मायावती और मूर्ति प्रेम
पार्कों में क़तार में खड़े पत्थर के हाथियों की सूँड या पूँछ 'मनुवादी गुंडे' तोड़ सकते हैं और उनकी रक्षा के लिए 'बहनजी' अपनी पुलिस पर भरोसा भी नहीं कर सकतीं.
जब दो हज़ार करोड़ की लागत से स्मारक बनाए गए हैं तो उनकी हिफ़ाज़त पर महज 53 करोड़ रुपए ख़र्च करने में क्या बुराई है? 'दलितों के आत्मसम्मान' के मायावती के तर्क और 'अरबों के आत्मसम्मान' के सद्दाम के नारे में फ़र्क़ दिखना बंद हो गया है.
ज़्यादातर मामलों में सद्दाम और मायावती की तुलना नहीं हो सकती लेकिन जीते-जी अपनी मूर्तियाँ बनवाने का शौक़ दोनों में एक जैसा दिखता है.
अपनी मूर्तियाँ लगवाने की गहरी ललक के पीछे कहीं एक गहरा अविश्वास है कि इतिहास के गर्त में जाने के बाद शायद लोग याद न रखें. मगर शख़्सियतों का आकलन इतिहास अपने निर्मम तरीक़े से करता है और उसमें मूर्तियाँ नहीं गिनी जातीं.
सोवियत संघ के विघटन के बाद क्रेमलिन में धड़ से टूटकर गिरा हुआ लेनिन की मूर्ति का सिर हो या फ़िरदौस चौक पर जंज़ीरों से खींचकर गिराई गई सद्दाम की मूर्ति, ये इतना तो ज़रूर बताती हैं कि उनके ज़रिए बहुत लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज नहीं किया जा सकता.
कहने का ये मतलब नहीं है कि मायावती की मूर्तियों के साथ भी ऐसा ही होगा या ऐसा ही होना चाहिए, मगर वे शायद ये नहीं समझ पा रही हैं कि ज्यादातर मूर्तियों की वर्ष के 364 दिन एक ही उपयोगिता होती है-- कबूतरों और कौव्वों का 'सुलभ शौचालय', 365वें दिन धुलाई के बाद माल्यार्पण.
स्मारकों की रक्षा के लिए बनाए जा रहे विशेष सुरक्षा बल में चिड़ियों को भगाने वालों को भर्ती किया जा रहा हो तो बात अलग है.
वैसे सुना है कि उन्हें किसी ने चाँद पर ज़मीन का टुकड़ा भेंट किया है, वहाँ मूर्तियाँ लगवाने के बारे में उन्हें सोचना चाहिए क्योंकि वहाँ कौव्वे और कबूतर नहीं हैं.

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राजेश जी क्या ख़ूब कहा है आपने!
जातियों के आत्मसम्मान के पीछे अपने सम्मान की चिंता राजनेताओं को है. करीब 15 साल पहले बिहार में भी जातिगत समीकरण का नारा उठा था लेकिन उस सम्मान ने बेरोज़गारों की एक फ़ौज खड़ी कर दी और रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन करना पड़ा. और फिर पिछड़े बिहार और ना जाने कौन-कौन उपमाओं को लोग झेल रहे हैं. इसी फ़ौज का एक हिस्सा मैं भी हूँ. आख़िर ये सम्मान हमें रोटी तो नहीं देती है. मूर्तियों और उसकी सुरक्षा के लिए मायावती जी को राज्यों के दलितों की समस्याओं के समाधान के बारे में सोचना चाहिए.
