विचारों की कमी नहीं रही
सुना है कि कोसल में विचारों की कमी समाप्त हो गई है. एक के बाद एक कई विचार कौंध रहे हैं. इसमें से कई तो क्रांतिकारी हैं.
बड़े चौधरी अमरीका की सलाह पर कोसल ने विचार करना शुरु कर दिया है कि अच्छे तालेबान और बुरे तालेबान में फ़र्क किया जाए.
ब्रिटेन ने इस विचार का समर्थन किया है. ब्रिटेन ने बताया है कि उन्होंने पहले भारत में अच्छे राजा और बुरे राजा का फ़र्क किया था और इसका फ़ायदा दो सौ साल तक मिलता रहा था.
कोसल के दरबार-ए-ख़ास ने जब अच्छे तालेबान और बुरे तालेबान को अलग-अलग दृष्टि से देखने पर विचार किया तो किसी ने कहा कि बैंक घोटाले करने वालों में भी फ़र्क करना चाहिए. इसकी शुरुआत करते हुए एक को पद्मश्री देने की घोषणा भी कर दी गई.
फिर किसी ने कहा कि बाघों और चीतल आदि के शिकारियों और काले हिरणों के शिकारियों को भी अलग-अलग नज़रों से देखा जाना चाहिए, सो काले हिरण के शिकार के एक अभियुक्त को भी पद्म सम्मान देने की घोषणा कर दी गई.
सुना है कि कोसल में इस परंपरा को और कई क्षेत्रों में लागू करने का विचार है.
'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' में 'वैदिकी' की जगह 'राजनीति' शब्द का इस्तेमाल करने पर मंत्रिमंडल विचार कर रहा है.
इस विचार के समर्थकों का तर्क है कि हत्या, अपहरण और बलात्कार जैसे मामलों के अभियुक्त चुनाव जीत रहे हैं. इसका अर्थ है कि लोग राजनीतिज्ञों की हिंसा को हिंसा नहीं मानते. इसलिए सीआरपीसी में संशोधन करके 'राजनीतिक हिंसा, हिंसा न भवति' को अपना लेना चाहिए.
सुना है कि कोसल के सभी राजनीतिक दल इससे ख़ुशी-ख़ुशी समर्थन देने को तैयार हैं.
कोसल के गृहमंत्री विचार कर रहे हैं कि तालेबान की तरह नक्सलियों में भी फ़र्क किया जाए. लिहाज़ा शीघ्र ही नक्सल प्रभावित राज्यों में अच्छे नक्सलियों की तलाश शुरु की जाएगी. उन्हें राजनीति की मुख्य धारा में आकर अपना काम करने का प्रस्ताव दिए जाने का विचार है.
सुना है कि 'अच्छे नक्सलियों' से कहा जाएगा कि वे आदिवासियों की भलाई, ग़रीबी दूर करने और भ्रष्टाचार कम करने में सरकार के साथ काम करें क्योंकि सरकारें तो पिछले छह दशकों से यही कर रही हैं.
विचार है कि नक्सलियों के बाद छोटे चोरों और उचक्कों के बारे में ऐसी ही दृष्टि अपनाई जाए और अच्छे और बुरे में फ़र्क किया जाए.
कोसल के प्रांतों में भी इस विचार का व्यापक असर दिख रहा है.
एक प्रांत में सरकार ने सांप्रदायिक ताक़तों में फ़र्क कर लिया है. भाषाई आधार पर लोगों में भेद करने वाली दो पार्टियों में फ़र्क कर लिया है. अच्छे और बुरे का फ़र्क कर लिया गया है. अच्छे को बढ़ावा दिया जा रहा है. उसे बिहारियों और उत्तर प्रदेश के भैयों को पीटने का अधिकार दे दिया गया है. बुरे को फूटी आँख भी नहीं देखा जा रहा है.
एक प्रांत में सरकार ने पाया कि मूर्तियाँ, जीवित लोगों से अच्छी हैं. इसलिए विचार किया गया है कि अब से जीवित लोगों की रक्षा की चिंता कम की जाए और मूर्तियों की रक्षा के लिए विशेष दस्ते बनाए जाएँ.
