बाहर कुछ अंदर कुछ
जब से एक नाईजिरियाई अपने अंडरवियर में बारूद छिपा कर एक अमरीकी विमान पर सवार होते पकड़ा गया है उस के बाद से अमरीकियों ने हर एयरपोर्ट पर फुल बॉडी सर्च के लिए स्कैनिंग मशीन लगाने का फ़ैसला लिया है.
यह ख़बर सुन कर मुझे एक वाक़्या याद आ रहा है कि 1943 में जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था तो अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में तुरंत सैनिकों की भरती का कार्यक्रम शुरु कर दिया. कई शहरों की तरह लाहौर में भी किराए के एक टांगे पर लगे लाउड स्पीकर पर घोषणा शुरु हो गई कि सेना में भरती के केंद्र पर 18 साल से ऊपर के युवक इंटरव्यू के लिए आएं.
कामयाब उम्मीदवारों को अच्छा वेतन, मेडिकल सुविधा, मुफ़्त राशन, मुफ़्त वर्दी और विदेश यात्रा का अवसर मिलेगा और रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी.
उस ज़माने में युद्ध की वजह से बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा थी इसलिए युवक बड़ी संख्या में फ़ौजी भरती केंद्र पर जाने लगे.
एक फौजी डॉक्टर भरती केंद्र पर उम्मीदवारों की प्रारंभिक मेडिकल जांच कर रहा था. जब डॉक्टर ने एक युवक से कहा कपड़े उतारो तो युवक ग़ुस्से में आकर कहने लगा. तुसी लोग बाहर वर्दी, मुफ़्त राशन ते तनख़्वाह दी गल करदे हो ते अंदर कपड़े उतारदे हो.
मुझे फ़ुल बॉडी सर्च पर कोई आपत्ति नहीं क्योंकि मेरे पास भी वही कुछ है जो भगवान ने किसी भी यात्री को दिया है.
अमरीकी आप्रवासन अधिकारी ने यह भी आश्वासन दिया है कि फ़ुल बॉडी सर्च का रिकॉर्ड स्कैनिंग के तुरंत बाद डिलीट कर दिया जाएगा.
फिर भी मुझे डर है कि उन्होंने स्कैनिंग रिकॉर्ड डिलीट न किया तो मैं क्या करूँगा. अगर मैं अट्ठारह बीस साल का युवक होता तो मुझे इस की भी परवाह न होती कि अमरीकी मेरी बॉडी स्कैनिंग का रिकॉर्ड डिलीट करें या घर ले जाएँ.
मैं ख़ुशी ख़ुशी अहमद फराज़ की यह पंक्तियाँ गुनगुनाता हुआ फुल बॉडी सर्च की मशीन से गुज़र जाता कि
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
लेकिन 48 साल की उम्र में यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता. बल्कि मैं तो यह सोच कर कांप जाता हूँ कि किसी दिन अगर कोई चरमपंथी अंडरवियर के बजाए कहीं और बारूद छिपा कर विमान पर चढ़ गया तो फिर अमरीकी अधिकारी लाखों यात्रियों के साथ क्या क्या नहीं करेंगे?
मेरा यह डर सुन कर सर्जिकल दस्ताने बनाने वाले एक दोस्त ने कहा, तेरे मुँह में घी शक्कर...

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
वे कितने भी जाँच कर लें, जिनको जो करना है, वह तो करेगा ही. एक समय आएगा जब इनका रेकॉर्ड भी फ़ुल हो जाएगा. आज अमरीका के पास सबकुछ का रेकॉर्ड है चरमपंथियों का और सभी देशों का.
