पोशाक और राजनीति
पिछले दिनों जब नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत की यात्रा पर आए तो सबका ध्यान उनके गंभीर व्यक्तित्व के साथ साथ उनके करीने से सिले हुए काले सूट और नीली टाई पर भी गया. आमतौर से नेपाली प्रधानमंत्री सूट और टाई में कम ही दिखाई देते हैं. नेपाल की राष्ट्रीय पोशाक डौरा सरुवाल है यानि चूड़ीदार पायजामा और उस पर कोट. लेकिन अब इस पोशाक को राजतंत्र का प्रतीक माना जाता है, इसलिए कम कम से कम कम्यूनिस्ट राजनीतिज्ञ इसे सार्वजनिक रूप से नहीं पहनते. अभी पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर की भारत यात्रा को बहुत दिन नहीं हुए जब उनकी फ़ैशनेबिल पोशाक और बर्किन बैग पर भारत में ख़ासी हायतोबा मची थी और उन्होंने इसका बहुत बुरा भी माना था. भारत में पोशाक का कितना महत्व हो सकता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के पहले गणतंत्र दिवस से तीन दिन पहले भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बाक़ायदा पत्र लिख कर पूछा था कि वह इस अवसर पर क्या पहनें. नेहरू का जवाब था सादगी को तरजीह दीजिए. सफ़ेद चूड़ीदार पायजामा और उस पर काली अचकन. पिछले साल जापान के प्रधानमंत्री यूकियो हातोयामा की लोकप्रियता सिर्फ़ इसलिए घट गई क्योंकि उन्होंने चैक की एक ऐसी कमीज़ पहन ली थी जिसकी एक आस्तीन पीले रंग की थी तो दूसरी लाल रंग की. प्रख्यात फ़ैशन डिज़ायनर डॉन कोनिशी ने जापान की एक राष्ट्रीय पत्रिका में यहाँ तक लिख दिया था, 'क्या कोई उन्हें यह सब पहनने से रोक सकता है ?' इटली के प्रधानमंत्री जियानी एगनेली को एसक्वायर पत्रिका ने दुनिया के इतिहास में पाँच सबसे अच्छे कपड़े पहनने वालों में से एक बताया था. उनकी एक ख़ास अदा थी कि वह आस्तीन के ऊपर कफ़ पर घड़ी बाँधा करते थे. मनमोहन सिंह की आसमानी पगड़ी उनका स्टाइल स्टेटमेंट है लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि वह ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आसमानी रंग उनके विश्वविद्यालय केंब्रिज का रंग है. अपनी छवि बनाने के लिए कपड़ों का जितना ज़बरदस्त इस्तेमाल गाँधी ने किया है उतना शायद किसी ने नहीं ! अपने राजनीतिक जीवन के शुरू में ही उन्हें कपड़ों के महत्व का अंदाज़ा हो गया था. दक्षिण अफ़्रीका की एक अदालत में वह पगड़ी पहन कर गए थे और उन्हें जज ने पगड़ी उतारने के लिए कह दिया था. अपने करियर के शुरू में सूटेड बूटेड रहने वाले गाँधी ने बाद में घुटने तक की धोती और बदन ढ़कने के लिए खादी के कपड़े के अलावा कुछ नहीं पहना. चाहे वह राजा से मिल रहे हों या बड़े से बड़े व्यक्ति से, उन्होंने अपनी इस आदत से कभी समझौता नहीं किया. नतीजा यह रहा कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने उन्हें नंगा फ़कीर तक कह डाला. जब वह इंग्लैंड गए तो इनके शुभचिंतकों ने दो चमकीले सूटकेसों में उनका सामान रख दिया. जब गाँधी को इसका पता चला तो वह बहुत नाराज़ हुए. एक ग़रीब देश का प्रतिनिधि इतने मंहगे सूटकेस के साथ वहाँ पहुँचे यह उन्हें मंज़ूर नहीं था. वह उन सूटकेसों को उसी समय समुद्र में फेंकने पर उतारू थे. उनके साथियों ने बहुत मुश्किल से उन्हें ऐसा न करने के लिए राज़ी किया.... वह भी इस वादे के साथ कि उन दो सूटकेसों को वापस बंबई भिजवा दिया जाएगा. नेपाल के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान की विदेश मंत्री को शायद यही करना चाहिए था.... बेहतर होता कि वह अपनी नीली टाई और बर्किन हैंडबैग घर छोड़ कर आते...

