इस विषय के अंतर्गत रखें फरवरी 2010

मेरा परिवारवाद बनाम तेरा परिवारवाद

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 24 फरवरी 2010, 11:45

टिप्पणियाँ (26)

सुना है कि लालकृष्ण आडवाणी इन दिनों ठीक तरह से सो नहीं पा रहे हैं.

उनके सपनों में दिवंगत विजया राजे सिंधिया आ रही हैं और उनसे शिकायत कर रही हैं कि वे उनके परिवार की राजनीति पर वार कर रहे हैं.

सुना है कि उनका कहना है कि वसुंधरा राजे सिंधिया उनकी बेटी होने की वजह से राजनीति में नहीं हैं और न ही वसुंधरा राजे का बेटा दुष्यंत उनकी वजह से भारतीय जनता पार्टी का टिकट पाता रहा है. उन्हें यह भी नाराज़गी है कि यशोधरा राजे लगभग दो दशक अमरीका में रहकर यदि मध्यप्रदेश में राजनीति कर रही हैं तो वह सिंधिया परिवार की वजह से तो है नहीं.

कहा जा रहा है कि जागते हुए भी लालकृष्ण आडवाणी जी को कई लोग परेशान कर रहे हैं.

लोग बता रहे हैं कि गोपीनाथ मुंडे मुँह फुलाए बैठे हैं कि उनकी बेटी पंकजा विधायक क्या बन गईं पार्टी को परिवारवाद दिख रहा है. उनका कहना है कि पूनम महाजन को टिकट इसलिए थोड़े ही मिला कि वे उनकी भतीजी हैं, वह तो दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की बेटी होने के नाते मिला था.

सुना है कि सांसद मेनका गांधी कह रही हैं कि एक तो वे कांग्रेस वाले गांधी परिवार की काट की तरह पार्टी की सेवा कर रही हैं और उस पर अब आडवाणी जी को उनका बेटा वरुण अखर रहा है. उनकी शिकायत है कि एक तो पार्टी के लिए वरुण गांधी ने अपने सेक्युलर होने का पारिवारिक चोगा उतार दिया और उसका यह फल मिल रहा है.

हिमाचल के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल सफ़ाई देते घूम रहे हैं कि आडवाणी जी ने जो परिवारवाद की बात कही है वह उनके बेटे अनुराग ठाकुर पर लागू नहीं होती.

अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा और भतीजी करुणा शुक्ला भी सुना है कि सफ़ाई दे रहे हैं कि उन्होंने अटल जी के नाम से कभी राजनीति नहीं की, इसलिए उन्हें परिवारवाद की परिभाषा से अलग रखा जाए.

कल्याण सिंह को लग रहा है कि पार्टी से अलग क्या हुए आडवाणी जी को उनका बेटा राजबीर सिंह खटक रहा है.

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राहत की साँस ले रहे हैं कि अच्छा हुआ उनकी पत्नी को पार्टी का टिकट नहीं मिला उधर जसवंत सिंह सोच रहे हैं कि अब आडवाणी उनके बेटे मानवेंद्र सिंह की राजनीति के पीछे पड़ गए हैं.

लेकिन भाजपा के निकटतम सहयोगी और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सुना है कि बेचैन हैं कि आडवाणी जी एनडीए में रहकर साथ देने का अच्छा सिला दे रहे हैं. उनका कहना है कि उनका बेटा सुखबीर सिंह अपने दम पर उप मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष है. उनकी बहू हरसिमरत कौर अपनी क़ाबिलियत पर सांसद हैं. उनका भतीजा मनप्रीत बादल और उनके दामाद अवधेश सिंह कैरों इसलिए मंत्री हैं क्योंकि उनसे क़ाबिल लोग राज्य में थे ही नहीं. वे पूछ रहे हैं कि यदि सुखबीर के साले विक्रम सिंह मजीठा को मंत्री न बनाया होता तो सुखबीर के लिए कुर्सी कौन खाली करता?

