अबे तेरी तो!
वैसे तो मुझे भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई बातें समझ में नहीं आती, लेकिन यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि अचानक बैठे बिठाए बात प्यार, मुहब्बत और शांति से शुरु होते होते गाली-गलौज में कैसे बदल जाती है.
भारत- हम पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता चाहते हैं. एक मज़बूत पाकिस्तान भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के हित में है.
पाकिस्तान- हम भारत के साथ समग्र बातचीत का स्वागत करते हैं. दोनों देशों का नेतृत्व धीरे-धीरे सभी समस्याएं शांति प्रक्रिया के ज़रिए हल करने की क्षमता रखता है.
भारत- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़े और वीज़ा नियमों में नरमी हो.
पाकिस्तान- यदि नियंत्रण रेखा की दोनों ओर से व्यापार और लोगों की अवाजाही में आसानी हो तो धीरे-धीरे सीमाएँ बे-मानी होती जली चाएँगी.
भारत- दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया अब पीछे नहीं जा सकती, लेकिन पाकिस्तान को सबसे पहले अपने यहाँ आतंकवाद के ख़िलाफ ठोस क़दम उठाने होंगे.
पाकिस्तान- दक्षिण एशिया को भारत और पाकिस्तान शांति का केंद्र बना सकते हैं, लेकिन भारत को बलोचिस्तान में हस्तक्षेप बंद करना होगा.
भारत- जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना रहेगा, बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं.
पाकिस्तान- भारत को आरोप-प्रत्यारोप से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और इलाक़े में दादा बनने का शौक़ अपने मन से निकाल देना चाहिए.
भारत- अगर चीन और पाकिस्तान से एक ही समय पर युद्ध होता है तो भारत दोनों का एक साथ मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है.
पाकिस्तान- जनरल दीपक कपूर को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है और भारतीय सेना कितने पानी में है.
भारत- अब तक सीमा पार से आतंकवाद हो रहा है. अमेरिका और अन्य शक्तियाँ पाकिस्तान को समझाएँ कि वह आग से न खेले.
पाकिस्तान- जिस प्रकार से हम ने पाकिस्तान हासिल किया है उसी प्रकार से कशमीर भी हासिल करेंगे. चाहे हज़ार साल तक युद्ध क्यों न करना पड़े.
भारत- क्या पाकिस्तान भूल गया कि सन् 71 में क्या हुआ था. क्या उसे दोबारा याद दिलाना पड़ेगा.
पाकिस्तान- हमारी ओर जो भी मैली आँख से देखेगा वह आँख निकाल दी जाएगी.
भारत- पाकिस्तान अपने क़द से बड़ी बात करने से पहले अपने घर की आग तो बुझाले.
पाकिस्तान- अबे तेरी तो....
भारत- अबे तेरी ऐसी की तैसी.....
(यदि भारत और पाकिस्तान किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करने पर तैयार हो जाएँ तो इलाज के पैसे मैं अपनी जेब से देने को तैयार हूँ.)

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ख़ान साहब, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे से क्या कहते हैं. हमें मतलब इस बात से होना चाहिए कि दोनों देशों में बच्चे किस तरह सोते हैं. व्यक्ति के तौर पर अगर हम ठान लें कि कम से कम एक बच्चा भूखा नहीं सोएगा तो, मेरा यक़ीन कीजिए, सभी के लिए अच्छा होगा. जहाँ तक दोनों देशों के बीच वार्तालाप की बात है तो वह दोनों के लिए ही शर्मनाक है. जब तक पाकिस्तान मुल्लावाद के बाहर सोचना नहीं शुरू करेगा, चीज़ें नहीं बदलेंगी.
समस्या यह है कि दोनों देशों के लोग उसी दिशा में देखते हैं जो मीडिया दिखाता है. और मीडिया वह दिखाता है जिसकी राजनीतिज्ञ अनुमति देते हैं. चाहे वह कश्मीर का मामला हो या बांग्लादेश का, बलूचिस्तान का या जासूसी और एक-दूसरे के देश में विद्रोहियों को बढ़ावा देने का. कहानी एक ही है. ख़ान साहब आपको ब्लॉग लिखने से पहले सोचना चाहिए कि हिंदी के पाठक सामान्यतः भारतीय ही हैं और हमारी सोच वही है जैसा मैंने लिखा.
