा भैंस के बदन पर चिपके कीड़े ख़ा रहा होता है.
बगुले की आँखों में भैंस के प्रति कोई कृतज्ञता या दया नहीं होती, वो भैस के ऊपर ऐसे संभल कर खड़ा होता है कि कहीं उस पर गंदगी का एक छींटा भी ना पड़ जाए.
यह दृश्य देख कर मुझे हमेशा दिल्ली की याद आती है. भारत एक विशाल भैंस है, गरीबी पिछड़ेपन की गंदगी में सराबोर पर अपने सुख दुख में आप ही रमी हुई. दिल्ली इस पर बैठा सफेद बगुला है.
दिल्ली में रहने वाले चाहे पत्रकार हों, नेता हों या अधिकारी, ज़्यादातर का भारत के प्रति वही रुख है जो बगुले का भैंस के प्रति होता है. उसी भैंस के कीड़ों पर पलते हैं पर उससे कोई वास्ता नहीं रखते.
भोपाल सहित ऐसे शहरों में जहाँ पठान बसते हैं वहां एक कहावत पाई जाती है "शेख़ अपनी देख" मेरे हिसाब से यह दिल्ली और दिल्ली वालों का मूलमंत्र है.
दिल्ली बड़ी बेदर्द है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक बहुत भले और बड़े इतिहासकार हैं मुकुल केसवन उन्होंने एक बार मुझसे पूछा कि दिल्ली कैसी लगी मैंने ईमानदारी से बता दिया.
केसवन दिल्ली वाले हैं पर उन्होंने बुरा नहीं माना और एक अनुभव बताया. केसवन इतिहास के छात्र हैं और उन्होंने भारत में कई दंगा पीड़ित जगहों पर घूम-घूम कर दंगों के बाद शोध किया है.
दिल्ली के 1984 के सिख विरोधी दंगों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया है.
केसवन ने कहा कि और जगहों और दिल्ली के दंगों में फ़र्क था. आम तौर पर और जगहों में दंगा पीड़ित कहते हैं कि अनजान हमलावर बाहर से आए थे. पीड़ित शक जताते हैं कि कुछ लोग मोहल्ले के उन्हें पता बताने में शामिल हो सकते हैं.
लेकिन दिल्ली में सिखों पर उन लोगों ने हमला किया जो सालों से उनके साथ एक ही थाली में खाना खाते थे, उनके घर पर टीवी देखने आते थे और जो उनके बच्चों के साथ पले-बढ़े थे.
शायद यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं हैं कि मिथकों से लेकर लिपिबद्ध इतिहास तक दिल्ली के किस्से खून से लिखे हैं. कहानी है कि पांडवों को अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ बनाने के लिए जगह मिली तब जब उन्होंने जंगल को जला दिया जो उनके भीतर था सबको जला कर ख़ाक कर दिया.
कहते हैं यह दिल्ली उसी इन्द्रप्रस्थ की वंशज है.
दिल्ली के इतिहास में शायद ही कोई सदी ऐसी गुजरी होगी जब इस शहर ने खून की होली नहीं हो. भाई ने भाई का क़त्ल न किया हो.
विलियम डालरिम्पल की किताब लास्ट मुग़ल में ज़िक्र है कि 1857 के ग़दर में दिल्ली के मूल बाशिंदों ने किस तरह से ग़दर करने वालों से अपनी जान छुड़ाई. किसी ने पैसा दे कर तो किसी ने अपना तख़्तोताज दे कर.
इसे चाहे दिल्ली की दरियादिली कहिए या बेदिली. मुझे भरोसा है कि इतना सब कह कर भी मैं बच जाऊँगा. कोई मुझे पीटेगा नहीं, कोई मेरे घर या दफ़्तर पर हमला नहीं करेगा.
इसीलिए इस बड़े शहर में छोटा आदमी होने के कुछ फायदे भी हैं जो कि मैं उठा रहा हूँ.

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बिल्कुल सही. गाँव में रहने वाले लोग पूरे भारत के बारे में सोचते हैं बल्कि दिल्ली में रहने वाले लोग सिर्फ़ खुद के बारे में सोचते हैं. यहाँ बस एक भीड़ सी है.