सुना है कि बाला साहब ठाकरे कह रहे हैं कि यदि आडवाणी में ठीक राजनीतिक समझ होती तो वे उद्धव ठाकरे को परिवार के बेटे की तरह आगे बढ़ाते. वे कह रहे हैं कि जीवन भर भतीजे राज ठाकरे को राजनीति सिखाने के बाद वह बेवफ़ाई कर गया इसलिए उसे ठाकरे परिवार का नहीं मानना चाहिए.

अभी इस पर संघ-परिवार की ओर से कुछ सुनाई नहीं पड़ा है. कहा जा रहा है कि वे विश्लेषण और मंथन कर रहे हैं कि कहीं आडवाणी जी ने नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाने की नाराज़गी में संघ-परिवार पर तो टिप्पणी नहीं की है?

भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में जब से लालकृष्ण आडवाणी ने परिवारवाद की राजनीति पर टिप्पणी की है तब से कांग्रेसी बगलें झाँक रहे हैं. वे कह रहे हैं कि नेक काम की शुरुआत तो अपने घर से ही होनी चाहिए और यदि कोई अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाएगा तो देश को कैसे आगे बढा़ सकेगा? कांग्रेस का एक धड़ा कह रहा है कि वे भाजपा पर परिवारवाद की राजनीति के लिए पलटवार इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे एक ही परिवार को परिवार मानते हैं शेष को वे देख ही नहीं पाते.

कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव की पार्टी ने कहा है कि आडवाणी परिवारवाद की बात कहकर सेक्युलर ताक़तों को कमज़ोर करना चाहते हैं. उन्हें आशंका है कि कहीं आडवाणी जी को अमर सिंह ने बरगला तो नहीं लिया.

जनता असमंजस है कि किस परिवार की राजनीति को परिवारवाद माने और किसे नहीं?

ज़ुबान खोलें तो धनवर्षा!

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|शुक्रवार, 19 फरवरी 2010, 11:30

टिप्पणियाँ (43)

तो आख़िरकार 'ख़ान साहब' ने अपना दम साबित कर दिया. अब वो आराम से कह सकते हैं कि - जी हाँ, माई नेम इज़ ख़ान. मुझे तो ये सोचते हुए डर लगता है कि ख़ान साहब अपना दम साबित नहीं कर पाते तो कहीं भारतीय संस्कृति की कहावत के अनुसार उन्हें अपना नाम बदलना पड़ जाता तो क्या होता?

फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद ख़बरें आईं कि ब्रिटेन में ख़ान साहब ने बॉक्स ऑफ़िस पर धमाकेदार नौ लाख 36 हज़ार पाउंड यानी लगभग साढ़े छह करोड़ रुपए कमाई की है और ब्रिटेन में इसने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अमरीका में भी फ़िल्म ने पहले हफ़्ते में ही 23 लाख डॉलर यानी क़रीब साढ़े आठ करोड़ फ़िल्म टीम की झोली में डाल दिए हैं.

हो भी क्यों ना भला, फ़िल्म की टीम ने अमरीका और ब्रिटेन के तूफ़ानी दौरे जो किए थे और वो भी शिवसेना की मशालों से अपनी पूँछ बचाने की भाग-दौड़ में. कुछ दिन के लिए शिवसैनिकों से जान भी बच गई और फ़िल्म का धुँआधार प्रचार तो हुआ ही.

