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बदलाव के सकारात्मक संकेत

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 16 फरवरी 2010, 10:47 IST

पिछले दिनों अदालतों के भीतर से कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जिससे लगता है कि उनका नज़रिया एक बार फिर बदल रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली ने कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आख़िरी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट को वैश्वीकरण और उदारीकरण के आकर्षक नारों में नहीं उलझना चाहिए.

एक और अदालती फ़ैसले में न्यायाधीश ने टिप्पणी की है कि किसी आपराधिक मामले पर सज़ा का फ़ैसला करते हुए यह ध्यान में रखना चाहिए कि वह अपराध ग़रीबी के दबाव में तो नहीं किया गया है. अदालत ने कहा है कि किसी ग़रीब अपराधी में सुधार की संभावना को भी ध्यान में रखना चाहिए.

पिछले हफ़्ते ही दिल्ली हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त हुए मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता की ज़रुरत पर बल दिया है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. ऐसा लगता है कि उन्होंने यह भी मान लिया है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय में सूचना के अधिकार के तहत आना चाहिए.

ये सब फ़ैसले या टिप्पणियाँ इसलिए राहत देती हैं क्योंकि अभी कुछ ही साल पहले अदालतों का रवैया कुछ और ही दिखाई दे रहा था. डरा रहा था.

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी, वर्ष 2005 में सार्वजनिक रुप से कह रहे थे कि आने वाले दिन एलपीजी के हैं. एलपीजी मतलब लिब्रलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन. यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण.

वर्तमान मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी उस समय एलपीजी के इस सिद्धांत से सहमत दिखते थे.

उसी समय भोपाल में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के सम्मेलन में उन्हें बताया जा रहा था कि उदारीकरण, नई अर्थव्यवस्था और नई तकनीकें कैसी हैं.

अदालतों का रुख़ ऐसा हो चला है मानों वे सरकार की नीतियों के अनुरुप अपने आपको बदल लेना चाहती हैं.

जिस वैश्वीकरण और उदारीकरण को लेकर समाज में आम सहमति नहीं बन सकी थी उससे अदालतें मानों सहमत हुए जा रही थीं.

अच्छा है कि बदलाव के रुख़ दिख रहे हैं. नानुकुर के बाद ही सही माननीय न्यायाधीश अपनी संपत्ति सार्वजनिक तो कर रहे हैं.

कथित मीडिया ट्रायल के बाद ही सही प्रियदर्शिनी मटूट, जेसिका लाल, शिवानी भटनागर और नितीश कटारा की हत्या जैसे मामलों के अभियुक्त प्रभावशाली होने के बावजूद सलाखों के पीछे तो हैं.

अदालत से बाहर आते एसपीएस राठौर की मुस्कुराहट उन्हें भारी तो पड़ रही है.

हालांकि अभी बहुत कुछ होना बचा हुआ है.

यह देश भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए अधिकारियों और राजनेताओं को सीखचों के पीछे ज़िंदगी गुज़ारते देखना चाहता है.

हत्या, लूट और बलात्कार के मामलों के अभियुक्तों को विधानसभाओं और संसद में प्रवेश करने से वंचित होता देखना चाहता है.

देश चाहता है कि जब बरसों बरस से लाखों मामले अदालत में लंबित हों तो अदालतें उसे चिंता के साथ देखें.

जब हज़ारों लोग विचाराधीन क़ैदियों की श्रेणी में हों तो अदालतों को विचार करना चाहिए कि गर्मियों की और शीतकाल की लंबी छुट्टियाँ अदालतों के लिए कितनी ज़रुरी हैं.

इंतज़ार उस दिन का भी है जिस दिन माननीय न्यायाधीश बेझिझक कह सकें कि न्याय के मंदिर भ्रष्टाचार और पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:45 IST, 16 फरवरी 2010 bb:

