इस विषय के अंतर्गत रखें अक्तूबर 2010

सरकार बेचारी है या जनता?

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 24 अक्तूबर 2010, 16:33

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लंदन में पतझड़ की भूरी उदासी छाए उसके पहले ही क्रिसमस की रौनक़ दिलों को बहला लेती है.

मगर इस बार बहार में भी मंदी की मायूसी थी, अप्रैल में लोग आँकड़ों के जंगल में रिकवरी के कोंपल खोज रहे थे, अब सदाबहार समझे जाने वाले 'सरकारी वटवृक्ष' से भी पतझड़ में नौकरियाँ पत्तों की तरह झड़ रही हैं.

20 अक्तूबर को जब वित्त मंत्री जॉर्ज ऑस्बर्न ने लगभग पाँच लाख सरकारी नौकरियों को अलविदा किया तो इससे सीधे प्रभावित न होने के बावजूद मैं एक अजीब सोच में घिर गया.

लंदन के अंडरग्राउंड रेल की यात्री-संस्कृति है कि कोई किसी से आँख नहीं मिलाता, सब अख़बारों-पत्रिकाओं में खोए होते हैं. रेल के आधे घंटे के सफ़र में मैं हर नौकरीपेशा टाइप चेहरे को देखता रहा और 'गेसिंग गेम' खेलता रहा, बचेगा/बचेगी, नहीं बचेगा/ नहीं बचेगी.

जिन पाँच लाख 'सरकारी कुर्सियों' को अब ग़ैर-ज़रूरी समझा जा रहा है उन पर बैठने वाले ज्यादातर लोग लंदन में ही रहते हैं. कोई भी सरकार हो, वह कुर्सियों के बारे में ही सोचती है, उन पर बैठने वाले लोगों के बारे में सोचना उसके सॉफ्टवेयर का हिस्सा नहीं है, ख़ास तौर पर हटाते वक़्त.

वित्त मंत्री ने बहुत सारे आँकड़े बताए जिसमें पाँच लाख का आँकड़ा भी था, ज़ाहिर है, वे पाँच लाख लोगों के नाम तो नहीं ले सकते थे.

मैं लोगों के चेहरे पर पसरी मायूसी को पढ़ने की कोशिश कर रहा था. गेसिंग गेम में बहुत ज्यादा ग़लती के आसार नहीं थे क्योंकि लंदन की लगभग 75 लाख की आबादी में अंदाज़न 15 लाख नौकरीपेशा (सरकारी-प्राइवेट दोनों) लोग होंगे, उनमें से पाँच लाख लोगों की नौकरी जाने का मतलब है, हर तीन में से एक नौकरीशुदा का बेरोज़गार होना.

जब लीमैन ब्रदर्स के बंद होने पर लोगों की नौकरियाँ जा रही थीं तो एक अख़बार ने प्रभावित लोगों के बीच सर्वे करके बताया था कि नौकरी जाने का अफ़सोस परिवार में किसी के गुज़रने के सदमे जैसा ही होता है.

जिन बैंकों ने जुआ खेला उन्हें सैकड़ों करोड़ पाउंड देने के लिए सरकार के पास पैसे थे? जिस चक्र की शुरुआत आर्थिक मंदी से हुई और अब सरकारी ख़र्च में एक चौथाई कटौती हो रही है उसे शुरू करने और यहाँ तक लाने में इन पाँच लाख लोगों का कितना कसूर था?

ज्यादा वक़्त नहीं बीता जब कुछ लोग शैम्पेन में नहा रहे थे, उन्हें मिलियन से बिलियन के बीच दूरी मामूली लगती थी, प्राइवेट जेट में, प्राइवेट आइलैंड पर मॉडलों के साथ प्राइवेट पार्टी करने वाले ये पाँच लाख लोग नहीं थे.

दलील है कि सुनहरे दौर का फ़ायदा इन पाँच लाख लोगों को भी तो मिला, ज़रूर मिला-- आसानी से ढेर सारा कर्ज़, जिसे चुकाने के लिए अब नौकरी नहीं बची है इसलिए घरों से बेदख़ल किए जाएँगे.

वित्त मंत्री ने काफ़ी बेचारगी के साथ कहा, हमें शौक़ नहीं है लोगों को नौकरी से निकालने का, मजबूरी है.

सरकार अपनी बेबसी बता रही है--तनख़्वाह के लिए पैसे नहीं हैं, हटाने पर मुआवज़ा मुश्किल है, पेंशन में भी टेंशन है इसलिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ानी पड़ेगी.

