इस विषय के अंतर्गत रखें नवम्बर 2011

अजी सुनती हो !

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|शनिवार, 26 नवम्बर 2011, 20:57

टिप्पणियाँ (43)


पाकिस्तान 13 अगस्त 1947 तक अफ़ग़ानिस्तान, चीन या ईरान का हिस्सा नहीं बना था बल्कि हिंदुस्तान का हिस्सा था. सिवाय काबुल दरिया के पाकिस्तान में सब नदियां हिंदुस्तान से दाख़िल होती हैं.

पाकिस्तान की सबसे लंबी सीमा चीन, अफ़ग़ानिस्तान या ईरान के साथ नहीं बल्कि भारत से मिलती हैं.

पाकिस्तानी नागरिक ईरान, चीन और अफ़ग़ानिस्तान भी जाते हैं लेकिन सबसे ज़्यादा भारत जाते हैं. हांलाकि पाकिस्तान में फ़ारसी, पश्तो और चीनी बोली जाती है लेकिन सबसे ज़्यादा उर्दू बोली जाती है जो ईरान, अफ़ग़ानिस्तान या चीन में नहीं बल्कि हिंदुस्तान में पैदा हुई.

चीन, ईरान या अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान की कभी जंग नहीं हुई लेकिन भारत से चार बड़ी जंगें और सैकड़ों छोटी-मोटी झड़पें हो चुकीं हैं.

पाकिस्तान के सिनेमाओं में अफ़ग़ान, चीनी या ईरानी फ़िल्में नहीं दिखाई जातीं बल्कि भारतीय फ़िल्में दिखाई जाती हैं.

पाकिस्तान के टीवी दर्शक सबसे ज्यादा जो ग़ैर-मुल्की चैनल देखतें हैं उनमें हिंदुस्तानी चैनल सबसे आगे हैं.

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियां चीन, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से आने-जाने वालों पर उतनी कड़ी नज़र नहीं रखतीं जितनी भारत आने-जाने वालों या भारत से आने-जाने वालों पर रखती हैं.

यही काम भारतीय एजेंसियां भी करती हैं.

पाकिस्तानी चीनी, अफ़ग़ानी और ईरानी खाना भी पसंद करते हैं लेकिन उनके किचन में रोज़ाना जो कुछ पकता है वो उत्तरी भारत के किसी भी घर के किचन मे पकता है.

पाकिस्तान में शायद ही कोई अफ़ग़ानी, चीनी या ईरानी शायर और अदीब इतना मशहूर हो जितने हिंदुस्तानी शायर या अदीब मशहूर हैं.

हर पाकिस्तानी बच्चा शाहरूख़ ख़ान, सलमान ख़ान, सचिन तेंदुल्कर और मनमोहन सिंह को जानता है.

लेकिन बहुत कम पाकिस्तानी बच्चे अफ़ग़ानिस्तान, चीन और ईरान के शीर्ष अदाकारों या खिलाड़ी या नेताओं के बारे में जानते हैं.

पाकिस्तानी एफ़एम चैनल पर बॉलीवुड संगीत चलता है. राहत फ़तह अली ख़ान और आतिफ़ असलम के बारे में ये बताना मुश्किल है कि वो भारत के ज़्यादा हैं या पाकिस्तान के.

इन सबके बावजूद पाकिस्तानी राजनेता, कमेंटेटर, टीवी ऐंकर, फ़नकार जब भी कोई लेख लिखते हैं, कोई बात करते हैं तो अफ़ग़ानिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान, ईरान को ईरान, चीन को चीन कहते हैं लेकिन भारत को भारत, इंडिया या हिंदुस्तान नहीं कहते, पड़ोसी मुल्क कहते हैं.

जैसे पारंपरिक पत्नियां और पति एक दूसरे का नाम नहीं लेते, मुन्ने के अब्बा और अजी सुनती हो कह कर गुज़ारा करते हैं.

ऐसा भला क्यों है, क्या भारत में भी पाकिस्तान को पाकिस्तान कहा जाता है या पड़ोसी मुल्क़ कह कर काम चलाया जाता है?