    विनोद जी, अच्छा लिखा है. लेकिन यह संकेत मेरे हिसाब से ग़ालिब के अनुसार बस इतने ही हैं,
    'दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है'
    मेरा मानना है कि देश में न्याय नहीं है क्योंकि दिल साफ़ नहीं है और दिल साफ़ किस प्रकार हो जब इंसाफ़ नहीं है. जितने बदलाव के संकेत आपने गिनवाए हैं वे सब अपवाद हैं क्योंकि हर रोज़ बेगुनाह हमारी न्यायिक प्रक्रिया की भेट चढ रहे हैं. कुछ इंसाफ़ तो मीडिया और पब्लिक प्रेशर में सामने आ रहा है और कुछ किसी और मक़सद के तहत. ख़ैर अच्छाई गिनवाने में कोई नुक़सान तो नहीं. आप ही की तरह आशावादी हूं कि वह सुबह कभी तो आएगी. लेख के लिए धन्यवाद

  • 2. 14:29 IST, 16 फरवरी 2010 braj kishore singh:

    न्याय में देरी और ऊपर से नीचे तक क़ायम भ्रष्टाचार के कारण जनता का न्यायपालिका पर से विश्वास ही उठता जा रहा है. उच्चतम न्यायालय को इस पर भी ध्यान देना चाहिए. सरकार और सरकारी नीतियों के बदले पूँजी के बढ़ते प्रभाव के इस युग में अच्छा हो अगर न्यायपालिका बेहाल जनता के अधिकारों की रक्षा पर ध्यान दे. सरकारी नीतियों को लागू करने के लिए तो पूरी कार्यपालिका है जो नाकारा हो चुकी है और शासक कम शोषक की भूमिका ज्यादा संजीदगी से निभा रही है. अगर उच्चतम न्यायालय जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रियता दिखाती भी है तो वह कोई एहसान नहीं करेगी बल्कि अपने संवैधानिक कर्तव्यों को ही पूरा करेगी.

  • 3. 15:35 IST, 16 फरवरी 2010 अजय कुमार झा :

    आपकी बहुत सी बातों से सहमत हूं. निश्चय ही अदालतों के न सिर्फ़ रुख़ और कार्यप्रणाली बल्कि मध्यस्थता केंद्रों, विधिक सहायता प्राधिकरण, लोक अदालतें, प्ली बार्गेनिंग जैसी व्यवस्थाओं को अपनाने से भी ये बात दिख रही है. मगर इस बीच ख़ुद न्यायपालिका में बढ़ता भ्रष्टाचार एक गुपचुप चुनौती के रूप में बढ़ता जा रहा है.

  • 4. 16:38 IST, 16 फरवरी 2010 himmat singh bhati:

    विनोद जी भारत में जनसंख्या दिन दुनी और रात चौगुनी हो रही है और सरकार जनसंख्या रोकने का उपाय भी नहीं कर रही है, दूसरी ओर भारत में न्यायालयों की कमी है और न्यायधीशों की भी कमी है. और क़ानून भी पुराना है और इधर-उधर से लिया हुआ है. जो न्याय देने का कम और लोगों को दबाव में रखने वाला ज़्यादा है. न्यायधीश भी क्या करे जो क़ानून है उसी के अनुसार फ़ैसला करने पर मजबूर है क्योंकि न्यायधीश तो क़ानून बनाने से रहे. यह काम विधायकों का है जिसमें चुनाव जीत कर बाहुबली, भ्रष्टाचारी और दाग़दार लोग शामिल हैं.

  • 5. 16:54 IST, 16 फरवरी 2010 Gaurav Shrivastava:

    मैं विनोद जी से सहमत हूं. एक ताज़ा मिसाल इस प्रकार है, इंदौर में एक डेढ़ साल के बच्चे की एक अपराधी ने 13 दिसंबर 2009 को हत्या कर दी. उसने सिर्फ़ इसलिए उस बच्चे को मार डाला कि उसका मन कर रहा था कि किसी को मारे डाले. आज इंदौर के न्यायालय ने उस अपराधी को मौत की सज़ा सुनाई है. मैं बहुत ही ख़ुश हूं इस फ़ैसले से और भगवान से प्रार्थना करते रहें कि हमारी न्याय प्रणाली इसी प्रकार तरक़्क़ी करती रहे. न्याय को लेकर बहुत सारी समस्याएं हैं. अभी भी इसमें बहुत देर लगती है. भ्रष्ट राजनेता अभी तक आज़ाद घूम रहे हैं. पुलिस ने अपनी साख खो दी है. अगर इन तीनों में बदलाव आता है तो हम देखेंगे कि हमारी न्याय प्रणाली ने कितनी तरक़्क़ी की है.

