यूं ही नाराज़ हो रहे हैं सिब्बल
प्रिय कपिल सिब्बल जी,
मुजे आज भी याद है जब मैं आपको कांग्रेस के प्रवक्ता के तौर पर टीवी पर देखा करता था और आपके हर तर्क पर मुग्ध हो जाता है ये सोच कर कि ये आदमी कितने अच्छे से कितनी विनम्रता से अपनी बात कहता है.
ये बात अधिक पुरानी भी नहीं है दस बारह साल पहले की है. आज जब आपको टीवी पर एक मंत्री की हैसियत से कुछ कहते हुए देखता हूं तो बड़ी कोफ्त होती है.
इंटरनेट पर आपत्तिजनक तस्वीरों आदि आदि पर आप इतने नाराज़ क्यों हैं. ये मेरी समझ से बाहर है. फेसबुक, गूगल और सोशल नेटवर्किंग कंपनियों के अधिकारियों ने आपकी घुड़की नहीं मानी आप उससे भी नाराज़ लगते हैं.
जिस तरह से आप अपने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के साथ घटिया व्यवहार कर रहे थे वो भी कई लोगों को आपत्तिजनक लग सकता है लेकिन आपके लिए कोई नियम लागू नहीं होता क्योंकि मंत्री तो आज़ाद है और देश भी स्वतंत्र है.
आप तो टेलीकॉम मिनिस्टर हैं लेकिन लगता है कि आपको इंटरनेट की दुनिया के बारे में शायद ही कुछ पता है. इस दुनिया में मेरे जैसे छोटे मोटे लोग भी गालियां खाते हैं और आलोचना सहते हैं.
आपके बयान पर जाने माने एक पत्रकार ने ट्विटर पर आपका समर्थन किया तो उनको मिनटों के भीतर गालियां पड़ी लेकिन उन्होंने पलट के ट्विटर को नियंत्रित करने की बात नहीं कही.
लेकिन आप तो मंत्री हैं आप कुछ भी कर सकते हैं. सूचना की लड़ाई है कपिल जी...आपको लड़ना है तो आइए इस युद्धभूमि में. सूचना को सूचना से काटिए अपनी कुर्सी की ताकत से नहीं.
आपत्तिजनक फोटो हैं उसकी शिकायत कीजिए. सरकारी कार्यलय तो नहीं लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर इसे ब्लॉक भी किया जा सकता है.
मैंने खुद कई बार उन तस्वीरों पर आपत्ति जताई है जिसमें से शायद कुछ तस्वीरें आपने भी पत्रकारों को दिखाई हों.
हां और अगर आप सोच सकें तो थोड़ा सोचें कि लोग सोशल नेटवर्किंग पर ही सरकार को क्यों निशाना बना रहे हैं क्योंकि शायद अख़बार लोगों की बात नहीं सुन रहा है और उनकी बात लिख नहीं रहा है.
सरकारों का प्रवक्ता बन चुकी मीडिया के युग में सोशल नेटवर्किंग ने एक हथियार दिया है आम लोगों को. इस हथियार को छीनने की कोशिश मत कीजिए. लड़ना है तो इस क्षेत्र में उतरिए और लड़िए.
आशा है आप ये पत्र नहीं पढ़ेंगे क्योंकि ये पत्र भी ऑनलाइन छापा जाएगा और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों पर शेयर किया जाएगा....जो आप खुद शायद ही देखते होंगे..

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खिसियानी बिल्ला , आपन मूंड फोड़े . इस तरह की हरक़त करके कपिल अपनी इमेज में नकारात्मकता के घोल की सांद्रता बढ़ाते ही जा रहे हैं. बढ़िया लेख सुशील जी.