वैसे ये ख़याल ज़रूर आता है कि अगर शाहरुख़ ख़ान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के बारे में वो नहीं कहा होता, जो उन्होंने कहा तो क्या वाक़ई फ़िल्म को इतना प्रचार मिलता? भला हो शिवसेना का कि उसने ख़ान साहब का काम आसान कर दिया.

shahrukh_kajol.jpg शाहरुख़, प्रीटि ज़िंटा और शिल्पा शेट्टी जैसी फ़िल्मी हस्तियों ने सुनहरे पर्दे से बेतहाशा धन बटोरने के अलावा क्रिकेट की दुनिया को भी ख़ूब मुनाफ़ा कमाने वाली दुनिया बना दिया है. मेरी अनभिज्ञता को माफ़ कीजिएगा कि मुझे ये जानकारी नहीं है कि ये लोग कितना धन कल्याणकारी कार्यों में ख़र्च करते हैं, आपको कुछ जानकारी हो तो ज़रूर बताइएगा.

शाहरुख़ को पाकिस्तानी खिलाड़ियों की तो चिंता रही लेकिन पूरे भारत की बात अगर छोड़ भी दें तो उनकी मुंबई नगरी में ही करोड़ों लोग ऐसे भी रह रहे हैं जिन्हें हर रोज़ रोज़ी-रोटी के लिए तरसना पड़ता है, छह, आठ, दस लोगों के परिवार की गुज़र-बसर एक ही झोंपड़ी में होती है.

क्या शाहरूख़ ख़ान और उनकी टीम भारत देश के ऐसे लोगों के लिए कुछ धन ख़र्च करने की ज़हमत करेंगे जो उसी भारत देश के नागरिक हैं लेकिन उनके लिए करोड़ों रुपए मिलने तो क्या, सिर्फ़ चंद रुपए भी सपना लगते हैं जिनसे रोज़मर्रा का ख़र्च चल जाए.

शाहरुख़ ख़ान शायद अमरीका और ब्रिटेन की दुनिया से सबक लेने से घबराते हैं जहाँ हर सेलेब्रिटी यानी लोकप्रिय व्यक्ति किसी ना किसी दान संस्था से जुड़ा होता है और अपनी मौजूदगी से भारी धन चैरिटी के लिए जुटा देते हैं. अगर मैं कुछ ग़लत कहूँ तो टोक दीजिएगा कि मेरे ख़याल में शाहरुख़ ख़ान इन देशों के दौरे सिर्फ़ धन बटोरने के लिए करते हैं.

आज शाहरुख़ ख़ान में वो दम है कि उनकी एक झलक धन की बरसात कर सकती है, अब ये उन पर है कि वे अपने इस जादू का कमाल लोगों में ख़ुशियाँ बाँटने और उनका दुख दर्द दूर करने में करते हैं या फिर सिर्फ़ अपनी और फ़िल्मी दुनिया की जेबें भरने के लिए.

ये बात भी बहुत कचोटती है कि क्या हम और आप जैसे आम लोगों को कभी ये सुध आएगी कि ज़्यादातर क्रिकेट या फ़िल्मी सितारे हमारी जेबें ख़ाली करवाते हैं, बाज़ारी दुनिया इसमें उनकी मदद करती है और फिर उसी पैसे के बल पर और ज़्यादा बाज़ारी चीज़ें और संस्कृति हम पर थोप दी जाती हैं, आधुनिकता और फ़ैशन का नाम देकर लोग उनके पीछे भागते-चले जाते हैं.

लेकिन हम और आपमें वो हुनर कहाँ कि शाहरुख़ ख़ान की तरह अपना मुँह खोलें तो पैसे की बरसात हो जाए...

बदलाव के सकारात्मक संकेत

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 16 फरवरी 2010, 10:47

टिप्पणियाँ (16)

पिछले दिनों अदालतों के भीतर से कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जिससे लगता है कि उनका नज़रिया एक बार फिर बदल रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली ने कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आख़िरी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट को वैश्वीकरण और उदारीकरण के आकर्षक नारों में नहीं उलझना चाहिए.