दलालों और भ्रष्टतम लोगों को माननीय कहना, 40 साल के अधेड़ को युवा कहना, रासलीला की सीडी को झूठा कहना और अख़बारों में पैसे देकर ख़बर छपवाने जैसे छोटे-छोटे अनगिनत विचार कोसल में पहले से ही फल-फूल रहे हैं.
सो कोसलवासियो अब चिंता की कोई बात नहीं है.
वे लोग जो कोसल में विचारों की कमी को लेकर चिंतित हैं, उन्हें बता दिया जाए कि कोसल में विचारों की कमी हरगिज़ नहीं है. इसलिए कोसल का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
विनोद जी क्या शानदार ब्लॉग लिखा है आपने, तहेदिल से शुक्रिया. जिस व्यंगात्मक शैली का आपने उपयोग किया है और एक ही तीर से कई निशाने शाधे हैं वह वाकई में काबिले तारीफ़ है.
भाई विनोद! सब कुछ तो अच्छा लिखा है, लेकिन यह तो बताते चलें कि 'कोसल' का मतलब होता क्या है. मतलब नहीं बताया तो कवि श्रीकांत वर्मा की कविता के अंश को ही यहाँ लिख देते ताकि हम समझ जाते कि आपने लिखा क्या है.
विनोद जी, आपने शानदार ही नहीं लिखा बल्कि बहुत शानदार लिखा है. आप कोसल का मतलब भी समझाते तो अच्छा रहता. अब यह हकीकत है कि सीआरपीसी और आईपीसी में बेईमान नेताओं के लिए बदलाव की ज़रूरत है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि काले हिरण के शिकारी को पद्मश्री से सम्मानित किया जा रहा है. आपने बहुत अच्छा लिखा है कि अंग्रेज़ों ने भारत पर दो सौ साल इसलिए राज किया है और अब आगे भी ऐसी ही तैयारी लगती है.इस बार शायद अमरीका यह काम करे.
आप चाहे कुछ भी कहो, उन लोगों को शर्म नहीं आएगी क्योंकि वे किसी भी तरह से आगे आगे आने के लिए शर्म छोड़ चुके हैं. फिर भी ऐसा लिखने के लिए तहे दिल से शुक्रिया. ऐसी उम्मीद बनाए रखिए.
बड़े भाई, बहुत दिनों बाद "घूमता हुआ चेहरा" याद आ गया, आपकी ये शैली पसंद आई. पहले भी आपके ब्लॉग पढ़े थे पर आज बात कुछ और है.
अगर आप अच्छे-बुरे का अंतर लोगों को नहीं समझाओगे, तब आप उन्हें अच्छाई की बुराई पर विजय कैसे दिखाओगे. विभीषण और रावण में भी फ़र्क करना होगा.
इस तरह की बौद्धिक जुगाली से बचें तो ही बेहतर है. यह किसके लिए लिखा गया है. विनोद जी क्लिष्टता को ताक पर रखें.
बहुत शानदार. व्यंग्य विधा में इतनी अच्छी अभिव्यक्ति के लिए बधाई.
काफी अच्छा लिखा है आपने, हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जिन्दा लोगों की बजाय मूर्तियों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. जो भाषा के नाम पर राजनीति करते हैं ,हाशिए पर खड़े लोगों की बात करते हैं पर अपना राज-सुख त्याग नहीं पाते. अच्छे और बुरे विचारों में बुरे विचार इस कदर हावी हैं कि अच्छे विचार सामने नहीं आ पाते हैं. अतः यह सही है कि कोसल में विचारों की कमी नहीं है.
बहुत ही अच्छा ब्लॉग लिखा है.
शर्म उनको मगर नहीं आती.
इस ब्लॉग के लिए शुभकामनाएँ. आपका यह ब्लॉग पढ़कर मैं ख़ुश हुआ. बीबीसी के ब्लॉग में से सबसे बेहतर. इसमें कोई ऐसा बिंदु नहीं है जिससे मैं असहमत हो पाऊँ.