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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कभी नहीं सोचा था की आज़ाद भारत में उनके अनुयायी महंगे मकानों और लग्जरी गाड़ी की सुविधा भोगेंगे. बापू ने जो कड़े नियम बनाए थे उसका पालन वे ख़ुद करते थे तथाकथित गाँधीवादियों ने उनके उसूलों आदर्शों को अपनाया नहीं है.
गाँधी युग के जो बचे खुचे लोग थे उनको मैंने खादी संस्थाओं में देखा है. वे बताते थे कि अगर धोती फट जाये तो उसका बिछावन चादर बना लो... ब्रिटेन की सर्दी भी बापू को अपने इरादे से डिगा नहीं सकी. रेहान भाई आपने अच्छा मुद्दा चुना.
रेहान साहब बीबीसी श्रोताओं को इतनी जानकारी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया मगर इस लेख से आप क्या संदेश देना चाहते हैं जबकि समाज से ये बहुत दूर है. किसी न किसी तरह से आप संवाददाता इन बेईमान नेताओं पर ही ध्यान क्यों देते हैं. समय के साथ ये चोला और सब कुछ बदल देते हैं जनता को बेवकूफ बनाने के लिए.
अच्छा ब्लॉग है.
रेहान जी आपने पाकिस्तान की विदेश मंत्री और नैपाल के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान उनकी पोशाक का जिक्र किया है, हो सकता है कि इसमें कुछ संकेत हों लेकिन इनकी पोशाक के मामले में गॉधी से तुलना करना इसलिए ठीक नहीं जान पडता है क्योंकि गॉधी जननेता थे और ये राजनीतिज्ञ हैं,लेकिन इनका राजनीतिज्ञ होना भी इतना सतही विषय नहीं है जितना इन देशों की आन्तरिक स्थिति के कारण मिडिया ने इनकी पोशाक पर टिप्पणियां की हैं, सभी जानते हैं कि हिना खार किन परिस्थितियों में पाकिस्तान की विदेश मंत्री बनाई गयी हैं और नैपाल के प्रधानमंत्री तो घनघोर राजनीतिक गतिरोध के बाद बमुश्किल ऐसे उम्मीदवार मिले जिनको केवल इस कारण ही याद रखा जाएगा क्योंकि ये राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का निमित्त बने। हमारे मिडिया ने इनकीे पोशाक पर गैरजरूरी तरीके से टिप्पणियां की हैं। इसी तरह से यदि किसी ताकतवर मुल्क का प्रतिनिधि हमारे यहॉ थौडा हटकर भी पोशाक पहन लेता तो इस तरह टिप्पणि करना कठिन हो जाता। सवाल यह नहीं है कि हमारे देश में जो लोग आये उन्होनें क्या पहना है सवाल यह है कि हम उनमें क्या देख पाये। यह तो गनीमत है कि आपने नैपाल के प्रधानमंत्री की पोशाक को उनके राष्ट्रीय पोशाक से जोडा, अन्यथा उनके कम्युनिस्ट होने के कारण आप उनसे मार्क्स जैसी दाढी की भी उम्मीद कर सकते थे, जैसा कि हमारे यहॉ बहुत से अनुयाइयों के अवचेतन में है कि क्रान्तिकारी दिखने के लिए मार्क्य जैसा दिखना चाहिए और गॉधी के अनुयाई होने के लिए गॉधी टोपी व खादी के वस्त्र होने चाहिए लेकिन पोशाक की नकल लोगों को अक्सर विदूषक ही बना पाती है,इससे अधिक कुछ नहीं। हमारे यहॉ लोग गॉधी, भगत सिंह सुभाष और विवेकानन्द जैसा दिखना चाहते हैं लेकिन वे पोशाकों तक ही सीमित रह जाते हैं, मुझे लगता है कि एक समान पोशाक पहनने वाले दो महापुरूषों कें भी अलग अंदाज होते हैं,इसका कोई बहुत महत्व नहीं है। जैसा कि एक महापुरूष ने कहा भी था कि नाम में क्या रखा है, इसी तरह पोशाक में भी कुछ होगा ऐसा लगता नहीं है।