"भारत एक भैंस है और दिल्ली उस पर बैठा सफ़ेद बगुला". वाह कितनी सही और सटीक उपमा दी है. पूर्ण रूप से मैं आपसे सहमत हूँ. कुछ इसी तरह की भावना हमारे अंदर भी जागृत होती थी जब हम दिल्ली में थे. शानदार...
1984 के दिल्ली दंगे मात्र दंगे नहीं थे. वो सिखों की सामूहिक हत्या थी जो एक योजना के तहत की गई थी.
मैं पिछले दस साल से दिल्ली आ रहा हूँ. मैं इलाहाबाद का रहने वाला हूँ. मैं ये ज़रूर कहूँगा कि दिल्ली एक अनजानी सी दुनिया लगती है जहां कोई आपकी मदद नहीं करता. अगर आप शहर में नए हैं तो ये शहर आपके खिलाफ़ शत्रुभाव रखता है. अगर आप जान-पहचान के लोगों के साथ हैं तो सब ठीक है, नहीं तो आपको सावधान रहने की ज़रूरत है. मेरे कई दोस्त जो दिल्ली के नहीं हैं, उन्हें भी ऐसा ही लगता है. मेरे ख्याल से ये सबकुछ भ्रष्ट प्रशासन के कारण है जो समस्या से निपटने के लिए कुछ नहीं कर रहा है.
अविनाश, बात तो आपकी सही है.
मित्र अविनाश जी, आपने एक बड़े फोड़े को फोड़ दिया, रक्त बह चला है. मैं सहमत हूँ कि दिल्ली में आत्मा या दिल नहीं है. पैगंबर जी ने फ़रमाया कि अपने पड़ोसी को खिला कर तब खाना. दिल्ली में उल्टी चाल है कि सबकी रोटी छीन ले, फ़्रिज में रख ले. सच है, समस्त भारत की प्रतिनिधि दिल्ली में मानवता बिल्कुल नहीं है. हे राम, बेदिल दिल्ली. चूहे की तरह सब कुछ बिल में भर लो.
वाह, वाह. काबिले तारीफ़ ब्लॉग. बीबीसी बीबीसी का लेखन और दृष्टिकोण. लेकिन सावधान. अपनी कलम को गलत दिशा में मत ले जाइएगा.
क्या बात कही है आपने. अद्भुत और विश्वनीय पत्रकारिता. मैं मणिकांत ठाकुर जी का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ औऱ आपके इस ब्लॉग को देखकर लगता है कि आपका भी फ़ैन हो जाऊँगा. जैसे मणिकांत जी पूरे बिहार का विवरण दे देते हैं, वैसे ही आपने दिल्ली के बारे में दिया. आशा करता हूँ कि आपके जैसे और पत्रकार बीबीसी हिंदी लेकर आए. अतिउत्तम लेख.
बिल्कुल सही अविनाश. आपने जो कुछ लिखा है बिल्कुल सही है. मैं पूरी तरह आपके साथ हूँ.
मैं दिल्ली वाला हूँ, दिल्ली में ही पला बढ़ा हूँ. लेकिन आपने सही कहा. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
मैं नवम्बर में दिल्ली गया था, दिल्ली वासीयों ke मुख पर तनाव ही तनाव था, कोई हंसता मुस्कुराता चेहरा नहीं दिखा. एक ऑटो वाला 4 किलोमीटर का 60/- या 100/- मांगता, जब मैंने पूछा तो उसने बताया... साहेब दिल्ली मैं लूटमार मची है हमसे पोलिसे वसूलती है वरना गली डंडा.
आधा घंटा वेट कर के, लोकल ट्रेन से 2 रुपए मैं निजामुद्दीन पहुँच गया.
जब मैं दिल्ली में था तो दिले नादाँ ने यह कहा था
यार दिल्ली में जब से आयें हैं
अपने भी हो गए पराए हैं
वोह नहीं भूलते कसम ले लो
हमने दिल से बहुत भुलाएँ हैं
अविनाशजी आपने सही फ़रमाया. बस जरुरत है लोगों को अपनी सोच बदलने की.
