इस विषय के अंतर्गत रखें मार्च 2011

हमारा काम है ख़बरें पहुँचाना!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 30 मार्च 2011, 13:51

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बीबीसी के पत्रकारों के लिए एक उसूल है. आप जब काम पर आएँ तो अपनी राष्ट्रीयता को भूल जाएँ. यानी आप न भारतीय हैं, न पाकिस्तानी, न ही ब्रितानी. आप एक निष्पक्ष, तटस्थ पत्रकार हैं जिसका काम है बिना भेदभाव या पक्षपात के ख़बर लोगों तक पहुँचाना.

इस संस्थान के साथ सत्रह वर्ष के अरसे में मैंने इस बात का पूरी तरह ख़्याल रखा. पूरी निष्ठा के साथ अपनी भावनाओं को कभी अपने काम पर या अपनी लेखनी पर हावी नहीं होने दिया.

लेकिन दफ़्तर से बाहर की ज़िंदगी तो आपकी अपनी है. इसीलिए आज जब मैं ने फ़ेसबुक पर अपनी एक पाकिस्तानी रिश्तेदार का यह कथन देखा कि, 'हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब बुध के दिन...' तो स्वयं को यह लिखने से नहीं रोक पाई कि...'कम ऑन इंडिया यू कैन डू इट'.

मुझे लगता है क्रिकेट मैच एक ऐसी घटना है जिसमें आप की मन की भावनाएँ खुल कर सामने आ जाती हैं.

उस समय की मनस्थिति शब्दों में बयान करना आसान काम नहीं है.

हालाँकि आज भी अगर मैं बीबीसी के लिए क्रिकेट मैच कवर करूँगी या उस पर स्टोरी करूँगी तो भावनाशून्य हो कर करूँगी.

उस समय मैं भारतीय नागरिक नहीं बीबीसी की पत्रकार का दायित्व निभाऊँगी. किसी की जीत-हार मेरी रिपोर्टों को प्रभावित नहीं करेगी.

लेकिन दफ़्तर से बाहर निकलते ही हो सकता है मैं भारत के प्रदर्शन पर अपने मन की भावनाओं को प्रकट होने से न रोक पाऊँ.

क्या यह कुछ ग़लत होगा?

दिल्ली, लंदन के साथ-साथ हमारे भीतर का वसंत

सुबह अलार्म बजने से पहले ही नींद खुल गई, खिड़की से अंदर आती सूरज की किरणों ने जगाया, लंदन का मौसम ऐसा है कि सूरज नहीं बताता, घड़ी से पूछना पड़ता है कि कितने बजे हैं.

हवा में नसों को सुन्न कर देने वाली सर्दी नहीं बल्कि ताज़गी देने वाली शीतलता है.

घास का हरा रंग वापस लौट रहा है, डेफ़ो़डिल्स के पीले-नारंगी फूल खिल उठे हैं, चेरी, नाशपाती और आलूबुख़ारे के पेड़ों पर सफ़ेद-गुलाबी फूल लद गए हैं.

अभिशप्त प्रेतों की तरह खड़े मेपल और ओक के पेड़ों पर कोंपल दिख रहे हैं, झील में बत्तखों के पीछे नन्हे चूज़े तैर रहे हैं. मोटे-मोटे कोट उतारते ही ऐसा लग रहा है मानो भारी कर्ज़ उतर गया हो.

गिलहरियाँ और मधुमक्खियाँ कई महीनों की छुट्टी के बाद दोबारा व्यस्त हो गई हैं.

वसंत आ गया है.

जैसे आतिशबाज़ी आसमान में रंग बिखेरती है, वैसे ही रंग ज़मीन पर बिखरे हैं, कोई धमाका नहीं है, कोई धुआँ नहीं है लेकिन रंगों का एक अदभुत नरम सा विस्फोट है.

यह लंदन का वसंत है, जैसा कि कहते हैं मैंने भारत में 27 वसंत देखे हैं, लेकिन वसंत दिखा सिर्फ़ एक बार देहरादून में और एक बार श्रीनगर में, बाक़ी के 25 वसंत मुझे दिखाई नहीं दिए, न राँची में, न दिल्ली में.

