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ये बच्चे और हथकड़ियाँ

राजेश जोशीराजेश जोशी|शुक्रवार, 04 नवम्बर 2011, 15:35 IST

पुलिस वाले की गिरफ़्त में वो दुबला पतला बच्चा सावधानी से सीढ़ी उतरने की कोशिश कर रहा है. दूसरी तस्वीर में उसी उम्र का, उतना ही दुबला पतला पर थोड़े छोटे क़द का एक और बच्चा बहेलिये के जाल में फँसे कबूतर सा दिखता है.

दोनों बच्चों की कलाइयाँ वर्दीधारी पुलिस वालों ने कस के पकड़ रखी हैं.

अख़बार के फ़ोटोग्राफ़र ने ये तस्वीर इन बच्चों को अदालत से बाहर लाते वक़्त खींची होगी. क्योंकि अख़बार की ख़बर के मुताबिक़ कुल छह बच्चों को पुलिस वाले हथकड़ियाँ पहना कर अदालत लाए थे.

मजिस्ट्रेट ने सबसे पहले पुलिस वालों को उन बच्चों की हथकड़ियाँ खोलने का आदेश दिया और सुनवाई के बाद उन्हें सुधारघर भेजने का आदेश दे दिया.

जाते जाते सातवीं जमात में पढ़ने वाला बुरहान नज़ीर चिल्लाकर बोला, "पुलिस ने हमें बेरहमी से मारा. उन्होंने मेरी बहनों और माँ के साथ बदसलूक़ी की... वो अरसा पहले मर गई." (अँग्रेज़ी से अनुवाद.)

* * *
अब निम्नलिखित प्रश्न और उनके उत्तर ध्यानपूर्वक पढ़िए.

ये बच्चे कौन हैं?
ये कश्मीरी बच्चे हैं.
उन्हें क्यों गिरफ़्तार किया गया है?
उन पर पथराव करने का आरोप है.
उन्होंने पथराव किस पर किया?
उन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों पर पथराव किया.
पर उन्होंने पथराव क्यों किया?

नोट: इस आख़िरी सवाल के कई जवाब हो सकते हैं. पर आप अपनी सुविधा और विचारधारा के आधार पर निम्नलिखित में से एक जवाब चुन सकते हैं.

1- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि स्कूल से मास्टर नदारद था और बच्चों के पास कुछ काम नहीं था.
2- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि वो भूखे थे और उन्हें खाना नहीं मिला.
3- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि कट्टरवादी तत्वों ने उनका ब्रेनवॉश कर दिया है.
4- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि "ये लोग होते ही ऐसे हैं."
5- बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि वो आज़ादी चाहते हैं.

नोट: निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य है:

इस बात की कितनी संभावना है कि सुधारगृह में ये बच्चे इतने सुधर जाएँ कि वहाँ से निकलने के बाद पथराव करने वालों की भीड़ में शामिल होने की बजाए सीधे पाठशाला जाएँगे? गणना करके बताइए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:05 IST, 04 नवम्बर 2011 anand:

    मेरे विचार से व्यवहारिक तौर पर पहले और दूसरे जवाब की ज़्यादा उपयुक्त लगते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि तीसरा जो जवाब है उसका प्रयास नहीं किया गया हो.आज़ादी की मांग का कोई अंत नहीं है.आजकल तो पूरे भारत में कुछ मूर्खों को संसद से आज़ादी चाहिए.नौजवानों को भड़काना आसान है.उन्हें ग़लत राह पर डालना आसान है और उन्हें समझाना मुश्किल है.

