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टैक्सी चालक भी नहीं बन सकता!

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|शुक्रवार, 22 जनवरी 2010, 17:43 IST

मैं मुंबई में पिछले छह साल से रह रहा हूँ और मुझे ऐसा महसूस होता है यह शहर मेरा अपना शहर है. यहाँ की कई चीज़ें मुझे काफ़ी अच्छी लगती हैं, जिनमें से एक यहाँ की काली-पीली टैक्सियाँ भी हैं. यह टैक्सियाँ मुंबई की ख़ास पहचान में से एक है. मैं इन टैक्सी चालकों को भी बहुत पसंद करता हूँ.

मैं उनकी ईमानदारी का लोहा मानता हूँ. मुझे याद है एक बार मैंने एक टैक्सी वाले का इंटरव्यू किया था. वो ग़रीबी में दिन गुज़ार रहा था, लेकिन उसने अपनी गाड़ी में जब एक बड़ा बैग पड़ा हुआ पाया तो उसे खोला तक नहीं और सीधे उसे जमा करने के लिए ठाणे के पुलिस थाने चला गया.

ठाणे में तब तक बैग का मालिक पहुँच गया था. वो काला बैग हीरों से भरा हुआ था. बैग का मालिक शहर का एक अमीर जौहरी था. जौहरी ने टैक्सी वाले को 25 हज़ार रूपए इनाम देने की कोशिश की, लेकिन उसने लेने से यह कह कर इनकार कर दिया कि यह उसका फ़र्ज था. हाँ उसने पुलिस के ज़रिए दी गई वो चिट्ठी ले ली जिसमें उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की गई थी.

वो टैक्सी वाला उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला था. मुंबई के अधिकतर टैक्सी चालक उत्तर भारतीय हैं. लेकिन अब उन राज्यों के लोग जो मुंबई में टैक्सी चलाने की ख़्वाहिश रखते हैं, उन्हें राज्य सरकार परमिट नहीं जारी करेगी. कारण साफ़ है मराठी भाषा की जानकारी और पिछले 15 सालों से राज्य के निवासी होने की शर्त.

इसके बाद मैं इस सोच में हूँ कि मुंबई में मैं एक टैक्सी चालक भी नहीं बन सकता.

लेकिन सवाल यह उठता है कि इन नियमों की ज़रूरत पड़ी ही क्यों?

यहाँ आम धारणा है कि यह एक राजनीतिक चाल है. ज़रा इस ख़बर पर ग़ौर कीजिए. 18 जनवरी को महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने यह एलान किया कि वो महाराष्ट्र में रहने वाले सभी परिवारों को चिठ्ठी भेजेंगे, जिसमें वो उनसे आम जीवन में मराठी भाषा का प्रयोग करने की अपील करेंगे. इस चिट्ठी को उनके कार्यकर्ता घर-घर जाकर पहुंचाएंगे. यह काम मराठी भाषा दिवस यानी 27 फ़रवरी को किया जाएगा .

यह सभी समझते हैं कि सरकार ने राज ठाकरे के इस एलान के दो दिनों बाद परमिट वाले नए नियमों का एलान क्यों किया.

यह एक ऐसा हथियार है जिससे कांग्रेस पार्टी राज ठाकरे और शिव सेना के क़िलों में सेंध लगा सकती है. एक मंत्री ने पार्टी को यही सलाह दी कि राज ठाकरे को मात देने के लिए उसकी ही चाल चली जाए.

अब तक राज ठाकरे मराठी भाषा के पक्ष में और हिंदी के ख़िलाफ़ जिहाद करते आए हैं अब कांग्रेस भी मैदान में कूद गई है

लेकिन कभी-कभी ज़्यादा चालाकी भी अच्छी नहीं होती. जैसा कि इस मामले में हुआ. अब मुख्यमंत्री सफ़ाई दे रहे हैं कि परमिट के लिए स्थानीय भाषा का जानना ज़रूरी है और मराठी की तरह हिंदी और गुजराती भी मुंबई की स्थानीय भाषा है.

