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इन सपनों का क्या करें?

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 11 जनवरी 2010, 11:18 IST

कवि पाश ने कहा था, 'सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना...'

एक बच्चा उड़ीसा के जंगलों में मिला था. 11-12 साल का. उसने बताया कि उसका पिता किसान है. और उत्सुकतावश पूछा कि किसान यानी? तो उसने मासूमियत से कहा, ग़रीब आदमी. वह बच्चा नक्सलियों के साथ रहता और घूमता फिरता है. एके-47 से लेकर पिस्टल तक सब कुछ चलाता है. वह बड़ा होकर नक्सली बनना चाहता है. उसका कहना है कि अपने लोगों का भला ऐसे ही हो सकता है.

एक बच्चा बलिया में मिला. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के गुज़र जाने के बाद, उनके बंगले की रखवाली करता हुआ. वह दस साल का रहा होगा. पान मसाला खाते हुए वह बताता है कि एक दिन वह अपने बड़े भाई के दुश्मनों को चाकू मारना चाहता है और कट्टा हासिल करके वह अपने नेताजी के लिए काम करना चाहता है. इस काम में उसे रुतबा दिखाई देता है.

एक बच्ची मुज़फ़्फ़रपुर के रेडलाइट एरिया में मिली. उम्र बमुश्किल आठ साल. यह जानने के बाद कि मैं दिल्ली में रहता हूँ, उसने उत्सुकता के साथ कहा कि एक दिन वह मुंबई जाना चाहती है. करना वही चाहती है, जो उसकी माँ मुज़फ़्फ़रपुर में करती है. वह कहती है कि इस काम में उसे कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन यह शहर ख़राब है.

एक बच्चा दिल्ली के बड़े स्कूल में पढ़ता है. आठवीं कक्षा में. डिस्कवरी चैनल पर 'फ़्यूचर वेपन' यानी भविष्य के हथियार कार्यक्रम को चाव से देखता है. वह एक दिन सबसे ज़्यादा तेज़ी से गोली चलाने वाले बंदूक का आविष्कार करना चाहता है. उसका तर्क है कि गोलियों से आख़िर बुरे लोग ही तो मारे जाते हैं.

पाश की कविता अक्सर लोगों को रोमांचित करती है. लेकिन इन बच्चों के सपने सुनकर तो रूह काँप जाती है.

क्या इन सपनों को भी ज़िन्दा रखा जाए?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:04 IST, 11 जनवरी 2010 mohinder:

    विनोद जी,

    सपनों के जिन्दा रहने से भी ज्यादा जरूरी है... आदमी का जिन्दा रहना. जो कुछ हम नकसलियों के बारे में पढते हैं वह सब तो उन्नत दुनिया का नजरिया होता है. अखबार वाले अपनी टी आर पी बढाने के लिये लिखते है.. नेता अपनी साख बढाने के लिये... असल हालात वहां जा कर कौन देखता है... कौन घर का सुख छोड कर बंदूक कंधे पर टांग हमेशा मौत का डर सर पर लिये जंगलों में घूमना चाहता है.. मगर हालात ऐसे हैं कि कभी पेट के लिये.. कभी अपनी जमीन के लिये और कभी अपनों के लिये यह रास्त अपना लिया जाता है.. सिस्टम में फ़ैली गंदगी को साफ़ करना जरूरी है... गूंडे नेताओं और उनकी चापलूसी में लगे तंत्र को बदलना जरूरी है.

    मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत लेख लिखने के लिये बधाई... लिखते रहिये

  • 2. 12:18 IST, 11 जनवरी 2010 पद्मनाभ मिश्र:

    विनोद जी;
    विज्ञान कहता है, हम वही सपने देखते हैँ जो हमारे वर्तमान जीवन मे घटित हो रहे होते हैँ. मेरा मानना है कि सब लोग अपने हिसाब से सपने भी नही देख सकते. मसलन जैसे कि मैं अनिल अम्बानी बनने का सपना नही देख सकता. लेकिन अपनी तनख्वाह मे अचानक 50% बढ़ोतरी का सपना देख ही सकता हूँ. आपने जो उदाहरण दिया है, वो हमारे समाज को एक आइना दिखा रहा है, कि कैसे सपने भी अपवित्र हो सकता है. यह दर्शाता है कि हम लोगों ने अपने बच्चों को कैसा वातावरण दिया है. ईश्वर से केवल एक प्रार्थना कि ऐसे सपने कभी सफल नहीं हों.