सचिन देश के लिए एक बाम हैं

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 25 नवम्बर 2011, 13:04

टिप्पणियाँ (14)

एक बार फिर 120 करोड़ भारतवासियों का दिल टूट गया. सचिन 100 वाँ सैकड़ा नहीं मार पाए.

उनको शतक लगाए हुए 10 मैच बीत चुके हैं. उनके ऐसा न कर पाने पर कई मज़ाक भी चल निकले हैं. 'सचिन से पहले पेट्रोल का दाम 100 को छू लेगा.'

इस तरह की फ़ब्तियाँ उनके साथ बेइंसाफ़ी है और एक तरह की एहसान फ़रामोशी भी.

अगर ख़ुदा न ख़ास्ता सचिन सौंवा शतक नहीं भी मार पाते तो उससे उनकी महानता कम नहीं हो जाएगी.

100 शतक बनाना एक क्रिकेटीय रिकॉर्ड ज़रूर हो सकता है लेकिन मेरा मानना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान है 120 करोड़ भारतवासियों की ख़ुशी का बार बार कारण बनना.

पहली बार उनके बारे में मैंने जाना था 1987 में. हम अपने हीरो गावस्कर के रिटायर होने का ग़म मना रहे थे. बेशक वैंगसरकर बेहतरीन फ़ॉर्म में थे, माँजरेकर की तकनीक की हर जगह चर्चा थी ...... अज़हरउद्दीन की जादुई कलाइयों पर पूरा भारत कुर्बान था. लेकिन इनमें से कोई भी गावस्कर के समकक्ष या उनसे बेहतर नहीं था.

तभी तेंदुलकर का उदय हुआ. जब उन्हें भारतीय टीम में चुना गया तो सिर्फ़ इस बात पर रोमाँच हो आया कि 16 साल का यह लड़का उस समय दुनिया के तीव्रतम गेंदबाज़ों इमरान ख़ाँ, वसीम अकरम और वकार यूनुस का सामना किस तरह करेगा.

यह आशंका सच भी हो गई जब सियालकोट के एक मैच में वकार यूनुस की एक गेंद उनकी नाक पर लगी और उनका पूरा चेहरा ख़ून से सराबोर हो गया.

दूसरे छोर पर खड़े नवजोत सिंह सिध्दू दौड़ कर उनके पास पहुँचते, इससे पहले ही सचिन बोल पड़े, 'मैं खेलेगा.'

वकार की दूसरी ही गेंद जिस तरह से उन्होंने चार रनों के लिए कवर ड्राइव किया उससे ही क्रिकेट दुनिया को संदेश चला गया कि एक क्रिकेट सुपर स्टार का जन्म हो चुका है.

उसी दौरे में पेशावर के एक मैच में जब अपने करियर के पीक पर चल रहे अब्दुल कादिर की गेंद पर सचिन ने छक्का लगाया तो इमरान ने कादिर को छेड़ा, 'एक स्कूल का लड़का आपको ठोक रहा है.'

अब्दुल कादिर ने आँख मारते हुए यह इशारा देने की कोशिश की कि वह लड़के के लिए जाल बिछा रहे हैं. अगली ही गेंद पर सचिन ने एक छक्का और जड़ दिया.

उस ओवर में कादिर की गेंद पर दो छक्के और लगे और चौथे छक्के के बाद अब्दुल कादिर की कुटिल मुस्कान हमेशा के लिए जाती रही.

1998 में शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ हुए मैच को भी याद करिए. वहाँ मैच के दौरान इतनी ज़बरदस्त आँधी आई कि सारे खिलाड़ी ज़मीन पर लेट गए.

थोड़ी देर बाद जब आँधी रुकी तो ऑस्ट्रेलिया को एक दूसरी ही आँधी का स्वाद चखना पड़ा. सचिन ने न सिर्फ़ यह मैच जितवाया, बल्कि दो दिन बाद एक शतक और जड़ कर भारत को एक जीत और दिलवाई.

इसी मैच के बाद शेन वार्न ने स्वीकार किया कि उन्हें सचिन की वजह से डरावने सपने आते हैं.