हिंदुस्तान में रोज़मर्रा के जीवन में पोशाक को लेकर हायतौबा रहती है. अगर शादी में जाना है तो घर में तनाव रहता है, क्या पहन कर जाऊँ क्या नहीं. बस अच्छा इंप्रेशन पड़ना चाहिए. कहने का मतलब ये है कि आपने सिर्फ़ नेताओं के पोशाक की चर्चा की है पर यहाँ तो पोशाक का मसला रोज़ मर्रा की ज़िंदग़ी का हिस्सा है.
आपके जिक्र से दो जनों की याद आती है या यूँ कहें दो महापुरुषों की, एक तो 'हरिश्चंद्र' और दूसरे महात्मा गाँधी जी की चंपारण यात्रा की दोनों जगहों पर कपडे की उपयोगिता समझ आयी.
हरिश्चंद्र ने 'कर्तव्य और ईमानदारी के निर्वहन हेतु अपने पुत्र का दाह संस्कार बिना अपनी पत्नी की साडी का टुकड़ा कर के रूप में लिए तब आगे की प्रक्रिया होने दी, गाँधी के साथ की घटना भी कुछ एसी ही है, आधी साडी सुखाकर नहाने की गरीब संथाल स्त्री की दशा देखकर.
यहाँ मानवता के ईमानदार दर्शन होते हैं न की बनावटी शान ए शौकत के, आज हम उस मुल्क में पग पग पर अपराध और नक़ल के असंतोष से मुखातिब हैं जो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की नीति को मानता था, आज तो देश को भी न मानने वाले पूजनीय हैं, क्या राजनीति, शिक्षा, व्यवसाय, धर्म और समाज सब जगह दोयम और घटिया सोच के लोग. (जिन राजनयिकों पर आपका आलेख है) क्या ? वे इन सब से ऊपर कोई मसीहा हैं.
रेहान जी पोशाक और राजनीति पर आपकी टिप्पणी अच्छी है लेकिन इस विषय में पोशाक की राजनीति पर आपकी टिप्पणी आती तो और भी अच्छा होता, इसके लिए किसी देश के विदेशमंत्री या किसी देश के प्रधानमंत्री को माध्यम नहीं बनाना पडता हमारे देश में ही इसके पर्याप्त उदाहरण मौजूद हैं जिनके माध्यम से हम पोशाक की राजनीति को बेहतर ढंग से समझ लेते। हमारे देश में पोशाक के बिना बहुत ही कम लोग होगें,हिन्दु,मुसलमान,सिख,ईसाई बौद्ध,जैन,पारसी की पोशाकों में अनगिनत धार्मिक लोग हैं,जिनको आप दूर से ही चिन्हित कर सकेगें कि कोई धार्मिक व्यक्ति आ रहे हैं। ऐसे लोगों का सारा ध्यान पोशाक में ही रहता है, धार्मिक दिखने की जिद जब आक्रामक हो जाती है तो यही मानसिकता साम्प्रदायिकता के रूप में सामने आ जाती है। लोगों में धार्मिक होने में कितनी उत्सुकता और प्रयास हैं यह तो शोध के बाद ही पता चल पायेगा । लेकिन धार्मिक दिखने की राजनीति में कितने लोग सक्रिय हैं यह स्पष्ट होने में कोई मेहनत नहीं करनी पडेगी। पोशाक के माध्यम से आप गॉधी के अनुयाइयों को भी पहचान लेगें और क्रान्तिकारियों को भी। पोशाक की राजनीति का हमारे यहॉ खतरनाक खेल खेला जाता है,बाजार में आप कहीं भी निकल जाईए आपको सब जगह धार्मिक पोशाकों में लोग घूमते हुए मिलेगें,इनके अलावा बचे हुए लोग महान लोगों के अनुयाई होगें इनकी भी निश्चित पोशाकें या चेहरे मोहरे हैं ।