लड़कियों का एक दिन...
'हिंदी दिवस' और 'बालिका दिवस' में क्या समानता है?
यही कि दोनों कमज़ोर हैं, समाज की नज़रों में बेचारी हैं और इन पर तरस खाने और इनका ख़्याल रखने की ज़रूरत है.
भारत की राष्ट्रभाषा कमज़ोर है. भारत में देवी की पूजा करने वाले अपनी लड़कियों को निराश्रित और निस्सहाय बनने से नहीं रोक पा रहे हैं.
यह देश का दुर्भाग्य है या उसके कर्णधारों का,यह एक अलग बहस का मुद्दा है. आइए आज बात करें राष्ट्रीय बालिका दिवस की.
क्या इस तरह के दिवस या इस अवसर पर होने वाले आयोजनों से लड़कियों का कुछ भला होता दिख रहा है?
बड़े पैमाने पर गोष्ठियाँ, लड़कियों की दुर्दशा पर भाषण, उनकी स्थिति सुधारने को लेकर लंबे-चौड़े वायदे...कितने लोग याद रख पाते हैं?
एक क़िस्सा सुना था कि नेताजी की बीवी तैयार हो रही थीं और अपने घर काम करने वाली ग्यारह वर्षीया बच्ची को झिड़क रही थीं, "अरी कलमुँही, साड़ी पर जल्दी से इस्त्री कर...बालिका दिवस पर भाषण देने जाना है".
बालिका दिवस का औचित्य तभी है जब अपने आसपास कूड़ा बटोरती, चौराहों पर भीख मांगती, घरों में झाड़ू-पोंछा करती बालिकाओं की सुध लेने की ज़िम्मेदारी हम आप जैसे नागरिक उठाएँ.
और दूर क्यों जाएँ...क्या हमने पूरी तरह अपने घरों में बेटे-बेटी में फ़र्क़ करना छोड़ दिया है?
भारत का हरेक नागरिक एक-एक बच्ची की क़िस्मत संवारने की ज़िम्मेदारी भी लेले तो भविष्य में साल का एक दिन बालिका दिवस के रूप में मनाने की ज़रूरत महसूस नहीं की जाएगी.
और यह दिन मनाया भी जाएगा तो बालिका गौरव दिवस के रूप में...क्या आप इस काम में भागीदार बनेंगे?

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बालिका दिवस शब्द ही आम लोगों की लड़कियों के प्रति निरीह मानसिकता को दर्शाता है. वास्ताविकता इससे कहीं ज़्यादा कटु है. दिवस, भाषण, नारेबाजी ये सब एक ढकोसला मात्र है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर सिर्फ वादे किये जाते हैं. वास्तविकता यह है कि सरकार भी इसके लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठा पा रही है. आखिर जिस देश के धर्म और वेदों में नारी की पूजा होती है वहां इन दिवस को मनाना मात्र एक औपचारिकता भर लगती है.
एक क़िस्सा सुना था कि नेताजी की पत्नी तैयार हो रही थीं और अपने घर काम करने वाली ग्यारह वर्षीय बच्ची को झिड़क रही थीं, "अरी कलमुँही, साड़ी पर जल्दी से इस्त्री कर...बालिका दिवस पर भाषण देने जाना है".
बहुत अच्छा उदहारण दिया है आपने.....
सलमा जी, तक़रीबन हर घर में बालिका होती है. जिस घर में नहीं उसे लोग कुछ समय के लिए ख़ुशक़िस्मत भी मानते हैं. पर आगे चल कर बुढ़ापे में लड़के अलग हो जाते हैं तो यही लोग उस समय बेबस हो जाते हैं. उस समय सोचते हैं कि लड़की होती और भले ही वह अपने ससुराल में होती, मिलने ज़रूर आती. रही बात दिवस मनाने की तो यह तो हिंदी की बिंदी न हटे इसलिए उसे सुहागिन की तरह संजो कर रखने की झूठी कोशिश करना ज़्यादा सही होगा. इस तरह दिवस नहीं मनाएँगे तो नेताओं की नेतागिरी को विराम जो लग जाएगा.