दयनीय दशा किसकी है? जिन पर मार पड़ेगी या सरकार की?

बिहारी होने के नाते

ब्रजेश उपाध्यायब्रजेश उपाध्याय|सोमवार, 18 अक्तूबर 2010, 04:43

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बारह-तेरह साल पहले जानेमाने लेखक और पत्रकार अरविंद एन दास ने लिखा था, 'बिहार विल राइज़ फ़्रॉम इट्स ऐशेज़' यानी बिहार अपनी राख में से उठ खड़ा होगा.

एक बिहारी की नज़र से उसे पढ़ें तो वो एक भविष्यवाणी नहीं एक प्रार्थना थी.

लेकिन उनकी मृत्यु के चार सालों के बाद यानी 2004 में बिहार गया तो यही लगा मानो वहां किसी बदलाव की उम्मीद तक करने की इजाज़त दूर-दूर तक नहीं थी.

मैं 2004 के बिहार की तुलना सम्राट अशोक और शेरशाह सूरी के बिछाए राजमार्गों के लिए मशहूर बिहार से या कभी शिक्षा और संस्कृति की धरोहर के रूप में विख्यात बिहार से नहीं कर रहा था.

पटना से सहरसा की यात्रा के दौरान मैं तो ये नहीं समझ पा रहा था कि सड़क कहां हैं और खेत कहां.

सरकारी अस्पताल में गया तो ज़्यादातर बिस्तर खाली थे, इसलिए नहीं कि लोग स्वस्थ हैं बल्कि इसलिए कि जिसके पास ज़रा भी कुव्वत थी वो निजी डॉक्टरों के पास जा रहे थे.

इक्का-दुक्का ऑपरेशन टॉर्च या लालटेन की रोशनी में होते थे क्योंकि जेनरेटर के लिए जो डीज़ल सप्लाई पटना से चलती थी वो सहरसा पहुंचते-पहुंचते न जाने कितनों की जेब गर्म कर चुकी होती थी.

लगभग 60 प्रतिशत जली हुई एक 70-वर्षीय महिला को धूप में चारपाई पर लिटा रखा था और इंफ़ेक्शन से बचाने के लिए चारपाई पर लगी हुई थी एक फटी हुई मच्छरदानी!

ये वो बिहार था जहां लालू यादव 15 साल से सीधे या परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज़ थे.

लगभग छह सालों बाद यानि 2010 की अप्रैल में फिर से बिहार जाने का मौका मिला. काश मैं कह पाता कि नीतीश के बिहार में सब कुछ बदल चुका था और बिहार भी शाइनिंग इंडिया की चमक से दमक रहा था.

परेशानियां अभी भी थीं, लोगों की शिकायतें भी थीं लेकिन कुछ नया भी था.

अर्थव्यवस्था तरक्की के संकेत दे रही थी. हर दूसरा व्यक्ति कानून व्यवस्था को खरी खोटी सुनाता हुआ या अपहरण उद्दोग की बात करता नहीं सुनाई दिया.

दोपहर को स्कूल की छुट्टी के बाद साइकिल पर सवार होकर घर लौटती छात्राएं मानो भविष्य के लिए उम्मीद पैदा कर रही थीं.

डॉक्टर मरीज़ों को देखने घर से बाहर निकल रहे थे. उन्हें ये डर नहीं था कि निकलते ही कोई उन्हे अगवा न कर ले.

किसान खेती में पैसा लगाने से झिझक नहीं रहा था क्योंकि बेहतर सड़क और बेहतर क़ानून व्यवस्था अच्छे बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़ा रही थी.

कम शब्दों में कहूं तो लगा मानो बिहार में उम्मीद को इजाज़त मिलती नज़र आ रही थी.

और एक बिहारी होने के नाते ( भले ही मैं बिहार से बाहर हूं) ये मेरे लिए बड़ी चीज़ है.

इस चुनाव में नीतीश कुमार समेत सभी राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए बहुत कुछ दांव पर है बल्कि लालू-राबड़ी दंपत्ति का पूरा राजनीतिक भविष्य इस चुनाव से तय हो सकता है.

लेकिन बिहारियों के लिए दांव पर है उम्मीद. उम्मीद कि शायद अब बिहार का राजनीतिक व्याकरण उनकी जात नहीं विकास के मुद्दे तय करेंगे, उम्मीद कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा, उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी कोने में बिहारी कहलाना मान की बात होगी.

