एक निष्ठुर की रहमदिली
पेट्रोल के दाम तेल कंपनियों ने फिर बढ़ाए. सरकार के कुछ साथी दलों और विपक्ष ने सरकार से कहा कि बढ़ोत्तरी वापस होनी चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा, नहीं हो सकता.
उन्होंने मानों पलटवार किया,'सरकार का उस पर नियंत्रण नहीं, दाम बाज़ार तय करेगा.'
वो एक क़दम और आगे बढ़ गए, कहा कि डीज़ल और एलपीजी के दाम भी बाज़ार को तय करना चाहिए.
लोगों ने गुहार लगाई, तेल के दाम से तेल निकला जा रहा है.लेकिन मनमोहन सिंह अविचलित रहे.
बहुत से लोगों ने इसे एक अर्थशास्त्री की साफ़गोई की तरह देखा.हालांकि उससे भी ज़्यादा लोगों ने इसे एक कल्याणकारी राज्य के प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की निष्ठुरता की तरह देखा.
फिर देश के सबसे चर्चित उद्योगपति विजय माल्या की एयरलाइन कंपनी डूबने लगी. किंगफ़िशर एयरलाइन के बारे में ख़बर है कि उसमें एक हज़ार करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का घाटा है. कंपनी कर्मचारियों को तनख़्वाह नहीं बाँट पा रही है और उड़ाने रद्द करनी पड़ रही हैं.
तेल कंपनियों ने किंगफ़िशर के लिए 'आज नक़द कल उधार' की तख़्ती टाँग दी है. अब विजय माल्या कह रहे हैं कि तेल के बढ़ते दामों की वजह से कंपनी डूब रही है और उसे बचाना होगा.
एकाएक अविचल सरकार में हलचल हो गई. नागरिक विमानन मंत्री ने इतनी चिंता कभी नागरिकों की नहीं की होगी जितनी एकाएक वे एक विमानन कंपनी की करने लगे.
जो वित्तमंत्री कल तक पत्रकारों को डाँट रहे थे कि तेल कंपनी को घाटा हो रहा था इसलिए उसने दाम बढ़ा दिए, इसमें सरकार क्या करेगी वही एकाएक नरम पड़ गए और कहा कि वे बैंकों से बात करेंगे कि विजय माल्या की कंपनी को कुछ सहायता दें. राहत पैकेज.
विजय माल्या से हमेशा लोगों को ईर्ष्या होती रही है.
वे देश की सबसे बड़ी शराब कंपनियों में से एक के मालिक हैं, उनके पास फ़ॉर्मूला वन की टीम है, वे आईपीएल की एक क्रिकेट
टीम के मालिक हैं, वे भारत में एक फ़ुटबॉल टीम के मालिक हैं और इंग्लैंड की एक फ़ुटबॉल टीम में उनकी भागीदारी है, उनके पास एक टीवी चैनल है, अमरीका में एक अख़बार है, एक स्टड फ़ार्म है और भारतीय संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा की सदस्यता है.
इसके अलावा उनके पास ऐसी बहुत सी सुंदरियों की भीड़ है,जिनके पास अक्सर कपड़े कम होते हैं.
वे जब चाहें 3000 करोड़ चुकाकर स्कॉच बनाने वाली एक कंपनी ख़रीद सकते हैं,जब चाहें तब 550 करोड़ चुकाकर एक एयरलाइन कंपनी को ख़रीद सकते हैं. वे नीलामी में टीपू सुल्तान की तलवार और महात्मा गांधी के सामान को ख़रीद कर भारतीयों को गौरवान्वित होने का मौक़ा दे सकते हैं.
जिस व्यक्ति की अपनी निजी संपत्ति 70 अरब रूपए से अधिक की हो,उससे भला किसे ईर्ष्या नहीं होगी?
इतना कम था कि अब भारत सरकार उनकी कंपनी को बचाने के लिए एक हज़ार करोड़ रुपए का पैकेज जुटाने में लग गई है.
विशेषज्ञ कह रहे हैं कि किंगफ़िशर एयरलाइन को चलाने में व्यावसायिक कमियों की वजह से उसे घाटा हुआ,वरना कई दूसरी कंपनियों की तरह वो भी फ़ायदे में चल सकती थी.
जो लोग प्रधानमंत्री से सुन रहे थे कि क़ीमतें बाज़ार को तय करने दीजिए,उनकी सरकार से ये समझ में नहीं आ रहा है कि एक निजी कंपनी के डूबने की इतनी चिंता उसे क्यों हो रही है, उसका डूबना और बचना भी बाज़ार को क्यों तय नहीं करने दिया जा रहा है?