अविनाश जी, दिल्ली की बगुले से शेष भारत की भैंस तुलना करना बड़ा मजेदार लगा। काबिलेतारीफ है आपकी साफगोई। मैं भी भारत के हरेक महानरक (जी हां महानरक) में नौकरी कर चुका हूं। मुझे कहीं भी भारत नजर नहीं आया। दिल्ली तो मुंबई से भी ज्यादा बेरहम है। सुंदर आलेख। शुक्रिया।
सटीक उपमा दी है आपने. ठीक ऐसा ही मुझे भी लगता है.
धन्यवाद
मैं आपसे 100% सहमत हूँ.
आप दिल्ली कि बात करते है मैं उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर डिस्ट्रिक्ट का रहने वाला हूँ. मैंने यहाँ भी कुछ ऐसा होते हुए देखा है. लोग धीरे धीरे एक दुसरे से दूर हो रहे है. पर आपने दिल्ली के बारे में लिखा बहुत खूब है. आपका शुक्रिया
अविनाश भाई मैं आपसे सहमत भी हूँ और असहमत भी. जो आपने लिखा वो दिल्ली कि नहीं भारत का अधिकतर सारे बड़े शहरों की कहानी है.
मेरे पूर्वज अमेठी (उप्र) से है पर मेरा जनम और परवरिश दिल्ली मैं ही हुई और अब मैं दिल्ली ही नहीं भारत के बाहर रहता हूँ. दिल्ली ऐसी नहीं थी. दिल्ली वाले बहुत अछे थे, सबकी मदद करते थे.
मैं पूरे 7 साल का था 84 के दंगो के समय. मुझे अच्छी तरह याद है कि सिख्खों के साथ कैसा वयवहार हुआ, परन्तु जहाँ मैं रहता था वहां हमारे पड़ोस में दो सिख परिवार थे. हम सभी पड़ोसियों ने मिलाकर उनकी मदद की. उन लोगो कि हर तरह से सहायता कि. आज भी वो परिवार और सारे पड़ोसी एक साथ रहते हैं.
पर हाँ अब आपस मैं वो प्यार नहीं रह गया है. पहले हमारे एक पंजाबी पड़ोसी के यहाँ एक तंदूर होता था और सारे पड़ोसी रात को एक साथ उसी तंदूर पर रोटी बनाते थे. आज कल तंदूर है पर किसी के पास समय नहीं है. पहले लोग एक दूसरे से कुछ भी सामान उधर ले लेते थे और लोग बिना किसी बात के दे भी देते थे. टीवी और फ़ोन किसी किसी के घर होता था. मैं और मेरे बड़े भाई दूर दूर तक साइकिल पर जाकर लोगों को उनके फ़ोन आने कि बात बता कर आते थे. आज कल सबके पास मोबाइल है. सबके घर में 2-3 टीवी हैं. अगर आप रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता 'मेंडिंग वॉल' पढेंगे तो आपको समझ आ जाएगा कि दिल्ली को क्या और क्यों हुआ.
प्यार और अपनापन तो अब नहीं रहा. पर फिर भी दिल्ली बहुत अच्छा है. कम से कम किसी को मार कर भगा तो नहीं रहा. की तुम उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भारतीय हो. सबको जगह मिलती है. मुझे अपनी दिल्ली की कमी खल रही है.
पारुल अग्रवाल जी के "मुस्कुराइए कि आप..." के बाद उतना ही विचारोत्तेजक लेख! जैसे कि ट्रक के होते हैं, दिल्ली के भी दो पक्ष है (श्रीलाल शुक्ल को श्रद्धांजलि!). एक आपको मुस्कुराने को विवश करता है, एक घबराने को.
आप बिलकुल सही हैं जब आप कहते हैं कि दिल्ली एक सफ़ेद बगुला है, जो भैंस-रूपी भारत पर बैठकर कीड़े खाता रहता है. इससे बढ़िया तुलना आज के समय में शायद नहीं हो सकती! और आप सत्य को परिभाषित करते नज़र आये हैं जब आप कहते हैं "बगुले की आँखों में भैंस के प्रति कोई कृतज्ञता या दया नहीं होती...उसी भैंस के कीड़ों पर पलते हैं पर उससे कोई वास्ता नहीं रखते".
ये सचमुच बेदर्द दिल्ली है, उस जौक की दिल्ली जो "शाह का मुसाहिब बना इतराता फिरता है!" और आगरे से आया एक ग़ालिब फाकामस्ती में दिन गुजारता है! किसी भी नए बाशिंदे के लिए दिल्ली किसी भी अन्य शहर की तरह निष्ठुर है!