  • 6. 17:52 IST, 16 फरवरी 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    विनोद जी, इस लोकतंत्र के नागरिक और भी बहुत कुछ चाहते हैं. यह एक नन्हीं सी शुरुआत मात्र है. अभी तो महासागर पार करना है इस आशा की छोटी सी नाव के सहारे. माननीय न्यायधीश सेनानिवृत्ति के पश्तात ही क्यों आवाज उठाते हैं न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार के बारे में ? मैं समझता हूँ कि जिस गति से तथाकथित सुधारवादी राह पर हम बढ रहे हैं निश्चित तौर पर इस भ्रष्टाचार के कैंसर से उभरने के लिए शायद कई दशक लगें. सौ बातों की एक बात कि जब तक हमारी ससंद में भ्रष्टाचारी, अपराधी, घूसखोरों और जमाखोरों का बोल-बाला रहेगा तब तक हमारी न्यायपालिका भी इस रोग से अछूती नहीं रह सकती है, क्योंकि हमारे यहाँ हर विषय में खाने के दांत और दिखाने के और दांत होते हैं. हमारे देश में आज भी नेता और रसूख वाले लोगों का सिक्का चलता है. नियम, क़ानून और जेल की कोठरियाँ तो नेताओं के लिए बनीं ही नहीं हैं. ऊपर से हमारे यहाँ हर क़ानून में इतनी खामियां हैं कि अपराधी किसी न किसी तरह बचने के उपाय पहले ही खोज लेते हैं तभी तो अपराधी घोर अपराध करने के बाद बड़ी बेशर्मी से अदालत परिसर से बाहर हंसता और मुस्कराता हुआ न्यायपालिका और क़ानून को ठेंगा दिखाते हुए आजाद घूमता है.पीड़ित और बेक़सूर लोग ठगे से रह जाते हैं. यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि भारत में कुर्सी , धन और रसूख न्याय पर भारी पड़ते हैं. लेकिन मैं निराशावादी नहीं हूँ. बेशक जिस दिन आम आदमी जाग जाएगा तो यही नन्हीं सी चिंगारी ज्वालामुखी बनकर अपराध और भ्रष्टाचार के दानव को जड़ से खत्म कर देगी.

  • 7. 17:52 IST, 16 फरवरी 2010 himmat singh bhati:

    क़ानून मंत्री जी, इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. कहाँ है मानवाधिकारी, कहाँ है खोजी मीडिया, क़ानून भी यही है? लगता यही है कि सरकार मीडिया को विज्ञापन देकर अपने कारनामें छुपाती है तो क़ानून मंत्रालय भी क़ानून दिवस पर हर साल हर ज़िले में, हर समाचार पत्र में यह विज्ञापन जारी करता है कि पैसों के अभाव में न्याय से कोई वंचित नहीं रहेगा और उसे क़ानूनी मदद भी दी जाएगी, तो क़ानून मंत्री जी ये कैदी जेलों में कैद क्यो हैं. यह तो संविधान के मूल अधिकारों के रक्षक हैं वे कैसे ग़लती कर बैठे. इन कैदियों के बाद आए और फ़ैसले करा कर चलते बनें. ये लोग न्याय के इंतज़ार में आज भी बैठे हैं.

  • 8. 18:52 IST, 16 फरवरी 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने. लेकिन मेरे ख्याल से इतनी आशा करना भी बेकार है. यह मेरे साथ हुआ है, 1982 में मेरे ख़िलाफ़ एक झूठा मुक़दमा दर्ज हुआ और उसका फ़ैसला 2007 में हुआ. इसमें मैं बरी हुआ. लेकिन मेरा 25 साल जो बरबाद हुआ. उसके लिए मैं इस महान भारत में कहाँ दावा करूँ. इसमें कई शक नहीं है कि अगर अदालतों को डर नहीं होता तो बेइमान नेता देश को एक बार फिर गिरवी रख देते. लेकिन अदालतों से भी बहुत उम्मीद करना बेकार है क्योंकि अब अदालतों में भी बेइमानी का बोलबाला हो गया है.

  • 9. 12:37 IST, 17 फरवरी 2010 ashok mishra :

    बहुत अच्छे विचार हैं आपके.

