क्या भूलें क्या याद रखें
मुंबई में कला की पढाई के लिए प्रसिद्ध जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के कैम्पस में इन दिनों एक छोटा सा विवाद उठ खड़ा हुआ है.
हरे पेड़ और पौधों से भरे इस कैम्पस के बीच एक कुटीर है जो सौ सालों से भी पुराना है. इसे आम तौर से विभागाध्यक्ष कुटीर या 'किपलिंग का घर' से जाना जाता है.
इस कुटीर की अहमियत को देखते हुए एक निजी संस्था ने इसे एक संग्रहालय में बदलने की योजना महाराष्ट्र सरकार को पेश की जिसे मंज़ूर कर लिया गया.
इस योजना के तहत संग्रहालय का एक कमरा किपलिंग के नाम कर दिया जाना था लेकिन अब सरकार इसके लिए तैयार नहीं नज़र आती है जिस से कैम्पस में मायूसी है.
सरकार के एक अधिकारी ने मुझे बताया कि किपलिंग का नाम उन अंग्रेजों में शामिल होता है जिसे आप नस्लपरस्त कह सकते हैं और वह ब्रिटिश राज को बढ़ावा देने वालों में भी शुमार होते थे.
सरकार डरती है कि कहीं यह एक राजनैतिक विवाद में न बदल जाए. इसलिए किपलिंग के नाम को इस संग्रहालय से जोड़ने की ज़रुरत ही नहीं.
'किम' और 'दी जंगल बुक' जैसी किताबों के और 'इफ़' जैसी कविता के लेखक रुडयार्ड किपलिंग इस कुटीर में 30 दिसंबर 1865 को पैदा हुए थे. उस समय उनके पिता जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के विभागाध्यक्ष थे.
अंग्रेजी साहित्य में उनका एक बड़ा नाम है और मुंबई में पैदा होने के कारण मुंबई वालों को उन पर गर्व भी है. यहाँ किपलिंग सोसाइटी भी बनी हुई है.
लेकिन यहाँ और देश में कई ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जो उन्हें इस लिए पसंद नहीं करते कि वह भेद भाव करते थे. लेकिन उनकी याद में उनके जन्म स्थान को उनका नाम दिया जाए तो क्या फर्क़ पड़ता है.
देश में दर्जनों सड़कें इमारतें और जगहें अंग्रेजों के नाम पर आज भी हैं उन्हें बदला तो जा सकता है लेकिन क्या इतिहास को बदला जा सकता है.
आज किपलिंग को याद करने वाले उनकी दोनों बातों को याद करते हैं, एक यह कि वह भेद भाव करने वाले अँगरेज़ थे और दूसरे अंग्रेजी साहित्य में उनका योगदान.
हैरानी की बात है कि जो व्यक्ति 'इफ़' जैसी कविता में जैसी नसीहत कर सकता है वह नस्ली भेदभाव में विश्वास भी रख सकता है.
मैंने जेजे कॉलेज ऑफ़ आर्ट के कुछ छात्रों से इस बारे में उनकी राय जाननी चाही.
मुझे कुछ यह सुनने को मिला, हमें पुरानी बातों को कुरेदना नहीं चाहिए. किपलिंग इस शहर में पैदा हुए थे और इस कैम्पस में पैदा हुए थे. हमें उनकी याद में उनके घर को श्रद्धांजलि के तौर पर उनके नाम कर देना चाहिए. उन्होंने अधिकतर अच्छी चीज़ें दी हैं और वह इस शहर को पसंद करते थे इसलिए हमें उन पर गर्व है.
मैंने सोचा यह नौजवान कितने खुले ज़हन के हैं. अगर इसी विचार के साथ वे कैम्पस से बाहर इस दुनिया में क़दम रखें तो देश का भविष्य अच्छे हाथों में होगा. हमें अपनी नई नस्ल पर गर्व है.

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यह नौजवान कितने खुले ज़हन के हैं. अगर इसी विचार के साथ वे कैम्पस से बाहर इस दुनिया में क़दम रखें तो देश का भविष्य अच्छे हाथों में होगा. हमें अपनी नई नस्ल पर गर्व है.
हमें भी है और यही सही रास्ता है.