  • 3. 12:47 IST, 11 जनवरी 2010 Mohammad Iftekhar Ahmed:

    सही कहा आपने. सरल सी बात है कि जो माहौल मिलता है बच्चे को वह उसी के हिसाब से सोच पाता है और आगे कुछ करना चाहता है. इसमें उसकी कोई ग़लती भी नहीं क्योंकि इसमें हम माता-पिता और समाज की ज़िम्मेदारी है. हमें इस बात को सोच कर उन्हें अच्छा समाज देना चाहिए जिससे वे अपनी सोच का इस्तेमाल अच्छे काम के लिए कर सकें. कुछ भी लेकिन सकारात्मक कार्य के लिए...

  • 4. 13:35 IST, 11 जनवरी 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    विनोद साहब बहुत अच्छा लिखा है आपने इस लेख में | क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश शायद अल्पायु में भी दिशाविहीन ह्रदयों को आलोकित करने में कामयाब रहे फिर भले ही जिन्दगी से हार गए लेकिन उनकी कलम की आवाज हमेशा ज़िंदा रहेगी | आगे भी शायद उन्होंने तभी लिखा था कि -
    "सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
    जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
    और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
    आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए" -पाश
    लेकिन दुःख इस बात का है कि आज दिशाविहीन समाज आने वाली नस्ल को अन्धकार के गर्द में धकेल रहा है | सबसे बड़ी बात यह कि हम लोग अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़े बैठे हैं व् हर समस्या का समाधान सिर्फ और सिर्फ सरकार से चाहते हैं | सरकार व् नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है जब एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री अपने ही सहयोगी के लिए गाली व् अपशब्दों प्रयोग करते हैं |"आज के बच्चे कल के नेता " शायद यह कथनी आज के परिवेश में बिलकुल सटीक बैठती है | अभी तो आपने केवल देश के चार स्थानों के बच्चों के सपनों का ही ज़िक्र किया हो सकता है कि गली-२ में हालत इससे भी बदतर हो सकते हैं | कभी -कभी तो लगता है कि हम आज भी पूंजीवाद के कैंसर से मुक्त नहीं हो पाए हैं | पूंजीवाद ,कालाबाजारी ,घूसखोरी की जड़ें काट दी जाएँ तो नक्सलवाद ,उग्रवाद और चरमपंथी विचारधाराओं का अंत हो सकता है | तब हर बच्चे के सपने भी एक जैसे हो सकते हैं |आज सरकार भी ज़माखोरों के सुर में सुर मिलाकर महंगाई का आलाप कर रही है |ज़माखोरी को सरकार रोकने बिलकुल असफल रही है वरन महंगाई इतनी भी नहीं है |भूखे पेट भजन तो नहीं हो सकता | पेट की आग ही शायद इन मासूम बच्चों के सपनों को ग्रहण लगा रही है |

  • 5. 13:54 IST, 11 जनवरी 2010 Divakar Rai:

    जो आप ने देखा है वो ऐसे सपने है जिनको देखने वाली आँख हमारे समाज और और हमारी भौतिकता की देन है आज हमारे समाज को इन सपनो के लिए जिम्मेवार मानना चाहिए.

  • 6. 15:24 IST, 11 जनवरी 2010 mohammed sahul hameed:

    भारत 21वीं सदी में पहुँच चुका है लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में सरकार की पहुँच नहीं है. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में हज़ारों गाँवों ऐसे हैं जहाँ प्रशासन के हाथ नहीं पहुँचते. ऐसे इलाक़ों का विकास करने में सरकार को 100 साल लग सकते हैं. ऐसे हालत में जो बच्चा जिस माहौल में पैदा और बड़ा हुआ वैसी ही उसकी सोच हो जाती है. जरूरत है आज माहौल बदलने की ताकि भविष्य में अच्छे माहौल में अच्छी बातें सोच सके.

  • 7. 19:09 IST, 11 जनवरी 2010 Sandeep Kumar Mahato:

    एक व्यक्ति सपने में वही सब देखता है, जो वह अपने आसपास देखता या महसूस करता है. जिन सपनों का आपने ज़िक्र किया है, वो वही चीज़ें हैं जो हमने अपनी अगली पीढ़ी के आसपास खड़ी कर रखी है. आजकल तो बच्चे हमारे जैसे सपने भी नहीं देखते. और तो और युवा पीढ़ी ऐसी नौकरी के सपने देखती है जहाँ उसे ज़्यादा रिश्वत मिल सके.