वाकई एक तीर से कई निशाने शाधे हैं. काबिले तारीफ़ है. 'वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' में 'वैदिकी' की जगह 'राजनीति' शब्द का इस्तेमाल करने पर मंत्रिमंडल विचार कर रहा है, बहुत शानदार व्यंग्य है.
मुझे लगता है भारत का अपना एक द्रिष्टीकोण होना चाहिए. पता नहीं हम दूसरों की बातों पर इतना क्यों चलते हैं. हमें एक विचार रखना चाहिए.
विनोद जी, आपने जिस कुशलता से समकालीन समाज की नब्ज को खंगाला है, उसमें भारतीय समाज, राजनेता और तथाकथित विचारवानों की सारी परते दर परतें उघर गई हैं.
इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई.
विनोद वर्मा जी, मुझे एक कवि की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, ''अब तो इतर भी मलो तो मोहब्बत की बू नहीं आती, वो दिन हवा हुए जब पसीना भी गुलाब था'' इन सब बातों का मोटी चमड़ी पर कोई भी असर पड़ने वाला नहीं. कोसल में रामराज्य की सोच सकते थे तो अब जंगलराज में क्या बुराई है. अब कोसल नरेशों की कमी भी नहीं है. जो चाहो क़ानून बना लो. घर की तो खेती है फिर दुनिया और प्रजा जाए भाड़ में, किसे परवाह है यहाँ?
विनोद जी, आपने बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है. इसके लिए आपको शुभकामनाएँ. यदि कोसल वालों का मापदंड आपके हाथ लग जाए तो ज़रूर उनको सरेआम पत्रिका में उछाल देंगे. लेख बहुत अच्छा लगा और पढ़कर मुझे अपने हिंदी की परीक्षा की याद आ गई. इस लेख को पढ़ कर कौसल वाले कुछ ऐसी ग़लतियाँ कम करे लें तो आप और हम धन्य हो जाएँगे.
आपका व्यंग बिलकुल सही है पर मेरा एक सवाल है, कि समाज और लोगों को जोड़ने वाले विचारों की भी कमी हुई है या नहीं?
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता, कोसल में विचारों की कमी है, अगर ये पंक्तियां लिखने वाले आज ज़िन्दा होते तो उन्हें महसूस होता की जब विचार कुकुरमुत्तों की तरह यहाँ-वहाँ उगने लगते हैं तो वे विचारहीनता से कहीं ज़्यादा खतरनाक साबित होते हैं. कुकुरमुत्ता इसलिए क्योंकि सारे के सारे एक से नज़र आते हैं, अगर ये विचार कोसल के लाखों करोड़ों आम किंतु छल-कपट रहित साफ़ दिमाग़ों की अपनी उपज हों तो शायद आपके कोसल को कुछ फ़ायदा होता.
इस संसार में सबसे आसान और ह्दय प्रिय काम कनरे पर निंदा की जाती है. हमें एक उद्देश्य को अपनाना चाहिए कि हम हर एक काम दूसरों की भलाई या मदद के लिए करें. वर्मा जी ने व्यंग के रुप में सारी कमियाँ गिना दी हैं. ये सारी बातें सौ प्रतिशत सही हैं. पर मुझे ऐसा लगता है कि इन लेखों से हम लोगों के मन में कही इन विचारों के प्रति समर्थन तो नहीं जुटा रहे हैं. अच्छा होता अगर वर्मा जी लोगों को इनके विरोध खड़े होने की बात करते. एक लेखक के हाथों में बहुत ताक़त होती है. वो अपने विचारों के माध्यम से समाज में क्रांति ला सकते हैं. हमें अपनी ऊर्जा का प्रयोग सार्थक कार्यों के लिए करना चाहिए. हम अगर मीडिया से जुड़े हैं तो हमें चाहिए कि हम लोगों तक सही ख़बर पहुँचाए. सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत होनी चाहिए.
कोसल वासियों ने भी चोरों मे फ़र्क़ करना सीखा है, और तय किया है कि अगर चुनाव में मत देंगे तो उन्हें च्रोरों को जो उनकी आपनी बिरादरी का हो, चाहे फिर वे चोर कौशल को ही क्यों ना बेच दे. चोर है तो क्य हुआ है अपनी बिरादरी का तो है.