मैं आपके विचारो से बिलकुल सहमत हूँ सुशील झा जी , और इसमें एक बात और जोड़ना चाहता हूँ कि आज सरकार आम जनता विरोधी नीतियों पर चल रही है और सरकारी तंत्र का उपयोग आम जनता कि आवाज को दबाने के लिए किया जा रहा है . इस स्तर तक भ्रष्टाचार में धंस चुके है कि कोई भी काम बगैर भ्रष्टाचार के इस समय की सरकार नही कर रही है , आप किसी भी एक क्षेत्र को देख ले . अगर सरकारी तंत्र स्वतंत्र रूप से काम करे (जो कि सरकार करने नही देती ) इसी सरकार के ना जाने कितने लोग सामने आयेंगे जो कि भ्रष्टाचार में लिप्त है , और लोंगो कि आवाज़ को दबाने के लिए सरकारी शक्ति का इस्तेमाल करना भी एक भ्रष्टाचार ही तो है
वाह सुशील जी धन्याद आप ने पहली बार एक सच्चे पत्रकार का धर्म निभाने का प्रयास किया है .सचाई यह है कि पहले जब प्रिंट मीडिया होता था तब इतना भूचाल किसी भी न्यूज़ से नही अता था .लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक और नेट ने दुनिया कि काया ही पलट दी है .आप का शानदार और सच लिखना तारीफ़ के काबिल है .
सुशील जी, कम से कम आप तो साहसी निकले . डेमोक्रेसी में जनता के सभी अधिकार लेने की कोशिश हो रही है सोई जनता को जागते रहो.
"कुटिल" सिब्बल को लगता है, कि फ़ेसबुक, गूगल, ऑरकुट और ट्विटर भी आरएसएस द्वारा संचालित हो रहे हैं.वाकई इन सेकुलरों के लिए "छातीकूट मोहर्रम" का कोई अन्त नहीं…
अपनी गन्दी आदत नहीं सुधार सकते हैं, तो जनता के साथ साथ सोसिअल नेट्वोर्किंग साइट्स को जिम्मेवार ठहरता है.
सुशील जी क्या सिब्बल साहब ने एफ़एचएम मैगज़ीन नहीं देखी है जिसमें वीणा मलिक की तस्वीर छाप कर नारी समाज का अपमान किया गया है. क़ानून के जानकार और शक्तिशाली मंत्री होने के नाते वे पहले इस पत्रिका को ज़ब्त करवाएं.
आपने जिस सफाई से अपनी बात कही है शायद इलेक्ट्रोनिक मीडिया उतनी सफाई से अपनी बात कहे क्योंकि सभी कांग्रेस और खासकर गाँधी परिवार की चमचागिरी को ही अपनी पत्रकारिता धर्म समझते हैं. सरकार अब तो मनमानी पर उतर आयी है. कपिल सिब्बल का हर एक बयान कुटिलता से भरा और क्रोध को भड़काने वाला होता है उसी को लोग कभी कभी उनकी चतुराई भी समझते हैं. अगर हम अपनी भाषा में कहें तो अब सरकार रंगदारी कर रही है मगर शायद वो जनता को अधिक भड़काने का ही काम कर रही है.
आपने बहुत ही बढ़िया ब्लॉग लिखा है. आपने ना केवल अपनी राय रखी है बल्कि ये तो सारे भारतीयों की राय है.
ये आपका सबसे बेहतरीन ब्लॉग है.
बहुत बढ़िया, आप एक सच्चे भारतीय और अच्छे लेखक हैं.
सिब्बल की बात तो दर किनार, लेकिन ये सोसल नेटवर्किंग कम्पनियाँ समाज का जितना नुकसान कर रही हैं, शायद उसके बारे में कोईं नहीं सोचता. लोगों की व्यक्तिगत सूचनाएँ चुरा के बेचना, अश्लील साहित्य का प्रचार प्रसार करना आदि तो अब बहुत सामान्य हो गया है.
आज जब युवा वर्ग अपने रोम रोम की तस्वीर और हर क्षण की हर बात दुनिया भर को पहुँचाना चाहता है जो अत्यधिक उर्जा खाने वाला काम है. जो सर्वर इस तरह की सूचनाये संगृहीत करते हैं और जरूरत पड़ने पर आपके कम्पूटर को मुहय्या कराते हैं, वे भविष्य में अत्यधिक उर्जा लेंगे क्योंकि सूचनाओं की मात्रा दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है. पुराने कम्पूटरों के रूप में जितना कूड़ा और प्रदूषण पैदा हो रहा है, उसका खामियाजा उन बच्चों को अपनी ज़िन्दगी में ही भुगतान पड़ेगा जो एक छन के लिए भी फेसबुक से नहीं हटना चाहते. रेडियो तरंग से होने वाला नुकसान तो दर किनार.
डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी
क्लीवलैंड , अमेरिका
@Satyadita. फ़ेसबुक, गूगल, ऑरकुट और ट्विटर भी आरएसएस द्वारा संचालित तो नहीं हो रहे हैं पर आरएसएस और उसके लोगों ने जरुर उनमे गंध मचा रखी है.
सुशील जी...जितनी तारीफ़ की जाए वो कम है..बहुत अच्छा
एसिस्टेंट- साहब, बीबीसी के एक पत्रकार ने आपके खिलाफ कुछ लिखा है.
सिब्बल- क्या?
बीबीसी. अच्छा हम उनको भी गाइडलाइन्स भेजेंगे आपत्तिजनक बातें हटाने को.
सत्ता के नशे में मदहोश कपिल सिब्बल ये भूल गए हैं कि उन्हें जनता की अदालत में फिर जाना है. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर रोक लगाने से आम आदमी की आवाज़ को नहीं रोका जा सकता है.जो आदमी 2 जी घोटाले में सीएजी रिपोर्ट को ही पूरी तरह ग़लत ठहरा दे उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं. सिब्बल साहब 2014 ज़्यादा दूर नहीं हैं, जनता का जवाब आपको मिल जाएगा.
मुझे याद ख़ुद कपिल सिब्बल ने एक बार कहा था तकनीक का ज़माना है हम आप किसी को रोक नहीं सकते.
यहाँ पर भी आर एस एस का नाम उछल के पहले जब ले ही लिया है आदतन, जैसे की फेसबुक पर सिर्फ आर एस एस ही कम्मेंट करती है हर प्रोफाईल से .. हमेशा की तरह रोना.. तो अब जवाब भी सुनियेगा.शरिया थोपने वालो की अश्लील पोस्ट और कम्मेंट भेज भेज के या गुजरात दंगो पर मोदी के नाम पर ताने दे दे कर भावनाएं भड़काने वाले असली दंगाइयों के बारे में आपको कुछ कहना नहीं क्यूँ नहीं सूझा ? ..
बहुत ख़ूब
बहुत सही आईना है ये कांग्रेस और सिब्बल जैसे तालिबानी फ़तवा जारी करने वालों के लिए.
कांग्रेस को फ़ेसबुक, ट्विटर, इत्यादि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी असफलता के प्रति आम जनता में उपजे आक्रोश दिखाई पड़ रहें हैं और इसके दमन का प्रयास किया जा रहा है.
वैसे भारत में यह तालिबानी दमन संभव नही है, यदि कांग्रेस इस क्षेत्र में मनमानी करती है तो संभव है कि कांग्रेस की मिट्टी पलीद हो जाए और कोई पानी देने वाला भी ना मिले.
बहुत बढ़िया लेख लिखा है आपने. जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.