ऐसा नहीं है कि वसंत लंदन का मौसम है, वसंत को भारत में ऋतुराज कहा जाता है. संस्कृत के पुराने काव्य में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है, भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है ऋतुओं में मैं वसंत हूँ.

फिर भारत का वसंत कहाँ गया, वह दिखाई क्यों नहीं देता, महानगर लंदन में वसंत ऐसा है कि हर क़दम वह आपको टोकता है, देखो मैं आ गया हूँ, दिल्ली में उसे ढूँढने के लिए शायद मुग़ल गार्डन जाना पड़ेगा.

लंदन में वसंत आता है क्योंकि वह पेड़ों पर आता है, पार्कों में आता है, मॉल और हाइवे पर वसंत न तो लंदन में आता है, और न दिल्ली में आएगा.

वसंत के सुहाने मौसम में विकास और वसंत के मुद्दे पर बहस का कोई इरादा नहीं है.

अगर आप छोटे से कमरे में रहते हैं तो एक गमले में ही फूल उगाइए, वही आपका वसंत होगा, वसंत हमारे भीतर भी तो होता है उसके अंकुरों को सहेजिए.

बदल गए हैं गांव

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 23 मार्च 2011, 16:16

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मेरा गांव शहर में रहता है और मेरा शहर ......माफ़ कीजिएगा मेरा नहीं. शहर तो शहर है वो हम सबके दिमाग में रहता है.
गांव अब जीता नहीं. इंतज़ार करता है उनका जो शहर चले गए हैं और साथ ले गए हैं गांव का लड़कपन, उसका बांकपन, उसकी मिट्टी, उसके सपने और उसका दीवानापन.

फागुन में अब गांव में फाग नहीं गाए जाते बल्कि होली वाले दिन लाउडस्पीकर पर शहर के गुड्डू रंगीला और चंदू चमकीला अपनी भौंडी आवाज़ में छींटाकशी वाले गाने गाते हैं.

साथ में होती है मदिरा और पैंट बुश्शर्ट वाले नौजवान जो भांग नहीं बल्कि बोतल से शराब पीते हैं.

बरसात में बूढ़े दालान पर बैठकर अपनी बूढ़ी बीवियों और जवान बहुओं को गरियाते हैं या फिर अपने छोटे छोट पोते पोतियों की नाक से निकलता पोटा पोंछते हुए कहते हैं कि छोटा ही रह.

उन्हें डर है कि पोता भी बड़ा होते ही शहर हो जाएगा.

जवान औरतें अब मेला नहीं जाती हैं बल्कि मोबाइल फोन पर अपने शहर में रह रहे पतियों या किसी और से गप्प लड़ाती हैं.घर से बाहर निकलती हैं और बूढ़ों की भाषा में लेफ्ट राइट करती हैं.

शहर कभी कभी गांव आता है. होली दीवाली में. दो चार दिन रहता है. अपने कोलगेट से मांजे गए दांतों से ईख चबाने की कोशिश में दांत तुड़ाता है और फिर ईख को गरियाते हुए गांव को रौंद कर निकल जाता है.

फिर गांव इंतज़ार करता रहता है कि कब शहर आएगा और भैंस को दाना खिलाएगा. हल या ट्रैक्टर से खेत जोतेगा और बीज बोएगा. कब अपनी भीनी आवाज़ में गीत गाते हुए फसल काटेगा और कब चांदनी रात में कटी फसल पर अपनी बीवी के पसीने में लथपथ होगा.

ऐसा होता नहीं है. शहर अब फ़िल्मी गाने गाता है. ट्रैक्टर चलाने की बजाय ट्रैक्टर के पीछे हेलमेट लगा कर बैठता है. बुलडोज़र और गारा मशीन की आवाज़ों के बीच मशीन हो जाता है. दिन रात ठेकेदार की गालियां सुनता है. शाम को अपनी दिहाड़ी लेकर कमरे पर लौटता है और दो रोटियां सेंककर सो जाता है कल फिर मुंह अंधेरे उठ कर काम के इंतजा़र में.