  • 2. 18:12 IST, 04 नवम्बर 2011 सौरभ:

    छोटा मगर विचारोत्तेज़क लेख! लेख पढ़कर इंशा साहब के 'उर्दू की आखिरी किताब' की याद आ गई.
    अंतिम (अनिवार्य) प्रश्न का उत्तर देना शायद वहाँ रह रहे लोगों के लिए भी आसान नहीं, वहाँ से दूर रह रहे लोगों की बात तो दूर है!.आखिरी से पहले प्रश्न ने बहुत सारी बातों पर चोट की है. नई पीढ़ी को ऐसे ही सवालों-जवाबों में उलझा कर रख दिया गया है राजेश जी, और उनके भविष्य के बारे में शायद ही कोई सोच रहा है!
    रहा आखिरी प्रश्न के उत्तर का मसला- मैं इसका उत्तर नहीं दे सकता. और मुझे लगता है मैं इस परीक्षा में फ़ेल हो गया हूँ...

  • 3. 18:27 IST, 04 नवम्बर 2011 vikas kushwaha, kanpur:

    राजेश जी हम आपकी संवेदना का सम्मान करते है लेकिन ये संवेदना कश्मीरी पंडितों के बचाव के लिए क्यों नहीं है?

  • 4. 18:44 IST, 04 नवम्बर 2011 नवल जोशी:

    राजेश जी कश्मीर में बच्चों की स्थिति पर आपने अपने नजरिए से बात रखी है, लेकिन पहला प्रश्न ही गलत है और इसका उत्तर मुझे हर दर्ज़े तक ग़लत लगता है क्योंकि बच्चे कश्मीर, असम,बंगाल ,पहाड़ी,तमिलनाडु,गुजराती अथवा बिहार के नहीं होते हैं.हिन्दू,मुसलमान नहीं होते हैं .इस बात से शायद आप भी सहमत होगें कि जातीय और क्षेत्रीय पहचान जब तक सकारात्मक है तब तक इसका कोई मूल्य है,लेकिन जब कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बनना चाहता है और कुछ लोग अपने को प्रभावशाली दिखाना चाहते हैं केवल इस कारण यदि जातीय और क्षेत्रीय पहचान का नारा दिया जा रहा है तो दो कौडी भी इसका मूल्य नहीं है.

  • 5. 21:36 IST, 04 नवम्बर 2011 शकील अहमद:

    राजेश जी, कश्मीर में बच्चों के प्रति प्रशासन के रवैये पर आपने सवाल उठाये है, लेकिन आपके सवालों में ही कुछ सवाल छिपे हुए हैं जो कि ख़तरनाक हैं. पहला सवाल यह है कि आपने बच्चों के प्रति प्रशासन के सवाल को कश्मीर ये क्यों जोडा? क्या कश्मीर क्षेत्र में ही बच्चों के प्रति प्रशासन की नीति दमनकारी है और देश के दूसरे हिस्से में प्रशासन बच्चों के प्रति संवेदनशील है? आपने प्रशासन की ग़लत नीतियों को चिन्हित किया है लेकिन जिन लोगों ने बच्चों को अपने हित के लिए इस्तेमाल किया है उन पर आपकी कोई टिप्पणी नहीं आयी है। बच्चों के सवालों की ओट में कश्मीर पर टिप्पणी करने से गलत नतीजे सामने आयेगें, बच्चों का सवाल पूरी दुनियां में ही एक समान है कम से कम भारत के प्रशासन का नजरिया पूरे देश में ही एक सा है.

  • 6. 21:52 IST, 04 नवम्बर 2011 m. iqbal khan:

    मेरे हिसाब से पाँचवा उत्तर सही है.

  • 7. 22:35 IST, 04 नवम्बर 2011 ram:

    मैं जवाब तीन पर मोहर लगाऊंगा.

  • 8. 23:37 IST, 04 नवम्बर 2011 zafar:

    राजेश जी आप ने बेहद हल्के फुल्के तरीके से लोगों को एक गंभीर मुद्दे को पर्याप्त संवेदनशीलता से समझने का बेहतरीन प्रयास किया है.