मुझे चिंता सिर्फ़ उन दर्जनों मराठी दोस्तों की है और उन लाखों मराठियों की है जो भेदभाव के ख़िलाफ़ हैं और इस तरह की ख़बरों के बाद उन्हें मायूसी होती है. वो अपने राज्य से प्यार ज़रूर करते हैं, लेकिन पहले अपने देश से प्रेम करते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:25 IST, 22 जनवरी 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    ज़ुबैर साहब महाराष्ट्र सरकार के एलान के बाद कि आपका आहत होना उचित है, किसी का झंडा किसी का डंडा. तभी तो मुख्यमंत्री साहब दो ही दिनों में अपने ब्यान के बाद बैकफुट पर आ गए हैं. अब मुख्यमंत्री साहब यह कह रहे हैं कि यह फैसला राजनीति से परे है तो सबसे बड़ा सवाल भी यही है कि स्थानीय भाषा से क्या आशय था प्रदेशीय सरकार का? आखिर इस विशेष समय इस तरह के फरमान देने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? इस तरह की राजनीती कांग्रेस सरकार के राजनितिक दायरे में नहीं आती. और सबसे महत्वपूर्ण एक कांग्रेस प्रशासित प्रदेश में ऐसी घोषणाए जनमानस को कितना आघात पहुंचा सकती हैं यह केंद्रीय सरकार को भली भांति सोच लेना चाहिए. ताली हमेशा दो हाथों से बजा करती है.| कांग्रेसी हमेशा अपने निर्णयों को परिपक्वता के तराजू में तोला करते हैं और ऐसा हुआ भी है तो इस तरह से खुद को असुरक्षित समझकर गैर जिम्मेदाराना ढंग से पथ से भटकने की क्या ज़रुरत थी. इस तरह के कारनामें कांग्रेस का तरीका कभी नहीं रहा. अत: केंद्रीय सरकार को अपने प्रदेशीय नुमायांदों को यह अच्छी तरह से सिखाना चाहिए. हंस अगर हंस की ही चाल चले तभी ठीक लगता है.

  • 2. 20:28 IST, 22 जनवरी 2010 SRanjan, TCA Dholi, Muzaffarpur, Bihar:

    ये लोग भारत को मराठी जैसे क्षेत्रिय भाषा के नाम पर खंडित करना चाहते है, ये सब बीमार मानसिकता वाले लोग हैं. जो अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते है, सिर्फ़ मौके की तलाश में रहते हैं... पहले ठाकरे और अब कॉंग्रेस-एनसीपी सरकार ने ये नाटक अपने हाथ मे ले लिया है. टैक्सी तो एक बहाना है, अपनी गंदी मानसिकता दिखाने का. "हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दुस्ता हमारा!" इस वाक़्या की सच्चाई को कोई झुठला नही सकता. इस प्रकार की बीमार मानसिकता वाले लोगों का पूरे देश मे विरोध होना चाहिए. हिन्दुस्तान की अखंडता के लिए ये अलक़ायदा के समान घातक हैं, गर्व से कहो "जय हिंद, जय भारत!", हिन्दुस्तान अखंड है और रहेगा.

  • 3. 21:32 IST, 22 जनवरी 2010 GRIJESH KUMAR,PATNA(BIHAR):

    अब यह बात बिलकुल स्पष्ट हो चुकी है कि अगर राज ठाकरे जैसा कोई आदमी उत्तर भारतीयों पर अत्याचार करता है तो इसके पीछे किन लोगों का हाथ है? महाराष्ट्र में टैक्सी वही चला सकता है जो मराठी जानता हो ,यह ख़बर सुनकर तो मैं भी आश्चर्यचकित हूँ. और यह सुनकर तो और सकते में हूँ कि इसबार राज ठाकरे नहीं राज्य सरकार का बयान है. तो क्या यह नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने राज कि राह पकड़ ली है. और फिर यह सवाल भी उठता है कि क्या राज ठाकरे के कारनामों के पीछे राज्य सरकार का समर्थन प्राप्त था? संविधान में जब यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि कोई भी व्यक्ति देश में कहीं भी जाकर रह सकता है ,व्यापार कर सकता है तो मुझे यह समझ में नहीं आता कुछ लोग अपने आप को संविधान से ऊपर कैसे समझने लगते हैं? आज पूरा देश जातीयता, क्षेत्रीयता ,साम्प्रदायिकता कR आग में झुलस रहा है. लेकिन यहाँ सभी अपनी -अपनी राजनीति में लगे हुए हैं. और इन सब के पीछे अगर कुछ छुट जाती है तो वह है आम आदमी की बेहतरी, जिसका ठेका लेकर ये लोग कुर्सी पर बैठते हैं. आपकी चिंता जायज है. मैं आपकी बातों से सहमत हूँ.