सब कहते हैं गांव बदल गया है.

हां गांव बिल्कुल बदल गया है. अब गांव भी शहर की तरह भूतिया हो गया है जहां सिर्फ़ औरतें और बूढ़े दिखते हैं. खेत खलिहान सूखे और पानी की किल्लत दिखती है. लोकगीतों की बजाय फ़िल्मी गाने सुनाई पड़ते हैं और लोग कहते हैं अपने काम से काम रखो.

जय जनादेश!

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 21 मार्च 2011, 13:20

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सात, रेसकोर्स रोड प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निवास है. कुछ सुविज्ञ लोगों को लगता है कि वहाँ पीने के पानी की जाँच करनी चाहिए. उन्हें शक है कि उस पानी में भंग घुल गई है.

इन लोगों को मानना है कि मनमोहन सिंह जैसे ज्ञानी-ध्यानी व्यक्ति बिना कारण इस तरह का बयान नहीं दे सकते जैसा उन्होंने पिछले दिनों दिया है.

उन्होंने कहा है कि सरकार को बचाने के लिए घूसख़ोरी उनकी जानकारी में नहीं थी. फिर उन्होंने कहा कि संसद के चुनाव में जीत से सारा मुद्दा ही ख़त्म हो गया. मानो जनादेश सारे अपराध मिटा देता हो.

इस बयान के बाद लालकृष्ण आडवाणी को लग रहा है कि ये सुझाव उनके बहुत काम आ सकता है. उन पर लोग रथयात्रा करके दंगे करवाने और फिर बाबरी मस्जिद गिरवाने के आरोप लगाते रहे हैं. अब वे कह सकते हैं कि उसके बाद केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में दो-दो बार एनडीए की सरकार बन गई. जनादेश ने साबित कर दिया कि भाजपा निर्दोष थी. साथ में उन्हें, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती आदि सब को जनता ने सही ठहरा दिया है.

पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण ठीक कह रहे हैं कि अब लोग तर्क दे सकते हैं कि गुजरात में दो बार की चुनावी जीत के बाद नरेंद्र मोदी को गुजरात के दंगों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. जनता ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है.

अब शहाबुद्दीन और पप्पू यादव दोनों मांग कर सकते हैं कि वे जेलों में आते-जाते कितने ही चुनाव जीत चुके हैं. उनको मिले जनादेशों के बाद उन्हें जेलों में रखना ठीक नहीं है. सारे अपराधों के लिए जनता ने उन्हें क्षमा कर दिया है.

डेढ़ सौ के क़रीब लोकसभा सदस्य सोच रहे होंगे कि वे अपने ख़िलाफ़ लगे आपराधिक आरोपों को जनादेश का हवाला देकर ख़त्म करवा सकते हैं. उधर राज्य विधानसभाओं में आपराधिक मुक़दमे झेल रहे सैकड़ों माननीय विधायक प्रधानमंत्री के क़ायल हो गए हैं कि अब वे भी जनादेश के हथियार का उपयोग कर सकते हैं.

सुरेश कलमाड़ी सोच रहे होंगे कि अब जल्दी चुनाव हो जाएँ और वे फिर चुनाव जीत जाएँ तो फिर कह सकें कि जनादेश मिल गया और राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले के आरोपों को जनता ने नकार दिया है. ए राजा को लग रहा है कि प्रधानमंत्री को 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जाँच करवाने की ज़रुरत ही नहीं थी. चुनाव करवा लेते और फिर जीत कर बरी हो जाते.

और अब ललित मोदी, हसन अली और शाहिद बलवा भी अपने-अपने लिए एक-एक सीट की तलाश कर रहे होंगे जिससे कि वे जनादेश लेकर आपराधिक मामलों से बरी हो जाएँ.

