« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

भूख से मौत या गोली से?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 18 जनवरी 2010, 13:16 IST

बीबीसी के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जबकि दुनिया भर के लोग सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी को मानते हैं, भारत और पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी आफ़त आतंकवाद है.

ग़रीबी और आतंकवाद में यह समानता है कि उसका धर्म या मज़हब से कोई लेना देना नहीं है. ग़रीबी जब पैर पसारती है तो उसकी ज़द में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी आते हैं.

आतंकवादी की गोली भी इस मामले में कोई भेदभाव नहीं करती. बच्चे, बुज़ुर्ग, औरतें किसी को भी इससे निजात नहीं.

सर्वेक्षण के नतीजों से साफ़ जाहिर है कि भारत-पाकिस्तान की जनता ग़रीबी से लड़ने की हिम्मत तो रखती है लेकिन आतंकवाद ने उसका हौसला पस्त कर दिया है.

हालाँकि हाल में इस तरह के हमलों ने लोगों को एकजुट किया. उनमें घबराहट देखी गई लेकिन उन्होंने जम कर हालात का मुक़ाबला किया.

लेकिन यह भी सच है कि जनता को अब न सरकारी वायदों पर भरोसा है न सेना और पुलिस की बढ़ती मौजूदगी पर.

घर का कोई सदस्य रात गए घर न पहुँचे और उससे संपर्क न हो पा रहा हो तो परिवार के अन्य सदस्यों की साँसें अटक जाती हैं.

ग़रीबी अचानक हमला नहीं बोलती. आतंकवाद बिना कहे, चुपचाप सामने आता है.

ग़रीबी से मुक़ाबला करने की तैयारी की जा सकती है. बाज़ार या मेले में होने वाले चरमपंथी हमले से बचने के लिए कोई सिर पर हेल्मेट लगा कर या शरीर पर बख़्तरबंद धारण करके घर से नहीं निकल सकता.

ग़रीबी या भूख से मौत के क़िस्से भी सुने हैं.

लेकिन आतंकवादी हमले के शिकार जीते जी अपाहिज बने भी देखे जा सकते हैं.

और यह स्थिति मौत से भी बदतर है!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:21 IST, 18 जनवरी 2010 DHANANJAY NATH:

    सलमा जी, क्या ख़ूब कहा आपने. आम आदमी ही ग़रीबी से गोलियों से मारा जाता है. इतिहास गवाह है. एक तरफ़ ग़रीब तिल-तिल कर मार रही है तो दूसरी ओर आतंकवाद का दीमक खोखला करने को आतुर है. आख़िर आम आदमी कहाँ जाए.

  • 2. 16:24 IST, 18 जनवरी 2010 anil:

    मात्र एक प्रश्न है आप जैसे पत्रकारों से. यदि दुनिया में इस्लाम न होता तो क्या फिर भी आतंकवाद होता. यदि समाचारों पर विश्वास किया जाए तो दुनिया भर में धर्म के नाम पर रक्त बहाना अधिकतर इसी संप्रदाय के मानने वालों ने किया है.

  • 3. 16:55 IST, 18 जनवरी 2010 sandeep singh:

    सलमा जी, यहाँ तो ठंड, सूखे और बाढ़ से इतने मर जाते हैं जिसके आगे आतंकवाद बहुत पीछे ही छूट जाता है. जब इनसे ही नहीं लड़ पाते तो ग़रीबी और आतंकवाद को मिटाने के लिए सोच लीजिए कितनी बड़ी जंग लड़नी होगी.

  • 4. 17:29 IST, 18 जनवरी 2010 GRIJESH KUMAR,PATNA(BIHAR):