राजेश जी! अति तो हर चीज़ की बुरी होती है. आत्मसम्मान तो जनता के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान जैसी बुनयादी ज़रूरतों में निहित है. बाकी तुगलकी योजनायें कितनी कारगार होतीं हैं यह जग ज़ाहिर है. वैसे तो बहनजी ने गरीबों के लिए आशियाने भी अपने जन्मदिन पर कुछ मुट्ठीभर गरीबों को उपलब्ध करवाए हैं. लेकिन यह समझ नहीं आता कि यह सब खर्च गरीबों के आत्मसम्मान और पेट की आग पर क्यों भारी पड़ता आया है. हमारे नेता और जनता के हकों के प्रहरी परिपक्वता का परिचय क्यों नहीं देते. बेशक बहनजी ने बहुत अच्छे काम भी किए हैं और इन कार्यों को नकारा भी नहीं जा सकत. लेकिन लखनऊ के बाहर अति गरीबी की काली परछाईं घने कोहरे से कम नहीं है और तर्कवादियों पर नकारात्मक विषयों की सोच हावी रहना कोई नई बात नहीं है. वरन एक समय अपहरण ,लूट-पाट व् पकड़ जैसे शब्दों का अर्थ छोटे से छोटा सा बच्चा भी समझता था. अगर अटूट और सच्चे मन से एक स्वस्थ समाज की सरंचना की भावना हो तो एक प्रदेश की सरकार के पास जन-मानस के हृदयों में जगह पाने के लिए सदियों के लिए याद किए जाने के लिए पांच साल का अच्छा -खासा वक्त होता है. बात यहाँ सिर्फ बहनजी की ही नहीं बल्कि सब नेताओं को समझना चाहिए कि जनता में भगवान् बसता है और भगवान् का आदर हमेशा ही फलदाई होता है.
वास्तव में ये तानाशाही जैसा है. सद्दाम हुसैन से मायावती की तुलना सच्चाई के बहुत क़रीब है. उत्तर प्रदेश में सारा विकास लखनऊ के पोश कॉलनियों तक ही सीमित है. राज्य के दूसरे भागों की पूरी तरह से अदेखी की जा रही है. सड़क, परिवहन, बिजली, स्कूल और कॉलेजों का विकास रुक गया है. मुख्यमंत्री का इस ओर कोई ध्यान नहीं है. विकास की जो बात की जा रही है वो सबकुछ काग़ज़ों पर हो रहा है.
मैं श्री बलवंत सिंह जी को शुक्रिया अदा करता हूँ कि कम से कम किसी को तो इल्म है कि मायावती ने कुछ बेहतर भी किया है. वरना मीडिया में तो मायावती के विरुद्ध ही देखने को मिलता है जैसे श्रीमान प्रियदर्शी ने इस ब्लॉग में पेश किया है. मुझे ये नहीं समझ आती कि मीडिया की आँखें और ज्यादा ज़रूरी मुद्दों पर क्यों नहीं जाती. उदहारण के तौर पर: अभी अभी बाल ठाकरे बोल रहे हैं कि मुंबई पर ज्यादा हक मराठी लोगों का है, वो ये भी बोल रहे हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खिला कर देखो, टैक्सी के लिए परमिट लेने के लिए मराठी जानने की शर्त कहाँ तक लाज़मी है; क्या मीडिया का ध्यान महंगाई पर नहीं जाना चाहिए? क्यों रुचिका मामले में राठौर को बेल मिल गयी?
प्रियदर्शी जी आपने मायावती के एक स्पेशल फोर्स खोलने के पीछे जो पैसा खर्च होगा उसे तो बता दिया परन्तु आपने ये क्यों नहीं बताया की ऐसा करने से कुछ और लोगो को रोजगार भी मिलेगा जो इस मुद्दे का दूसरा पहलू है. इसके कारण कितने घरों को रोटी मिलेगी ये भी तो सोचना चाहिए था.
मायावती ने सद्दाम की तरह इंसानों को जानवरों की मौत नहीं मारा, और न ही मायावती ने १९८४ के दंगे करवाए थे, न ही धर्म के नाम पर मंदिर या मस्दिज की गरिमा को ठेस पहुंचाई और न ही मायावती ये कहती है कि उत्तर प्रदेश में केवल हिंदी भाषी के लिए रोजगार है या लखनऊ पर केवल उनका अधिकार है.