  • 10. 17:46 IST, 17 फरवरी 2010 AfsarAbbasRizvi "Anjum":

    विनोद जी, हमारे देश का बहुत कुछ भविष्य हमारी न्यायपालिका पर निर्भर करता है.क्योंकि हमारा यह मानना है कि हमारे महामहीम जज बहुत ही सावधानी और निष्पक्षता से फ़ैसले करते हैं. उनके फ़ैसले में ग़रीब और अमीर का भेदभाव नहीं होना चाहिए. क्योंकि निष्पक्ष न्याय के लिए अमीरी-ग़रीबी, जाति-बिरादरी, सगे संबंधियों का भेद नहीं होना चाहिए. सबसे ऊपर है सही फ़ैसला. इसके साथ ही हम सब उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में यह दूरी और कम होगी. जैसे कि आजकल हमारे माननीय जज ने अपनी सारी पूँजी का व्योरा सार्वजनिक कर दिया है. यह एक बहुत ही अच्छा संकेत है. उम्मीद की जानी चाहिए कि नेताओं पर भी भविष्य में निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी.

  • 11. 19:20 IST, 17 फरवरी 2010 himmat singh bhati:

    विनोद जी, सकारात्मक सोच से क्या होता है? भारत का क़ानून डाल-डाल तो अपराध करने वाले भी पात-पात चलते हुए दिखाई दे रहे हैं. क्योंकि क़ानून में ख़ामियाँ और उसमें लचीलापन भी है. इसका फ़ायदा अपराध करने वाले उठा रहे हैं. सरकार ने सस्ता न्याय और जल्दी न्याय मिलने के लिए पंच (मध्यस्थ) क़ानून को अपना रखा है. इसे ज्यादातर सरकारी विभागों ने अपना रखा है जिससे वे कोई भी काम अपनी मर्जी से कर सकें.

  • 12. 19:52 IST, 18 फरवरी 2010 himmat singh bhati :

    विनोद जी आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार किसी भी बात को लेकर ब्लॉग लिख देते हैं और उसपर लोग अपनी राय भी देते हैं. और बातों ही बातों में कोई जानकारी लोगों तक पहुंच जाती है. लोग व्यवस्था के बारे में सवाल करने लगते हैं.

  • 13. 20:40 IST, 19 फरवरी 2010 HImat Desai:

    इसके लिए सोनिया गांधी सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं. अगर अदालतों को डर नहीं होता तो बेइमान नेता देश को एक बार फिर गिरवी रख देते. लेकिन अदालतों से भी बहुत उम्मीद करना बेकार है क्योंकि अब अदालतों में भी बेइमानी का बोलबाला हो गया है.
    .....ये तो मज़ाक है.'

  • 14. 15:57 IST, 23 फरवरी 2010 Mohammad Athar khan Faizabad Bharat:

    भारत में दूसरे विभागों की तरह न्यायपालिका भी है, करोड़ों मामलों में कभी-कभी किसी को इंसाफ़ मिल जाता है तो उसको दुनिया देखती और दिखाती है. लेकिन उन लोगों को कोई नहीं देखता या दिखाता जिन्हें इंसाफ़ नहीं मिलता या इतनी देर से मिलता है कि उसका कोई महत्व नही रह जाता. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के 17 साल बाद भी किसी को सज़ा नहीं मिली, गुजरात के दंगों में हज़ारों लोग मारे गए लेकिन अदालत (कथित रूप से) ने अपना काम नहीं किया. इन अदालतों से भला इंसाफ़ की उम्मीद कैसे की जा सकती है. आम आदमी की तो वहां तक पहुंच ही नहीं है, जिनके पास पैसा और ताक़त है वह आसानी से फ़ैसले को ख़रीद लेते हैं.
    देखोगे तो मिल जाएंगे हर मोड़ पे लाशे
    ढ़ूंढ़ोगे शहर में कोई क़ातिल न मिलेगा

  • 15. 15:29 IST, 24 फरवरी 2010 Sugriv Mehla:

    हिम्म सिंह भाठी आपसे समहत हूँ और आपने जो लिखा है वो सही है.

  • 16. 07:24 IST, 28 फरवरी 2010 Divya:

    दुनिया की अदालतों में तो हम लाचार हैं. हो सके तो ऊपर वाले (ईश्वर) की अदालत का ई मेल एड्रेस भेज दीजिए.

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