सुशील जी, आपने कपिल सिब्बल जी को आइना दिखाया है कि पहचानो आप जो लोगों को दिखा रहे है ,वैसे आप खुद को भी देख पा रहे है या नही ,या अपने आप को भी पहचानते हो या नही. जो ये दर्पण देख कर यही कहेगे कि यह तो मैं नही हूँ ,यह सही भी है ,क्योंकि जब यह आम लोग थे तो मीडिया में विज्ञप्ति छपवाने के लिये पत्रकारो की खुशामदी करते थे पर अब भारत देश के पहुचे मंत्री है , मीडिया के मालिको से सीधे रिश्ता रखते है ,इस गुमान में जो आये कह देते है ,यह इस गुमान में है कि वह 5 सालो के लिया भारत की जनता के मालिक है ,उन्हें अलादीन का चिराग मिला हुआ है ,वह जो चाहे कर सकते है और कर भी रहे है ,पर सुशील जी, जनता अपना दुखड़ा किसे सुनाये ऐसे लोग किसी कि सुनते ही नही ,अपनी मनमर्जी कर रहे है ,और जनता भी बेचारी मजबूरी में सब कुछ सहन करती रही थी ,पर जब से इंटरनेट का चलन हुआ है तब से जनता को बहुत कुछ कहने को मिला है और लोग अपनी अपनी राय भी देते है ,जिससे इन जेसे नेताओं को जो अपनी मनमर्जी चलाना चाहते है , उस पर लगाम लग रही है ,या विरोध कर रहे है जो इनसे सहन नही तो रहा है क्योंकि इन की तानाशाही पर चोट लग रही है ,सवाल यह है कि यह अनैतिक काम जो जनता नही चाहती है वह करते ही क्यों है जिससे जनता को कहने का मौका मिलता है ,यह खुद नही सुधर कर ,जनता को दादागिरी से चुप करना चाहते है ,वो दिन लद गए . यह अब भी इस मुगालते में ही जी रहे है. इनके पास समय का अभाव है यह इंटरनेट पर जाते ही नही हैं. इन्हें अनगिनित कामो से फुर्सत मिलती ही कहाँ है. मंत्री बनाने से क्या ये इंटरनेट के ज्ञाता तो होने से रहे ,यह सही है कि अशीलता ,या धर्मो को लेकर कि गई टिप्पणियों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए , पर लोगो की जुबान इंटरनेट पर बांध करने कि बात करना ही नासमझी है .
कुछ भी हो लेख शानदार है और इसमें जो भी अभिव्यक्ित व्यक्त की गई है, वह भी सत्य है और एक आम आदमी को सत्य और असत्य जानने और उस पर प्रतिक्रिया करने का हक है. शायद केंद्र सरकार महंगाई, लोकपाल बिल, घटती लोकप्रियता व अन्य मुद़दों पर लोगों से बातचीत नहीं करना चाहती है, उन्हें नेताओं पर हो रहे हमलों और अन्ना का डर सता रहा है, यह सीधे तौर पर सेंसरशिप लगाने की तैयारी है, यदि ऐसा हुआ तो न कोई स्टिंग ऑपरेशन होगा और न ही किसी भष्ट नेता व अधिकारी की बुराई सामने आयेगी, जो सरकार चाहेगी वैसा ही करना होगा.
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. इससे उनकी सरकार की छवि ही गिरेगी. वो ये क्यों नही सोचते कि ये सारी बातें किसी और नेता के साथ नही हो रहीं. सुषमा जी हैं, पर आख़िर कांग्रेस ही क्यों ? मतलब कि पूरा देश ही ग़लत है और कांग्रेस सही है. सिब्बल जी ये क़दम बेकार का है.
बेहद अच्छी टिप्पणी है
माननीय सिब्बल जी के लिए अच्छा जवाब है.
अरे झा साहब, क्यों अपना दिमाग खराब कर रहे हैं. आदणीय सिब्बल जी और पूज्यनीय दिग्गी राजा ने तो कसम खा रखी है कि दिमाग को कष्ट नहीं देना हैं. जो मन में आए कह देना है.जनता की कौन सुनता है.
ये भारत के लोगों की आवाज़ है.इसे चुप नहीं कराया जा सकता.
अब लगता है कि कांग्रेस पार्टी का अंत आ गया क्योंकि जब अंत आता है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है.
कुछ लोग लोकतंत्र का यह मतलब निकालते है, की हर एक व्यक्ति की बात मानी जाये, परन्तु लोकतंत्र का मतलब है की हर एक व्यक्ति की बात सुनी जाये, यदि आप के पास 100 सुझाव आते है तो उनमे से मात्र 10 ही ध्यान देने लायक होते है, बाकि कचरे की टोकरी में डालने लायक.
परन्तु मीडिया हर आदमी की बात को बराबर महत्व देता है जब की उसका सामाजिक दायित्व है की वो उल जुलूल सुझावों को तूल न दे कर उसे अन सुना कर दे, ताकि अच्छे सुझावों को महत्व मिल पाए.
नेता कुछ भी बोले चले जाते है और लोग उस पर अपना वक़्त बर्बाद करते रहते है. कपिलजी पहले अपने आप पर काबू करना सीख ले फिर इन्टरनेट पर काबू करने की सोचे.
मैं आपके विचारों से बिल्कुल सहमत हूं सुशील जी. ये नासमझी है.