एक और अदालती फ़ैसले में न्यायाधीश ने टिप्पणी की है कि किसी आपराधिक मामले पर सज़ा का फ़ैसला करते हुए यह ध्यान में रखना चाहिए कि वह अपराध ग़रीबी के दबाव में तो नहीं किया गया है. अदालत ने कहा है कि किसी ग़रीब अपराधी में सुधार की संभावना को भी ध्यान में रखना चाहिए.

पिछले हफ़्ते ही दिल्ली हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त हुए मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता की ज़रुरत पर बल दिया है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. ऐसा लगता है कि उन्होंने यह भी मान लिया है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत आना चाहिए.

ये सब फ़ैसले या टिप्पणियाँ इसलिए राहत देती हैं क्योंकि अभी कुछ ही साल पहले अदालतों का रवैया कुछ और ही दिखाई दे रहा था. डरा रहा था.

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी, वर्ष 2005 में सार्वजनिक रुप से कह रहे थे कि आने वाले दिन एलपीजी के हैं. एलपीजी मतलब लिब्रलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन. यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण.

वर्तमान मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी उस समय एलपीजी के इस सिद्धांत से सहमत दिखते थे.

उसी समय भोपाल में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के सम्मेलन में उन्हें बताया जा रहा था कि उदारीकरण, नई अर्थव्यवस्था और नई तकनीकें कैसी हैं.

अदालतों का रुख़ ऐसा हो चला है मानों वे सरकार की नीतियों के अनुरुप अपने आपको बदल लेना चाहती हैं.

जिस वैश्वीकरण और उदारीकरण को लेकर समाज में आम सहमति नहीं बन सकी थी उससे अदालतें मानों सहमत हुए जा रही थीं.

अच्छा है कि बदलाव के रुख़ दिख रहे हैं. नानुकुर के बाद ही सही माननीय न्यायाधीश अपनी संपत्ति सार्वजनिक तो कर रहे हैं.

कथित मीडिया ट्रायल के बाद ही सही प्रियदर्शिनी मटूट, जेसिका लाल, शिवानी भटनागर और नितीश कटारा की हत्या जैसे मामलों के अभियुक्त प्रभावशाली होने के बावजूद सलाखों के पीछे तो हैं.

अदालत से बाहर आते एसपीएस राठौर की मुस्कुराहट उन्हें भारी तो पड़ रही है.

हालांकि अभी बहुत कुछ होना बचा हुआ है.

यह देश भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए अधिकारियों और राजनेताओं को सीखचों के पीछे ज़िंदगी गुज़ारते देखना चाहता है.

हत्या, लूट और बलात्कार के मामलों के अभियुक्तों को विधानसभाओं और संसद में प्रवेश करने से वंचित होता देखना चाहता है.

देश चाहता है कि जब बरसों बरस से लाखों मामले अदालत में लंबित हों तो अदालतें उसे चिंता के साथ देखें.

जब हज़ारों लोग विचाराधीन क़ैदियों की श्रेणी में हों तो अदालतों को विचार करना चाहिए कि गर्मियों की और शीतकाल की लंबी छुट्टियाँ अदालतों के लिए कितनी ज़रुरी हैं.

इंतज़ार उस दिन का भी है जिस दिन माननीय न्यायाधीश बेझिझक कह सकें कि न्याय के मंदिर भ्रष्टाचार और पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं.

गूगल देव को प्रणाम

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 12 फरवरी 2010, 18:13

टिप्पणियाँ (42)

तैंतीस हज़ार करोड़ देवी देवताओं की जमात में जल्दी ही एक नाम और जुड़ने वाला है. भगवान गूगल का.

भगवान गूगल की महिमा अपरंपार है. वो सर्वज्ञानी हैं. सभी समस्याओं के बारे में जानते हैं और उनके पास समाधान भी है.

जिन मामलों में आम देवता कुछ नहीं कर सकते गूगल उनमें भी मदद कर सकते हैं.

पढ़ाई करनी हो, शादी करनी हो, दुःख प्रकट करना हो, खुशी प्रकट करनी हो, सब में गूगल महाराज की मदद ली जा सकती है.

