शर्म तुम को मगर नहीं आती
सुना है कि शाहरुख़ ख़ान सफ़र की तैयारी कर रहे हैं, शिवसेना ने उन्हें पाकिस्तान जाने का फ़तवा जो सुना दिया है!
उनकी हिमाक़त तो आपको मालूम ही होगी. उन्होंने अपनी नादानी में ये कह दिया था कि दुनिया में क्रिकेट के सबसे बड़े तमाशे आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल न किया जाना ग़लत था.
और बॉलीवुड के दूसरे स्वयंभू 'अहमक़' और सुपरहिट फ़िल्म 'थ्री ईडियट्स' के स्टार आमिर ख़ान ने भी यह साबित कर दिया कि व्यावहारिक जीवन में भी वह अहमक़ ही हैं.
उनका बयान भी आपने सुना ही होगा कि खिलाड़ियों को किसी टीम में शामिल करते वक़्त उसकी योग्यता देखनी चाहिए, राष्ट्रीयता नहीं, है ना बेतुकी बात?
आपको शायद शिवसेना की बात ग़लत लग रही होगी, लेकिन काफ़ी सोचने समझने के बाद मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि ये सब एक ग़लतफ़हमी का नतीजा है जो शायद अनुवाद की ग़लती से पैदा हो गया है.
मुंबई पर हमलों के तुरंत बाद भारत सरकार ने बार बार ये कहा था कि उन हमलों में पाकिस्तान की धरती से 'स्टेट ऐक्टर्ज़ और प्लेयर्ज़' शामिल थे. शिवसेना वाले बेचारे बिलावजह शुतरमुर्ग़ की तरह अपना सर रेत में छुपाए रखने के लिए बदनाम हैं. वह शायद ये समझे कि सरकार पाकिस्तानी अदाकारों और खिलाड़ियों की तरफ़ इशारा कर रही है!
ये तो राज़ किसी से छुपा नहीं है कि शिवसेना वाले सबके सब देशभक्त हैं. बस सरकार को ज़रा शब्दों का सही चुनाव करना चाहिए!
और हां शाहरुख़, आप भी ज़रा सोच समझ कर बोला कीजिए. पूरे देश में आपने पोस्टरों पर छपवा रखा है माइ नेम इज़ ख़ान. क्या आपको मालूम नहीं शिवसेना को इस प्रकार का घटिया प्रदर्शन बिलकुल पसंद नहीं? इसी लिए शायद वह आप की फ़िल्म के दिखाए जाने पर भी पाबंदी लगाने की मांग कर रहे हैं.
हो सकता है मेरा विश्लेषण सही हो, लेकिन मुझे ख़ुद ही ग़लत लग रहा है, आपको क्या लगता है?

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ग़लत लग नहीं रहा, आपकी टिप्पणियाँ ही ग़लत हैं. आप शिवसेना का बचाव कैसे कर सकते हैं? जो लोग छिप कर हमको नुक़सान पहुँचाते हैं उनको तो हमने चरमपंथी कह दिया. लेकिन जो खुले आम कर रहे हैं उनको आप क्या कहेंगे.
सटीक व्यंग्य...
लगता है सुहैल भाई शिव सैनिकों से खुद ही डरे-सहमे हैं. उन्हें लगता हो कि उनके इस ब्लॉग पर शिवसैनिक कहीं उनकी मुखालफ़त न करने लगें, सो खूब धैर्य का परिचय दिया है. जाहिर है वह विरोध में लिखेंगे तो उन्हें भी इस्लामाबाद जाने को न कह दिया जाए. लेकिन मैं समझता हूँ ये स्थिति सुहैल साहब के लिए अच्छी ही होगी. उनके क़लम की धार कुंद नहीं होगी और तब वह वहाँ से उन्हें शिवसेना के आतंकी सैनिकों के खिलाफ़ खुलकर लिखने का मौका मिल सकेगा. रही बात बीबीसी की नौकरी की, तो भारत के बाहर से भी वह सुरक्षित रहेगी ही.
उस देश के साथ खेलने का सवाल ही नहीं पैदा होता जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवाद का साथ दे रहा है.