अगर आम लोग गुहार लगाएँगे कि वे डूब रहे हैं तो सरकार कहेगी कि ख़र्च कम करो फिर भी बात न बने तो अपनी कार,स्कूटर बेचो,मकान बेचो और हल्ला मचाना बंद करो.
क्यों विजय माल्या को सरकार यही सलाह नहीं दे रही है. क्या विजय माल्या अपने राजनीतिक रसूख़ का उपयोग कर रहे हैं या फिर सरकार का नीति आम लोगों और ख़ास लोगों के लिए अलग-अलग है.
डूब जाने दीजिए किंगफ़िशर एयरलाइन को. इससे दूसरे उद्योगपतियों और बाज़ार को सबक मिलेगा और आम लोगों को राहत मिलेगी कि सरकार सभी को एक ही तरह की निष्ठुरता से देख रही है.

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बहुत अच्छा.
विनोद जी इस ब्लॉग के लिए आपका आभार या धन्यवाद भी कैसे कहें ,क्योंकि सही बात कहना सभी का कर्तव्य है, लेकिन जितनी साफ़गोई से आपने बात रखी वह दिल का सकून पहुँचाने वाली है. लोग बेवजह ही किन्तु-परन्तु करते रहते हैं लेकिन सरकार की मंशा पर आपने बेहतरीन तरीक़े से अपना मत रखा या कहा जा सकता है कि आम लोगों की बात रखी. मुझे लगता है कि यदि इसी तरह स्पष्ट नजरिया लोगों के सामने रखा जाए तो किसी भी मनमानी करने का साहस नहीं होगा. यह मनमानी का ही परिणाम है कि बिना लोगों और संसद से पूछे ही आज के प्रधानमंत्री ने, जो कि 1991 में वित्त मंत्री थे , अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज ले लिया, यह किसी को पता नहीं कि इसकी शर्तें क्या थीं? जबकि ऐसी ही परिस्थिति में ग्रीस और इटली में लोगों और संसद से राय ली जा रही है और देश की हालत ख़राब होने के कारण दोनों ही देशों के प्रधानमंत्रियों का इस्तीफा भी देना पड़ा है. लेकिन हमारे यहॉ यह काम बिना किसी से पूछे रातों-रात कर दिया गया. इसी तरह जब मारुति कंपनी की हालत ख़राब थी तब उसका अधिग्रहण कर लिया गया और जब वह भरपूर मुनाफ़ा कमा रही थी तब उसके शेयर बेचकर मालिकाना हक़ सुज़ुकी को दे दिया गया. रहस्यमय तरीक़े से अमीर हुए लोगों पर सरकार की इस तरह की अनुकंपा से यह ज़ाहिर होता है कि इनकी अमीरी में सरकारों का ही हाथ होता है. लेकिन आपने सही बात रखकर लोगों को उलझाने वाली सरकार को ही उलझन में डाल दिया है.
विनोद वर्मा ने सही लिखा है. डूब जाने दो किंगफ़िशर को. अगर बचाना ही है तो आम आदमी को बचाओ, उसके आंसू पोंछो.
मैं तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ, " मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है , क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा " विनोदजी आप तो परम ज्ञानी आदमी हैं , आप ही कुछ ऐसा मंत्रोचार करो कि इनका हृदय निर्मल हो जाए और हम भी जी सकें.
विनोद जी आपने ज़बरदस्त लिखा है. केंद्र सरकार को बिहार की चीनी मिलों की चिंता नहीं है, जो बरसों से बंद पड़ी हुई हैं. बिहार सरकार को इसके लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. केंद्र सरकार को किंगफ़िशर की चिंता इसलिए है क्योंकि विजय माल्या के पास विदेश में एक बड़ा अख़बार है. कांग्रेस की सरकारें विदेशों में अपनी आलोचना नहीं चाहतीं. एक बार कांग्रेस महासचिव दिवंगत श्रीकांत वर्मा ने पंजाब के मसले पर न्यायमूर्ति वीएम तारकुंडे को गिरफ़्तार करने की मांग की थी. इस पर ख़ुशवंत सिंह ने लिखा था कि देशी मीडिया की आलोचना पर तो देश में ही चर्चा होगी लेकिन बीबीसी पर या वॉइस ऑफ़ अमरीका में इस पर चर्चा हो जाए तो जग हँसाई हो जाएगी. इस लेख के तुरंत बाद श्रीकांत वर्मा महासचिव के पद से हटा दिए गए थे. अब पायलट की नौकरी का सम्मान ख़त्म हो गया. उन्हें तनख़्वाह तक नहीं मिल रही है. कल टीवी पर एक विशेषज्ञ कह रहे थे कि इस व्यक्ति ने तो डेक्कन एयरलाइन को ढक्कन पहना दिया. अगर सरकार विजय माल्या की सहायता करती है तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगी.