सलमा जी, मुझे तो यह भी लगता है कि अगर बालिका दिवस पर सरकारी विज्ञापन में गड़बड़ी नही हुई होती तो बहुतों को बालिका दिवस की याद भी नहीं आती. क्या कहें इसे?
सलमा जी, बहुत शानदार लिखा है आपने. आज भी भारत में ही नहीं दुनिया में भी लड़कियों को लकड़े की तरह नहीं देखा जाता और व्यवहार भी वैसा नहीं होता. रहा सवाल बिना लड़की के, तो मेरे ख़्याल से माँ-बाप की ज़िंदगी जहन्नुम होती है. उन बदकिस्मतों में मैं ख़ुद भी शामिल हो क्योंकि मेरी भी कोई लड़की नहीं है. अगर आपकी नज़र में कोई बेसहारा लड़की हो तो मुझे बताइएगा, मैं उसकी पूरी ज़िम्मेदारी लेता हूँ. लेकिन अनाथाश्रम या कोई संस्था में नहीं. आपका ये लेख पीड़ा महसूस करवाता है.
बालिका दिवस तो महज़ औपचारिकता है. केवल दिखावा है. अगर वास्तव में इसके लिए पहल की जाती है तो साल में एक दिन को दिवस के रूप में मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
जब इस दुनिया में लड़कियाँ ही नहीं रहेंगी तो लड़के कहाँ से आएँगे. मैंने ख़ुद अभी एक बालिका गोद ली है और मैं बहुत ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ. मुझे उसे बहुत बड़ा बनाना है ताकि दुनिया कह सके कि यह राजेश की बेटी है. उसके आने के बाद हमारी ज़िंदगी सार्थक हो गई है.
बहुत खूब लिखा है सलमा जी, हास्यस्पद है न कि हिन्दी राष्ट्र भाषी होने के बाबजूद हमारे देश में हिन्दी दिवस मनाने की आवश्कयता पड़ती है. बालिका दिवस मनाने वालों की पोल तब खुलेगी जब इन्हीं के घरों में अगर सर्वेक्षण करवाया जाए तो 90 फीसदी से ऊपर आबोध बालिकाएँ ही घरेलू नौकरानियाँ मिलेंगीं. मुझे शब्बीर खन्ना जी के विचार बहुत सराहनीय लगे. काश, ऐसी सोच का मालिक हर कोई ज़रूरतमंद इंसान हो. एक साल पहले तक मेरा परिवार एक बेटी को तरसता था लेकिन आज मेरी तीन महीने की बेटी ने हमारी दुनिया ही बदल डाली है. सचमुच बेटियों के बिना कितना अधूरा होता है परिवार यह इन सालों में हमें समझ आया. मेरे एक क़रीबी रिश्तेदार के यहाँ बेटी क़रीह नौ महीने की थी, मैंने उन्हें कह रखा था कि अगर मेरे यहाँ बेटा होगा तो मैं आपसे बेटी ले लूँगा क्योंकि मेरा बेटा अब आठ साल का है, लेकिन तीन महीने पहले बेटी के रूप में प्यारी सगौत पाकर हमारा ख़ासकर मेरी पत्नी का जीवन बदल गया है.