क्या ख़ूब लिखा है आपने और बहुत अच्छा सबक़ दिया है इन दोनों वर्गों को कि आज मुंबई में किसी को इंसानियत और समाज दोनों पर बोलने की इजाज़त नहीं है. हमारे मुल्क में जो खुला अंडरवर्ल्ड (शिवसेना) अपनी किसी भी तरह की ग़ुंडागर्दी को अंजाम दे सकता है और क़ानून एक तमाशा बन गया है इन लोगों के सामने. हम पूछते हैं कि सुप्रीम कोर्ट स्कूलों में बच्चों की दाढ़ी को लेकर फ़ैसला तो सुनाता है लेकिन बाल ठाकरे जैसे लोगों के बारे में कुछ नहीं करता.
माशाल्लाह सुहैल साहब, क्या सोच है आपकी. क्या ब्लॉग लिखा है आपने बिलकुल यही ज़रूरत है तमाचा मारने की. क्या हिंदुस्तानी होना गुनाह है. क्या इंसानियत की बातें करना गुनाह है. शिवसेना की नज़र में हर वह व्यक्ति देशद्रोही है जो मुल्क को जोड़े रखने की बातें करता है और जो धार्मिक उन्माद फैलाते हैं वे सब बड़े देशभक्त हैं. शिवसेना और माननीय बाल ठाकरे ही ने हिंदुस्तान की वफ़ादारी का ठेका लिया हुआ है. उनके अनुसार कोई भी भाईचारे की बात न करे और सिर्फ़ एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के मानने वालों को दुश्मन की नज़र से देखते रहें. भगवान के लिए नवयुवकों को इस तरह की सोच में मत बाँधो वर्ना यह खाई पटते पटते बहुत समय लग जाएगा और आने वाले समय में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर कीचड़ उछालेगा जो कि देश की एकता और अंखडता के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा. आज बहुत सख़्त ज़रूरत है कि हम सब इतने विस्फोटक मुद्दे पर आगे निकल कर काम करें और आने वाली युवा पीढ़ियों को महफ़ूज़ कर लें.
जी हाँ विश्लेषण तो गलत है लेकिन व्यंग्य बिलकुल सही है.शिवसेना की गुंडागर्दी के आगे आपका व्यंग्य थोड़ी और कड़वाहट बढ़ाता है. बहरहाल यह सच है क़ि भारत अब सिर्फ कुछ क्षेत्रीयतावाद के शिकार राजनेताओं का ही है यह हमें समझ लेना चाहिए.
बहुत खूबसूरत. सुहैल साहब ज़ुजे सरामागु की आपको याद होगी, उनकी पुस्तक ही अनुवाद की ग़लती से शुरू होती है. शुक्रिया.
शाहरुख खान को भी सोच-समझ कर बोलने की आवश्यकता है. उनको भारतीय जन-मानस की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए था. अभी तक पाकिस्तान ने ऐसा कोई क़दम नहीं उठाया जो हम उसके साथ खेलना-कूदना शुरु कर दें. आतंकवाद का खात्मा अभी भी क्रिकेट से अधिक जरुरी है. वॆसे शिव सेना के विरोध के तरीके का समर्थन नही किया जा सकता है.
सुहैल भाई आपने सच लिखा है. पर फिर बात समझ में नहीं आती के शाहरुख़ ख़ान एक टीम के मालिक थे तो क्यों नहीं उन्होंने पाकिस्तानी खिलाडियों को ख़रीदा. मैं समझता हूँ कि शिव सेना सही कर रहे हैं और कम से कम देश को नुक़सान पहुँचाने वाले तत्व के खिलाफ़ बोल तो कर रहे हैं. शाहरुख़ ख़ान ने मौक़ापरस्ती का उदाहरण दिया है.
मैं कहना चाहता हूँ कि अगर शिव सेना के लोग इतना ही मुंबई से प्यार करते हैं तो उसके साफ़ सफ़ाई पर कोई कार्यक्रम क्यों नहीं चलाता.
यह दुख की बात है कि हम राजनीति से प्रेरित बेतुकी बातों के आदी हो गए हैं. अब समय आ गया है कि इन जैसे नेताओं और संगठनों को बाहर का रास्ता देखना चाहिए.