  • 9. 11:51 IST, 05 नवम्बर 2011 HIMMAT SINGH BHATI:

    बच्चों में पथराव इसलिए किया क्योंकि कट्टरपंथियों ने उनका ब्रेनवॉश किया है.सुधार गृह में इन बच्चों की सुधरने की संभावना कम ही है क्योंकि सुधार गृह से निकल कर वे उसी माहौल में रहने पहूँच जाएंगे जहाँ पहले से ही रहते आए हैं.

  • 10. 15:36 IST, 05 नवम्बर 2011 niranjan:

    मैं तीसरे जवाब से सहमत हूं.

  • 11. 15:51 IST, 05 नवम्बर 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी, ऐसा लगता है कि सच्चाई को लिख कर आखिर में आप डर गए इसलिए आप ने वो पांच सवाल कर दिए.

  • 12. 17:44 IST, 05 नवम्बर 2011 saptarshi:

    गंभीर विषयों को इतने हल्के तरीके से न उठाएं.

  • 13. 19:49 IST, 05 नवम्बर 2011 Gajendra Singh:

    राजेश जी सादर नमस्कार, कश्मीरी बच्चों के प्रति आपकी सहानुभूति सराहनीय है. आपके नज़रिये से यदि कश्मीरी बच्चे आज़ादी चाहते हैं तो देश के बाकी बच्चे ग़ुलामी का जीवन क्यों जी रहे हैं ?
    1. वो बच्चे पिछड़े हैं, इसलिए वो अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे है?
    २. उन बच्चों की ताकत व जोश का सदुपयोग नहीं हो रहा है?
    3. वो बच्चे लक्ष्य से भटक गए हैं?
    4. वो बच्चे ग़ुलामी में जीने की कला जानते हैं?
    5. वो बच्चे देश के विकास के साथ प्रसन्नता से जीवन जी रहे हैं?
    मुझे बहुत प्रसन्नता होगी यदि आप इस प्रश्न का उत्तर दें .

  • 14. 21:16 IST, 05 नवम्बर 2011 ashish yadav hyderabad:

    राजेश जी, आपने बहुत ही संवदेनशील मुद्दा उठाया है. ग़लती हमारी सरकार की है. बच्चे तो कच्ची मिट्टी के समान होते हैं. उन्हें जैसा माहौल मिलेगा, वैसा ही बनेंगे. अगर चरमपंथी उनका ब्रेनवॉश कर सकते हैं तो सरकार अपनी नीतियों से उन्हें अपनी ओर क्यों नहीं मोड़ सकती. लेकिन संसद में बैठे नेताओं के झुंड को वोट बैंक की राजनीति से फ़ुरसत मिले तब ना. आपके सवाल का जवाब तीसरा ही होगा.

  • 15. 23:04 IST, 05 नवम्बर 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    उन्होंने पथराव क्यों किया? इसका जवाब तो वही बच्चा दे चुका है, "पुलिस ने हमें बेरहमी से मारा. उन्होंने मेरी बहनों और माँ के साथ बदसलूक़ी की... वो अरसा पहले मर गई." ऐसी सूरत में एक बच्चा पथराव के अलावा और क्या कर सकता है. भला बच्चे ऐसी व्यवस्था से आज़ादी क्यों न चाहें ? जो बच्चे बिगड़े ही नहीं हैं उन्हें सुधरने की क्या ज़रूरत? सुधरना तो सरकार को चाहिए. आखिर ग़लत कौन है- सरकार या आज़ादी चाहने वाले?

  • 16. 11:06 IST, 06 नवम्बर 2011 Dr. Rajesh:

    बेचारे बच्चे दो देशों की राजनीति का शिकार हो रहे हैं.