    यह सच है की लोग आतंकवाद से नफरत करते है ,इसलिए यह हो सकता है कि लोग उसे गरीबी से बड़ी समस्या माने|लेकिन असली समस्या तो गरीबी ही है. आतंकवादी तो खैर दूसरे मुल्क से आते हैं, वो कहीं न कहीं से भटके हुए रहते हैं इसलिए ऐसा करते हैं, लेकिन ग़रीबी तो इसी मुल्क से आकर इसी मुल्क के लोगों को डंसती है.|खासकर भारत में मुझे नहीं लगता की आतंकवाद बहुत बड़ी समस्या है. मुंबई हमला, अयोध्या राम मंदिर हमला, संसद पर हमला जैसे कुछ उदाहरण हैं जिसने भारत को हिला कर रख दिया है और चिंताएं बढाई हैं. लेकिन यह सब तो कभी -कभी लोगों की जान लेता है परन्तु ग़रीबी के कारण तो रोज लोग मर रहे हैं. |सलमा जी, असली भारत गांवों में बसता है. आतंकवाद ने कुछ शहरों को अपने कब्जे में ले रखा है लेकिन ग़रीबी से तो पूरा देश त्रस्त है. एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश में 90 फ़ीसदी लोग तो ग़रीब ही हैं. क्या यह सच नहीं है कि उड़ीसा में एक माँ अपने जिगर के टुकड़े को चाँद पैसे के लिए विवश है क्योंकि उसके पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं? पश्चिम बंगाल में किसान भूख के कारण मर रहे हैं? यह तस्वीर उस आज़ाद भारत की है जो विकसित राष्ट्र होने का सपना देख रहा है लेकिन उसे पूरा करने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है.
    आतंकवाद पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर समस्या है इससे इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में उससे भी बड़ी समस्या ग़रीबी है. ये ऑक्टोपस की तरह हमारा खून चूस रही है. आतंकवादियों के काम की तारीफ़ नहीं की जा सकती लेकिन ग़रीबी को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि ग़रीबी से ज्यादा लोग चपेट में हैं बजाए आतंकवाद के. और अगर भारत में चरमपंथी हमला होता है तो इसके लिए यहाँ की सरकार दोषी है और सुरक्षा तंत्र दोषी है. हम सभी जानते हैं की मुंबई हमला सरकार और सुरक्षा तंत्र की नाकामयाबियों की वजह से हुआ. इसे हौवा बनाकर पेश नहीं किया जा सकता. इसलिए अगर हमें आतंकवाद से लड़ना है तो भ्रष्टाचार को पहले खत्म करना होगा वरना हमारा विकास कभी संभव नहीं है. एक छोटा सा उदाहरण मैं देना चाहूँगा पूरी दुनिया लादेन के पीछे पड़ी हुई है लेकिन अभी तक नहीं पकड़ पाई है, दुनिया के किस हिस्से में धरती के नीचे तेल है यह अमरीका पता कर लेता है लेकिन लादेन कहाँ है यह पिछले 10 वर्ष में भी पता नहीं कर पाया. ऐसा इसलिए क्योंकि वह नहीं चाहता कि लादेन रूपी दानव समाप्त हो. क्योंकि कहीं न कहीं उसे लादेन से फायदा है. आज आतंकवाद इसलिए समाप्त नहीं हो पाया क्योंकि उसे समाप्त करने की सोची नहीं गई. इसलिए मेरा साफ़ मानना है कि पहली प्राथमिकता ग़रीबी मिटाना है.

  • 5. 17:45 IST, 18 जनवरी 2010 harish:

    आतंकवाद भारत और पाकिस्तान के लिए स्थायी समस्या जैसा रोग बन गया है जिसका इलाज दूर तक नज़र नही आता है. आतंकवाद के कारण दोनों देशो के समाजों में राजनैतिक. समाजिक और धार्मिक तनाव बढ़ रहा है.

  • 6. 18:29 IST, 18 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    ग़रीबी की समस्या का हल निकाला जा सकता है, लेकिन इसका समाधान करने वाले ईमानदारी नहीं बरतते हैं इसलिए भारत में ग़रीबी बनी हुई है. ग़रीबी से अचानक मौत नहीं आती. भारत में आतंकवाद पाकिस्तान के कारण पनपा है और वह इसकी टकसाल बना हुआ है. चरमपंथियों का मकसद खूनखराबा करना और लोगों में भय फैलाना. इसके कारण होता ये है कि मौत अचानक आ जाती है, और अगर आप अपाहिज हो गए तो ये मौत से भी बदतर है.

  • 7. 19:04 IST, 18 जनवरी 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमाजी बहुत शानदार लिखा है आपने. लेकिन दोनों भूख और गोली के लिए कौन ज़िम्मेदार है, बेईमान नेता और बेईमान सरकारें. मेरे ख्याल में गोली से मौत तो फिर भी ठीक है लेकिन भूख से तड़प तड़प कर इंसान को मारती है. मेरा मानना है कि यदि भूख ने लोग मरना बंद हो जाएं तो गोली से भी अधिकांश मौतें बंद हो जाएंगीं. मेरा एक अनुरोध और है कि गोली से मौतों को इस्लाम से न जोड़ा जाए क्योंकि ये मारामारी करने वाले इस्लाम को मानने वाले नहीं हैं. वे इंसानियत के दुश्मन हैं.

  • 8. 19:07 IST, 18 जनवरी 2010 harsh kumar:

    देखिए गरीबी और आतंकवाद दोनो ही खराब राजनीति की उपज है और इसे अच्छी और सकारात्मक राजनीति से ही ख़त्म किया जा सकता है. आतंकवाद उतनी बड़ी समस्या नहीं है. अगर मीडिया ने इसे इतना दर्शनीय नहीं बनाया होता. मुंबइ हमले को लाइव दिखाकर, आप लोगों के मन में डर नहीं तो और क्या भर रहे हैं. यदि आपने गरीबी की रिपोर्टिंग उसी तरह की होती तो शायद आज न तो गरीबी होती , न आतंकवाद.