एकदम सटीक लिखा है राजेश जी. अपनी मूर्तियाँ लगाने के बदले मायावती जी को ऐसे काम करना चाहिए कि जनता ख़ुद उनकी मूर्तियाँ लगाए.
प्रियदर्शी जी, सारी बातों को दरकिनार करके आप अपनी जाति बताने का कष्ट करेंगे?
राजेश जी लेख बहुत अच्छा है और हक़ीक़त भी यही है. लेकिन जानवरों से रक्षा करने के लिए इंसानों की भर्ती करना कोई बुरी बात नहीं है, शायद इसी बहाने लोगों को रोज़गार तो मिलेगा. फिर जब सरकार बदल जाएगी तो यही सब इंसान एक बार फिर बेरोज़गारों में शामिल हो जाएंगे. दुख इस बात का है कि पूरे देश को मालूम है कि ये बेईमान नेता कभी भी ग़रीबों का भला नहीं कर सकते हैं फिर भी जनता उनके पीछे और उनके गुण गान करती है. सच है कि एक दिन इन सब मूर्तियों का हाल सद्दाम हुसैन की मूर्तियों की तरह ही होगा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.
क्या ख़ूब कहा है!!!!!!!
राजेश जी, आपने बहुत सटीक ब्लॉग लिखा है और मायावती जी की इससे अच्छी कोई तुलना नहीं हो सकती. अगर आज उत्तर प्रदेश में सड़कें नेहरू जी या शास्त्री जी के ज़माने से ऐसी ही हैं तो क्या, लेकिन गुजरात में अमरीका जैसी सड़कें हैं तो क्या.
अगर पानी और बिजली थोड़ी देर के लिए मिलेगी, तो इसमें भला मायावती जी का कोई दोष है. वो तो सिर्फ़ जाति के नाम पर राजनीति करेंगी. पता नहीं राजनीति वाली ये गाड़ी फिर मिले या ना मिले. तो क्यों नहीं सारे निजी काम इस बार में ही निपटा लिए जाए.
अगर यही हाल रहा, तो उत्तर प्रदेश विकास से अछूता प्रदेश न कहलाया जाए, इसमें मुझे कोई शक नहीं. अगर सरकारी नौकरी के अवसर प्रदान करने का यही सबसे बढ़िया रास्ता है तो फिर पूरे भारत देश में उनकी मूर्ति लगवाकर जनता का भला करवा दीजिए. राजेश जी भी ख़ुश और जनता भी ख़ुश.
अगर काग़ज़ के नोट मिलने से अर्थव्यवस्था चलने लग जाए, तो फिर नोट छापने की मशीन भी मायावती जी के हाथ लगवा दीजिए.
क्या नीरज कुमार जी आप भी हद करते हैं? क्या रखा है इन सबमें.
जात न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान.
मोल करो तलवार का पड़ी रहने दो म्यान.
मायावती के एक स्पेशल फ़ोर्स गठित करने के पीछे जो पैसा ख़र्च होगा उसे तो बता दिया, लेकिन आपने ये क्यों नहीं बताया कि ऐसा करने से कुछ और लोगों को रोज़गार भी मिलेगा जो इस मुद्दे का दूसरा पहलू है. इसके कारण कितने घरों को रोटी मिलेगी.
ये बिल्कुल सही बात लिखी है राजेश प्रियदर्शी जी. अपनी मूर्ति अपनी ज़िंदगी में वही लगता है, जिसको डर हो कि उसके जाने के बाद उसको कोई याद नहीं करेगा. वैसा सद्दाम हुसैन ने किया और वही अब मायावती जी कर रही हैं.
मायावती की तानाशाही कब तक चलेगी. उत्तर प्रदेश को लूटकर जेबें भरी जा रही हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि जो जनता आपको आगे ले जा सकती है, वही आपको पीछे भी कर सकती है.
क्या ख़ूब लिखा है. अच्छी राय है. हम भी आपसे सहमत हैं.