  • 17. 15:12 IST, 06 नवम्बर 2011 gopal:

    तीसरा जवाब सही एवं उपयुक्त है. यहां शिक्षा व्यवस्था मज़बूत नहीं है लेकिन इन सब चीज़ों की व्यवस्थता कैसे हो? आज अगर कश्मीर में होटल तथा पर्यटन उद्योग आ जाए तो स्थानीय लोगों को नौकरी के बहुत अवसर मिलेंगे. लेकिन इतना निवेश तो तभी कोई करेगा जब उन्हें इस बात की गारंटी मिले कि कोई आतंकवादी हमले नहीं होंगे. कश्मीर तो तभी सुधरेगा जब स्थानीय लोग उसे सुधारना चाहेंगे.

  • 18. 20:26 IST, 06 नवम्बर 2011 Anwar Ali:

    जिस बच्चे के सामने उसकी मां और बहनों के साथ बदसलूकी की जाएगी, वो पत्थर तो मारेगा ही. जब सुरक्षाबल बच्चों को बेरहमी से पीट सकते हैं तो उन्हें अपना ग़ुस्सा निकालने के लिए पथराव करना सरकार की कारगुज़ारी को उजागर करता है. पथराव की नौबत आने के लिए सरकार ज़िम्मेदार है. मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला ने स्वीकार किया है कि इसमें बाहर वालों का हाथ नहीं है.

  • 19. 20:40 IST, 06 नवम्बर 2011 Anant singh:

    राजेश जी, बेहतर ब्लॉग है. मेरे अनुसार आज़ादी का पूर्ण मतलब तो उन बच्चों को नहीं पता होगा, हां उनमें अपने परिवार पर अत्याचार के प्रति प्रतिशोध की भावना अवश्य होगी.

  • 20. 06:48 IST, 07 नवम्बर 2011 सिद्धार्थ जोशी:

    राजेश जी आपने अन्तिम प्रश्न के लिए ”सुविधा और विचारधारा“ के अनुसार विकल्प दिये हैं. लेकिन उन उत्तरों का क्या मूल्य होगा जो कि हमारी ”सुविधा और विचारधारा“ के अनुसार होगें? यदि हमें प्रश्न का उत्तर तलाशने की हिम्मत करनी है और उसके लिए हमें अपनी ”सुविधा और विचारधारा“ के खिलाफ़ भी जाना पड़े तो उसके लिए तैयार होना चाहिए. यह तो गम्भीर प्रश्न के साथ एक मज़ाक जैसा ही है कि उत्तर भी हम अपनी सुविधा के अनुसार दें. यही समस्या है कि आज हर कोई ”अपनी सुविधा और विचारधारा“ दूसरों पर थोप रहा है. वास्तविक उत्तर में विकल्पों का कोई स्थान नहीं होता है. जितने विकल्प आपने सुझाए हैं यदि उनमें से एक भी सही होता तो बाकी उत्तरों की कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

  • 21. 08:31 IST, 07 नवम्बर 2011 harshvardhan singh:

    rराजेश जी, ये सभी समझते हैं कि इन मासूम बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन क्या आपको लगता है कि पुलिस का व्यवहार कश्मीरी बच्चों के प्रति भेद-भाव पूर्ण है? सब जगह की पुलिस एक सी ही है. मैं दूसरे उत्तर से कुछ हद तक सहमत हूं.

  • 22. 10:29 IST, 07 नवम्बर 2011 Siddharth:

    मैं तीसरे जवाब को सही मानता हूं.

  • 23. 19:09 IST, 07 नवम्बर 2011 kamal singh, Lucknow:

    राजेश जी मुझे भी अपने घर को भारत से आज़ाद कराना है और मेरे घऱ का बहुमत भी इसके पक्ष में हैं. अब मुझे क्या करना चाहिए. पुलिस वालों को पत्थर मारना चाहिए या आतंकवादी बनना चाहिए. क्या मेरे मानवाधिकार कश्मीरियों से कम हैं.