  • 8. 22:30 IST, 11 जनवरी 2010 Ashok Singh:

    सबसे बडी बात है सपने. सपने कभी भी नहीं मरने चाहिए. लेकिन ऐसे सपनों को सही रूप देने की आवश्यकता है. हमारा मानना है कि अगर इन बच्चों को सही शिक्षा, सही परवरिश दी जाए तो सपने बदले भी जा सकते हैं. इनके सपने को सही मार्गदर्शन देने की आवश्यकता है. तभी हम सामाज में पनपने वाले इस विध्वंसक सपने को सकारात्मक सपने में बदल सकते हैं.

  • 9. 23:47 IST, 11 जनवरी 2010 ANIL MISHRA,Guelph,Ontario,Canada:

    हम जो सपना देखते हैं, हम उन्हें ख़त्म कर देंगे. आपके आसपास का माहौल भी सपनों पर असर डालता है. बच्चों का दिमाग़ कोमल होता है और जल्दी प्रभावित हो जाता है. अच्छी चीज़ें करें, अच्छी चीज़ें बोलें, पर्यावरण का ख़्याल रखे. एक दिन आपका भी सपना पूरा होगा.

  • 10. 00:25 IST, 12 जनवरी 2010 Satnam Singh:

    कोई नहीं चाहता है कि वो बुरा बनें, उसे बुरा बनने के लिए हालत मजबूर कर देते हैं. बाद में लोग कहते हैं कि उसे मनोवैज्ञानिक रोग हो गया है. मेरी कहानी ऐसी ही है. ग़रीब परिवार में जन्म लेने के बाद मेरी चाहत आसमान छूने की थी लेकिन हालात ने क्या से क्या बना दिया. मुझे किसी ने भी मदद नहीं की, ना सत्ता ने ना ही व्यवस्था ने. मैं सबके द्वारा छला गया.

  • 11. 11:34 IST, 12 जनवरी 2010 pramod jain:

    मुझे समझ नहीं आता कि लोग विकास के लिए सरकार को ही दोष क्यों देते हैं. क्या आम लोगों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है. जब कोई सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाता है तो हम सिर्फ़ तमाशा देखते हैं. नक्सली लाखों की संपत्ति बर्बाद करते हैं और कहते हैं कि उनका आंदोलन विकास के लिए है.

  • 12. 12:55 IST, 12 जनवरी 2010 Dr. Mathuresh N. Jayaswal:

    यह एक बड़ी समस्या है कि हम कैसे अपने बच्चों को ग़लत सपने देखने से रोके. यह तभी संभव है जब हम उन्हें मूलभूत शिक्षा दे. लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह असंभव दिखता है. भगवान के चमत्कार से ही कुछ अच्छा हो सकता है.

  • 13. 13:17 IST, 12 जनवरी 2010 Rahul Kumar Singh:

    विनोद जी, मैं आपकी इज्ज़त करता हूँ, लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हम सिर्फ़ उन बातों का ही जिक्र क्यों करते हैं जिनमें रोमांच होता है. आज उन बच्चों की कोई कमी नहीं जिनके सपने हम सबकी इज्ज़त के साथ-साथ भारत का नाम भी रौशन कर देंगे. इस लिस्ट में आईआईटी, मेडिकल और यूएन में पर्यावरण पर बोलने वाली बच्ची या चांद पर दुनिया बसाने का सपना देखने वाले बच्चे हैं. यह लिस्ट और भी लंबी हो सकती है. आपने लेख में जिन बच्चों का जिक्र किया है क्या आप नहीं मानते कि उनके सपनों के लिए आप और हम जैसे लोग ही ज़िम्मेदार हैं.

  • 14. 13:29 IST, 12 जनवरी 2010 DHANANJAY NATH:

    विनोद जी, ये वे सपने हैं जो हमारे भारत की ज़मीन से जुड़ी सच्चाई बयान कर रहे हैं. काश हमारे देश के संचालक इस दर्द को समझ पाते. लेकिन दर्द को समझने की फ़ुर्सत किसे है. यहाँ तो दर्द देने वाले ही ज़्यादा हैं.