किन्तु जब आप ये कहते हैं कि "...दिल्ली का और भारत का कोई ख़ास रिश्ता नहीं है.." तो मेरी समझ से आप शायद पूरी तरह सही नहीं हैं. दिल्ली और भारत का रिश्ता है, शायद भैंस और बगुले का ही सही!
शायद ये बगुला भी कभी भैंस रहा होगा! हम ही कभी भैंस बनते हैं, कभी बगुला. बेदर्द हम हैं, बेदर्द सत्ता की ताकत है और बेदर्द है पैसे का घमंड!
पांडव दिल्लीवाले नहीं थे, बाहर से आये थे; सिख-दंगे फ़ैलाने वाले भी दिल्ली की गलियों से नहीं थे; मुग़ल भी बड़ी दूर से आये थे. कोई यहाँ का पूरी तरह से मूल निवासी है ही नहीं. दिल्ली किसी एक की कभी रही नहीं. अब आप इसे या तो बेवफा कहें या मजबूर!
सार संक्षेप: दिल्ली में हर आगंतुक राजा ने रक्त बहाया है, दिल्ली एक शापित शापग्रस्त आत्माओं का मृत शहर है, 100 साल बाद कोई कहानीकार लिखेगा ; लाशों कि पहाड़ी दिल्ली.
ओह.
बगुला तो मैंने भैंस पर चढ़ा हुआ नहीं देखा हाँ कौवा ज़रुर देखा है.
बहुत बहुत बढ़िया अविनाश.केवल कुछ ही पत्रकार , अख़बार और समाचार चैनल ही बचे है जो मुद्दे पर बात करते है और किसी का पक्ष नहीं लेते आप उन्हीं में से एक हैं.
अविनाशजी इतने अच्छे लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई.दूर रहकर भी हम भी दिल्ली के बारे में यही सोचते है .अब पता चला की हमारी सोच कितनी सही है.
दिल्ली कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचा सकती है, यदि अविनाश जी की तरह नजरिया साफ हो. यदि अपनी जडों से जुडे लोग हों तो यही गुर्राती दिल्ली भीगी बिल्ली बन जाऐगी. यह हमारे व्यक्तित्व का भी दोष है कि ज़रा सी चमक-दमक देखी नहीं और अपने ही गॉव घरों के प्रति ही हिकारत से भर गये. मेरा यह अनुभव है कि अधिकांश लोग जो थोड़ा समय भी दिल्ली में रह लेते हैं, उनके व्यक्तित्व का तो पता नहीं कि उसमें क्या जुड जाता है, लेकिन घरों को लौटते ही उनकी चाल-ढाल और देखने का नजरिया ही बदल जाता है. दिल्ली को देश की राजधानी बने रहने के लिए अपने आप को देश के अनुरूप ही ढालना होगा. अमरावती अपनी ठसक में रहे और देश बदहाल होता जाए तो यह नहीं चल सकता है शायद इन्हीं खामियों के कारण ही दिल्ली को अतीत में कई बार उजडना पडा होगा. इस बार दिल्ली को यह न देखना पडे, इसके लिए हर प्रकार के प्रयत्न करने अभी से जरूरी है. 1947 से पहले दिल्ली अलग थी जो हुकूमत करती थी. अब दिल्ली को वह जिम्मेदारी निभानी है कि जैसी उम्मीद से लोग मन्दिर और मजारों में जाते हैं और वहॉ से भरोसा और विश्वास से भरकर लौटते है. कम से कम दुत्कारे तो नहीं जाते है. साथ ही बीबीसी का बहुत-बहुत शुक्रिया कि दिल्ली पर हर नजरिए से बात रखी.