जिसकी लाठी उसकी भैंस.
एक कहावत आपने सुनी होगी, हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और. ये कहावत हमारी सरकार के चरित्र पर एकदम सही बैठती है. ना सिर्फ़ हमारी बल्कि दुनिया की बहुत सी और सरकारों पर भी. सही बात ये है कि जनता से ही सारी अपेक्षा रखी जाती है क्योंकि जनता ही है जो बिना प्रत्युत्तर दिए सब कुछ सहने को तैयार रहती है.
हम कई बार सुन चुके है कि अमुक कंपनी का दिवालिया हो गई जिसके कारण शेयर बाज़ार गिर गया.तो क्या भारतीय कंपनी किंगफिंशर पर इसलिए रहम नहीं किया जाना चाहिए की उसके मालिक विजय माल्या हैं.एक कंपनी जो हज़ारों लोगों को रोज़गार दे रही है, विदेशों में भारत की शान बढ़ा रही है , क्या उसे ऐसे डूबने दिया जाना उचित है.
विनोदजी बहुत ही बढ़िया लेख हैं.ये वही प्रधानमंत्री है जिन्हें पूरी दुनिया महान अर्थशास्त्री मानती है.लेकिन ऐसा अर्थशास्त्र किस काम का जो 26 रुपए रोज़ कमाने वाले को सुविधा समपन्न मानते हैं.
काश ये लेख प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पढ़ते और उन्हें थोड़ी सी शर्म भी आ जाती.
बहुत ख़ूब विनोद जी.ऐसे समय में सरकार फंड नहीं करेगी तो पार्टियों को कौन बिज़नेसमैन चंदा देगा ?
ये निजी लाभ है और लोगों का घाटा कराना है.
बहुत बढ़िया विनोदजी.
विनोद जी, आपने तो कमाल का लिखा है. इस ब्लॉग की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं. ऐसे ही ईमानदारी से लिखते रहिए और समाज का भला करने मे अपना सहयोग दीजिए.
विनोद जी, आपने 'समाजवादी गणतंत्र' की सरकार की शर्मनाक हक़ीकत को शानदार तरीके से रेखांकित किया है.बधाई
वाह विनोदजी क्या शानदार और सच लिखा है आपने.सलाम करता हूँ आपको.सच्चाई के साथ-साथ निडरता से आपने जो लेख लिखा है उससे ग़रीब सीख ले और कुछ नहीं तो कम से कम बेईमान नेताओं को आने वाले चुनाव में जनता वोट ना दे.आपकी और मणिकांत जी की रिपोर्टिंग बहुत कमाल की है.
किंगफ़िशर में कांग्रेस के नेताओं का कालाधन जो लगा है. प्रधानमंत्री जी उसे नहीं बचाएँगे तो किसे बचाएँगे.
अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह आम आदमी पर बाज़ार तंत्र लागू करना चाहते हैं. यूपीए की सरकार में व्यवसाय जगत को ही फ़ायदा हो रहा है. कहाँ है सरकार का वो वादा जो उसने आम आदमी से किया था. चुनाव के समय उन्होंने कहा था कि शिक्षा के लिए लिए जाने वाले कर्ज़ पर से ब्याज हटा दिया जाएगा, बहुत से लोगों ने इस पर भरोसा करके कर्ज़ ले लिया, लेकिन क्या हुआ उस वादे का? शायद सरकार की सोच कुछ इस तरह की हो गई है, "धनी पैदा होते हैं कुछ करने के लिए, ग़रीब पैदा होते हैं मरने के लिए."
आज आपने फिर से मुझे एहसास दिला दिया कि मैं क्यों बीबीसी को इतना पसंद करता हूं. इस लेख के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.
एक बार फिर सरकार की दोहरी नीति सामने आ गई है. देश में लाखों किसान भूखे मर रहे हैं लेकिन माननीय प्रधानमंत्री को कभी उनकी हालत पर तरस नहीं आया. आम आदमी की सरकार में आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है और प्रधानमंत्री खामोश हैं. वे उस वक्त भी खामोश थे जब मोंटेक सिंह ने ग़रीबी की एक नई परिभाषा लिखी थी. ग़रीबों को तेल और गैस पर सब्सिडी नहीं दी जा सकती लेकिन विजय माल्या को बचाने के लिए बेल आउट दिया जाएगा.
बहुत बढ़िया.
अगर मेरे टैक्स का पैसा एयर इंडिया जैसी कंपनी में झोंका जा सकता है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं कि उस पैसा का छोटा सा हिस्सा किंगफ़िशर को बचाने में जाए. अगर सरकार किंगफ़िशर को नहीं बचाना चाहती तो उसे एयरइंडिया पर एक और पैसा भी नहीं खर्च करना चाहिए.