  • 24. 11:31 IST, 08 नवम्बर 2011 Amit Bhatt:

    कश्मीर में बच्चों के हाथों में जिन लोगों ने पत्थर थमाये हैं वे ही इन बच्चों की हालत के लिए ज़िम्मेदार हैं.आतंकवादियों में अब सुरक्षा बलों का सामना करने की हिम्मत नहीं रह गई है,और न अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियां उनके अनुकूल हैं. इसलिए वे कश्मीर में बच्चों का इस्तेमाल कर रहे है,जिन लोगों ने कश्मीर आंदोलन के नाम पर पहले हथियार उठाये सुरक्षा बल केवल उनको ही अंजाम तक पहुंचाए तो यह उनकी कुशलता होगी.कश्मीर में आतंकवादियों को मारना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए बल्कि उनकी नैतिक पराजय भी सुनिश्चित की जानी चाहिए. पहले आतंकवादी धर्म की आड़ ले रहे थे फिर कश्मीरियत की आड़ ले रहे थे और अब बच्चों की ओट में अपना खेल खेल रहे हैं.

  • 25. 12:01 IST, 08 नवम्बर 2011 himmat singh bhati:

    हमारे प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जी कुछ बोलते नही और बोलते है तो यह कहते है कि यह उन के बस में नही और जनता बोलती है तो उसका कोई असर नही होता.अन कहे तो किससे कहें राजेश जी कोई उपाय तो बताओ

  • 26. 00:15 IST, 09 नवम्बर 2011 jane alam:

    राजेश जी मैं आपके श्रेष्ठ विचारधारा को प्रणाम करता हूँ .आपने कश्मीर की एक ज्वलंत समस्या को प्रकाशित किया है .अगर कश्मीरी बच्चों ने पुलिस और सुरक्षाबलों पर पथराव किया तो कोई ग़लत नहीं किया क्योंकि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होनी चाहिए और यही न्याय संगत है .रही बात आपके सवाल के जवाब की तो मेरे हिसाब से पांचवा जवाब ज़्यादा सही है क्योंकि हर इन्सान को आज़ादी पाने का पूरा हक़ है .

  • 27. 13:01 IST, 09 नवम्बर 2011 mithilesh kumar:

    अच्छा लिखा है

  • 28. 15:08 IST, 13 नवम्बर 2011 के एस ठाकुर भारतीय:

    बहुत ही हलके तरीके से एक ज्वलंत मुद्दे को उठाने की कोशिश लेकिन क़ामयाबी शायद नहीं! जितनी शिद्दत से उन चंद बच्चों की बात बताई गई, कृपया कोई स्वयंसेवी ये बताने का कष्ट करेगा कि कश्मीरी पंडितों के मुद्दों पर क्यों उनकी जुबान तालू में अटक जाती है? क्यों उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन का उल्लेख नहीं मिलता? क्या चंद मुसलमानों के मानवाधिकार ही सब कुछ हैं, हिन्दुओं के नहीं?

  • 29. 03:19 IST, 16 नवम्बर 2011 robkakaind:

    ये बच्चे कच्चे आतंकवादी बनाने कि प्रक्रिया में हैं . दुनिया में हर जगह के बच्चे पुलिस पर पथराव क्यों नही करते , ग़लत काम कि सज़ा मिलनी ही चहिये नही तो ये ग़लत रस्ते पर भटकते ही जाएँगे .

  • 30. 10:28 IST, 16 नवम्बर 2011 MAHFOOZ:

    जोशी जी आपने बिलकुल सही लिखा है . क्योंकि कश्मीरी पुलिस पूरी तरह निष्ठुर हो चुकी है . और उमर अब्दुल्लाह तो ऐसे सिर्फ़ दिखावे का मुसलमान है . कश्मीर की औरतों की इज़्ज़त बिलकुल महफूज़ नहीं है . ऐसे में वो लोग पत्थर न मरे तो क्या करे जब पुलिस ही इज्ज़त से खेलेगी .