पता नहीं हमारा देश कब तक शिव सेना जैसी पार्टियों के क्षेत्रवाद में फंसी रहेगी. ठाकरे परिवार के सभी सदस्यों को गिरफ़्तार कर उनपर मुक़दमा चलाया जाना चाहिए. क्या उनके उलटे-सीधे बयानों को अब भी हमारा लोकतंत्र बरदाशत करता रहेगा. मुझे ख़ुशी है कि भारत की जनता ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री चुना है और भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस जैसी समर्थित पार्टियों को बाहर रखा.
शाहरुख़ खान जी जो पाकिस्तानी खिलाडियों के न चुने जाने पे इतना बवाल मचा रहे हैं, कोई उनसे यह पूछे के जब टीम चुनी जा रही थी तो कहाँ थे? अब कोई पाकिस्तानी चुना नहीं गया तो उन्हें अचानक याद आया ओह हो मेरी एक फिल्म आने वाली है "माई नेम इज़ ख़ान". और वोह तो पाकिस्तानी भी बहुत चाव से देखना चाहेंगे तो चलो भैया पाकिस्तानी खिलाडियों के लिए कुछ बोल ही दें, और हो गया बवाल शुरू, शिवसेना तो खुद के सामने किसी को कुछ समझते नहीं. अब आप समझ लीजिए कौन कैसा है?
आपके इस लेख से मुझे आईके गुजराल की वो बात याद आई गई कि हम राजनीति में खेल करते हैं और खेल में राजनीति. अफ़सोस तो इस बात की है कि जो बाल ठाकरे खुद को कलंदर कहते हैं उम्र के इस पडाव पर भी नफ़रत की बात करते हैं. इस तरह के ग़ैर ज़िम्मेदाराना राजनीति से ठाकरे को फ़ायदा होता हो तो होता हो लेकिन कम से कम भारत का तो सिर्फ़ नुक़सान ही होता है. इसपर ग़ौर करने की ज़रूरत है.
आज शाहरुख़ ख़ान, आमिर खान, मुकेश अंबानी जो कह रहे हैं उससे वो शिव सेना की आंखों में खटक गए हैं. लेकिन बात यह है कि जब गिदर की मौत आती है तो वो शहर की ओर भागता है. लगता है कि शिव सेना ने मुसिबत को बुलाया है. मुझे नहीं तो पाकिस्तानियों से परेशानी है और न ही उनके लिए हमदर्दी है. लेकिन मैं मानता हूँ कि ऐसा माहौल पैदा नहीं किया जाना चाहिए कि घर को आग लग जाए घर की चिराग से.
बाल ठाकरे और राज ठाकरे जब मराठी मानुष की के लिए भारत को तोड़ने से परहेज नहीं करतो हैं तो अगर शाहरुख़ ख़ान और आमिर ख़ान ने कुछ बोल दिया तो उन्हें ऐतराज़ क्यों है.
आप ने सही लिखा है. हर देश अपनी तरक़्की की बात सोच रहा है. हर देश के लोग अपना नाम दुनिया में चमकाना चाहते हैं, लेकिन हमारे भारत के लोगों में ये बात नहीं दिख रही है. अगर हम भारत को बुलंदी पर ले जाना चाहते हैं तो हमारा मज़हब केवस 'भारत' होना चाहिए और घटिया राजनीति से किनारा करना चाहिए.
बाल ठाकरे के अनुसार महाराष्ट्र में दो इडियट्स हैं लेकिम मैं समझता हूँ कि राज्य में तीन इडियट्स हैं लेकिन उनका नाम उनके सुझाए नाम से अलग है.
बाला साहेब ठाकरे के अनुसार महाराष्ट्र में दो इडियट्स हैं. लेकिन मैं समझता हूँ कि महाराष्ट्र में तीन इडियट्स हैं. लेकिन नाम अलग है जो बाल ठाकरे कह रहे हैं. मैं इन इडियट्स से कहना चाहते हैं कि कुछ राष्ट्र सेवा करें और राजनीति नहीं करें.