वुसत साहब, आपके नेक ख़्यालों और माहौल को हलका करने वाली बातों की मैं बहुत इज़्ज़त करता हूँ लेकिन सच्चाई आपको भी पता है और मुझे भी. दरअसल बात वहीं पर आके रुक जाती है कि भारत में सरकार होती है जिसके पास फ़ौज है. लेकिन पाकिस्तान में एक फ़ौज है जिसके पास सरकार होती है. अब आप ही बताइए कि आज के ज़माने में सरकार सरकार से बात करे या फिर फ़ौज से. अब भारत फ़ौज से तो बात करने से रहा.
बेहतर यही है कि पाकिस्तान की अवाम आगे आए और पहले यह ख़ुद तय करे कि उसे क्या चाहिए. अगर वाक़ई में वहाँ की अवाम चाहती है कि पाकिस्तान का वजूद और ख़ुशहाली रहे तो पहले वहाँ सरकार क़ायम की जाए जो मुल्क की बात करे और सच्चाई को समझे.
रही बात पैसों की, तो अपनी हैसियत से मैं भी हाज़िर हूँ. दोनों का इलाज कराने के लिए.
शायद इलाज की जरूरत आपको है, मैं रुपए ख़र्च करने को तैयार हूं. (पैसे तो आजकल भिखारी भी नहीं लेते)
मैं भी तैयार हूँ पैसा देने के लिए.
वुसत साहब आप अच्छा लिखते हैं, लेकिन टीआरपी की तरह कम से कम आप भारत-पाक या हिन्दू-मुस्लिम जैसे मुद्दों से परहेज़ करें तो बेहतर रहेगा, क्योंकि ये मसले सिर्फ सियासत का खेल हैं. अच्छा हो अगर दोनों देशों के बीच मुफ़लिसी या इल्म को लेकर आवाज़ उठाई जाए. आप ख़ुद भी जानते हैं कि अपनी-अपनी सियासत के लिए उठाए जाने वाले ऐसे वाहियात मुद्दों का कोई छोर नहीं है. फिर भी - ''ये तो ग़ालिब का शौक़ है, आप लिखते रहिए लोग पढ़ते रहें. मसले आग का दरिया हैं, यूं ही पार हम-आप करते रहें''.
इससे साबित होता है कि दोनों देशों ने तय कर रखा है कि हम नहीं सुधरेंगे. ये इसलिए क्योंकि दोनों में से किसी भी देश ने प्रमाणिक होकर अपने-अपने दबाब को दूर रखते हुए बातचीत से हल ढूंढने की कोशिश ही नहीं की है.
पाकिस्तान की मजबूरी है कि वो दोनों देश की शांति से पहले कश्मीर को रखना चाहते हैं, क्योंकि इसके अलावा उसका कोई वजूद ही नहीं है और भारत में कोई भी राजनीतिक पार्टी देश हित के मामले में कोई हल नहीं रखता. विधाता को ही तय करने दीजिए कि इन दोनों देशों का क्यो होगा.
ख़ान साहिब शानदार ही नहीं बहुत शानदार और हक़ीक़त लिखा है. मेरा दावा है कि जबतक दुनिया रहेगी, दोनों देश के नेता जनता को इसी तरह से बेवकूफ़ बनाते रहेंगे. लेकिन यह भी सच है कि दोनों देश की 99 प्रतिशत जनता नहीं चाहती कि जो सच बाहर आए, और मीडिया उसे छुपा रहा है. आपने जो भी सवाल-जवाब दोनों तरफ़ से लिखा है वो सोचने लायक़ है.
ख़ान साहिब! आपको पाकिस्तान और भारत के बारे में ख़ुरंट उख़ाड़ने की बीमारी हो गई है. पहले आप इसका इलाज करवाते तो ज्यादा बेहतर रहेगा. क्योंकि आपको दोनों देश में किस तरह अमन, चैन क़ायम हो सके, ऐसी भलाई की बातें नहीं सुझाते. रही बात भारत में तो लोकतंत्र कायम है और आज पाकिस्तान में भी है. लेकिन दोनों देशों में कैसे लोकतंत्र का संचालन होता है आप उसे समझ सकते हैं.
आपने ग़लत मामले पर अपनी क़लम चलाई है. भारत और पकिस्तान कभी दोस्त नहीं हो सकते. हाँ, संबंधों में उतार चदाव जरूर हो सकता है. एक मज़बूत पाकिस्तान भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा जरूर है, क्योंकि जब कभी भी पकिस्तान ने थोड़ी सी भी ताक़त पाई है, उसका इस्तेमाल उसने भारत के खिलाफ ही किया है.