उनके दस हाथ या दस सर नहीं हैं बल्कि लाखों हाथ और सर हैं जिन्हें वेबपेज कहा जाता है.

कुछ भी जानना हो तो गूगल देव को याद कीजिए. मात्र स्मरण भर से पुण्य मिलता है और सवाल पूछते ही जवाब मिल जाता है.

बड़े फ़ायदे हैं गूगल के तभी वो देवताओं की श्रेणी में शामिल होने ही वाले हैं. अगर नहीं मानते हैं तो याद कीजिए आखिरी बार किसी सवाल के जवाब के लिए आपने कौन सी किताब उठाई थी?

या फिर किसी दोस्त से किसी तथ्य की प्रमाणिकता के लिए आपने कब किसी अख़बार का हवाला दिया था?

कोई तथ्य प्रमाणिक न लगे तो सीधे गूगल महाराज की शरण में जाना आपको ज़रुर याद आएगा.

हां ये बात और है कि गूगल महाराज आपको संपादित सामग्री नहीं देते. वो दुनिया भर की सारी जानकारी आपको दे देते हैं. उसमें सही और ग़लत क्या है ये आपको ही तय करना है.

गूगल देव का सबसे बड़ा वरदान पत्रकारों को मिला है. उनकी भूमिका जर्नलिज़्म में इतनी बड़ी है कि कई लोग अब जर्नलिज़्म की बजाय गूगलिज़्म करते हैं और उनके लिखे ( या चुराए?) गए लेख काफ़ी पसंद भी किए जाते हैं.

हां गूगल देव के किसी दूसरे भक्त ने देवता की मदद से ये चोरी पकड़ ली तो बात और है.

गूगल की महिमा बताने वाली एक किताब है, 'व्हाट वुड गूगल डू' यानी गूगल क्या करता.

ये किताब गूगल देव की असीम लोकप्रियता और सफलता के बारे में बताते हुए सलाह देता है कि आज के युग में कुछ भी करना हो तो ये ध्यान करें कि अगर गूगल देव आपकी स्थिति में होते तो क्या करते? बस उस कार्य में सफलता आपके क़दम चूम सकती है. पुस्तक के बारे में और जानकारी के लिए गूगल पर पुस्तक का नाम टाइप कर सकते हैं.

लेकिन गूगल देव आप पर कितने मेहरबान हैं इसके भी उपाय हैं यानी देवता को क्या भेंट करना है तो देवता प्रसन्न हों ये भी जानना ज़रुरी है.

मसलन अगर आप चाहते हैं कि सर्च में आपकी सामग्री सबसे ऊपर दिखे तो उसके भी तरीके हैं जिसकी जानकारी या कंसल्टेंसी के लिए गूगल देव के पुजारी अच्छी ख़ासी दक्षिणा लेते हैं.

प्रभु को खुश करने के लिए दक्षिणा तो देनी पड़ती ही है.

वैसे इंटरनेट रुपी ब्रहांड में और भी देवता हैं जो गूगल देव से बराबरी करना चाहते हैं मसलन याहू देव, एओएल देव इत्यादि लेकिन गूगल का स्थान गणेश जी की तरह है. सबसे पहला.

इंटरनेट के ब्रहांड में सबसे पहले गूगल की पूजा होती है.

अब अक्सर जब लोगों को अपनी लोकप्रियता की चिंता होने लगती है या यह सवाल सताने लगता है कि दुनिया में लोग उन्हें जानते भी हैं या नहीं, तो वे फिर गूगल की ही शरण में जाते हैं.

सर्च में जाकर अपना नाम डालिए और गूगल बता देगा कि इंटरनेट की दुनिया में आपकी पहचान कितनी बड़ी है.

ऐसे गूगल देव को शत-शत प्रणाम, जिनके बिना जीवन मुश्किल ही नहीं असंभव सा लगने लगा है.