वुसत साहब, आपने जिस तरह अपनी साफ़गोई पेश की है, उसका अंदाज़ कुछ ऐसा है कि एक बार अपने बच्चे की पढ़ाई की बुराई सुनकर एक पिता से रहा नहीं गया और जा पहुँचा मैडम के पास ''मैडम जी, थोड़ी सी कोशिश आप करो और थोड़ी सी मैं करता हूँ, बच्चा तो निकल ही जाएगा. तो यह सिर्फ़ सोच का अंतर है. आप चरमपंथी हों या कुछ और अपनी कमी को छिपाने के लिए बॉडी सर्च का विरोध करेंगे, वरना ख़ुशी-ख़ुशी कराएंगे. उम्र भले ही कितनी भी हो. लेकिन इस मुद्दे को ग़ालिब की तरह बड़ी ही शालीनता के साथ लिखने के लिए बधाई.
आपकी टिप्पणी असलियत के दायरे में है.
वुसत साहब, मैं भी आपकी राय से इत्तेफ़ाक रखता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है की जो भी होता है इश्वर की मर्ज़ी से होता है, फिर आप क्या और मैं क्या? आख़िर कब तक ऐसे लोगों के कपड़े उतारे जाएँगे, वैसे भी जो लोग पश्चिमी सभ्यता को मानते हैं, उन्हें कोई शर्म नहीं है और होगी, लेकिन हमारे यहाँ ऐसा नहीं है, आज भी हमारे यहाँ एक आम लड़की अपने आप को ढका हुआ देखना पसंद करती है. जब-जब जो जो होना है, तब तब सो सो होता है.
मैं आप से पूरी तरह से सहमत हूँ. फुल बॉडी स्कैनिंग अधिकतर यात्रियों के लिए परेशानी का कारण है, चाहे उनका संबंध कहीं से भी हो. मेरे अनुसार अमरीका को अपने फ़ैसले पर एक बार विचार करना चाहिए.
ख़ान साहब ये अमरीका के अंदर का मामल है. ऐसा ही भय अगर आपको है तो उसके जहाज़ों में सफ़र करना क्या ज़रूरी है? और ज़रूरी है तो शर्म छोड़कर सबकुछ खुला रखें और जांच के लिए आगे बढ़ें.
ख़ान साहब आपभी इस उम्र में जवान दिखना चाहते हो और ये भी की कोई आपकी ओर आकर्षित हो.
मतलब ये हुआ कि जवान आदमी ख़ुशी ख़ुशी स्कैन करवा लेगा, वहीं बुज़ुर्ग डरेंगे?
ख़ान साहब बहुत ही अच्छा लिखा है. मेरा मानना है कि अमरीका को ख़ुद सोचना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों आई और इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. मेरा मानना है कि ऐसी जाँच से थोड़ा फ़ायदा तो हो सकता है लेकिन बीमारी से छुटकारा नहीं मिल सकता. मैं कहना चाहता हूँ कि अमरीका को इलाज ढ़ूँढना चाहिए.
ख़ान साहब सुरक्षा के इन जाँच नियमों पर आप सवाल उठा रहे हैं. लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यदि अमरीका जाँच के लिए विशेष तरीका आपनाना चाह रहा है तो वो उनकी पॉलिसी है. अगर किसी को उसपर आपत्ति है तो वो अमरीका नहीं जाए. लेकिन अगर आप या हम किसी देश में जाना चाहते हैं तो हमें वहां के क़ानूनों को सम्मान करना चाहिए. मेरी कंपनी में हमेशा लोगों की मदद से सुरक्षा जाँच को अंजाम दिया जाता है. हम लोगों को हमेशा जाँच के दौरान सुरक्षा अधिकारियों की मदद करनी चाहिए.
सुरक्षा जांच के लिए इस अति आवश्यक कदम का मखौल उड़ाना वो भी ढलती उम्र के नाम पर, आश्चर्य होता है. बेहतर होगा अगर आप अमेरिका की यात्रा का विचार मन से निकाल दें. यदि किसी कठमुल्ले ने ये आपत्ति की होती तो समझ में आता पर एक पत्रकार की ये प्रतिक्रिया? सोचने पर मजबूर करता है.