एक और मैच ज़हन में आता है.... 1999 का चेन्नई टेस्ट. सचिन की पीठ में इतना दर्द था कि उन्हें लगने लगा कि उन्हें मैदान छोड़ना पड़ेगा.

मैच जल्दी ख़त्म करने की कोशिश में उन्होंने सकलैन मुश्ताक की चार गेंदों पर चार लगातार चौके लगाए. पाँचवा चौका मारने की कोशिश में वह सकलैन की गेंद पर वसीम अकरम को कैच दे बैठे और भारत वह मैच हार गया.

पूरा ड्रेसिंग रूम आँसुओं से भीग गया. गावस्कर ने टिप्पणी की, 'अगर तुम किसी चीज़ को ख़ुद कर सकते हो तो उसे दूसरे के लिए कभी मत छोड़ो.'

सचिन इस समय शायद भारत के सबसे मशहूर जीवित व्यक्ति हैं. हाल ही में स्वर्गवासी हुए मशहूर क्रिकेट लेखक पीटर रोबक ने उनके बारे में लिखा था,'तेंदुलकर एक देश की अवस्था और उसके क्रमिक विकास को बयान करते हैं.'

सचिन का सौंवा शतक बने या न बने भारतवासियों को अपने आप को इस बात के लिए भाग्यशाली मानना चाहिए कि साढ़े पाँच फ़िट का यह इंसान अपने बल्ले को हिलाने भर से पूरे देश के संघर्ष और आपाधापी को भुलाने के लिए मजबूर कर देता है.

रामचंद्र गुहा की मानी जाए तो सचिन तेंदुलकर देश के लिए एक बाम का काम करते हैं.

रियल स्लमडॉग मिलियनेयर की रिएलिटी

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|गुरुवार, 17 नवम्बर 2011, 21:07

टिप्पणियाँ (15)

ब्रिटेन के 190 साल पुराने अख़बार गार्डियन के तीसरे पन्ने पर, भारत की कोई ख़बर छपे, ऐसा अक्सर नहीं होता, मगर पिछले महीने की 28 तारीख़ को ऐसा हुआ.

इस दिन ये पूरे का पूरा पन्ना ही भारत की एक ख़बर को समर्पित था. हेडलाइन थी - रियल स्लमडॉग मिलियनेयर. बड़ी सी तस्वीर भी थी साथ में, हॉट सीट से नीचे उतरकर, खड़े होकर, दोनों हाथ जोड़कर, अमिताभ बच्चन को नमस्कार करते, मुस्कुराते, सुशील कुमार की तस्वीर.

संभवतः ये स्लमडॉग मिलियनेयर फ़िल्म का प्रभाव था कि इस ख़बर को ब्रिटेन की मीडिया में ख़ूब स्थान मिला, कि कैसे एक सिनेमाई अफ़साना हक़ीक़त में बदल गया.

जीते रूपयों से पिता का कर्ज़ चुकाने, बड़े भाईयों की मदद करने, घर की टूटी छत बनवाने, गाँव के बच्चों के लिए लाइब्रेरी बनाने, और आगे सिविल सेवा की तैयारी करने की सुशील की योजना का भी ज़िक्र था.

सुशील कुमार की इस ख़बर से ठीक दो सप्ताह पहले, ब्रिटेन में ऐसी ही एक और ख़बर आई थी, दो आम लोगों के अरबपति बनने की.

केम्ब्रिज के पास रहनेवाले दो साधारण लोग, 47 वर्षीय डेव डॉस और उनकी मेहबूबा, 43 वर्षीया एंजेला डॉस एक लॉटरी जीतकर अरबपति बन गए.

दोनों ने पूरे 101 मिलियन पाउंड यानी दस करोड़ पाउंड यानी कोई लगभग आठ अरब रूपए जीते.

खबरों के साथ की तस्वीरों में वे कहीं हाथों में महँगी शराब के जाम थामे, कहीं हेलिकॉप्टर के सामने, तो कहीं महँगी डिज़ाइनर दूकानों के आगे, ब्रांडेड बैग लटकाए दिखाई दिए.