राजेश जी, मायावती सद्दाम हुसैन का नहीं बल्कि कांग्रेस का अनुसरण कर रही हैं. क्या आप ये आँकड़े उपलब्ध करा सकते हैं कि देश के कितने पार्क, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक जगहों पर नेहरू और गांधी परिवार के लोगों का दबदबा है? मूर्तियाँ और सार्वजनिक जगहों के नाम तय करना हमेशा राजनीति का हिस्सा होता है. मायावती तो इस पुराने खेल की नई खिलाड़ी हैं.
नीरज जी, मैं जाति का पंडित हूँ लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं मायावती के किए गए कामों की समीक्षा करने का अपना मौलिक अधिकार खो देता हूँ, जो उत्तर प्रदेश का नागरिक होने के नाते मुझे है.
मायावती अपनी मूर्तियों पर दो हज़ार करोड़ ख़र्च कर रही हैं. अगर मायावती सही हैं तो यदि अगली सरकार में मुलायम सिंह आते हैं और यही काम वो करते हैं तो वो भी सही होगा. उनके भी ज़रिए भी किए जाने वाले मूर्ति निर्माण से लोगों को रोज़गार मिलेगा. और देश के सबसे बडे राज्य के विकास के लिए यह नुस्खा कामयाब हो जाएगा. मैं समझता हूँ कि दुनिया में किसी व्यक्ति या शासक क पास घटिया नुस्खा नहीं होगा.
मायावती को मेरी सलाह है कि उन्हें अपनी मूर्ति उत्तर प्रदेश के सभी मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों में रखने की कोशिश करनी चाहिए.
मायावती जी एक सुझाव ये भी हो सकता है कि अपनी मूर्तियों के साथ कुछ सिपाहियों की मूर्तियाँ भी बना के बगल में लगा दे जैसा कि चीन के प्राचीन शासक करते थे. यदि दो हजार करोड़ रुपए खर्च करके गरीबो, दलितों, और किसानो के घर बना दे या इनको पाँच हजार रुपए प्रत्येक परिवारों को बिना ब्याज के ऋण दे दें तो सदियों तक आपका नाम रहेगा चाहे मूर्ति रहे न रहे. रही बात कांग्रेस और गांधियों की, तो सबको पता है कि कोई मजबूत विपक्ष कभी टिका नहीं इनके सामने इसीलिए जिसकी लाठी उसकी भैस. जैसा कि आजादी के महान नेता सिर्फ कांग्रेस के है और जो मर गए उनका नाम सरकार को याद भी नहीं आता. उदहारण के तौर पर लाल, बाल, पाल, सुखदेव, राजगुरु, नेताजी, भगत सिंह जैसे जाने कितने ही देशभक्तों के जन्म दिन कितने लोगों को पता है, मीडिया के तो क्या कहने!!! पत्रकारों को बुद्धिजीवी कहा जाता था लेकिन मास कोम्मुनिकेसन का कोर्स करके हर चौथा नौजवान बुद्धिजीवी बन जाता है और ऐसे में कोई खबर देता नहीं, खबर बनाके टाइम खा जाता है और फिर टाइम खाने के लिए नया खबर बनाने चल देते है, कल के लिए फिर 24 घंटे का न्यूज़ जो बनाना है. कहने का मतलब आज के दिन का न्यूज़ आज के लिए कल फिर न्या न्यूज़ और कुछ नहीं मिले तो बिल्ली छत से गिरकर भी नहीं मरी!!! राष्ट्रीय समाचार चंनेलो पर ऐसे न्यूज़ दिखाकर समय खाते है आज के बुद्धिजीवी पत्रकार. लेकिन दलितों, किसानो, मजदूरों की किसी को फिक्र नहीं, मै एक किसान का बेटा हूँ, हमने गेहू 975 रुपए क्विंटल मई 2009 में मुश्किल से बेचा, अक्टूबर 2009 से आटा 20 रुपए किलो है !! बीच में कौन है जो 10 रुपए प्रति किलो बढ़ा देता है. नौकरी वालों को क्या बारिश हो या तूफान महीने के अंत में वेतन तो मिलना है, महंगाई है तो क्या आधा पेट ही सही खाने को तो मिलेगा. लेकिन किसान का क्या, बीज खाद, दवाई महंगी हो जाती है और बारिश कम या ज्यादा हो गई तो भूखे ही रहना पड़ता है और जो रह नहीं पाते वो सुसाइड कर लेते है और राहुल गाँधी एक दिन कहानी बताकर छा जाते है और उस किसान की विधवा कलावती और बच्चे आज भी वैसे रहते है.