अब मुश्किल जनता की है जो अपने प्रतिनिधि चुन कर विधानसभाओं और संसद में भेज रही है लेकिन जनप्रतिनिधि दावा कर रहे हैं कि यह उनके आपराधिक मामलों पर जनता का फ़ैसला है.

जनादेश के इस हथियार का उपयोग जनप्रतिनिधि तो ठीक से करना सीख गए हैं पता नहीं जनता कब सीखेगी. अगर सीख नहीं मिली तो पानी में घुली भंग का असर और व्यापक होता जाएगा.

सठिया गई है अंतरात्मा

ब्रजेश उपाध्यायब्रजेश उपाध्याय|मंगलवार, 15 मार्च 2011, 22:26

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बड़े बूढ़े कहते थे जब कोई दुविधा हो तो अंतरात्मा की सुनो. जो सही है वही सुनाई देगा.

आज के दिन लगता है मानो ट्विटर, फ़ेसबुक, 24 गुणा सात टेलीविज़न और अनगिनत अख़बारों को देख-देखकर अंतरात्मा भी कनफ़्यूज़ सी हो गई है.

लाखों बेबस लाचार अनपढ़ महिलाओं को छोटे-छोटे कर्ज़ दिलाकर एक मान सम्मान की ज़िंदगी देनेवाले नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनूस को उन्हीं के देश की महिला प्रधानमंत्री जब "ख़ून चूसने वाले" की उपाधि दे, जिस इंसान ने दुनिया को यकीन दिलाया हो कि ग़रीब में भी कर्ज़ लौटाने की कुव्वत है उस पर यदि गरीबों के शोषण का आरोप लगे तो अंतरात्मा को कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि सही कौन है ग़लत कौन.

लेकिन अंतरात्मा भी आजकल डिप्लोमैटिक हो गई है. पहले गूगल पर सर्च करती है, कुछ पुराने आरोपों-अनुभवों पर नज़र दौड़ाती है और फिर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझती है.

डरती है कि कहीं कल अलमारी खोलने पर कुछ छिपे हुए कंकाल न लुढ़क पड़े और टीवी स्क्रीन पर म्यूज़िक के साथ आवाज़ न आ जाए "ग़लत जवाब".

आप कहेंगे अंतरात्मा सठिया गई है. अब वो ये भी नहीं पहचान रही कि नायक कौन है और विलेन कौन ? शायद आप सही हैं..सचमुच सठिया गई है वो.

अब तो उन स्कूली बच्चों की तरह करती है जिनसे मास्टर साहब ने पूरी क्लास के सामने एक आसान सा सवाल पूछा हो और उसका उत्तर न दे पाने की शर्मिंदगी में नाखून चबाने लगते हैं.
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाते हैं और हर बार अपील की जाती है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट दीजिए.

लेकिन जब नतीजे आते हैं तो पता चलता है कि बहुत से ऐसे लोग संसद पहुंच गए हैं जिनसे हम आमतौर पर मिलना पसंद न करें. मतदान के वक्त सास-बहू सीरियल देख रही थी अंतरात्मा.

ममता दीदी कह रही हैं कि वे चुनाव जीतने के बाद बंगाल को बदल देंगीं. जनता भी आस में है कि शायद वैसा ही हो लेकिन अंतरात्मा यकीन करने को तैयार नहीं और फिर से डिप्लोमैटिक चुप्पी.

बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगता है. गूगल सर्च बता रहा है कि उन्हें आदिवासियों के कल्याण के लिए काम करते देखा गया है.

तो क्या वो निर्दोष हैं? फिर से चुप्पी.

टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी कहते हैं कि जीत के लिए उनके लड़के जी-जान लगा देंगे. लेकिन 29 रनों के अंदर नौ विकेट गिर जाते हैं.

इस बार अंतरात्मा चुप है कि क्रिकेट में उतार चढ़ाव तो होते ही रहते हैं. जापान में सुनामी के बाद परमाणु रिएक्टर फटे तो भारत में भी सवाल उठे कि अपने वाले कितने सुरक्षित हैं. प्रधानमंत्री समेत नामीगिरामी वैज्ञानिकों ने कहा--सौ फ़ीसदी.