क्या भूलें क्या याद रखें

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|गुरुवार, 11 फरवरी 2010, 11:23

टिप्पणियाँ (9)

मुंबई में कला की पढाई के लिए प्रसिद्ध जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के कैम्पस में इन दिनों एक छोटा सा विवाद उठ खड़ा हुआ है.

हरे पेड़ और पौधों से भरे इस कैम्पस के बीच एक कुटीर है जो सौ सालों से भी पुराना है. इसे आम तौर से विभागाध्यक्ष कुटीर या 'किपलिंग का घर' से जाना जाता है.

इस कुटीर की अहमियत को देखते हुए एक निजी संस्था ने इसे एक संग्रहालय में बदलने की योजना महाराष्ट्र सरकार को पेश की जिसे मंज़ूर कर लिया गया.

इस योजना के तहत संग्रहालय का एक कमरा किपलिंग के नाम कर दिया जाना था लेकिन अब सरकार इसके लिए तैयार नहीं नज़र आती है जिस से कैम्पस में मायूसी है.

सरकार के एक अधिकारी ने मुझे बताया कि किपलिंग का नाम उन अंग्रेजों में शामिल होता है जिसे आप नस्लपरस्त कह सकते हैं और वह ब्रिटिश राज को बढ़ावा देने वालों में भी शुमार होते थे.

सरकार डरती है कि कहीं यह एक राजनैतिक विवाद में न बदल जाए. इसलिए किपलिंग के नाम को इस संग्रहालय से जोड़ने की ज़रुरत ही नहीं.

'किम' और 'दी जंगल बुक' जैसी किताबों के और 'इफ़' जैसी कविता के लेखक रुडयार्ड किपलिंग इस कुटीर में 30 दिसंबर 1865 को पैदा हुए थे. उस समय उनके पिता जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के विभागाध्यक्ष थे.

अंग्रेजी साहित्य में उनका एक बड़ा नाम है और मुंबई में पैदा होने के कारण मुंबई वालों को उन पर गर्व भी है. यहाँ किपलिंग सोसाइटी भी बनी हुई है.

लेकिन यहाँ और देश में कई ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जो उन्हें इस लिए पसंद नहीं करते कि वह भेद भाव करते थे. लेकिन उनकी याद में उनके जन्म स्थान को उनका नाम दिया जाए तो क्या फर्क़ पड़ता है.

देश में दर्जनों सड़कें इमारतें और जगहें अंग्रेजों के नाम पर आज भी हैं उन्हें बदला तो जा सकता है लेकिन क्या इतिहास को बदला जा सकता है.

आज किपलिंग को याद करने वाले उनकी दोनों बातों को याद करते हैं, एक यह कि वह भेद भाव करने वाले अँगरेज़ थे और दूसरे अंग्रेजी साहित्य में उनका योगदान.

हैरानी की बात है कि जो व्यक्ति 'इफ़' जैसी कविता में जैसी नसीहत कर सकता है वह नस्ली भेदभाव में विश्वास भी रख सकता है.

मैंने जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के कुछ छात्रों से इस बारे में उनकी राय जाननी चाही.

मुझे कुछ यह सुनने को मिला, हमें पुरानी बातों को कुरेदना नहीं चाहिए. किपलिंग इस शहर में पैदा हुए थे और इस कैम्पस में पैदा हुए थे. हमें उनकी याद में उनके घर को श्रद्धांजलि के तौर पर उनके नाम कर देना चाहिए. उन्होंने अधिकतर अच्छी चीज़ें दी हैं और वह इस शहर को पसंद करते थे इसलिए हमें उन पर गर्व है.

मैंने सोचा यह नौजवान कितने खुले ज़हन के हैं. अगर इसी विचार के साथ वे कैम्पस से बाहर इस दुनिया में क़दम रखें तो देश का भविष्य अच्छे हाथों में होगा. हमें अपनी नई नस्ल पर गर्व है.