लेख पढ़कर कुछ आनंद न आया, नवीनता की कमी महसूस हुई. एक औसत लेख जो मात्र खानापूर्ति कर रहा है.
ज़ुबैर साहिब. मैं आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हैं. हम भारतीयों को अपनी कला और संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए जिसका मूलमंत्र क्षमा करना है. किपलिंग की कृति बता रही है कि वो भारत से प्यार करते थे और उनके ज़ेहन में सारी बातें थीं. हमें ज़ुबैर साहिब के विचार पर ध्यान देना चाहिए.
ये बात हमें याद रनही चाहिए कि शिव सेना या इसके समान विचारधारा रखने वाले संगठन इस सौ साल पुरानी इमारत को बर्बाद कर देंगे.
वैसे माफ करना चाहिए, पर यह सही है कि किपलिंग की कुछ रचना नस्ली थी. जुबैर साहब, आपको उनका 'व्हाइट मैन्स बर्डेन' तो जरूर देखना था.
"इक गोरे आदमी का भार -
सबसे बेहतर नस्ल का
खुद के सन्तानो को वनवास भेजे
तुम्हारे ग़ुलामों की सेवा में
दुख भरा इंतज़ार जंगली लोग-
आपके नये पकड़े हुए दुखी लोग
आधे शैतान, आधे बालक "
-गोरे आदमी का भार
मुझे कुछ साल पुरानी बात याद आ गयी | जब एक नजदीकी दोस्त के यहाँ पूजा में सम्मलित होने के लिए हम बैठने ही वाले थे कि पंडित जी ने कहा कि सब लोग पूजा में बैठने वाले अपने चमड़े के सामान जैसे कमर की पेटी ,बटुआ आदि बाहर रख दें | हमारे साथ एक सज्जन बोल उठे पंडित जी अपनी खाल को कहाँ रखें | कहने का मतलब यहाँ भी यही है कि हमारा इतिहास ,हमारा अतीत कहीं न कहीं हमसे जुड़ा हुआ है | इसे यूं ही भुलाया नहीं जा सकता है | और इसमें बुराई ही क्या है ? रुडयार्ड किपलिंग के व्यकित्व के अच्छे पहलुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए | और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश की कई महान हस्तियों के नाम से संस्थाएं एवं स्मारक विदेशों में एवं खासकर ब्रिटेन में भी मौजूद हैं | इस विषय में हमें रूढ़िवादी तथा संकुचित विचारधारा का परिचय नहीं देना चाहिए |
'जड़, चेतन, गुण, दोष में, विश्व किन्हा करतार'. किसी भी अच्छे आदमी में बुराइयाँ ढूँढी जा सकती हैं. अल्लामा इक़बाल ने पाकिस्तान बनवाने में मदद की थी लेकिन उनका तराना 'सारे जहाँ से अच्चा हिंदोस्ताँ हमारा...' हम बड़े सम्मान से गाते हैं. किपलिंग को उचित सम्मान मिलना चाहिए भले ही उनके कुछ विचार नस्ली रहे हों.
याद रखना या भूल जाना हमारे हाथों में है ही कहाँ. अक्सर ऐसा होता है कि हम जिस घटना को भूल जाना चाहते हैं उसे भूलकर भी नहीं भुला पाते. ख़ासकर अपने हंसी का पात्र बनने की घटना को. यादगार घटनाओं के बारे में क्या कहा जाए! वे खुशियाँ कम देती हैं उलटे उदास कर देती हैं. हम सोचने लगते हैं कि क्या वो समय था और क्या ये समय है?
जुबैर साब. आपके तर्क का मैं सम्मान करता हूं पर इस दुनिया में दो तरह के इंसान होते हैं. अच्छे और बुरे. कौन अच्छा है और कौन बुरा इसका निर्धारण हमारा समाज उस इंसान के कर्मों से करता है. जो बुरे हैं वो सम्मान के हकदार नहीं होते. समाज उन्हें हिकारत की नजर से देखता है. हिन्दुस्तान को अपने इतिहास पर गर्व है और इतिहास कहता है किपलिंग जैसे लोग अच्छे इंसान कभी नहीं रहे