अंतरात्माजी से पूछा कि यकीन कर लूं तो फिर उसने कन्नी काट ली.

लगता है कि अंतरात्मा से अब बातें ना करने में ही भलाई है. जब जवाब ही न मिले तो पूछ कर क्या फ़ायदा.
वैसे भी ट्विटर, फ़ेसबुक और ढेर सारे ख़बरदार चैनल्स तो हैं ही.

वैसे आपकी अंतरात्मा के क्या हाल हैं?

काहे करें खेती....

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 08 मार्च 2011, 11:24

टिप्पणियाँ (26)

पछुआ का धुक्कड़ चल रहा है.. एक्को गो मकई में दाना नहीं धरेगा.......जो लागत लगाए उ भी डूबेगा.... काहे करें खेती...

ये बात एक किसान के जवान बेटे की है जो अब खेती नहीं करना चाहता है. ज़मीन बहुत है लेकिन कहता है कि खेती से पेट नहीं भरता.

उसने अपनी ज़मीनें बेचने का फ़ैसला कर लिया है और कहता है कि सारा पैसा बैंक में रखूंगा तो जो ब्याज़ मिलेगा वो भी खेती से ज्यादा है.

बात वाजिब है..कौन माथापच्ची करे..ट्रैक्टर मंगाए, ज़मीन जोते, बीज बोए, खाद डाले, रातों को जग कर फसल की रखवाली करे. बारिश न हो तो बोरिंग चलवाए. फिर कटाई में मज़दूर खोजे और हिसाब करे तो पता चले कि लागत भी मुश्किल से निकल रही है.

बैंक से पैसा निकालेगा, अनाज खरीदेगा, गाड़ी खरीदेगा, मॉल में जाएगा शॉपिंग करेगा और मज़े से जिएगा.

मैंने पूछा कि बात तुम्हारी ठीक लेकिन अगर सारे किसानों ने यही कर दिया तो क्या होगा. जवाब मिला.... गेहूं महंगा होता है तो मिडिल क्लास बाप बाप करने लगता है. उसको सस्ता में खिलाने का हमने ठेका ले रखा है.

मैंने कहा. सरकार सब्सिडी देती है. ऋण देती है तो खेती फायदे का सौदा हो सकता है. उसने कहा सब्सिडी सबसे बड़ा सरकारी धोखा है. डीजल, खाद, बीज और कीटनाशकों के बाद जो वापस मिलता है उससे लोग जहर भी नहीं खरीद सकते हैं. बचा हुआ कीटनाशक विदर्भ के किसान पी जाते हैं.

वो बहुत नाराज़ था. बोला, किसान का मुंह हमेसा सुखले ही काहे रहता है. एक और बहुत बड़ा दिक्कत है कि मीडिया समझती है कि देश में किसान सिर्फ हरियाणा और पंजाब में ही रहते हैं. कभी सड़क से चंडीगढ़ जाईये... वोक्सवैगन की बहुत सारी दुकानें खुली हैं.बिहार में एक्को ठो शो रूम नहीं है.

बात सोलह आने सच्ची थी. हरित क्रांति का जो लाभ पंजाब हरियाणा को हुआ वो बिहार और उत्तर प्रदेश को नहीं हुआ. वैसे आजकल पंजाब मे किसान गले तक कर्ज़े में डूबे बताए जाते हैं.

लाभ क्यों नहीं हुआ कैसे नहीं हुआ वो एक अलग ही कहानी है. फिलहाल खेती की बात. मैंन पूछा तो क्या करना चाहते हो खेती छोड़कर

बोलने लगा, खेती छोड़ने का विकल्प जिस दिन भी किसान को मिल जायेगा.. वो खेती छोड़ देगा... लोग खेती विकल्पहीनता की स्थिति में कर रहे हैं... विकल्प देकर पूछिए कि क्या वे खेती ही करना पसंद करेंगे.