जीती रकम ख़र्च करने की उनकी योजना में शामिल था - लंदन के एक महँगे इलाक़े में घर लेना, चेल्सी फ़ुटबॉल क्लब के मैचों के सीज़न टिकट ख़रीदना, पुर्तगाल में घर ख़रीदकर वहाँ शादी करना, और इसके साथ-साथ अपने 20 दोस्तों में पैसे बाँट उन्हें करोड़पति बना देना.

साथ-साथ एक और ख़बर थी, विजेता महिला एंजेला के पूर्व पति जॉन लीमैन और बेटे स्टीवन लीमैन की.

जॉन और स्टीवन ने एंजेला के बारे में कहा - वो एक मतलबी और भौतिकतावादी महिला थी, उसके लिए जीवन में पति और बेटा ही सबकुछ नहीं था, इसलिए उसने अपनी सुख-सुविधा के लिए उन्हें छोड़ दिया.

उनकी बताई कहानी के अनुसार - हमेशा बाहर रहनेवाला ट्रक ड्राईवर जॉन अचानक एक दिन घर लौटा तो उसने देखा, उसका सारा सामान फेंका हुआ है. तीन दिन बाद स्कूल की छुट्टी बिताकर बाहर लौटे स्टीव ने जब माँ से पिता के बारे में पूछा, तो उसने उसे भी जॉन के पास जाने के लिए कह दिया. स्टीव तब 12 साल का था.

अरबपति एंजेला के बेटे स्टीव ने अपनी माँ की कामयाबी पर ये कहा - मेरी माँ मुझे चाहे अपनी लॉटरी की एक-एक पाई दे दे, वो मेरी माँ नहीं बन सकती, वो अपने किए को नहीं बदल सकती, ये ऐसी चीज़ है जिसे ख़रीदा नहीं जा सकता.

भारत के रियल स्लमडॉग मिलियनेयर की रिएलिटी केवल उसका मिलियनेयर बन जाना भर नहीं है, साधारण सुशील कुमार के पास क्या असाधारण दौलत है, ये समझने में ब्रिटेन के बिलियनेयर विजेताओं की रिएलिटी जानने से मदद मिल सकती है.

एक क़ैदी की रिहाई

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 15 नवम्बर 2011, 20:03

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मजीद 17 वर्ष का था जब वो रास्ता भूल कर कसूर से सीमा पार चला गया और भारत के सीमा सुरक्षा बल के हाथ चढ़ गया.

जाँचकर्ताओं ने कई दिनों की जाँच के बाद पाया कि मजीद जासूस या आतंकवादी नहीं है तो उन्होंने उसे अवैध रुप से सीमा पार करने के आरोप में जेल भेज दिया गया.

मजीद को पंजाब और राजस्थान की चार जेलों में रखा गया और दो बार जज के समक्ष पेश किया गया.

साल 2001 में मजीद को मुशर्रफ़ और वाजपेयी की आगरा में हुई मुलाक़ात के कुछ दिनों बाद मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं के दबाव पर मजीद को रिहा करने का आदेश दिया गया था.

लेकिन जुलाई 2010 तक अदालती फ़ैसले पर अमल नहीं हो सका.

आख़िरकार मजीद को जेल से निकाल कर अमृतसर पहुँचाया गया और विभिन्न जेलों से रिहा किए गए दूसरी पाकिस्तानी क़ैदियों के साथ वाघा सीमा पर पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले किया गया.

मजीद को उनका भाँजा और छोटी मौसी किराए की गाड़ी में पाक-भारत सीमा पर लेने आए.

मजीद को बताया गया कि उनके पिता का 1994 में और माता का 2004 में निधन हो गया.

बड़ी बहन के चार और छोटी के दो बच्चे हैं. यह लोग कसूर से लाहौर आ चुके हैं और कसूर वाला घर बेच दिया गया है.

मगर मजीद ये सब कुछ नहीं सुन रहा था, उनका ध्यान कहीं ओर था और वह हर व्यक्ति को आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहा था. 31 साल में दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी थी.

जैसे ही गाड़ी लाहौर के सज़बाज़ार इलाक़े में पहुंची तो मोटर साइकल पर सवार चार लोगों ने आगे आकर उसे रोकने की कोशिश की.