  • 15. 19:33 IST, 12 जनवरी 2010 kewal krishna:

    विनोद जी, जिन सपनों का आप जिक्र कर रहे हैं वे तो उन सपनों की लाशें हैं जिनकी ओर पाश ने इशारा किया था. कोई सपना मरकर ऐसा ही ख़तरनाक हो जाता है. इन सपनों का अंतिम संस्कार कैसे हो अब यह सोचना होगा.

  • 16. 22:42 IST, 12 जनवरी 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, शानदार लेख लिखा है आपने. यह तो आपने थोड़ी सी सच्चाई लिखि है जबकि हकीकत तो इससे काफ़ी बड़ी है. ऐसे सपने देखने के लिए बेईमान नेता और भ्रष्ट सरकारें ज़िम्मेदार हैं. जो लोग देश की तरक्की की बात करते हैं. वे शायद नाइंसाफ़ी कर रहे हैं, इन सच्चे सपनों के साथ.

  • 17. 09:56 IST, 13 जनवरी 2010 Manish Kumar Arya:

    केवल दिल्ली में झंडा लगाने से सरकार का नियंत्रण सारे भारत पर नहीं हो सकता. यहाँ कई इलाके ऐसे हैं जहाँ सरकार है ही नहीं. इन इलाकों में बच्चे जिस माहौल में बड़े होते हैं उसकी के हिसाब से उनके सपने और आकंक्षाएँ बनती हैं. उनके रोल मॉडल अपराधी , नक्साली, भ्रष्ट नेता और आतंकी होते हैं. इसमें हिंसक सिनेमा का भी बहुत योगदान है. हर जगह हर कोई अपना हित देखता है. देश के भविष्य की किसको पड़ी है. जो एमपी का सरकारी बाबू करोड़ों लाखों खर्च कर यहाँ तक पहुँचा है वह पहले अपना निवेश निकलता है फिर अगले चुनाव के लिए भी पैसे का इंतजाम करता है. इन सबकी जड़ हमारी खोखली चुनावी व्यवस्था में है. जिसमें बड़े से बड़े अपराधी जेल में सजा कटते हुए भी जीत जाते हैं.

  • 18. 10:59 IST, 13 जनवरी 2010 umashankar sinha:

    इन सपनो का क्या करें? दुआ भी नहीं कर सकते पूरे होने की? और किसी के सपनों को बदलने का हक़ भी मुझे नहीं?
    बस इतना कहूँगा की.

    वो दिशा है कहाँ , जिसे पूरब कह सकूँ मैं,
    वह उजाला है कहाँ, जिसे सुबह कह सकूँ मैं,
    चिराग ना दे सहीं, रौशनी तो दे,
    लम्बी उम्र ना सही, बस जिंदगी तो दे,

  • 19. 16:13 IST, 13 जनवरी 2010 कमलेश माहेश्वरी:

    विनोद जी, बहुत अच्छा विषय चुना आपने, प्रशंसनीय, मासूमियत और सपने- हमारे देश में तो दोनों की नियति ही टूटना-बिखरना है, दोष किसको-किसको दें, जब सोच के सारे रास्ते किसी समाधान की मंजिल की ओर जाते हैं तो रास्ते में हम खुद भी किसी अपराधी की तरह खड़े नज़र आते हैं. बहरहाल, सपने टूटने और मासूमियत लूटने को रोकने के किसी उपक्रम में हम सबको साथ आना चाहिए, अकेले भी रहें तो कोई ऐसा काम, कोई छोटी सी मदद ऐसे बच्चों की ज़रूर कर दें जिसकी कीमत वर्तमान में भले ही कुछ न हो, पर किसी के भविष्य के लिए एक बुनियाद बन सकती है.