अगर आप सही है कि किसी प्रकार की जाँच प्रक्रिया से गुज़रना कोई मुशकिल नहीं है. मैं नहीं समझता कि धर्म इसमें रुकावट होंगे. अमरीका की कोशिश है कि बिगड़े हालात को सुधारा जाए. लेकिन लोग बेकरा की बात इस मुद्दे पर कर रहे हैं. आतकंवादी हमेशा मौक़े की तलाश में रहते हैं इसलिए ऐसा करना ग़लत नहीं है.
क्या ख़ान साहब 48 साल में भी आप इतने नटखट हैं? आज तो आपकी क़लम भी शरारत कर गई बातों ही बातो में. रही बात फुल बॉडी सर्च की तो इसमें घबराना क्या. जिसकी दाढी में तिनका वो डरे. जो मर्जी कर ले दुनिया लेकिन चरमपंथियों की दुनिया शायद हमारी दुनिया से हटकर सोचती है. हर बार नई सोच ,नए पैंतरे.
एक तरह से आप सही हैं और गलत भी...इतना है तो सफ़र करना छोड़ दीजिए. मुझ पर भारतीय होने के चलते ज्यादा चेक किया जाता है तो थोडा दर्द होता है, जानते हैं क्यों? क्यों कि सकल सूरत से मैं पाकिस्तानी भी हो सकता हूँ और अफगानी भी, तो क्या करूँ? अगर मेरे उपमहाद्वीप में समस्या है तो उसका मूल्य चुकाना हीं पड़ेगा. एक हिंदी कि कहावत भी सुन लीजिए 'जौ के साथ घुन पिसता ही है'...लेकिन अगर मेरे और तमाम निर्दोषों की सुरक्षा के लिए मशीन से गुजरना पड़े तो इतना बुरा भी नहीं है सौदा, मेरी नज़र में.
मुझे लगता है की फुल बॉडी सर्च स्कैनर का मतलब ये नहीं की आपकी फोटो बिलकुल वेसी आएगी जेसी किसी कैमरा से लेने के बात आती है, इस स्कैनिंग के बाद स्क्रीन पर एक द्वि-आयामी छवि आएगी जिसमे ये दिखेगा की आपके कपड़ो के अन्दर क्या है. यंहा तक की यह सिर्फ़ कंप्यूटर द्वारा तैयार एक चित्र होगा जो आपके शरीर से मेल तो खाए लेकिन किसी आदमी की पहचान नहीं की जा सकती. और एक बात और किसी भी देश को पूरा आधिकार है कि वो आपने देश में आने वाले लोगो की केसी जांच पड़ताल करना चाहता है जबकि कानूनन इसे मान्यता मिली है. आज के समय में जब आतंकवादियों के हमले इतने बढ़ गए हैं कि वो अंडरवियर में भी बारूद छुपा सकते हैं वो मैं सोचता हूँ कि अमेरिका कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहता. कोई भी देश आपनी धरती पर 9/11 या मुंबई हमला नहीं होने देना चाहेगा.
ये वुसतुल्लाह ख़ान अपनी घटिया लेखन कब बंद करेंगे समझ, मे नही आता और हाँ, बीबीसी को इन्हे ढोने की क्या मजबूरी है? इस लेख से तो यही लगता है कि इन लोगों को बम-बारूद के साथ आराम से कहीं भी जाने देना चाहिए. सही मे ख़ान के मन में कोई चोर है. हमारे देश में भी ये मशीन जल्दी ही लगेगा, वुसतुल्लाह ख़ान जैसे लोग अपनी कट्टर संगठन्नों के साथ इसका भी विरोध शुरू करेंगे, तो क्या इन्हें उग्रवाद फैलने की इजाज़त मिलनी चाहिए? अमरिका ही नहीं पूरी दुनियाँ मे अलक़ायदा जैसे उग्रवादी गिरोहों का ख़तरा है और सुरक्षा के लिए ये स्कैनिंग ज़रूरी है. हम सभी को इसमें सहयोग अवश्य करना चाहिए. ख़ान जी भी इसी ग्रह के प्राणी हैं तो इनके लिए भी यही रूल होगा, बस विकृत मानसिकता से बाहर निकालने की ज़रूरत है.