विनोद जी बहूत खूब विनोद जी जहां तक मेरा अनुभव है ये सब दौर होते हैं यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस भ्रष्टाचार, बेईमानी, और स्वार्थ कि घृणात्मक राजनीती के दौर मे जी रहे हैं.
40 वर्ष के अधेड़ को युवा कहना " सटीक व्यंग्य का प्रयोग किया आपने.व्यंग्य की ऐसे पराकाष्ठा पढ़कर अच्छा लगा.
विनोद जी बस इतना कहूँगा कि ऐसा ही लिखते रहें और सलामत रहिए. अब शायद इसी तारीक़े से लोगों को कुछ समझ आ जाए और भारतीय राजनीति में कुछ सुधार आ जाए.
विनोद जी आपने ने सदियों से चली आ रही उस परंपरा पर कलम चलाई जहाँ कैसे सत्ता में बने रहते हुए राज की जाती है. आपने इस राजनीति को बख़ूबी से लपटते हुए बहुत ही शानदार तरीक़े से खुलकर लिखा है. पूराने समय के और आज के समय में राज करने वालों में कोई फ़र्क़ नहीं आया है. पहले भी राज तख़्त के बल चलता था और आज भी यही हालात हैं. अच्छे और बुरे सभी लोगों को क़ानून का डर नहीं है. शासकों को लगता है कि उनका राज चलता रहेगा और बेइमानी किसी तरह की करने से डरो नहीं.
बीबीसी के ब्लॉग में अबतक का सबसे बेहतरीन. मेरे पास टिप्पणी करने के लिए शब्द नहीं हैं. पर कभी-कभी लगता है कि सबकुछ हमेशा ऐसा ही रहेगा या फिर हमें भी इनकी तरह हो जाना चाहिए?
आशा है हम आपका ब्लॉग पढकर कुछ चिन्तन करेंगे. कोसल में चिन्तन की भी बहुत कमी है.
बहुत ही सुंदर, विनोद जी.
ग़जब का लिखा है जनाब! सौ फ़ीसद सही है.
विनोद जी, आपने बहुत शानदार लिखा है. अपने भले के लिए नेता किसी भी बुराई को अपनाने से परहेज नहीं करते हैं. जिसमें उन्हें नुक़सान हो वह भली चीज भी उन्हें बुरी लगती है. तालेबान को बुरा कहने वाले अमरीका को क्या कहा जाए जिसने बिना किसी कारण इराक पर हमला कर लोगों का ख़ून बहाया. वह ख़ुद तो परमाणु बम का भंडार रखता है लेकिन ईरान को परमाणु बिजली भी नहीं बनाने देता है, जो भारत के सब्र का बांध टूटने की बात कहते हुए अहले दिन पाकिस्तान को विमान की सप्लाई करने की हामी भर देता है.
विनोद जी, आप जैसे पत्रकार द्वारा खरा-खरा ब्लॉग लिखने और लोगों द्वारा अपने विचार लिखने पर क्या सरकार में बैठे नेता जो आँखों पर पट्टी और कानों में रुई डाले हुए बैठे हैं और बैसाखियों से चलते हैं. वे जनता की समस्याओं के प्रति जागरूक क्यों नहीं होते हैं. जनसमस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं देते हैं. लोगों की भावनाओं का उन पर असर क्यों नहीं होता है. क्या वे यह सोचकर किसी समस्या का हल नहीं निकालते हैं कि जनता उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है. यह सब कबतक चलता रहेगा?
अच्छाई और बुराई हमेशा से अगल चीजें रही हैं. विचारों या अच्छाई-बुराई को मिलाने का समर्थन करना बहुत ही ख़तरनाक़ है.
आपको पहली बार पढ़ा, आप बेबाक और सटीक कहते हैं, मुझे अक्सर इन गहरे और उलझे मुद्दों पर साफ़ राय बनाने में दिक्कत आती है. उम्मीद है आपसे सीखता रहूँगा.
शुभकामनाएँ.