और मुख्यमंत्री कोई बने मेरी उम्मीद बस यही है कि जिस उम्मीद की इजाज़त बिहारियों को पिछले पांच सालों में मिली है वो अब उनसे छिन न सके.

नहीं चलेगी 'चलता है' संस्कृति

पोस्ट के विषय:

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शनिवार, 16 अक्तूबर 2010, 14:06

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राष्ट्रमंडल खेलों के समापन के बाद एक वर्ग है जो जश्न में डूबा है और कह रहा है कि देखा हम न कहते थे सब ठीक ढंग से हो जाएगा.

मगर इस जश्न का ख़ुमार उतरता उससे पहले ही जाँच के आदेश देकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक अच्छा संकेत दिया है.

इस पूरे आयोजन को दो हिस्सों में देखना होगा. एक खेल शुरू होने से पहले और दूसरा खेलों के दौरान.

खेल शुरू होने से पहले तक ख़ुद दिल्ली के लोग इसे लेकर उत्साहित नहीं थे मगर खेलों में जैसे-जैसे भारत का प्रदर्शन अच्छा हुआ, इन ख़बरों ने पहले पन्ने पर जगह बनाई लोगों की रुचि खेलों में बढ़ती गई.

अंत में जब टिकट नहीं मिल रहे थे तो लोग सिर्फ़ ख़ूबसूरत स्टेडियम देखने नहीं बल्कि भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन देखने जाना चाह रहे थे.

भारतीय खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन ने इन खेलों में लोगों का विश्वास जगाया न कि आयोजकों ने.

मगर इस जश्न में ये नहीं भूला जा सकता कि कुछ लोगों के कारनामों ने महज़ तीन हफ़्ते पहले ही दुनिया भर में देश का नाम बदनाम कर दिया था.

लाखों-करोड़ों भारतीयों ने अपनी मेहनत से दुनिया में भारत को जो पहचान दी थी वो चंद लोगों ने कुछ ही समय में धो दी.

जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में मौजूद लोगों ने उदघाटन समारोह में भी सुरेश कलमाड़ी की हूटिंग की थी और समापन समारोह में भी उनकी हूटिंग हुई.

भले ही वो अकेले इस पूरी स्थिति के लिए ज़िम्मेदार न हों मगर लोगों में उस बात का जो ग़ुस्सा है वो उन्हीं को प्रतीक मानते हुए निकला है.

खेल हो चुके हैं मगर पैसा हज़म नहीं होना चाहिए.

इस स्थिति के सभी ज़िम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए और प्रधानमंत्री के इस क़दम से संभव है कि आम लोगों में इस बात के प्रति विश्वास बढ़े कि इस देश में ' सब चलता है' संस्कृति नहीं चलेगी.

इन खेलों का स्वर्णिम सुख

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010, 11:35

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पिछले दिनों जब राष्ट्रमंडल खेल एक के बाद एक विवाद में फंसते जा रहे थे तो मेरे एक दोस्त ने बहुत ही वाजिब सवाल रखा कि क्या इन खेलों पर क़रीब दस हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च करना रुपए की बर्बादी और फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है?

हो सकता है कि स्टेडियम और खेल गांव बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर आयोजन समिति के हवाले किए गए हों या खेलों से मात्र एक सप्ताह पहले मुख्य स्टेडियम के पास दर्शकों के चलने का फ़ुट ओवरब्रिज धराशायी हो गया हो या दिल्ली में आई बाढ़ के पानी से जूझ रहे खेल गांव में सांप निकल आया हो लेकिन जिस तरह के खेल अब तक हुए हैं और जिस तरह का प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों का रहा है, उसने इन सभी अवरोधों और खिजाने वाली चीज़ों को भुलवा दिया है.

खरबों रुपए की अर्थव्यवस्था में दस हज़ार करोड़ रुपयों की बिसात क्या है? और फिर क्या 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' का मोल रुपयों में लगाया जा सकता है?

देश के एथलीटों के प्रदर्शन के बारे में अख़बारों में पढ़ने और उन्हें अपनी आँखों के सामने या टेलीविजन पर 'लाइव परफ़ोर्म' करते देखने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.

अलका तोमर द्वारा एथेंस ओलंपिक की रजत पदक विजेत तोन्या वरबीक को पटखनी देने या विजेंदर के नामिबियाई मुक्केबाज़ को मात्र 98 सैकंडों में स्टेडियम की छत दिखा देने के थ्रिल को सिर्फ़ देख कर ही महसूस किया जा सकता है.