  • 4. 22:25 IST, 22 जनवरी 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ज़ुबैर साहिब मेरे ख़्याल से वो दिन कभी भी नहीं आएगा जब आपको मुंबई में टैक्सी चलाने की ज़रूरत आ पड़े. लेकिन आपने काफ़ी सच लिखा है. ख़ासकर वो बात की ये कांग्रेसी वोट की चाल है. मेरे ख़्याल से कांग्रेस ने आजतक नारायण राणे के ही एजेंडे पर काम किया है. दुख की बात है कि जनता अबतक कांग्रेस को समझ नहीं पाई है.

  • 5. 00:19 IST, 23 जनवरी 2010 syed junaid akhter:

    यह एक राजनीतिक फ़ैसला है और इससे भारत का सौहार्द ही बिगड़गा.

  • 6. 06:50 IST, 23 जनवरी 2010 raj kumar chhabra:

    ज़ुबैर साहिब मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ और मैंने आपके ब्लॉग को पढ़ा है. लेकिन मैं कह सकता हूँ कि आपने झूठ लिखा है और ये बात मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ. आपने लिखा कि बैग का मालिक शहर का एक अमीर जौहरी था. लेकिन मैं यह यक़ीन नहीं कर सकता कि वो जौहरी टैक्सी से चल रहा था. अगर बाहरी जौहरी होता तो बात समझ में आती. अब या तो टैक्सी वाला लंबी-लंबी दे रहा है या आप......बुरा न मानना

  • 7. 08:32 IST, 23 जनवरी 2010 Roshanbhai wakhla:

    यह भारत के लिए दुख की बात है कि कुछ गंदे राजनेता ऐसी हरकत कर रहे हैं जिससे देश बरबादी की कगार पर जा सकता है. मैं समझता हूँ कि मराठी लोग इतने संकुचित मानसिकता के नहीं हैं. देश के अंदर कोई मराठी राष्ट्रवाद की बात करना सही नहीं है. मेरा मानना है कि इन गंदे राजनेताओं के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने की ज़रूरत है.

  • 8. 09:45 IST, 23 जनवरी 2010 संदीप द्विवेदी :

    आपने बिलकुल सही कहा है....देश के संविधान को भूल कर अपनी मनमर्जी चलने वाली राजनीतिक पार्टियों का भविष्य अंधकारमय है....

  • 9. 12:12 IST, 23 जनवरी 2010 GAUTAM SACHDEV, NOIDA:

    जुबैर अहमद साहब आपके आलेख को पढ़ते हुए एक बात का एहसास तो हो गया कि आप भी इस ओछी राजनीति से आहत हुए है. हो भी क्यों ना आप भी तो इसे देश के रहने वाले है. क्षेत्रवाद की राजनीति कों बढ़ावा देने वाले ये नहीं सोच पाते की पहले देश है और फिर राज्य. महारास्ट्र नव निर्माण सेना के अथक प्रयास कों अंजाम तक पहुंचाने में अब राज्य के मुख्यमंत्री भी अपने बयान से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते है. भारत देश के लोकतांत्रिक होने पर यह एक सवालिया निशान है. आखिर आम आदमी को राज्य ,भाषा, प्रांत और क्षेत्रीयता के बंधन में कब तक बांधते रहेंगे. क्षेत्र और भाषा के बन्धनों से मुक्त होकर ही हम देश के समग्र विकास की परिकल्पना कर सकते हैं.

  • 10. 12:23 IST, 23 जनवरी 2010 शशि सिंह :

    जब हमारे छलिया नेता ही हमारे भाग्य-विधाता हो जाएंगे तो ऐसा ही होगा. चाहिए तो ये कि इन देशद्रोही नेताओं को कड़ी सज़ा देनी चाहिए.

  • 11. 15:46 IST, 23 जनवरी 2010 Rajeeva Srivastava:

    ज़ुबैर साहिब मायूस न हों, आप राजनीति के धंधे में आने की क्यों नहीं कोशिश करते. इसमें प्रवेश के लिए कोई भी योग्यता या नियम नहीं है.

  • 12. 16:29 IST, 23 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    कहते हैं कि मुंबई एक आर्थिक नगरी है. जिसमें रहने वाले सभा काम करते हैं. तो मुझे यह सुन कर बड़ा ही अफ़सोस होता है कि भाषा पर राजनीति की जा रही है.

  • 13. 18:47 IST, 23 जनवरी 2010 Dharmesh Patel:

    हिन्दी न जानने वाले कितने मराठी टैक्सी में बैठने की क्षमता रखते है उस पर भी गौर करना पडेगा.

  • 14. 21:15 IST, 23 जनवरी 2010 Uday:

    ज़ुबैर साहब, अपने ही देश में इस तरह की बात पर कोई हंगामा नहीं होता तो फिर ऑस्ट्रेलिया में छात्रों और टैक्सी ड्राइवरों पर हमले होने पर इतना हंगामा क्यों.