  • 9. 19:53 IST, 18 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    ईमानदारी रखे तो इस समस्या का हल निकाला जा सकता है. पर उन अमीरों का क्या जो गरीबों पर ही आश्रित हैं और उन्हीं का दोहन करते हैं. अमीर चाहते हैं कि गरीबी बनी रहे और उनके लिए वो काम करता रहे. कट्टरपंथी आतंकवादी भी गरीबों के बीच से ही बनाए जाते हैं. पर कुछ शिक्षित लोग भी उनके बहकावे में मजहब के नाम पर उसमें शामिल होने लगे. ये बहुत ही ख़तरनाक मामला बनता जा रहा है जिससे दुनिया और डरावनी बनती जा रही है.

  • 10. 20:05 IST, 18 जनवरी 2010 Wasim Raza Amrath Jamui.:

    सलमा जी किसी ने ठीक ही कहा है, टपके शमा आँसू बन के परवाने की आँखों से, दर्द हूं मैं हसरत भरी दास्ताँ मेरी.

  • 11. 10:13 IST, 19 जनवरी 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    ये बात हज़म नहीं होती कि भारत में ग़रीबी से ज्यादा आतंकवाद की समस्या है. आज भी पूरी दुनिया में गरीबी ही हर समस्या की जननी है. यह भी कहना गलत न होगा कि गरीबी और आंतकवाद का चोली-दामन का साथ है. बेशक गरीबी का, भूख का हर देश में एक ही स्वरूप है जबकि आतंकवाद की कई नस्लें हैं. आतंकवाद के दायरे में सिर्फ गोलीबारी व निर्दोष लोगों का कत्लेआम ही नहीं आता बल्कि धौंस की राजनीति, नस्लभेदी राजनीति, दुनिया पर दादागिरी, अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु अन्य देशों की मान मर्यादा भंग करना, वहां की आर्थिक बुनियाद को खोखला करना, अनायास ही दुनिया को युद्ध के आगोश में धकेलना आदि. विश्लेषण यह भी होना चाहिए कि आखिर विश्व के ये देश गरीबी की चपेट में क्यों और किसके कारण हैं.

  • 12. 10:55 IST, 19 जनवरी 2010 maneesh kumar sinha:

    न हीं ग़रीबी और न ही आतंकवाद, दोनों ही बड़ी समस्याएँ नहीं है. राष्ट्रीयता का अभाव दोनों को बढ़ावा देता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान और जर्मनी दोनों ही ताक़तवार देश बन कर उभरे क्योंकि दोनों देशों में राष्ट्रीयता की भावना प्रबल है.

  • 13. 11:27 IST, 19 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    सलमा जी, बेबस, लाचारी और मजबूरी का नाम ही ग़रीबी है. उनकी कमजोरी का फ़ायदा ख़ास लोग उठा रहे हैं. कट्टरपंथी भी अपना हित साधने के लिए ग़रीबों का फ़ायदा उठाते हैं.

  • 14. 11:36 IST, 19 जनवरी 2010 GAUTAM SACHDEV, NOIDA:

    सलमा जैदी जी, आपके आलेख को पढ़ते हुए एक बात मन में प्रश्न बनकर आई कि क्या आपकी बात सच है? अगर हां, तो तथ्य तो दिखा नहीं. ऐसा लगता है कि वो हिन्दुस्तान हो या पाकिस्तान गरीबी आज भी यहाँ सबसे बड़ी समस्या है. ये एक अलग सच है कि आतंकवाद की समस्या से निजात पाना संभव नहीं दिख रहा है लेकिन गरीबी कि समस्या से निजात पाया जा सकता है. समस्या को उभारना एक अच्छी कला है तो इससे भी अच्छी बात होगी कि इन समस्याओं के मूल में पहुंचकर इसका समूल नाश कैसे हो सके इसके लिए एक अलख जगाने कि कोशिश की जाए.

  • 15. 12:37 IST, 19 जनवरी 2010 ANIS KHAN SHAHAN. NEW DELHI, INDIA:

    ऐसे मुद्दे पर ब्लॉग लिखने के लिए सलमा जी आपका शुक्रिया. नाइंसाफ़ी ने भूख पैदा किया, भूख ने बगावत को सींचा और इससे चारों तरफ़ मौत उपजने लगी, गोलियाँ चलने लगी.