इसीलिए अगर मायावती एक पुलिस बल बनाना चाहती है तो बनाओ लेकिन उसमे केवल ग़रीब, दलित और किसानो के बेटो को नौकरी देती है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा, लेकिन ऐसे होने वाला नहीं मुझे पता है!! एक विनती है यदि आप सुनहले मूर्ति केवल हाथ कारीगरों से ही बनाना फैक्ट्री में नहीं कम से कम किसी एक गरीब कलाकार का ही भला हो जाए. जय हिंद
जो लोग उत्तर प्रदेश नहीं गए हैं या समाचारों के आधार पर ही राज्य के बारे में अपना विचार रखते हैं. उन्हें राज्य की सही हालत का अनुमान नहीं है. मायावती की जीत का सबसे बड़ा कारण उनकी पहली सरकार के दौरान गुंडा तत्व पर क़ाबू पाना था. लेकिन इस मसय मायावती को मालूम नहीं चल रहा है कि जनता क्या चाह रही है. मायावती को जनता के बारे में सोचना चाहिए.
राजेश भाई आपके इस ब्लाग मे कमेंट करने लायक़ कुछ भी नही है. पर इस पर किये गए कुछ टिप्पणी को पढ़ कर एहसास हो रहा है कि शायद अर्थशास्त्र कि किताबें फ़िर से लिखने का वक़्त आ गया है. मायावती जी कि मूर्तियों कि सुरक्षा के लिए बनाई गई फोर्स से लोगों को रोज़गार मिलेगा तो ऐसा ही आइडिया अब हमारी सरकार को भी अपनाना चाहिए.
कल के अखबार मे इश्तिहार दे दिया जाए कि सरकार दीवारों पर नारे लिख्नने के लिये भर्ती प्रारंभ कर रही है, हर घर से एक आदमी चुना जाए जो अपने ही घर की दीवार पर अपने प्रिय नेता के लिए ज़िन्दाबाद का नारा लिखे, जब भारत के सारे घरों और झोपड़ियों के बाहर नारे लिखने का काम पूरा हो जाए तो हर घर से दो लोगों को उन नारों की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाए ताकि कोई उन्हे मिटा न पाए, एक आदमी दिन मे पेहरा दे और दूसरा रात मे. हर एक का मासिक वेतन पांच हज़ार रुपए तय किया जाए.
देखिये यहां बैठे बैठे मैने भारत के 100 करोड़ लोगों के लिए रोज़गार का इंतज़ाम करवा दिया है, अब आप कहेंगे कि इन 100 करोड़ लोगो को देने के लिए हर माह 5 हज़ार बिलियन रुपए कहां से आएंगे .. उसका भी हल है, हर गांव और शहर मे एक काग़ज़ की फ़ैक़्ट्री और एक नोट छापने की मशीन लगाई जाएगी, जो लोग पेहरेदारी का काम नहीं करना चाहेंगे वो कागज़ के कारखाने और नोट छापने के काम मे भाग्य आज़मा सकते हैं. इस तरह भारत 100% रोज़गार वाला देश बन जाएगा.