विचारों की कमी नहीं रही

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 02 फरवरी 2010, 13:23

टिप्पणियाँ (33)

सुना है कि कोसल में विचारों की कमी समाप्त हो गई है. एक के बाद एक कई विचार कौंध रहे हैं. इसमें से कई तो क्रांतिकारी हैं.

बड़े चौधरी अमरीका की सलाह पर कोसल ने विचार करना शुरु कर दिया है कि अच्छे तालेबान और बुरे तालेबान में फ़र्क किया जाए.

ब्रिटेन ने इस विचार का समर्थन किया है. ब्रिटेन ने बताया है कि उन्होंने पहले भारत में अच्छे राजा और बुरे राजा का फ़र्क किया था और इसका फ़ायदा दो सौ साल तक मिलता रहा था.

कोसल के दरबार-ए-ख़ास ने जब अच्छे तालेबान और बुरे तालेबान को अलग-अलग दृष्टि से देखने पर विचार किया तो किसी ने कहा कि बैंक घोटाले करने वालों में भी फ़र्क करना चाहिए. इसकी शुरुआत करते हुए एक को पद्मश्री देने की घोषणा भी कर दी गई.

फिर किसी ने कहा कि बाघों और चीतल आदि के शिकारियों और काले हिरणों के शिकारियों को भी अलग-अलग नज़रों से देखा जाना चाहिए, सो काले हिरण के शिकार के एक अभियुक्त को भी पद्म सम्मान देने की घोषणा कर दी गई.

सुना है कि कोसल में इस परंपरा को और कई क्षेत्रों में लागू करने का विचार है.

'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' में 'वैदिकी' की जगह 'राजनीति' शब्द का इस्तेमाल करने पर मंत्रिमंडल विचार कर रहा है.

इस विचार के समर्थकों का तर्क है कि हत्या, अपहरण और बलात्कार जैसे मामलों के अभियुक्त चुनाव जीत रहे हैं. इसका अर्थ है कि लोग राजनीतिज्ञों की हिंसा को हिंसा नहीं मानते. इसलिए सीआरपीसी में संशोधन करके 'राजनीतिक हिंसा, हिंसा न भवति' को अपना लेना चाहिए.

सुना है कि कोसल के सभी राजनीतिक दल इससे ख़ुशी-ख़ुशी समर्थन देने को तैयार हैं.

कोसल के गृहमंत्री विचार कर रहे हैं कि तालेबान की तरह नक्सलियों में भी फ़र्क किया जाए. लिहाज़ा शीघ्र ही नक्सल प्रभावित राज्यों में अच्छे नक्सलियों की तलाश शुरु की जाएगी. उन्हें राजनीति की मुख्य धारा में आकर अपना काम करने का प्रस्ताव दिए जाने का विचार है.

सुना है कि 'अच्छे नक्सलियों' से कहा जाएगा कि वे आदिवासियों की भलाई, ग़रीबी दूर करने और भ्रष्टाचार कम करने में सरकार के साथ काम करें क्योंकि सरकारें तो पिछले छह दशकों से यही कर रही हैं.

विचार है कि नक्सलियों के बाद छोटे चोरों और उचक्कों के बारे में ऐसी ही दृष्टि अपनाई जाए और अच्छे और बुरे में फ़र्क किया जाए.

कोसल के प्रांतों में भी इस विचार का व्यापक असर दिख रहा है.

एक प्रांत में सरकार ने सांप्रदायिक ताक़तों में फ़र्क कर लिया है. भाषाई आधार पर लोगों में भेद करने वाली दो पार्टियों में फ़र्क कर लिया है. अच्छे और बुरे का फ़र्क कर लिया गया है. अच्छे को बढ़ावा दिया जा रहा है. उसे बिहारियों और उत्तर प्रदेश के भैयों को पीटने का अधिकार दे दिया गया है. बुरे को फूटी आँख भी नहीं देखा जा रहा है.