  • 31. 08:21 IST, 17 नवम्बर 2011 sk:

    क्या अरब देशों में आज़ादी है , नहीं वहाँ ऐसी हिम्मत कर नही सकते , बहुत कम मुस्लिम ही इस दुनिया में पूर्वाग्रह से ग्रस्त नही हैं.

  • 32. 00:19 IST, 22 नवम्बर 2011 tanuj :

    इन बच्चो ने पत्थर फेंके ये बड़ी बात नहीं है . मुद्दा है कि कौन इनको उकसा रहा है और कौन इनकी इस हरकात का बेजा फायदा उठा रहे है . हो सकता है कुछ अलगाव वादी तत्त्व जो कथित आज़ादी कि बात करते है इन पर जुल्म होने की बात लिखे , या इनके आस पास कि कमियों को उजागर करे जैसे कि स्कूल में टीचर नहीं था वगैरह वगैरह . अगर इनके साथ नरमी बरती गयी सर्फ इस बात पर कि ये कश्मीरी है तो , कल देश के और अपराधी भी ऐसी ही सहूलियत चाहेंगे . ये कश्मीर कि आज़ादी कौन सी चीज़ है जिनको हिंदुस्तान से आज़ादी चाहिए थी वे लोग तो अपना अलग मुल्क़ ले कर जा चुके है अब फिर नयी आज़ादी का मतलब तो गद्दारी होगा .

  • 33. 06:54 IST, 26 नवम्बर 2011 सुभाष चंद्र:

    अगर जेल भेजने से कोई सुधर जाता तो कभी विद्यालयों जैसी संस्था का निर्माण नहीं होता।

  • 34. 13:49 IST, 27 नवम्बर 2011 khalid:

    राजेश जी आपके सवालों में कुछ कमी सी है. शायद आप भूल रहे हैं कि कश्मीर ही वो राज्य है जहां के लोग पुलिस के ज़ुल्म से सबसे ज़्यादा परेशान हैं. उनकी बहू-बेटियों की इज्ज़त से सब से ज़्यादा खिलवाड़ किया जाता है. ये तो स्वाभाविक बात है कि अगर किसी की मां-बहन की इज्ज़त के साथ खेला जाएगा तो ज़हन में हिंसा ही पनपेगी. ज़रूरत है कश्मीर में सख़्त क़ानून व्यवस्था की ताकि नई पीढ़ी हिंसा से कोसों दूर भागे.

  • 35. 00:14 IST, 01 दिसम्बर 2011 md wasim akram:

    पाँच नंबर सही है.

  • 36. 03:27 IST, 06 दिसम्बर 2011 वसीम आदिल:

    5 बच्चों ने पथराव इसलिए किया क्योंकि वो आज़ादी चाहते हैं.

  • 37. 14:29 IST, 08 दिसम्बर 2011 सुनील कुमार:

    कश्मीर में आतंकवाद तो दूसरे राज्यों में भी नक्सलवाद जैसी समस्या है लेकिन किसी भी बात का हल गोली या जेल नही हो सकती अगर बच्चे भटक जाएं तो उन्हें समझा कर सही राह पर लाया जा सकता है. बडे-बडे मुजरिम बच जाते हैं, और छोटे से अपराध के लिए छोटी कक्षा में पढने वाले बच्चों को जेल या सुधार गृह में भेज दिया जाता है, जहां बच्चा समझकर नहीं बल्कि बिगड़कर ही बाहर आते हैं. बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं कुम्हार (बड़े, बुजुर्ग) जैसे चाहें उन्हे ढाल दें ये उनके ऊपर है लेकिन ये बात भी सही है कि अगर किसी की मां,बहन के साथ बदतमीजी की जाएगी तो वो चुप नहीं बैठेगा कुछ ना कुछ तो कदम जरुर उठाएगा वो बच्चे थे इसिलिए इस कदम को उठाया वरना कानुन का सहारा भी लिया जा सकता था मैं आपके दिए किसी भी जवाब से संतुष्ट नहीं हूँ.

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