मैं समझता हूँ कि मैं इस ब्लॉग से सहमत और असहमत दोनों हूँ. मैं बाल ठाकरे, उद्वव ठाकरे और राज ठाकरे का समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि वो कोई अच्छा काम नहीं करते और केवल विवाद को जन्म देते हैं. मैं नहीं समझता कि आजकल में राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के बारे में कुछ कहा है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब मुबंई हमला हुआ था उस समय फौज उत्तर भारत से गई थी और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मराठी कुछ नहीं कर सके. इस बार भी उन्होंने शाहरुख़ ख़ान को ग़लत मामले में लपेटा है और पाकिस्तान जाने के बात करना भी ग़लत है. शहरुख़ खान भारतीय हैं और शिव सेना को इस बात का अधिकार नहीं है कि वो किसी को देश से बाहर जाने की बात कहे. लेकिन मैं आईपीएल का इस बात के लिए समर्थन करता हूँ कि उन्होंने पाकिस्तानी खिलाडियों को नहीं लिया है. मैं सुहैल साहब से भी कहना चाहते हैं कि मामले को ग़लत ढंग से नहीं पेश करना चाहिए.
इस विवाद पर टिप्पणी करना बकवास में शामिल होना है.
सबसे पहले तो आपको अपने तथ्यों की जांच करनी चाहिए. भारत सरकार ने कभी नहीं कहा कि मुंबई हमलों में 'नान स्टेट एक्टर्स' का हाथ है, यह अमरीकी सरकार का कथन था.| भारत सरकार का नहीं. पता नहीं बीबीसी हिंदी आजकल किस-किस को ब्लॉग लिखने को कह देती है.
सुहैल साहेब के लिखने का अंदाज़ मुझे बहुत अछा लगा , इसको कहते हैं "जूता मरो लेकिन भीगा के"
भाई साहब यह शिवसेना का काम क्या क्या है? आप लोग कोई बता सकते हैं ?
अरे मेरे भाई मैं बता ता हूँ, जब से मैं शिव सेना का नाम सुना है तब से लेकर आज तक इन्हों ने कितना बड़ा बड़ा प्रोजेक्ट किया है आप लोग को मालूम है के नहीं , मैं बताता हूँ
1. ग़रीबों को सताना
2. होटल, बार, कैफे को नुकसान पहुँचाना
3. कोई भी ऐसा काम करना जिनसे उनकी शोहरत हो ,
4. सेलिब्रिटी को तंग करना ,इत्यादि ,,इत्यादि ......
इनसब के अलावा शिव सेना ने क्या ही क्या है ?
भाई मेरे शिवसेना को माफ़ करो और अपने बारे में सोचो, देश के बारे में सोचो , इस शिव सेना का कुछ होने वाला नहीं है.
वाह हलीम साहब! मंदिर मे बिना नमाज़ पढ़े ही राम को खुदा का नाम दे दिया. व्यंग बाण का ऐसा विरोधाभास पढ़कर अच्छा लगा,
बाल ठाकरे सरीखे लोग, पाकिस्तान से तो नफ़रत करते हैं, लेकिन उसी पाकिस्तान के समाज की तरह कट्टरपंथी, और असहिष्णु हैं. सबसे पहले तो इनका ही टिकट कराना चाहिए पाकिस्तान का. शाहरुख और आमिर ने कुछ भी ग़लत नही कहा.
अच्छा व्यंग किया है आपने. बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे लोग आतंकवादियों से भी कही ज्यादा खतरनाक हैं...लेकिन सरकार इनपर कोई ठोस कार्यवाही नहीं करती...वस्तुतः 'राष्ट्रीय जनसुरक्षा अधिनियम' जैसे कानून इनके जैसे लोगो से निपटने के लिए ही होना चाहिए...लेकिन सरकार इसका प्रयोग किसानों, मजदूरों, आदिवासियों आदि के खिलाफ तो कर सकती है लेकिन जो सचमुच में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है उसे कोई कुछ नहीं कर सकता. क्या यही कानून का शासन है?
"मुंबई पर हमलों के तुरंत बाद भारत सरकार ने बार बार ये कहा था कि उन हमलों में पाकिस्तान की धरती से 'नान स्टेट ऐक्टर्ज़ और प्लेयर्ज़' शामिल थे. "....यहाँ आप गलत हैं. ये बयान पाकिस्तान के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री का था. भारत सरकार ने शुरू से ये कहा है कि इन हमलों में पकिस्तान का सरकारी तंत्र शामिल है, जिसे पाकिस्तान ने इनकार किया है. रही बात खेल और खिलाडियों की, तो एक मुसलमान होने के नाते आपका भी दर्द समझा जा सकता है. आप जैसे लोगों के अनुसार हमें पाकिस्तानियों को हर सहूलियत देनी चाहिए भले ही वे हमें "हज़ार जख्म देने" के अपने एजेंडे पर कायम रहें.