बहुत बढ़िया ब्लॉग
सरकार को किसने यह हक़ दिया की वो एक प्राइवेट कंपनी को जनता के पैसे से बेल आउट करे? विजय माल्या ने आज तक जनता के लिए क्या किया है? सरकार ने कभी जनता के बारे में नहीं सोचा कि तेल के दाम बढ़ने से उस पर क्या बीती. तो आज अचानक विजय माल्या के उद्धार के लिए कैसे तैयार हो सकती है? क्यों सरकार को सिर्फ़ कोरपोरेट वालों का दुःख दिखता है, आम जनता का नहीं ? वह सरकारी एयर लाइन्स एयर इंडिया को नहीं बचा रही है लेकिन किंगफिशर को बचाने जा रही है. अगर सरकार ने ऐसा फ़ैसला लिया तो वह आम जनता के साथ अन्याय होगा.
क्या बेवकूफों की तरह बात करते हो विनोद भाई. सरकार आम आदमियों की चिंता क्यों करे? क्या वे करोड़ों रूपये पार्टी को चंदा दे सकते हैं? क्या वे सुरा-सुन्दरी से मंत्रियों का स्वागत कर सकते हैं? क्या वे मंत्रियों के विदेशी दौरों के समय उन्हें मनचाही जगहों पर मनचाहे होटलों में टिकने का बिल चुका सकते हैं? नहीं ना! ज़्यादा-से-ज़्यादा वे वोट दे सकते हैं. मगर वोट तो उन्हें देना ही है. जिसे भी वोट देंगे वही सरकर बनाएगा और वही करेगा.
आपने ठीक लिखा है कि किंगफ़िशर को बचाने की कोई ज़रूरत नहीं है. हमारे यहां पहले ही कुप्रबंध की वजह से घाटे में चल रही एयर इंडिया कंपनी है.
सधे हुए शब्दों में बहुत ही सटीक और विस्तृत विश्लेषण. आम और ख़ास को पूरी इमानदारी से परिभाषित करते हुए अपने सरकार की मंशा, आम आदमी के प्रति उसका बेरहम रवैया और ख़ास के प्रति दरियादिली को आपने तेल के दामों के माध्यम से बखूबी रेखांकित किया है. सच पूछें तो बीबीसी पर बहुत दिनों बाद कुछ बहुत अच्छा पढने को मिला जिसने ह्रदय को छू लिया. अनेक साधुवाद.
ये बात स्पष्ट है कि भारत की सरकार सिर्फ़ अमीर लोग रिमोट से चलाते हैं और नेताजी कठपुतली की तरह से नाचते हैं. और मुझे तो शक़ है कि भारत में विपक्ष भी है. मुझको आश्चर्य नहीं होगा सुन कर कि एक ही थाली में सत्ता, विपक्ष, टीम अन्ना, पत्रकार, टीम अन्ना और विजय माल्या मिलकर खीर खाते पाए गए.
विनोद जी आपने आम आदमी के दिल की बात कह दी. सचमुच ये सरकारें आम लोगों के लिए निष्ठुर और पूँजीपतियों के लिए रहमदिल होती हैं.
कहां गए किंगफ़िशर के वो महंगे कैलेंडर जिनके फ़ोटो शूट पर करोड़ों रुपए ख़र्च होते हैं.?अब उन्हीं कैलेंडरों को बेच कर माल्या अपना घाटा क्यों नहीं कम कर लेते?
कृपया करके इस लेख को माननीय राष्ट्रपति, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को भी भेजें.
बहुत सटीक लिखा है विनोद जी.
विनोद जी आपने जो कुछ लिखा है वह सत्य ही नहीं उससे ऊपर कि कोई बात है पर इस देश के शासकों को आम आदमी दिखाई ही नहीं देता और न डूबते हुए अन्य या आम लोग. खास कि खबर रखना इनकी आदत है, इससे तो यह साफ हो जाता है मौके बे मौके ये सरकार कि मदद जरूर करते होंगे.आखिर इनकी आमदनी की कोई सीमा तो तय करनी चाहिए थी. अब सरकारी भिखारी की तरह इनकी सरकारी मदद की जा रही है. सरकार का समाज कल्याण मंत्रालय तो दिखता है पर "पूंजीपति कल्याण मंत्रालय" किसके जिम्मे है और इस मंत्रालय का मंत्री भी संभवतः 'प्रधानमंत्री' जी ही होंगे, तभी तो वे चिंतित हैं.
ये जानकर काफ़ी दुख हुआ कि किंग फिशर का ये हाल है, किंगफिशर और विजय माल्या पर भगवान की कृपा बनी रहे.
मुझे ये ब्लॉग बहुत पसंद आया.