लेकिन गाड़ी के ड्राईवर ने रोकने के बजाए गाड़ी ओर तेज़ कर दी जिस पर मोटर साइकल पर सवार लोग आक्रोश में आ गए और उन्होंने गाड़ी पर सीधी फ़ायरिंग की.

ड्राइवर उसी समय मर गया और गाड़ी खंबे से टकरा गई. मजीद, उनकी मौसी और भाँजे को घायल स्थिति में अस्पताल पहुँचाया गया.

अगली सुबह मजीद मर गया.

अस्पताल प्रबंधन ने शव मजीद की बड़ी बहन के हवाले करते हुए एक फॉर्म भरने को कहा.

मजीद की बहन ने फॉर्म में लिखा.

नाम: अब्दुल मजीद
जन्म तिथि: 05 नवंबर 1962
मृत्यु तिथि: 29 जुलाई 2010
आयु: 17 वर्ष

एक क़ैदी की रिहाई

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 15 नवम्बर 2011, 20:03

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मजीद 17 वर्ष का था जब वो रास्ता भूल कर कसूर से सीमा पार चला गया और भारत के सीमा सुरक्षा बल के हाथ चढ़ गया.

जाँचकर्ताओं ने कई दिनों की जाँच के बाद पाया कि मजीद जासूस या आतंकवादी नहीं है तो उन्होंने उसे अवैध रुप से सीमा पार करने के आरोप में जेल भेज दिया गया.

मजीद को पंजाब और राजस्थान की चार जेलों में रखा गया और दो बार जज के समक्ष पेश किया गया.

साल 2001 में मजीद को मुशर्रफ़ और वाजपेयी की आगरा में हुई मुलाक़ात के कुछ दिनों बाद मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं के दबाव पर मजीद को रिहा करने का आदेश दिया गया था.

लेकिन जुलाई 2010 तक अदालती फ़ैसले पर अमल नहीं हो सका.

आख़िरकार मजीद को जेल से निकाल कर अमृतसर पहुँचाया गया और विभिन्न जेलों से रिहा किए गए दूसरी पाकिस्तानी क़ैदियों के साथ वाघा सीमा पर पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले किया गया.

मजीद को उनका भाँजा और छोटी मौसी किराए की गाड़ी में पाक-भारत सीमा पर लेने आए.

मजीद को बताया गया कि उनके पिता का 1994 में और माता का 2004 में निधन हो गया.

बड़ी बहन के चार और छोटी के दो बच्चे हैं. यह लोग कसूर से लाहौर आ चुके हैं और कसूर वाला घर बेच दिया गया है.

मगर मजीद ये सब कुछ नहीं सुन रहा था, उनका ध्यान कहीं ओर था और वह हर व्यक्ति को आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहा था. 31 साल में दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी थी.

जैसे ही गाड़ी लाहौर के सज़बाज़ार इलाक़े में पहुंची तो मोटर साइकल पर सवार चार लोगों ने आगे आकर उसे रोकने की कोशिश की.

लेकिन गाड़ी के ड्राईवर ने रोकने के बजाए गाड़ी ओर तेज़ कर दी जिस पर मोटर साइकल पर सावर लोग आक्रोश में आ गए और उन्होंने गाड़ी पर सीधी फ़ायरिंग की.

ड्राइवर उसी समय मर गया और गाड़ी खंबे से टकरा गई. मजीद, उनकी मौसी और भाँजे को घायल स्थिति में अस्पताल पहुँचाया गया.

अगली सुबह मजीद मर गया.

अस्पताल प्रबंधन ने शव मजीद की बड़ी बहन के हवाले करते हुए एक फॉर्म भरने को कहा.

मजीद की बहन ने फॉर्म में लिखा.

नाम: अब्दुल मजीद
जन्म तिथि: 05 नवंबर 1962
मृत्यु तिथि: 29 जुलाई 2010
आयु: 17 वर्ष

एक निष्ठुर की रहमदिली

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शनिवार, 12 नवम्बर 2011, 13:43

टिप्पणियाँ (35)

पेट्रोल के दाम तेल कंपनियों ने फिर बढ़ाए. सरकार के कुछ साथी दलों और विपक्ष ने सरकार से कहा कि बढ़ोत्तरी वापस होनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा, नहीं हो सकता.