जो लोग घर से बाहर निकल कर काम नहीं करना चाहते उनसे कहा जाए कि वो हर माह एक नोटबुक मे एक लाख बार अपने नेता का नाम लिख कर ज़िला कर्यालय मे जमा करें और अपना वेतन हासिल करें, और जब चारों और खुशहाली और समृद्धी हो और इन महान कामों के लिए 100 करोड़ भारतीय कम पड़ने लगें तो फ़िर हम वीज़ा जारी कर सकते हैं ताकी दुनिया मे जो देश मंदी और बेरोज़गारी के शिकार हैं वहां से लोगों को बुला कर उन्हे रोज़गार दिया जा सके.
इस साल अर्थशास्त्र का नोबल पुरुस्कार भारत को ही मिलेगा ये बात पक्की समझे. क्रेडिट दीजिएगा सुश्री मायावती और उनके जैसी सोच रखने वाले लोगों को..
नीरज जी आप उनकी जाति के बारे में क्यों जानना चाहते हैं. क्या 2010 में भी जाति कोई मायने रखती है. आप इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और इस तरह का विचार रखते हैं जोकि अफ़सोसनाक है.
नीरज जी मैं इस ब्लॉग की टिप्पणी से आश्चर्यचकित नहीं हूँ पर आपके ज़रिए उठाए सवाल से ज़ूरूर आहत हुआ हूँ. मैं नहीं समझता हूँ कि इस लेख को जाति से जोड़ा जा सकता है. हम सभी को भीम राव अंबेडकर पर गर्व है, लेकिन ऐसा उनकी जाति की वजह से नहीं बल्की उनके काम की वजह है.
मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि अगर संविधान निर्माण का काम अगर ऊँच जाति का कोई व्यक्ति करता तो क्या उनके काम को नकार दिया जाता. मायावती तथाकतिथ बहुजन की नेता हैं. लेकिन क्या वो अपनी ताक़ल और ऊर्जा का उपयोग उस समाज के विकास के लिए कर रही है? सच तो यह है कि वो मूर्तियाँ बना रही हैं. अगर वो बहुजन समाज के उत्थान के लिए काम करती तो हर कोई उनके काम की तारीफ़ करता. तब शायद मूर्ति बनाने का काम उनके प्रशंसक ख़ुद करते.
नीरज जी, आपने लेख लिखने के लिए राजेश जी की जाति पूछ कर अपनी जाति सबको बता दी.
भारत में चोर, उठाईगीरे, तस्कर और अपराधी हर शहर और कस्बे में मिल जाएँगे, और सभी जगह किसी न किसी की मूर्ति लगी हुई है और इन मूर्तियों की सुरक्ष में किसी को नहीं लगाया गया है. इनमे सें किसी भी मूर्ति को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है, ऐसे में मायावती की मूर्ति को कोई ख़तरा दिखाई देने की बात करना सही नहीं है. अपने जीते जी अपनी मूर्तियाँ लगाने के इस शौक़ का विरोध होना ही चाहिए क्योंकि यह जनता के पैसों की बर्बादी है.
अगर सवर्ण महापुरुषों की मूर्तियों, राजघाट-श्मशानघाट, हजारों मंदिरों आदि की सुरक्षा जायज़ है तो फिर दलित स्मारकों की सुरक्षा के लिए विशेष दस्ते का गठन पूरी तरह जायज़ भी है और अत्यावश्यक भी है. क्योंकि भारत में सदियों से पक्षपाती व चालाक लोगों ने शूद्रों, दलित महापुरुषों, महानायकों के साथ पक्षपात करके उन्हें वांछित सम्मान से वंचित रखा है, सिर्फ वही मानसिकता आज भी दलित हितों का विरोध करती है,जिसने वीर एकलव्य का अँगूठा कटवा लिया था.
क्या ख़ूब लिखा राजेश जी आपने, उसके लिए धन्यवाद. मायावती को चाहिए कि जो पैसा वह मूर्तियों पर लगा रही हैं उसे उद्योगों पर लगाएँ. जिससे उत्तर प्रदेश के लोगों को रोज़गार मिले और वे और कहीं काम करने न जाएँ.