स्टेडियम में दर्शक भले ही नदारद हों( सौजन्य कलमाडी ऐंड कंपनी) लेकिन टेलिविजन पर जितने लोग इन खेलों का आनंद ले रहे हैं, उसने क्रिकेट के एकाधिकार को ( मोहाली में रोमांचक जीत और सचिन तेंदुलकर के 49 वें शतक के बावजूद) फीका किया है.

दूसरी सबसे बड़ी बात भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलातीं हैं.

तीरंदाज़ी, जिमनास्टिक, और पैरा स्विंमिंग में भारत को इससे पहले कभी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला. इन खेलों में कई पदक विजेता बड़े शहरों से न होकर भारत के अनजान गांवों और क़स्वों से आए हैं.

तीरंदाज़ी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीय दीपिका कुमारी झारखंड के रतुचेती गांव की रहने वालीं हैं जिनके पिता रांची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे. और इस समय बेरोज़गार हैं.

जिमनास्टिक में रजत और कांस्य पदक जीतने वाले आशिष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश मुज़्तबा इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. ये भी सोचने वाली बात है कि हरियाणा जिसका कि कन्या भ्रूण हत्या में बहुत ख़राब रिकॉर्ड है, किस तरह से बार-बार इतनी महिलाओं को विजेता पोडियम पर भेज रहा है.

हरियाणा के पुरुष खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी चाहे वो योगेश्वर दत्त हों या रविंदर सिंह या संजय कुमार, महिला खिलाड़ियों से कम नहीं रहा है.

कुछ हल्कों में तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा के खेल कहा जा रहा है.

और जिस तरह से इन खेलों ने दिल्ली का काया-पलट किया है वो भी क़ाबिले-तारीफ़ है. चौड़ी साफ़ सड़कें, ख़ूबसूरत फ़्लाई ओवर, दूरदराज़ के इलाक़ों तक मैट्रो ट्रेन ने दिल्ली की छवि को भारत वासियों के साथ विदेशियों की निगाह में भी उठा दिया है.

साइकिलिंग स्पर्धा के दौरान जब हेलीकॉप्टरों पर रखे कैमरे ऊपर से दिल्ली के दृश्य दिखा रहे थे तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही गंदी अनियोजित दिल्ली है. अपने पूरे वैभव में दिल्ली दुनिया के किसी भी सुंदर नगर से टक्कर ले रही थी.

ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है?

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 08 अक्तूबर 2010, 15:22

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न्यूज़ीलैंड के स्टार टीवी एंकर पॉल हैनरी ने जो कुछ किया उससे आप चकित हैं? मैं नहीं हूँ.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया वह असभ्य, अभद्र और असंवेदनशील है.

इसे सुनने-देखने के बाद मैं भी अपमानित महसूस कर रहा हूँ. नाराज़ भी हूँ. लेकिन चकित मैं बिल्कुल भी नहीं हूँ.

चकित इसलिए नहीं हूँ क्योंकि यह एक व्यक्ति की ग़लती भर नहीं है. यह एक मानसिकता का सवाल है. जिसके दबाव में पॉल हैनरी शीला दीक्षित की खिल्ली उड़ाते हैं. इस मानसिकता से हज़ारों भारतीय हर दिन पश्चिमी देशों और अमरीका में रुबरू होते हैं.

यह मानसिकता पूंजीवादी और सामंतवादी मानसिकता है.

इस मानसिकता से ग्रसित व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को अपनी बराबरी पर नहीं देखना चाहता जो कभी उससे कमतर रहा हो. सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक, किसी भी स्तर पर. अगर कोई उसकी बराबरी पर या उससे ऊँचा खड़ा दिखे तो महसूस होने लगता है मानों जूती सर पर चढ़ गई हो.

जो भारतीय उनके ज़हन में अनपढ़, गँवार और ग़ुलाम के रुप में बसे हुए हैं वे आगे निकलते दिख रहे हैं. चाहे वह पेशेवरों के रुप में व्यक्ति हों या फिर अर्थव्यवस्था के रुप में देश.

यह बात आसानी से गले उतर भी नहीं सकती.

ठीक उसी तरह से जिस तरह से भारत में ही दलितों और पिछड़ों का सामाजिक उत्थान अभी भी बहुत से लोगों को अखरता है.

बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक रास्ते में कितने कांटे बोए गए. मायावती का राजनीति में उदय उनके समकालीनों के गले में गड़ता रहा है.

बात सिर्फ़ दलित और पिछड़ों भर की नहीं है. यह मामला सामाजिक-आर्थिक उत्थान से भी जुड़ा है. पद और ओहदों से भी जुड़ा है. कहीं-कहीं यह भाषा के स्तर पर भी दिखता है.

ग़ालिब ने उस्ताद ज़ौक के गले में ऐसी ही किसी फाँस पर कहा होगा,

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है

इसे नस्लभेदी कह देने से मामला आसान दिखने लगता है. लेकिन यह उतना आसान नहीं है. यह उससे कोई महीन चीज़ है.

भारत ने न्यूज़ीलैंड के उच्चायुक्त रुपर्ट हॉलबोरो को तो तलब करके नाराज़गी जता दी.

लेकिन सीएनएन आईबीएन नाम के एक टेलीविज़न चैनल पर साइरस बरुचा ने जो कुछ किया और कहा उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

शीला दीक्षित के नाम को लेकर जिस तरह का मज़ाक उन्होंने उड़ाया वह कम अपमानजनक नहीं था.

मनोरंजन को लेकर हर देश काल में अलग-अलग प्रतिमान होते हैं. ये प्रतिमान सभ्यता और समाज के साथ भी बदलते हैं. लेकिन एक सीमा रेखा तो खींचनी ही होगी.

पॉल हैनरी के लिए भी और साइरस बरुचा के लिए भी.

कितना समझदार हो गया भारत 21 साल में !

रामदत्त त्रिपाठीरामदत्त त्रिपाठी|शुक्रवार, 01 अक्तूबर 2010, 02:23

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अब से 21 साल पहले जब अयोध्या में राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद का मुक़दमा हाईकोर्ट ने फ़ैजाबाद की ज़िला अदालत ने अपने पास मंगवा लिया था, उस समय तीन जजों - जस्टिस केसी अग्रवाल, जस्टिस यूसी श्रीवास्तव और जस्टिस सैयद हैदर अबास राजा ने सर्वसम्मति से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था.

उस आदेश के अंत में उन्होंने यह टिप्पणी की थी: 'इसमें संदेह है कि मुक़दमे में शामिल कुछ सवालों को न्यायिक प्रक्रिया से हल किया जा सकता है.' हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने यह टिप्पणी सात नवंबर 1989 को विवादित ज़मीन पर राम मंदिर के शिलान्यास से ठीक पहले की थी.

फिर 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सर्वसम्मति से केंद्र को इस मुद्दे पर राय देने से इनकार कर दिया था कि क्या वहाँ पहले स्थित कोई हिंदू मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी गई थी ?

सरयू तट से शुरू हुआ विवाद गंगा, गोमती और यमुना की दहलीज़ पर जाकर भी अनिर्णीत रहा. मगर अभी कुछ रोज़ पहले इस आशंका से हाईकोर्ट का फ़ैसला टलवाने की कोशिश हुई. लेकिन अदालत ने इस कोशिश को ठुकरा दिया.

उसी लखनऊ हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के जजों ने 21 साल बाद चारों मुकदमों के हर बिंदु पर पूरे विशवास के साथ बेहिचक अपना-अपना फै़सला दिया. फ़ैसले के अनेक बिंदुओं पर सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट को इस फ़ैसले को उलटने का भी अधिकार है.

क़ानून के तहत भारतीय जनता की चुनी हुई संसद भी हस्तक्षेप कर सकती है.
लेकिन हाईकोर्ट ने फै़सला देकर समूची न्यायपालिका को इस आरोप से बरी कर दिया कि वह इस जटिल मुक़दमे पर फ़ैसला देने में ढुलमुल रवैया अपना रही है.

हाईकोर्ट अपना स्पष्ट फ़ैसला इसलिए दे सका क्योंकि इस समय 1989, 1990, 1992, 1993 जैसे तनावपूर्ण दंगे फ़साद और धार्मिक भावनाएं भडकाने वालों को जनता ने हाशिए पर डाल दिया है.

आज पूरे देश में लगभग आम सहमति है कि अगर विवाद आपसी सहमति से नहीं सुलझ सकता तो अदालत ही फै़सला करे.

भारतीय नागरिक समाज का यह विश्वास ही अदालत की शक्ति है. कितना समझदार हो गया है भारत 21 साल में! अनुभव से हर कोई सबक लेता है.

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