एक प्रांत में सरकार ने पाया कि मूर्तियाँ, जीवित लोगों से अच्छी हैं. इसलिए विचार किया गया है कि अब से जीवित लोगों की रक्षा की चिंता कम की जाए और मूर्तियों की रक्षा के लिए विशेष दस्ते बनाए जाएँ.

दलालों और भ्रष्टतम लोगों को माननीय कहना, 40 साल के अधेड़ को युवा कहना, रासलीला की सीडी को झूठा कहना और अख़बारों में पैसे देकर ख़बर छपवाने जैसे छोटे-छोटे अनगिनत विचार कोसल में पहले से ही फल-फूल रहे हैं.

सो कोसलवासियो अब चिंता की कोई बात नहीं है.

वे लोग जो कोसल में विचारों की कमी को लेकर चिंतित हैं, उन्हें बता दिया जाए कि कोसल में विचारों की कमी हरगिज़ नहीं है. इसलिए कोसल का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

शर्म तुम को मगर नहीं आती

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|सोमवार, 01 फरवरी 2010, 13:36

टिप्पणियाँ (38)

सुना है कि शाहरुख़ ख़ान सफ़र की तैयारी कर रहे हैं, शिवसेना ने उन्हें पाकिस्तान जाने का फ़तवा जो सुना दिया है!

उनकी हिमाक़त तो आपको मालूम ही होगी. उन्होंने अपनी नादानी में ये कह दिया था कि दुनिया में क्रिकेट के सबसे बड़े तमाशे आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल न किया जाना ग़लत था.

और बॉलीवुड के दूसरे स्वयंभू 'अहमक़' और सुपरहिट फ़िल्म 'थ्री ईडियट्स' के स्टार आमिर ख़ान ने भी यह साबित कर दिया कि व्यावहारिक जीवन में भी वह अहमक़ ही हैं.

उनका बयान भी आपने सुना ही होगा कि खिलाड़ियों को किसी टीम में शामिल करते वक़्त उसकी योग्यता देखनी चाहिए, राष्ट्रीयता नहीं, है ना बेतुकी बात?

आपको शायद शिवसेना की बात ग़लत लग रही होगी, लेकिन काफ़ी सोचने समझने के बाद मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि ये सब एक ग़लतफ़हमी का नतीजा है जो शायद अनुवाद की ग़लती से पैदा हो गया है.

मुंबई पर हमलों के तुरंत बाद भारत सरकार ने बार बार ये कहा था कि उन हमलों में पाकिस्तान की धरती से 'स्टेट ऐक्टर्ज़ और प्लेयर्ज़' शामिल थे. शिवसेना वाले बेचारे बिलावजह शुतरमुर्ग़ की तरह अपना सर रेत में छुपाए रखने के लिए बदनाम हैं. वह शायद ये समझे कि सरकार पाकिस्तानी अदाकारों और खिलाड़ियों की तरफ़ इशारा कर रही है!

ये तो राज़ किसी से छुपा नहीं है कि शिवसेना वाले सबके सब देशभक्त हैं. बस सरकार को ज़रा शब्दों का सही चुनाव करना चाहिए!

और हां शाहरुख़, आप भी ज़रा सोच समझ कर बोला कीजिए. पूरे देश में आपने पोस्टरों पर छपवा रखा है माइ नेम इज़ ख़ान. क्या आपको मालूम नहीं शिवसेना को इस प्रकार का घटिया प्रदर्शन बिलकुल पसंद नहीं? इसी लिए शायद वह आप की फ़िल्म के दिखाए जाने पर भी पाबंदी लगाने की मांग कर रहे हैं.

हो सकता है मेरा विश्लेषण सही हो, लेकिन मुझे ख़ुद ही ग़लत लग रहा है, आपको क्या लगता है?

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