उन्होंने मानों पलटवार किया,'सरकार का उस पर नियंत्रण नहीं, दाम बाज़ार तय करेगा.'

वो एक क़दम और आगे बढ़ गए, कहा कि डीज़ल और एलपीजी के दाम भी बाज़ार को तय करना चाहिए.

लोगों ने गुहार लगाई, तेल के दाम से तेल निकला जा रहा है.लेकिन मनमोहन सिंह अविचलित रहे.

बहुत से लोगों ने इसे एक अर्थशास्त्री की साफ़गोई की तरह देखा.हालांकि उससे भी ज़्यादा लोगों ने इसे एक कल्याणकारी राज्य के प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की निष्ठुरता की तरह देखा.

फिर देश के सबसे चर्चित उद्योगपति विजय माल्या की एयरलाइन कंपनी डूबने लगी. किंगफ़िशर एयरलाइन के बारे में ख़बर है कि उसमें एक हज़ार करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का घाटा है. कंपनी कर्मचारियों को तनख़्वाह नहीं बाँट पा रही है और उड़ाने रद्द करनी पड़ रही हैं.

तेल कंपनियों ने किंगफ़िशर के लिए 'आज नक़द कल उधार' की तख़्ती टाँग दी है. अब विजय माल्या कह रहे हैं कि तेल के बढ़ते दामों की वजह से कंपनी डूब रही है और उसे बचाना होगा.

एकाएक अविचल सरकार में हलचल हो गई. नागरिक विमानन मंत्री ने इतनी चिंता कभी नागरिकों की नहीं की होगी जितनी एकाएक वे एक विमानन कंपनी की करने लगे.

जो वित्तमंत्री कल तक पत्रकारों को डाँट रहे थे कि तेल कंपनी को घाटा हो रहा था इसलिए उसने दाम बढ़ा दिए, इसमें सरकार क्या करेगी वही एकाएक नरम पड़ गए और कहा कि वे बैंकों से बात करेंगे कि विजय माल्या की कंपनी को कुछ सहायता दें. राहत पैकेज.

विजय माल्या से हमेशा लोगों को ईर्ष्या होती रही है.

वे देश की सबसे बड़ी शराब कंपनियों में से एक के मालिक हैं, उनके पास फ़ॉर्मूला वन की टीम है, वे आईपीएल की एक क्रिकेट
टीम के मालिक हैं, वे भारत में एक फ़ुटबॉल टीम के मालिक हैं और इंग्लैंड की एक फ़ुटबॉल टीम में उनकी भागीदारी है, उनके पास एक टीवी चैनल है, अमरीका में एक अख़बार है, एक स्टड फ़ार्म है और भारतीय संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा की सदस्यता है.

इसके अलावा उनके पास ऐसी बहुत सी सुंदरियों की भीड़ है,जिनके पास अक्सर कपड़े कम होते हैं.

वे जब चाहें 3000 करोड़ चुकाकर स्कॉच बनाने वाली एक कंपनी ख़रीद सकते हैं,जब चाहें तब 550 करोड़ चुकाकर एक एयरलाइन कंपनी को ख़रीद सकते हैं. वे नीलामी में टीपू सुल्तान की तलवार और महात्मा गांधी के सामान को ख़रीद कर भारतीयों को गौरवान्वित होने का मौक़ा दे सकते हैं.

जिस व्यक्ति की अपनी निजी संपत्ति 70 अरब रूपए से अधिक की हो,उससे भला किसे ईर्ष्या नहीं होगी?

इतना कम था कि अब भारत सरकार उनकी कंपनी को बचाने के लिए एक हज़ार करोड़ रुपए का पैकेज जुटाने में लग गई है.

विशेषज्ञ कह रहे हैं कि किंगफ़िशर एयरलाइन को चलाने में व्यावसायिक कमियों की वजह से उसे घाटा हुआ,वरना कई दूसरी कंपनियों की तरह वो भी फ़ायदे में चल सकती थी.