क्या ख़ान साहब किस चक्र में पड़ गए आप भी.| मनोचिकित्सक बेचारा खुद बिमार है. कहाँ जाइएगा, घर में खोई वस्तु को बाज़ार में खोजने से कोई लाभ नहीं. वैसे बीमारी इतनी भी बड़ी भी नहीं है, लेकिन सरहद के उस पार दोस्त ने नीम हकीमों के चक्र में पड़कर बिमारी बिगाड़ ली है.
भाई वुसत जी,
पैसा, पैसा करते हो और पैसे पर तुम भी मरते हो
पैसा से पैसा कमाते हो, पर जात अपनी सही नहीं पहचानते हो
पैसा का क्या, पैसे की लगा दूँ ढ़ेर
जब पाकिस्तानी अवाम चुने सरकार और फ़ौज न करे तेरी मेरी...
पैसा, पैसा करते तुम भूल गए अपने को
और जब पैसा आ गया तो ढूंढ़ रहे तो पुराने मुद्दों को
ताकि इन दबे मुद्दों से पैसा बनाया जा सके
शायद ये ब्लॉग हो गया है कि पैसा बनाने की मशीन आपके लिए
कयोंकि पैसा बोलता है...
और कोई काम नहीं है आपको? जो भारत-पाकिस्तान और हिंदू-मुसलमान के बीच के भेद-भाव जो आप के मन ही उसे उजागर करते हैं. ऐसा कुछ नहीं है दरअसल पाकिस्तान ही आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है. सीमा पर दोनों देश के सुरक्षाबल होते हैं. क्या पाकिस्तान सुरक्षाबल सो रहे होते हैं जब घुसपैठीय पाकिस्तान से भारत आते हैं.
सलाम वुसतुल्लाह साहिब.
आप लिखकर अपनी रोज़ी रोटी कमाते हैं जो जायज़ है लेकिन थोड़ा संभल के लिखिए और सच लिखिए. आपने एक कहावत सुनी होती. 'आंख में ... बाल आना'. पाकिसतान के साथ यही हो रहा है. हाथ में कटोरा और जेब में बम. ग़ैरत है इस नामाक़ूल देश पर.
क्या कभी पाकिस्तान ये देख पाएगा कि उसकी भला किस में है. ये उसकी अखड़ ख़ुद्दारी भी नहीं है. उधार का खाना, उधार के कपड़े और उधार की ग़ैरत.
भारत और पाकिस्तान की कोई तुलना ही नहीं और अगर चंद पैसे के लिए आप इनकी तुलना करने की तमना रखते हैं तो आपको भी अल्लाह ग़ैरत दे.
ख़ान साहिब आपने बहुस सही लिखा है. आपने हंसाने के साथ सोचने लायक़ लिखा है. दोनों देशों के बीच हर मीठास खटास में बदल चुकी है. ज़रूरत इस बात है कि इसे हम कैसे बदल सकते हैं. बढ़िया लेख है.
वुसतुल्लाह ख़ान साहिब पहले तो मैं आपको इस लेख के लिए धन्यवाद देता हूँ. क्या कमाल का लिखा है. सही स्थिति यही है. आजकल भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसा ही कुछ चल रहा है. आपके लेख से भी ये स्पष्ट है.
प्रिय ख़ान साहब. आपसे अनुरोध है कि इस मुद्दे पर न लिखें. पूरी दुनिया पाकिस्तान के बारे में जानती हैं. भारत से उसकी तुलना नहीं हो सकती. ये पाकिस्तान की जनता का कर्तव्य है कि वे विद्रोह करें और सरकार और सेना पर दबाव डालें कि वे देश के विकास के लिए काम करे. भरोसा कीजिए ख़ान साहब कि हर भारतीय नागरिक चाहता है कि पाकिस्तान में शांति हो और वो प्रगतिशील बने. पाकिस्तान के लोगों को यह समझना चाहिए कि वे अमरीका के खैरात पर आगे नहीं बढ़ सकते. अमरीका किसी का दोस्त नहीं बन सकता. पाकिस्तान को इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी और आने वाली पीढ़ियों को इसका प्रभाव झेलना होगा.
आपके ब्लॉग का मुरीद हूँ पर ये ब्लॉग जमा नहीं ...