आपने दिल्ली कों जिस नज़रिए से देखने की 'सामान्य' सी कोशिश क़ी हैं, मुझे तो उससे बिलकुल उल्टा ही लगता है. यहाँ बगुले नहीं वास्तव में भैंसे ही हैं जो गलियों में नहीं दिल्ली के सरकारी बंगलों में रहती हैं और बहुत ही आराम से क्योंकि उनका कीचड़ में रहना स्वभाव है. भैस के मालिक को तो आपने छुआ ही नहीं. दूधिए को पता है कि भैस कितने ही कीचड़ में क्यों न रहती हो, दूध तो सफ़ेद ही होगा और मक्खन भी उसी भैस से निकलेगा अतः भैसों कों याद कर आपने नए साल में एक नया 'बवाल' खड़ा करने का मौका तो दिया है. इसलिए ये कहना क्या गलत होगा कि "भैस के आगे बीन बजाए-भैंस खड़ी पगुआये' भले ही कोई कितना भी चिल्लाये.
बहुत सही है भाई. मेरी सोच को आपने सटीक उतारा है. संदेह नहीं है कि दिल्ली का यही हाल है.
प्रियवर अविनाश जी, शुक्रिया. किंतु इस प्रकार का नग्न सत्य वाला ब्लॉग लिख के आप जीवन भर धूल फेंकने वाले पत्रकार बने रहेंगे बस. यदि प्रसार भारती का प्रमुख बनना है तो आपको दूसरे प्रतिष्ठित लोगों का मार्ग अपनाना पड़ेगा.
बहुत ख़ूब, अविनाश जी !
भैंस की पीठ पर बैठकर हमारे लालूजी मुख्यमंत्री बन गए. भैंस हमें दूध देती है हम उसका दूध निचोड़ कर अपना पेट भरते हैं. अविनाश जी बिलकुल सही विश्लेषण. कच नंगा होता है. आपने उसको हू-ब-हू प्रस्तुत कर दिया है.
बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है, अविनाश जी. मैं आपका प्रशंसक हूँ क्योंकि नगेंद्र के बाद आप कार्यक्रम अच्छा प्रस्तुत कर रहे हैं. अब मैंने आपका फ़ोटो भी देख लिया. आपने दिल्ली और भारत के बारे में साफ़ साफ़ बातें लिखी हैं. आपसे पहले पारुल अग्रवाल ने भी लिखा था. बधाई.
अगर आपको दिल्ली पसंद नहीं है तो आप लौट क्यों नहीं जाते? आपकी कथनी और करनी में कितना फ़र्क़ है? आप दिल्ली में रोज़ी रोटी कमा रहे हैं और उसी शहर को गालियाँ भी दे रहे हैं. आप इसकी बेहतरी के लिए कोशिश क्यों नहीं करते?
अभी दिल्ली दूर है, दिल्ली के लिए भी.
अविनाश दत ने दिल्ली को लेकर जो बातें की हैं वे भले ही सख्त लग रही है लेकिन सही यही है. सबसे बड़ी बात अविनाश ने दिल्ली देखने से पहले इस देश के देहात को देखा है. बिना देहात देखे दिल्ली की बात करनी बेमानी है क्योंकि सारे देहात जब दिल्ली जाते हैं तो दिल्ली उन्हें खा जाती है. एक वस्तुनिष्ठ अवलोकन. अविनाश को बधाई...
सच सदा ही कड़वा होता है, पाठकगण. इतने भी मातम की ज़रूरत नहीं.
आपने बहुत अच्छा लिखा.यह बात कई सारे लोग सोचते है लेकिन उनकी सोच को आपने जैसे शब्दों का रूप दिया वाकई दिल को छूने वाला है. लेकिन हम चाहते है कि भैंस पर एक ही बगुला न बैठे.पूरी भैंस को तो बगुला बनाने से रहे इसलिए बगुलों की संख्या को ही बढ़ाया जाए.लेकिन लगता है हमारी सरकार को पूरे भारत में दिल्ली ही नज़र आती है जहां वह सारे विकास कार्य, सारे कार्यालय और सारे उद्योग लगाना चाहती है.बाकी भारत तो उसके लिए भैंस के समान है.यह सोच आने वाले समय में बदले तो देश के बाकी हिस्सों का भी विकास होगा.
आपका दृष्टिकोण आपकी सोच को दर्शाता है. जिस शहर ने आप जैसे पत्रकारों को रोटी दी उसे भी आप नकारात्मक मानते हैं.क्या बात है साहब वाकई पत्रकारिता,पत्रकारों के निजी फ़ायदे और बाबाओं के विज्ञापन तक ही रह गई है.यदि दिल्ली इतनी ही बुरी लगती है तो आप भी क्यों नहीं चले जाते.