राजेश जी, मायावती की तुलना सद्दाम हुसैन से करना आपकी अपरिपक्वता का परिचय देता है. जिस देश में पत्थर की मूर्तियाँ दूध पीती हैं, एक मिनट में हज़ारों ढोंग रचे जाते हैं. राजघाट, शांतिवन और शक्तिस्थल जैसे स्थानों की सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं तो जायज है. हो सकता है कि वहाँ ऊँचे नस्ल के कौवे और कबूतर रहते हों जिन्हें उड़ाने के लिए फ़ोर्स तैनात की जाती है. इसलिए आपको बुरा नहीं लगता. महोदय, बेहतर होगा यदि यही सवाल आप उन लोगों से करिए जिन्होंने इस परंपरा को जन्म दिया है. जरा उनको भी समझाइए जिनके दर्शन में ढोंग और आडंबर आज भी फल-फूल रहे हैं. रही बात राज्य की पुलिस द्वारा मूर्तियों की सुरक्षा करने की तो कल को आप जैसे लोग ही कहेंगे कि प्रदेश की सुरक्षा से ज्यादा ज़रूरी मूर्तियों की सुरक्षा है, इसलिए अपराध बढ़ रहा है. यहाँ प्रदेश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं किया गया है. आपको और आप जैसी मानसिकता रखने वाले लोगों से मेरा अनुरोध है कि आप लोग मिलकर आंदोलन करके संसद में यह क़ानून पास करवा दें कि देश में किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति की प्रतिमा नहीं लगाई जाएगी.
मुझे इस ब्लॉग की आखरी दो लाइनें बहुत अच्छी लगीं, ''आशा है कि मायावती जी ऐसा ही करें, अभी वहाँ कौवे और कबूतर ही नहीं इंसान (हम लोग ) भी नहीं रहते हैं. इससे आपको शांति और हमें भी आपसे निजात मिलेगी और पैसे भी बच जाएँगे. भले ही आप उत्तर प्रदेश का कुछ न कर पाई हों, पर इससे तो आप बहुत बड़ी देश सेवा कर पाएँगी.''
वाह रजेश जी आपने तो इतनी प्यार से खाल उधेडी है कि दर्द ही नहीं हो रहा है मगर क्या करे यह भी एक दौर है.
राजेश जी यहां आपके विचारों के ख़िलाफ़ नहीं लिखा जा सकता है. अपने बहुत अच्छ लिखा है.
इन नेताओं को इतनी बात समझ में नहीं आती है कि ये मूर्तियाँ भी आगे चलकर झगड़ा और ख़ून-ख़राबा करवाएँगी. फ़ोर्स बनाने से रोजगार मिलता हो तो देश के आधे से अधिक युवा अपराधी बन जाएँ और उन्हें संभालने के लिए आधे फ़ोर्स में चले जाएँ. इससे बेरोजगारी ख़त्म.
राजेश जी सवर्ण मानसिकता से प्रभावित हैं.
ज़ात न पूछो साधू की... प्रेम नाथ जी राजेश जी को सवर्ण मानसिकता से प्रभावित कहना आपकी मानसिकता की पोल खोल रही है. मायावती जी ने यूपी के विकास का जो रास्ता अपनाया है वह बहुत क़ाबिले तारीफ़ है. ऐसी ही मानसिकता की सोच के कारण आज हमें मुंबई से भगाया जा रहा है, क्या कभी आपने सोचा है इसके बारे में कि जिस देवरिया-कुशिनगर में पहले 13 चीनी मिल चलती थी आज गिनी चुनी ही चल रही है जिसके कारण वहां बेरोज़गारी बढ़ी है. क्या मायावती जी ने कभी इन ज़िलों के बारे में सोचा है. यूपी का बटवारा करके वह वेस्ट को बेस्ट पर पहुंचाना चाहती हैं. यूपी को तो राजनीतिक अखाड़ा बना रखा है.
राजेश जी लेख बहुत अच्छा है और हक़ीक़त भी है.