  • 16. 14:56 IST, 19 जनवरी 2010 joshi:

    मेरा मानना है कि सभी तरह की समस्याओं की जड़ धर्म, कम्युनिजम, पूँजीवाद और राष्ट्र है. विचारधाराएँ धरती के पर्यावरण के साथ ही एक दिन आदमी और आदमीयत को भी पूर्णत: नष्ट कर ही देगी. अभी तो थोड़ी बहुत संवेदनाएँ बाकी है. 70 के दशक में एक आदमी मरता था तो हम उसकी खबर पढ़कर उसके प्रति संवेदना से भर जाते थे लेकिन आज आतंक या गरीबी से 100 लोग भी मर जाते हैं तो मीडिया में सोचा जाता है कि संभवत: संख्या बढ़ेगी.

  • 17. 18:15 IST, 19 जनवरी 2010 Kanhaiya Tripathi:

    सलमा जी, देश के 31 जिलों में किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं. इसका एकमात्र कारण भूख है. भूख से दम तोड़ते लोगों की दशा पर ठहाके लगाती सरकार को मुँहतोड़ जबाव यदि जनता नहीं दे रही है तो कौन ज़िम्मेदार है. सभी को जगाना होगा नहीं तो कभी भूख की समस्या ख़त्म नहीं होगी. सलमा जी, देखिए विदर्भ में क़रीब पाँच हज़ार महिलाएँ विधवा हुई हैं लेकिन उनकी ओर कोई नहीं देखता. इस संकट से उबरना होगा. विदर्भ के विषय पर डाक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाते समय मैंने देखा कि भारत में भूख क्या होती है. भूख हमारी सबसे बड़ी चुनौती है, इसे रोकने के लिए युवा आंदोलन ज़रूरी है. इसके लिए युवा आगे आएँ, मेरी ही कामना है.

  • 18. 18:22 IST, 19 जनवरी 2010 जयराम "विप्लव":

    बात सही है पर ये बातें भारत से ज्यादा पाकिस्तान के लिए सटीक हैं. भारत में आज भी भूख से उतनी जानें जाती हैं, कर्ज के बोझ से किसान आत्महत्या करते हैं, नक्सलियों की हिंसा से लोग मारे जाते हैं और इनके मुक़ाबले आतंकवाद से मारे जाने वालों की संख्या कुछ भी नहीं है . आतंकवाद से लड़ने का हौव्वा खड़ा कर सरकार और मीडिया दोनों अपने कर्तव्यों पर पर्दा डालने की फ़िराक में है. भारत के सामने आतंकवाद से कहीं बड़ा ख़तरा नक्सलवाद, बेरोजगारी ,हाड़तोड़ महँगाई , किसानों की आत्महत्या है . क्या आतंकवाद का रोना लेकर हम इन सबके ऊपर अपनी नाकामियों को नहीं छुपा रहे हैं?

  • 19. 19:01 IST, 19 जनवरी 2010 seraj akram:

    न ग़रीबी न आतंकवाद, सबसे बड़ा मसला बेईमानी है जो भ्रष्टाचार, ज़ुल्म और शोषण की शक्ल में समाज को बरबाद कर रहा है. आज भी लोग अगर ईमानदार हों तो ग़रीबी नहीं रेहगी. लोग ईमानदार हों तो आतंकवाद नहीं फैलेगा.

  • 20. 18:45 IST, 20 जनवरी 2010 Mohammad Athar khan Faizabad Bharat:

    मैं अपने दूसरे टिप्पणीकर्त्ता अनिल को बताना चाहता हूँ कि आतकंवाद और इस्लाम का कोई रिश्ता नहीं है. इस्लाम ने दुनिया में अमन क़ायम किया है. इस्लाम ने कभी किसी क़ौम पर ज़ुल्म और ज़्यादती नहीं की है.
    क्या अफ़ग़ानिस्तान में लोगों का ख़ून बहाना आतंकवाद नहीं है? क्या फ़लस्तीन के बेगुनाह लोगों का क़त्ल आतंकवाद नहीं है? क्या बाबरी मस्जिद को शहीद करना आतंकवाद नहीं है? क्या गुजरात के दंगे आतकंवाद नहीं है? क्या मुसलामानों के फ़र्ज़ी एनकाउंटर आतकंवाद नहीं हैं? ये आतंकवाद इस्लाम नहीं फैला रहा है.

  • 21. 11:51 IST, 27 जनवरी 2010 Dr.Ramesh Kumar:

    आपके विचारो से कुछ हद तक सहमत हुआ जा सकता है लेकिन मेरा यह मानना है कि सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है. आप पाएँगी कि हर इस तरह की जड़ में भ्रष्टाचार व्याप्त है. अगर देश की रहनुमाई करने का दंभ भरने वाले यह तथाकथित लोग भ्रष्टाचार से दूर हो जाएँ तो हर समस्या को समाप्त किया जा सकता है.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.