आधुनिक दिखने की भी पोशाकें है, इस मामले में हिना खार और बाबूराम भट्टाराई सहज और स्वाभाविक और ईमानदार लगे कि उन्होने किसी की तरह दिखने की कोशिश नहीं की। लेकिन यह सवाल उठाकर आपने नई द्विविधा खडी कर दी है कि पोशाकों की भी राजनीति होती है।
रेहान साहब आपने अच्छा लिखा है.अपने देश में भी नेता खादी छोड़ डिज़ाइनर कपड़े पहन रहे हैं और पहने भी क्यों नहीं आख़िर लाखों करोड़ो के घोटालों का पैसा कहीं तो ख़र्च करना ही होगा.आज हम दूसरे गांधी की कल्पना ही नहीं कर सकते जो गरीबों की हालत पर इतना पिघल जाएं की पूरी जिंदगी धोती में ही गुजार दे.
ब्लॉग बहुत ही अच्छा है रेहान भाई . सचमुच आजकल के नेताओं को सादगी से कोई मतलब नहीं रह गया है . आपने यहाँ बहुत सारे अच्छे उदहारण दिए हैं .
किसी भी लोकप्रिय कार्यक्षेत्र में कर्मठ और सफल व्यक्ति द्वारा पहनी गई पोशाक फ़ैशन बन जाती है या बना दी जाती है. लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा किसी ख़ास पोशाक को पहनने या नहीं पहनने से उसकी योग्यता या अयोग्यता का निर्धारण तो निश्चित रूप से नहीं हो सकता.
बच्चों के चेहरे पर उदासी तक असहनीय होती है फिर उनके हाथों में हथकडी देखना तो बर्दाश्त से बाहर हो जाता है,लेकिन कान खडे तब होते हैं जब बच्चे आज़ादी का नारा लगाने लगते हैं,अयोध्या प्रकरण में बहुत से लोग जय श्री राम का नारा लगाते थे लेकिन सबको मालूम है कि राम के नाम का इस्तेमाल दंगाईयों ने समाज में अराजकता फैलाने के लिए किया, उसी तरह आज़ादी भी बडी बात है,लेकिन वहॉ इसका इस्तेमाल वे दंगाई कर रहे हैं जिन्होनें कश्मीर में रहने वाले दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्यायें की उन्हें मार-पीट कर दर-बदर भटकने पर मजबूर किया.ये आज़ादी के सिपाही नहीं बल्कि आज़ादी के नाम पर साम्प्रदायिक विदेशी ऐजेंट है.हमारे देश में बहुत से पढे लिखे लोगों का यह शगल बनता जा रहा है कि कश्मीर में आज़ादी दे दी जानी चाहिए, जिसने अपनी अर्जित कमाई में से किसी को कभी कुछ न दिया हो ,वह देश का एक हिस्सा ही दूसरों के हवाले कर दिया जाना चाहिए इस बात का समर्थन करने लगे तो समझ में आता है कि बिन मांगी इस सलाह से लोग समाज का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना चाहते हैं और साबित करना चाहते हैं कि हम पर ध्यान नहीं दोगे तो हम भी कश्मीर के बच्चों की तरह पत्थर तो मार ही सकते है. यह लोगों से ध्यान पाने की कोशिश ही है इससे अधिक कुछ नही.
अच्छा ब्लॉग