  • 15. 00:25 IST, 24 जनवरी 2010 Narendra Kumar:

    राज ठाकरे देश को बाँट रहे हैं.

  • 16. 01:55 IST, 24 जनवरी 2010 Munshi Premachand:

    यह नेता कुछ कमज़ोर दिमाग़ वाले लोग है और अपने फ़ायदे के लिए गंदी राजनीति का खेल खेल रहे हैं. यह कोई बात नहीं है, महाराष्ट्र से बाहर भी तो मराठी बाहरी हैं. हमें इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि भारत एक राष्ट्र है.

  • 17. 03:55 IST, 24 जनवरी 2010 Manish Singh, New York:

    मैं सरकार के फ़ैसले से बहुत ही दुखी हूँ और यह सब गंदी राजनीति की वजह से हो रहा है. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि वो कैसे भूल गए हैं पहले हम भारतीय नहीं हैं? आप अच्छा लिख रहे हैं और मेरी गुज़ारिश है कि आप लिखते रहे और एक मजबूत भारत के निर्माण में योगदान देते रहे. यह हमारी मातृ भूमि है.

  • 18. 22:04 IST, 24 जनवरी 2010 Muzzammil Hayat, U.A.E:

    मुंबई को विकसित करने और इतना बड़ा औद्योगिक शहर बनाने में किन-किन का योगदान और बलिदान है यह एक लंबी कहानी है मगर मराठी मानस इस पर अपना हक़ समझता है. उत्तर भारतीयों पर मुंबई में हुए मराठी या कह लीजिए राज(नितिक) अत्याचार पर उत्तर भारतीय नेता मात्र निंदा से ही संतुष्ट हैं. क्या उन लोगों ने कभी गंभीर रूप से सोचने की कोशिश की कि हमारे अपने शहर भी मुंबई की तरह विकसित हो सकें ताकि वहां निवेश हो सके और अपने लोगों को रोज़गार मिल सके. फिर किसी उत्तर भारतीय को मुंबई जाकर अपना अभिमान खोना नहीं पड़ेगा और मराठा मानस अपना ढोल पीटते रह जाएंगे. जागो नेता जागो....

  • 19. 16:44 IST, 25 जनवरी 2010 umesh yadav:

    ज़ुबैर जी, मैं आपकी भावनाओं का आदर करता हूँ लेकिन एमएनएस पार्टी के प्रमुख इसे नहीं समझ पाते. सरदार पटेल ने भारत को संगठित किया था, गुजरात या अन्य किसी राज्य को नहीं. मराठियों को खलनायक के तौर पर पेश किय जा रहा है. भारतीय क़ानून बहुत कमज़ोर है. सरकार को राज ठाकरे के विरुद्ध कड़े क़दम उठाने चाहिएं.

  • 20. 21:53 IST, 25 जनवरी 2010 Santosh:

    हिंदी बोलने वालों को इतना ही दुख है तो वे अपने राज्य में जाएं और अपने नेताओं को बताएं कि सिर्फ़ निंदा करने के बजाए अपने राज्य को सुधारने की कोशिश करें ताकि किसी उत्तर भारतीय को अपना राज्य छोड़ कर आना न पड़े.

  • 21. 11:58 IST, 26 जनवरी 2010 Gentle:

    ये मुद्दा किसका है और किसने इसे शुरू किया. कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस सरकार राज ठाकरे को मौक़ा दे रही है.


  • 22. 14:31 IST, 26 जनवरी 2010 Akshay:

    यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित वक्तव्य है. कांग्रेस की राजनीति पूरी तरह से जाति, धर्म, क्षेत्र पर आधारित है. देश तोड़ने में इनका हाथ सबसे आगे है, ये देश को कमज़ोर कर रहे हैं. क़ानून सिर्फ़ जनता के लिए है, नेता तो क़ानून से ऊपर हैं. देश की अखंडता बहुत दिनों तक क़ायम नहीं रहेगी जब तक ऐसे नेता हम चुनते रहेंगे.

  • 23. 16:34 IST, 27 जनवरी 2010 Amit:

    दोस्तों, यह केवल राजनेताओं के लिए नहीं है. इस ब्लॉग पर आई टिप्पणियों में हम देख सकते हैं कि महाराष्ट्र से आईं कुछ टिप्पणियों में राज ठाकरे की निंदा की गई है. इसलिए अगर वहाँ के कुछ लोग ऐसे परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं तो नेताओं को भी कुछ बदलना चाहिए.

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