जो लोग प्रधानमंत्री से सुन रहे थे कि क़ीमतें बाज़ार को तय करने दीजिए,उनकी सरकार से ये समझ में नहीं आ रहा है कि एक निजी कंपनी के डूबने की इतनी चिंता उसे क्यों हो रही है, उसका डूबना और बचना भी बाज़ार को क्यों तय नहीं करने दिया जा रहा है?

अगर आम लोग गुहार लगाएँगे कि वे डूब रहे हैं तो सरकार कहेगी कि ख़र्च कम करो फिर भी बात न बने तो अपनी कार,स्कूटर बेचो,मकान बेचो और हल्ला मचाना बंद करो.

क्यों विजय माल्या को सरकार यही सलाह नहीं दे रही है. क्या विजय माल्या अपने राजनीतिक रसूख़ का उपयोग कर रहे हैं या फिर सरकार का नीति आम लोगों और ख़ास लोगों के लिए अलग-अलग है.

डूब जाने दीजिए किंगफ़िशर एयरलाइन को. इससे दूसरे उद्योगपतियों और बाज़ार को सबक मिलेगा और आम लोगों को राहत मिलेगी कि सरकार सभी को एक ही तरह की निष्ठुरता से देख रही है.

ये बच्चे और हथकड़ियाँ

राजेश जोशीराजेश जोशी|शुक्रवार, 04 नवम्बर 2011, 15:35

टिप्पणियाँ (37)

पुलिस वाले की गिरफ़्त में वो दुबला पतला बच्चा सावधानी से सीढ़ी उतरने की कोशिश कर रहा है. दूसरी तस्वीर में उसी उम्र का, उतना ही दुबला पतला पर थोड़े छोटे क़द का एक और बच्चा बहेलिये के जाल में फँसे कबूतर सा दिखता है.

दोनों बच्चों की कलाइयाँ वर्दीधारी पुलिस वालों ने कस के पकड़ रखी हैं.

अख़बार के फ़ोटोग्राफ़र ने ये तस्वीर इन बच्चों को अदालत से बाहर लाते वक़्त खींची होगी. क्योंकि अख़बार की ख़बर के मुताबिक़ कुल छह बच्चों को पुलिस वाले हथकड़ियाँ पहना कर अदालत लाए थे.

मजिस्ट्रेट ने सबसे पहले पुलिस वालों को उन बच्चों की हथकड़ियाँ खोलने का आदेश दिया और सुनवाई के बाद उन्हें सुधारघर भेजने का आदेश दे दिया.

जाते जाते सातवीं जमात में पढ़ने वाला बुरहान नज़ीर चिल्लाकर बोला, "पुलिस ने हमें बेरहमी से मारा. उन्होंने मेरी बहनों और माँ के साथ बदसलूक़ी की... वो अरसा पहले मर गई." (अँग्रेज़ी से अनुवाद.)

* * *
अब निम्नलिखित प्रश्न और उनके उत्तर ध्यानपूर्वक पढ़िए.

ये बच्चे कौन हैं?
ये कश्मीरी बच्चे हैं.
उन्हें क्यों गिरफ़्तार किया गया है?
उन पर पथराव करने का आरोप है.
उन्होंने पथराव किस पर किया?
उन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों पर पथराव किया.
पर उन्होंने पथराव क्यों किया?

नोट: इस आख़िरी सवाल के कई जवाब हो सकते हैं. पर आप अपनी सुविधा और विचारधारा के आधार पर निम्नलिखित में से एक जवाब चुन सकते हैं.

1- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि स्कूल से मास्टर नदारद था और बच्चों के पास कुछ काम नहीं था.
2- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि वो भूखे थे और उन्हें खाना नहीं मिला.
3- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि कट्टरवादी तत्वों ने उनका ब्रेनवॉश कर दिया है.
4- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि "ये लोग होते ही ऐसे हैं."
5- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि वो आज़ादी चाहते हैं.

नोट: निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य है:

इस बात की कितनी संभावना है कि सुधारगृह में ये बच्चे इतने सुधर जाएँ कि वहाँ से निकलने के बाद पथराव करने वालों की भीड़ में शामिल होने की बजाए सीधे पाठशाला जाएँगे? गणना करके बताइए.

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