इससे पहले कि मैं कुछ और पूछता उसने कहा, मेरी पूरी बात सुनिए...बाबू जी पटना यूनीवर्सिटी से पोस्ट ग्रैजुएट थे. बड़े किसान के बेटे थे. मेरे दादा जी 1200 बीघा के जोतदार थे और बड़ी कार पर चढ़ा करते थे मैंने अपने पिता को साइकिल पर चढ़ते देखा .खेती में वे असफल रहे पर जमीन बचाकर रखी. शायद मेरे लिए. मैंने स्कूल कॉलेज के समय खेती की है लेकिन अब और नहीं.

बात सोचने वाली थी. मैंने थोड़ा सोचा तो याद आया. मेरे चार मामा हैं. एक भी गांव में नहीं रहते. सब बंबई, दिल्ली रहते हैं. कोई ड्राइवर है कोई दरबान है. महीने के दो चार हज़ार मिलते हैं. आधा पेट खाते हैं आधा घर भेजते हैं. कहते हैं खेती का झंझट कौन करे. नगद है जीवन चल जाता है.

बाल बच्चों को पढ़ाएंगे. खेती कर के क्या करेगा. डॉक्टर-इंजीनियर बनेगा तो बाप का नाम रोशन होगा. कोई भी किसान नहीं चाहता उसका बेटा खेती करे क्योंकि खेती में कुछ नहीं धरा है.

हां आजकल बात बहुत होती है. एग्रीकल्चर फार्मिंग, सस्टेनेबल डेवलपमेंट, वगैरह वगैरह लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है.

मेरे पास भी नहीं. मेरे पास भी एक सवाल ही है...अगर सभी किसानों ने खेती छोड़ दी और सब डॉक्टर इंजीनियर बन गए तो अनाज कौन उगाएगा और फिर मंहगाई के मुद्दे पर पत्रकार कागज कैसे काले करेंगे.

फिर गरीब अनाज के लिए लड़ेगा कैसे. सरकार किस बात की सब्सिडी देगी, किसका ब्याज़ माफ़ करेगी और आखिरकारएक निजी सवाल - मेरा पेट कैसे भरेगा..


नोट- इस ब्लॉग के कई शब्द एक जवान किसान से उधार लिए गए हैं.


इच्छा मृत्यु लेकिन किसकी इच्छा..?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 07 मार्च 2011, 12:33

टिप्पणियाँ (27)

अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लेखिका पिंकी वीरानी की यह अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी कि अरुणा की हालत को देखते हुए उनकी मौत की अनुमति दी जाए.

अरुणा जिस अस्पताल में पिछले 37 साल से बिस्तर पर हैं वहाँ के डॉक्टरों और नर्सों ने इस फ़ैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि वे आजीवन अरुणा की देखभाल करने के लिए तैयार हैं.

अरुणा इस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने की स्थिति में नहीं हैं. यानी उन्हें ज़िंदा रखने या न रखने की बहस में उनका कोई योगदान नहीं है..

अब अरुणा के दिल की हालत कौन समझे. कहते हैं हरेक को जान प्यारी होती है और कोई भी मरना नहीं चाहता.

तो साथ ही यह भी सुना है कि हे ईश्वर, ऐसी ज़िंदगी से तो मौत भली.

अरुणा किस मनोदशा से गुज़र रही हैं यह वह ही जानती हैं.

एक तरह से इच्छा मृत्यु के विरोधियों का तर्क सही है कि अगर एक बार इसकी अनुमति दे दी गई तो ऐसे मामलों का अंबार लग जाएगा और यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि किसमें पीड़ित व्यक्ति की सहमति है और किसमें उसके तीमारदारों का फ़ायदा.

लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि टर्मिनल इलनेस यानी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे और असहनीय पीड़ा भुगत रहे रोगी को कृत्रिम मशीनों के ज़रिए जीवित रखना कितना मानवीय है.

यह एक ऐसा मामला है जिस पर लोग बोलने से कतराते हैं.

ज़रूरत है एक राष्ट्रव्यापी बहस की जिसमें सबको अपनी राय रखने का मौक़ा मिले.

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