जहाँ फूल वहां कांटे भी कुछ हद तक शायद औरत ही औरत की दुश्मन है | जब तक सास यह समझ ले कि वह भी कभी बहु थी और बहु यह समझ ले कि उसे भी एक दिन सास बनना है तो शायद यह खाई पट सकती है | मेरे आस -पास कुछ शिक्षाविद व् अन्य अभिजात्यवर्ग पड़ोसी हैं लेकिन इनके घरों में हमेशा से ही अवयस्क , अबोध बालिकाएं ही घरेलू नौकरानियां देखने को मिलती हैं | दीपक तले ही अन्धेरा है तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है | पिछले साल ही एक प्रदेश में सरकार व् समाज के ठेकेदारों ने गरीब कन्याओं के विवाह की बात को लेकर कौमार्य परीक्षण जैसी सोच को अंजाम दिया | इसलिए शायद हर आम व् ख़ास इंसान अपना सामाजिक कर्तव्य समझकर बालिका बचाओ जैसे विषयों को गंभीर बनाकर सफल बना सकता है |
क़ानून मंत्री जी, इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. कहाँ है मानवाधिकारी,कहाँ है खोजी मीडिया, क़ानून भी यही है? लगता यही है कि सरकार मीडिया को विज्ञापन देकर अपने कारनामें छुपाती है तो क़ानून मंत्रालय भी क़ानून दिवस पर हर साल हर ज़िले में, हर समाचार पत्र में यह विज्ञापन जारी करता है कि पैसों के अभाव में न्याय से कोई वंचित नहीं रहेगा और उसे क़ानूनी मदद भी दी जाएगी, तो क़ानून मंत्री जी ये कैदी जेलों में कैद क्यो हैं. यह तो संविधान के मूल अधिकारों के रक्षक हैं वे कैसे ग़लती कर बैठे. इन कैदियों के बाद आए और फैसले करा कर चलते बनें. ये लोग न्याय के इंतज़ार में आज भी बैठे हैं.
लड़कियों को अपना महत्व ख़ुद बताना होगा. अगर उन्हें कुछ बनाना है तो उन्हें बचपन से यह बताना चाहिए कि किसी के सामने न झुकें. लड़कियों को पढ़ाओं, लड़ना सिखाओ, चिल्लाना सिखाओ, आंखों में आंखें डालकर बातें करना सीखाओ. उन्हें यह सिखाओं की की कोई ग़लत इरादा दिखाए तो उससे कैसे निपटें. अब लड़कियों को ख़ुद ही बोल्ड और बहादुर बनना है.
जिस तरह हिंदी का लाल किला पर भाषण देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है ठीक उसी तरह लड़की की पूजा भी एक दिन के लिए होती है.
सलमा जी, मैं आपके लेख से पूरी तरह सहमत हू कि किस तरह आज भी 21वीं सदी में भारत में लड़कियों और महिलाओं को दोयम दर्जे का ही समझा जाता है. मैं आजकल चीन में हूं, इसलिए वहां का उदहारण देना चाहता हूं कि चीन में वाकई पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई अंतर नहीं है. महिलाएं भी हर वो काम करती हैं,भारत में सिर्फ जिनमें सिर्फ पुरुषों का ही एकाधिकार समझा जाता है. भारत और चीन भले ही साथ आज़ाद हुए हो, लेकिन चीन आज हमसे कहीं आगे निकल गया है. इसकी एक प्रमुख वजह महिलाओं की देश के विकास में बराबर की भागीदारी भी है. शायद भारत के नीति निर्धारक और समाज के ठेकेदार अपनी पुरुषवादी मानसिकता को छोड़कर चीन से कुछ सबक लेंगे. अन्यथा महिलाओं के साथ यू ही दोहरा वर्ताव होता रहेगा.
ये सब जो आपने लिखी खोखली बातें हैं. वास्तिकता में आपके घर में जो बालिका होगी, उसकी भी वहीं स्थिति होगी. शायद आपके घर में वैसी स्थिति न हो क्योंकि आप पत्रकार जो ठहरे लेकिन आपके ही नाते-रिश्तेदार की बेटियों की यहीं कहानी है. किताबी ज्ञान बघारना सबको अच्छा लगता है. हक़ीक़त इससे कोसो दूर है, सलमा जी.
शाहरुख़ ख़ान इस दुनिया में सबसे बेहतर है. उनका कोई सानी नहीं है. वे जितनी मदद ग़रीबों की करती हैं, उसे शायद कोई नहीं जानता है.