  • 20. 18:23 IST, 13 जनवरी 2010 GRIJESH KUMAR,PATNA(BIHAR):

    विनोद जी, आपने उस मुद्दे को उठाया है जिसपर हमें बहुत पहले ही ठोस कार्रवाई कर लेनी चाहिए थी, लेकिन अफ़सोस है आज आज़ादी के छह दशक बाद भी हम सिर्फ़ बहस कर रहे हैं. यह सच है कि हर बच्चा अपने लिए एक सपना देखता है. उसे पूरा करने की कोशिश करता है. लेकिन अगर यही सपना हमारे सामाजिक नियमों को तोड़ने की कोशिश करता है तो समाज के तथाकथित ठेकेदार इसे ग़लत बताते हैं. वे कहते हैं कि ऐसे सपने कभी पूरे न हों, लेकिन कभी उन्होंने यह सोचने की कोशिश की कि आख़िर एक बच्चा नक्सली बनना क्यों चाहता है? किसी के सपने को तोड़ा जा सकता है? विनोद जी, लेकिन हमें यह सोचने कि ज़िम्मेदारी भी लेनी पड़ेगी कि हम कहाँ तक सही कर रहे हैं? तब यह सवाल भी उठता है कि क्या इसे छोड़ दिया जाए? मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि हालत के हाथों मज़बूर होकर और पेट, परिवार के लिए अगर कोई बच्चा बड़ा होकर हथियार उठा ले तो क्या कहेंगे हम उसे 'आतंकवादी'? विज्ञान कहता है कोई बच्चा माँ के पेट से सबकुछ सीखकर नहीं आता, वह इसी समाज में पलता है ,बड़ा होता है और सबकुछ सीखता है. इसलिए अगर कोई बच्चा हथियार उठने का सपना देख रहा है तो कहीं-न-कहीं यह समाज दोषी है. यह सामाजिक व्यवस्था दोषी है. यह व्यवस्था इतनी खोखली हो चुकी है कि इसे रोक पाना संभव नहीं है. आखिर नक्सली आन्दोलन शुरू क्यों हुआ? यह मैं मानता हूँ कि उनका रास्ता ग़लत है, उनका तरीका ग़लत है लेकिन क्या उनकी मांगें नाजायज हैं? आज़ादी के इतने दिनों के बाद भी अगर देश में ग़रीबी, भुखमरी, बेरोजगारी कि समस्या फैली हुई है तो बच्चे क्या बनने का सपना देख सकते हैं? अगर बच्चों को भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, महात्मा गाँधी जैसे लोगों के बारे में नहीं बताया जाएगा तो बच्चे लादेन और कसाब बनने का सपना क्यों नहीं देखेंगे? इसलिए अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जो कल का भविष्य हैं वो सही रस्ते पर जाएं, सही दिशा में सोचें भगत सिंह बने तो हमें इस समाज से हर उस बुराइयों को हटाना होगा जो ओक्टोपस कि तरह हमारा खून चूस रहे हैं.

  • 21. 19:34 IST, 13 जनवरी 2010 pawan paudel:

    आपका आशय अच्छा है, अगर आप इसमें पाश को नहीं जोड़ते तो बहुत अच्छा होता. आप उनकी कविता का दुरुपयोग कर रहे हैं.

  • 22. 17:30 IST, 14 जनवरी 2010 Wasim Raza. Amrath,Jamui:

    भाई साहब, किसी ने ठीक ही कहा है, ' अभी तो इबतदा इश्क है रोता है क्यों, आगे-आगे देख होता है क्या.'

  • 23. 19:50 IST, 14 जनवरी 2010 Shashi Shekhar:

    विनोद जी,
    अपका ब्लॉग... कवि पाश ने कहा था, 'सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना...' से शुरु होता है
    ... क्या इन सपनों को भी ज़िंदा रखा जाए?
    मेरे हिसाब से दोनों बातें सही हैं, सपने साकारात्मक हो इसके लिए है कि सापने जिंदा रहें.

  • 24. 12:43 IST, 15 जनवरी 2010 sheetal:

    विनोद जी!
    इसमें न तो बच्चों का दोष है और ना ही ब्चचों की आँखों का... ऐसा आपने अगर देखा है तो इसके लिए ज़िम्मेदार हैं उनके माता-पिता या ये बच्चे जिनकी देखरेख में रहते हैं.
    जिन्हें वो सुनते हैं, जिन्हें वो समझते हैं. दूसरे देशों के बच्चों को संपत्ति के तौर पर देखा जाता है. जबकि हमारे यहाँ बच्चों को मुंह खोलने पर फटकार लगाई जाती है. क्योंकि उनकी सोच को सुनना नहीं चाहते और ना ही अपनी सोट बदलना चाहते हैं.