क्या बीबीसी आजकल भारत में मुसलमानों की रहनुमा बन गई है? तथ्यों की जांच किए बिना आप किसी का ब्लॉग कैसे लोगों के सामने रख सकते हैं? वुसतुल्लाह ख़ान क्या कम थे पकिस्तानपरस्ती के लिए, जो इन साहेबान को आप ब्लॉग पोस्टिंग के लिए पकड़ लाए. आश्चर्य होता है कि भारत में होने वाली इन छोटी मोटी घटनाओं पर आप ब्लोग की एक श्रृंखला ही चला देते हैं, पर इस्लामिक आतंकवाद, जिससे सारी दुनिया त्रस्त है, उसपर चुप्पी? बीबीसी हिंदी पर इस तरह की सामग्री से आप एक वर्ग विशेष को तो अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं, पर इस वजह से कही आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह न लग जाए? फिर क्या फर्क रह जाएगा आपमें और "स्वयंभू सेकुलर" भारतीय समाचार चैनलों में?
मैं समझता हूँ कि आरएसएस और एमएनसएस का वही हाल होगा जो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का हुआ है.
आपने बहुत अच्छा लिखा है लेकिन बाल ठाकरे की बकवास को फतवा न कहें. इससे फतवे का अपमान होगा.
शाहरुख़ के देशप्रेम पर कोई शक नहीं लेकिन व्यापारी को तो व्यापार करना है. व्यापारी की देशभक्ति पर उंगली उठाने वाले लोग भी हैं. सब खेल अपने-अपने मुनाफे का है. कहते हैं न कि बहते दरिया में हाथ धोना. अरे साहब यहाँ तो बहते पानी से लोटा भरकर उस पर देश प्रेम (मुंबई प्रेम) की मुहर लगाकर बेचने की फ़िराक में हैं यह व्यापारी. शर्म कैसी? अरे व्यापार में सब जायज़ है.
शेर जब बूढ़ा हो जाता है तो बौखला जाता है. उसे अपने हाथों से शक्ति, धन और सत्ता खिसकती नज़र आती है. समाज में अपना वस्चर्व बनाए रखने के लिए, वह कोई भी हरकत करने के लिए उतारू हो जाता है. इसे कहते हैं सनकी हो जाना. बूढ़े शेर का जो हाल जंगल में होता है वह सबको पता है. मौका मिलने पर गीदड़ भी उसे छेड़ने लगते हैं. यह दौर ठाकरे साहब का शुरू हो गया है. इस बात को वे बहुत अच्छी तरह समझ रहे हैं. सब कुछ ही दिनों की बात है. हर दीया बुझने से पहले भभकता है.
मराठी को रटने वाले जब ख़ुद बाहर का है तो उसे यह सब करने का कोई अधिकार नहीं है.
मुझे लगता है कि ' 3 इडियट्स' की कहानी इन्हीं तीनों पर होनी चाहिए थी जो मुंबई को बर्बाद कर रहे हैं.
इस देश को तीन चीजें बर्बाद कर रही है - 1. क्रिकेट 2.राजनीति 3. सिनेमा. इस से दूर रहना ही बेह्तर है, इस बार तो तीनों ही बुरी तरह उलझी है. रही बात पाकिस्तान की, उससे जितना दूर रहो अच्छा है. और जहाँ तक शिवसेना का सवाल है वो अधिक देर तक नहीं चलने वाला है.
अरे भाई साहब भारत को जिन लोगों ने आज़ाद करवाया ये शिव सेना या भारतीय जनता पार्टी उन्हें भी आतंकवादी बताते हैं. आज़ादी की लड़ाई में अधितर फांसी पर लटकने वाले सिखों को देशभक्त नहीं मानते. तो बेचारे शाहरुख़ को कैसे मांगे. लोकतंत्र ने इन नेताओं को हीरो बना दिया है.
सुहैल हलीम जी आपने तमाचा तो मारा है मगर प्यार से.
जनाब आपकी टिप्पणी में सटीकता नहीं है. टिप्पणी कभी भी सुकून से की जाती है. आपकी टिप्पणी में नफ़रत भरी है. यह तारीफ़ के काबिल नहीं है.
लगता है बात लग गई है.