ऐसा प्रतीत होता है, अविनाश जी को कोई बहुत दुखद अनुभव हुआ है 'दिल्ली' में आकर.मैं भी पिछले पाँच साल से दिल्ली में रह रहा हूँ. ऐसा नहीं हैं कि मुझे दिल्ली कि बागडोर पसंद है या दिल्ली वालो ने सदैव मेरा स्वागत किया हो, पर यहाँ पर ज़िंदगी देखने को मिलती हैं, यहाँ के लोगों से अगर आप ठीक से बात-चीत करेंगे तो पाएंगे कि सचमुच यह दिल-वालो कि दिल्ली हैं.
दिल्ली में रहने वाले चाहे पत्रकार हों, नेता हों या अधिकारी, ज़्यादातर का भारत के प्रति वही रुख है जो बगुले का भैंस के प्रति होता है. उसी भैंस के कीड़ों पर पलते हैं पर उससे कोई वास्ता नहीं रखते.आपकी यह टिप्पणी बहुत दुखद प्रतीत होती हैं, क्या दिल्ली में सिर्फ़ 'पत्रकार, नेता या अधिकारी' ही रहते हैं, इससे यह मालूम पड़ता हैं कि आप ज़मीनी हक़ीकत से कोसो दूर हैं.
अविनाशजी इतने अच्छे लेख के लिए आपको बधाई.भैंस और बगुला की मिसाल देकर आपने दिल्ली की हक़ीकत बयान कर दी है.दिल्ली में जो भी तथाकथित उच्च वर्ग है उनकी चमचमाती गाड़ियाँ रोज़ ही उन बस्तियों के सामने से गुजरती है.लेकिन ये लोग नज़र बचा कर निकल जाते हैं.
मेरा ये मानना है कि अविनाशजी की अगर आपको इतनी ही दिक़्कत है तो दिल्ली आते क्यों हो.जिस थाली में खाते हो उसी में छेद करते हो.एक तो दिल्ली ने रहने की जगह दी, रोज़गार दिया और आप इस तरह से बात कर रहे हैं.
अविनाश दत्त जी मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
अविनाश जी की बात में दम है, लगे हाथ अविनाश जैसी गलती मै भी किये देता हूँ. अब बात भैंस और बगुले की हो रही है तो मुझे लालू प्रसाद यादव की अक्सर कही जाने वाली वात याद आ गई जिसे वह संसद भवन में भी ठेठ गवईपन के साथ कहतें है -- वह यह की "हम पहले भैंस की पीठ पर बैठ कर चलते थे १०-१० लीटर दूध एक बार में लगा लेते थे, और देश कानून से नहीं रुआब से चलता है" लालू का कथन बड़ा ही नुकीला है, उनके कथन के सही मायने कुछ इस तरह है - भारत एक भैस है, उस पर लालू जैसे सफ़ेद बगुले जनता के न चाहने के बाद भी रुआब से बैठे हैं, और उसे दुह रहे हैं. इस लिए अन्ना का लोकपाल बेकार है, नहीं तो भैंस हाथ से खिसक जायेगी, रुआब के बदले हवलदार जूते मारेगा.
बहुत अच्छा.
लोग कहते है दिल्ली दिलवालों की है . लेकिन हकीकत ये है कि दिल्ली दिल के कालो की है . आप का ब्लॉग सचमुच अच्छा लगा . 2005 से दिल्ली में रहने के बाद ही इस शहर की सच्चाई से दो चार हुआ . तब पता चला कि अपने ही अपनों का गला कैसे कट देते है .
दिल्ली का इतिहास रहा है , ये कितनी बार उजड़ी है.
कोटि कोटि धन्यवाद अविनाश जी आपने तो पोल खोलकर रख दी दिल्ली कि आपके जैसे बेबाक मीडिया के लोग ही सच बोलने कि कूव्वत रखते हैँ
मैंने भी दिल्ली में रह कर पढाई की है. अभी मुंबई में हूँ. पर दिल्ली की याद बहुत आती है. दिल्ली से अच्छा कोई महानगर नहीं है. लोग चाहे दिल्ली के बारे में जो कुछ भी लिखें लेकिन दिल्ली में दिलवालों की कमी नहीं है और न होगी.