  • 25. 14:42 IST, 15 जनवरी 2010 AMIT KUMAR:

    मैं यही कहना चाहता हूँ कि आजकल जो समय है वो बच्चों के अनुसार काफ़ी पीछे चल रहा है. बच्चों की सोच इतनी आगे निकल चुकी है कि उसे पूरी ना होते देख मन में कुंठित भावनाएं पनपने लगती है.

  • 26. 16:52 IST, 15 जनवरी 2010 कमलेश साहू:

    बोए पेड़ बबूल तो आम कहां से होए... बच्चों के ये सपने आस-पास के माहौल और परिस्थितयों की ही उपज हैं. सहज ही अंदाजा लग जाता है कि हम अपने बच्चों को कैसा माहौल और कैसी प्रेरणा दे रहे हैं. भावी पीढ़ी के लिए हम कितनी ख़तरनाक ज़मीन तैयार कर रहे हैं!!!

  • 27. 16:56 IST, 15 जनवरी 2010 ANIS KHAN SHAHAN. NEW DELHI, INDIA:

    विनोद मकर संक्रांति मुबारक हो.
    उड़िसा, बलिया, मुज़फ़्फ़पुर या दिल्ली के बच्चों के जो ख़्वाब हैं उसकी ताबीर अच्छी नहीं लगती, लेकिन जैसे हालात हैं उससे देखकर तो यही लगता है कि कहीं ये ख़्वाब हक़ीक़त में न बदल जाए. अगर ऐसा होता है तो इंसान और भारत का क्या होगा?
    वैसे इन सारे हालात की जिम्मेदारी समाज पर आती है और समाज के उन लोगों पर जिनके हाथों में सानाज की बागड़ोर है. अब देखना है कि हमारे रहनुमा इन बच्चों के बोझिल और ख़ौफ़नाक ख़्वाब को कैसे एक ख़ूबसूरत ख़्वाब में तब्दील करते हैं. जिससे कल इन बच्चों के नाम आगे नक्सली, क़ातिल, वैश्या और मौत के सौदागर के तौर पर न आए.

  • 28. 11:39 IST, 16 जनवरी 2010 GAUTAM SACHDEV, NOIDA:

    सपने देखना गलत नहीं है लेकिन हां उन सपनो की सही दिशा और दशा होनी चाहिए. आपके इस आलेख में देश के चन्द कोने से चन्द बच्चों की कहानी ये बयान करती है कि आज सपने भी भौतिकतावादी सोच के साए में पल्लवित हो रही है. सच पूछा जाए तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है. समाज, उनके माँ बाप या उनको मिलता माहौल. आपके आलेख से समस्या का समाधान कम और ये एक सवाल बनता ज़्यादा दिखा रहा है.

  • 29. 00:55 IST, 17 जनवरी 2010 krishna kumar mishra:

    बिल्कुल सही क्यों कि यही तो सत्य है.

  • 30. 08:54 IST, 17 जनवरी 2010 hemant kumar :

    इसको दबाना नहीं बल्कि जगाना चाहते हैं.

  • 31. 14:19 IST, 17 जनवरी 2010 shahroz:

    आपको इधर लगातार पढ़ रहा हूँ. ऊर्जा मिलती है.लेकिन बार-बार निरंजन की कविता-पंक्ति याद आती है:
    आप परिंदे के पर काट सकते हैं
    कैसे काटेंगे उड़ने की उत्कंठा
    जहां से जन्म लेते हैं पर

    स्थिति भयावह ज़रूर है, लेकिन अभी उम्मीद बाक़ी है, आप जैसे लोग भी हैं.

  • 32. 19:36 IST, 17 जनवरी 2010 DEVENDRA SACHAN:

    प्रिय बीबीसी हिंदी टीम, मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह समाज की वास्तविक छवि है और बच्चे जो सपने देखते हैं उनके लिए हम ज़िम्मेदार हैं क्योंकि बच्चे समाज से या अपने आसपास के माहौल से ही सीखते हैं.

  • 33. 09:16 IST, 18 जनवरी 2010 tavishi chopra:

    मेरे हिसाब से यह एक बहुत अच्छा विषय है बात करने के लिए. जिस तरह से बच्चों की सोच बदल रही है इसके लिए बहुत हद तक हमारा वातावरण और टीवी ज़िम्मेदार है. जो बच्चे देखते हैं, सुनते हैं, वही करना चाहते हैं. उन्हें सही-ग़लत का नहीं पता.

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