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर या देश का विभाजन समस्या नहीं है, ये तो सिर्फ़ लक्षण हैं. असली वजह तो धर्म और धार्मिक हथियार को राजनीतिक लड़ाई के लिए इस्तेमाल करने की मानसिकता है. पूरी दुनिया में सत्ता के लिए संघर्ष है और इस संघर्ष में हर चीज़ का इस्तेमाल हो रहा है. इस्लाम का शांत स्वरूप दुनिया में अब तक देखने को नहीं मिला है.
जब तक चोरी का नाम चालाकी रखोगे तब तक इसका इलाज नहीं.
ख़ान साहब, पाकिस्तान कितना भी उछले भारत की वह बराबरी नहीं कर सकता. यदि वह भारत से बराबरी कर सकता तो सीधे भारत से टक्कर लेता, पीठ पीछे छुरा नहीं घोंपता. पाकिस्तान समझता है कि वह चीन के साथ मिल कर भारत विरोधी हरकत करके भारत को डरा देगा. यह पाकिस्तान की ग़लती है. आगे पाकिस्तान की मर्जी की वह भारत के साथ दोस्ती करके ख़ुद को बचाना चाहता है या बरबाद होना चाहता है.
वुसत साहब भारत की तुलना चरमपंथी देश पाकिस्तान के साथ करके आप भारत का अपमान करते हैं. आप अपने ब्लॉग में लगातार भारत के ख़िलाफ़ अपनी घृणा दिखाते हैं. आप भी मेनस्ट्रीम पाकिस्तानी मीडिया जैसा ही लिखते हैं. आशा करता हूँ कि आगे आप
निरपेक्ष भाव से लिखेंगे.
सच्चाई यह है कि दोनों देशों के नेता इन्हीं डायलॉग के जरिए आम जनता का ख़ून चूस रहे हैं. फर्क ये है कि पाकिस्तान नेताओं ने हिंदुस्तानी नेताओं को लूट के मामले में काफ़ी पीछे छोड़ दिया है. यदि दोनों देशों की जनता अपने-अपने देशों के नेताओं पर नकेल कसना सीख लें तो दोनों देशों के बीच प्यार बढ़ेगा.
ख़ान साहब आपको भी एक बीमारी है, भारत-पाकिस्तान पर ब्लॉग लिखने की. आप इससे आगे सोचे ना. आप भारत की तुलना पाकिस्तान से क्या सोच कर करते हैं. तुलना बराबर वालों में की जाती है.
आपने ग़लत मामले पर अपनी क़लम चलाई है. भारत और पकिस्तान कभी दोस्त नहीं हो सकते. हाँ, संबंधों में उतार चदाव जरूर हो सकता है. एक मज़बूत पाकिस्तान भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा जरूर है, क्योंकि जब कभी भी पकिस्तान ने थोड़ी सी भी ताक़त पाई है, उसका इस्तेमाल उसने भारत के खिलाफ ही किया है.दरअसल पाकिस्तान ही आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है. सीमा पर दोनों देश के सुरक्षाबल होते हैं. क्या पाकिस्तान सुरक्षाबल सो रहे होते हैं जब घुसपैठीय पाकिस्तान से भारत आते हैं.
आपसे अनुरोध है कि इस मुद्दे पर न लिखें. पूरी दुनिया पाकिस्तान के बारे में जानती हैं. भारत से उसकी तुलना नहीं हो सकती. ये पाकिस्तान की जनता का कर्तव्य है कि वे विद्रोह करें और सरकार और सेना पर दबाव डालें कि वे देश के विकास के लिए काम करे. भरोसा कीजिए ख़ान साहब कि हर भारतीय नागरिक चाहता है कि पाकिस्तान में शांति हो और वो प्रगतिशील बने. पाकिस्तान के लोगों को यह समझना चाहिए कि वे अमरीका के खैरात पर आगे नहीं बढ़ सकते. अमरीका किसी का दोस्त नहीं बन सकता. पाकिस्तान को इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी और आने वाली पीढ़ियों को इसका प्रभाव झेलना होगा.
पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान भारत में रहते हैं. भारतीय मुसलमान की हालत पाकिस्तान के मुसलमान से बेहतर है. असल बात यह है कि पाकिस्कतान के मुल्ला नहीं चाहते हैं कि दोनों मुल्कों में ख़ुशियाँ हो क्योंकि जिस दिन ख़ुशियाँ आ गईं, इन मुल्लाओं का काम-धंधा बंद हो जाएगा. अरे पहले पाकिस्तान को बचा लो, भारत आपसे बहुत आगे है.
बहुत अच्छा लिखा है.