ज़ुबान खोलें तो धनवर्षा!
तो आख़िरकार 'ख़ान साहब' ने अपना दम साबित कर दिया. अब वो आराम से कह सकते हैं कि - जी हाँ, माई नेम इज़ ख़ान. मुझे तो ये सोचते हुए डर लगता है कि ख़ान साहब अपना दम साबित नहीं कर पाते तो कहीं भारतीय संस्कृति की कहावत के अनुसार उन्हें अपना नाम बदलना पड़ जाता तो क्या होता?
फ़िल्म रिलीज़ होने के बाद ख़बरें आईं कि ब्रिटेन में ख़ान साहब ने बॉक्स ऑफ़िस पर धमाकेदार नौ लाख 36 हज़ार पाउंड यानी लगभग साढ़े छह करोड़ रुपए कमाई की है और ब्रिटेन में इसने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अमरीका में भी फ़िल्म ने पहले हफ़्ते में ही 23 लाख डॉलर यानी क़रीब साढ़े आठ करोड़ फ़िल्म टीम की झोली में डाल दिए हैं.
हो भी क्यों ना भला, फ़िल्म की टीम ने अमरीका और ब्रिटेन के तूफ़ानी दौरे जो किए थे और वो भी शिवसेना की मशालों से अपनी पूँछ बचाने की भाग-दौड़ में. कुछ दिन के लिए शिवसैनिकों से जान भी बच गई और फ़िल्म का धुँआधार प्रचार तो हुआ ही.
वैसे ये ख़याल ज़रूर आता है कि अगर शाहरुख़ ख़ान ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के बारे में वो नहीं कहा होता, जो उन्होंने कहा तो क्या वाक़ई फ़िल्म को इतना प्रचार मिलता? भला हो शिवसेना का कि उसने ख़ान साहब का काम आसान कर दिया.
शाहरुख़, प्रीटि ज़िंटा और शिल्पा शेट्टी जैसी फ़िल्मी हस्तियों ने सुनहरे पर्दे से बेतहाशा धन बटोरने के अलावा क्रिकेट की दुनिया को भी ख़ूब मुनाफ़ा कमाने वाली दुनिया बना दिया है. मेरी अनभिज्ञता को माफ़ कीजिएगा कि मुझे ये जानकारी नहीं है कि ये लोग कितना धन कल्याणकारी कार्यों में ख़र्च करते हैं, आपको कुछ जानकारी हो तो ज़रूर बताइएगा.
शाहरुख़ को पाकिस्तानी खिलाड़ियों की तो चिंता रही लेकिन पूरे भारत की बात अगर छोड़ भी दें तो उनकी मुंबई नगरी में ही करोड़ों लोग ऐसे भी रह रहे हैं जिन्हें हर रोज़ रोज़ी-रोटी के लिए तरसना पड़ता है, छह, आठ, दस लोगों के परिवार की गुज़र-बसर एक ही झोंपड़ी में होती है.
क्या शाहरूख़ ख़ान और उनकी टीम भारत देश के ऐसे लोगों के लिए कुछ धन ख़र्च करने की ज़हमत करेंगे जो उसी भारत देश के नागरिक हैं लेकिन उनके लिए करोड़ों रुपए मिलने तो क्या, सिर्फ़ चंद रुपए भी सपना लगते हैं जिनसे रोज़मर्रा का ख़र्च चल जाए.
शाहरुख़ ख़ान शायद अमरीका और ब्रिटेन की दुनिया से सबक लेने से घबराते हैं जहाँ हर सेलेब्रिटी यानी लोकप्रिय व्यक्ति किसी ना किसी दान संस्था से जुड़ा होता है और अपनी मौजूदगी से भारी धन चैरिटी के लिए जुटा देते हैं. अगर मैं कुछ ग़लत कहूँ तो टोक दीजिएगा कि मेरे ख़याल में शाहरुख़ ख़ान इन देशों के दौरे सिर्फ़ धन बटोरने के लिए करते हैं.
आज शाहरुख़ ख़ान में वो दम है कि उनकी एक झलक धन की बरसात कर सकती है, अब ये उन पर है कि वे अपने इस जादू का कमाल लोगों में ख़ुशियाँ बाँटने और उनका दुख दर्द दूर करने में करते हैं या फिर सिर्फ़ अपनी और फ़िल्मी दुनिया की जेबें भरने के लिए.
ये बात भी बहुत कचोटती है कि क्या हम और आप जैसे आम लोगों को कभी ये सुध आएगी कि ज़्यादातर क्रिकेट या फ़िल्मी सितारे हमारी जेबें ख़ाली करवाते हैं, बाज़ारी दुनिया इसमें उनकी मदद करती है और फिर उसी पैसे के बल पर और ज़्यादा बाज़ारी चीज़ें और संस्कृति हम पर थोप दी जाती हैं, आधुनिकता और फ़ैशन का नाम देकर लोग उनके पीछे भागते-चले जाते हैं.
लेकिन हम और आपमें वो हुनर कहाँ कि शाहरुख़ ख़ान की तरह अपना मुँह खोलें तो पैसे की बरसात हो जाए...

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मैं आपकी कुछ बातों से सहमत भी हूँ और कुछ से असहमत भी. शाहरुख़ ने लीलावती या नानावती (मुझे याद नहीं) अस्पताल के लिए 50 लाख रुपए दिए थे और वहाँ उनकी माँ फातिमा के नाम से एक वार्ड भी है. इसमें बच्चों का ख़ास ख्याल रखा जाता है. इसके पीछे भी प्रचार है लेकिन एक तरह की ये मदद ही थी. दरअसल सफलता अपने साथ डर भी लेकर आती है इसलिए मोहवश या डरवश यह दान में भी (कभी-कभार) यकीन रखते हैं, सलमान खान भी इसके उदहारण हैं. सहमत इस मामले में कि अभी आमिर ख़ान ने कॉपीराइट मामले में इस्तीफ़ा देकर आपकी बात साबित की. शाहरुख़ और अमिताभ वाकई सारे काम पैसों के लिए करते हैं.
महबूब साहब, शाहरुख़ ख़ुद भिखारी है वो क्या मदद करेगा ग़रीबों की. आप का लेख 100 प्रतिशतद सच है लेकिन आप यह भूल गए कि भिखारी कैसे ग़रीब की मदद कर सकता है. लोगों का अमन चैन ख़ासकर मुसलमानों को परेशानी में डालने वाला और उनके नाम पर ही पैसे कमाने वाला ख़ान है ये.
शाहरुख़ अच्छा ख़ासा टैक्स अदा करते हैं. मेरे ख़याल में उनके लिए ये काफ़ी है. अगर हर व्यक्ति ईमानदारी से टैक्स अदा करें तो दान की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. हमें किसी कामयाब व्यक्ति पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में भी झाँकना चाहिए.
महबूब साहब, औरों पर उंगली उठाना हमेशा आसान होता है. आपने अब तक कितने पैसे दान में दिए हैं? सबकी अपनी मजबूरी है. सच बोलूँ तो शायद आप ब्लॉग की वजह से भले ही ना जाएँ फ़िल्म देखने पर इतनी कामयाब फ़िल्म को घर के अंदर आप भी देखेंगे या देख चुके होंगे. बुरा मत मानिएगा पर शाहरुख़ का पीछा छोड़कर देश के भ्रष्टाचार, नेतागिरी आदि के बारे में कुछ लिखिए, अच्छा होगा...
खान साहब, वैसे तो कहने को ये बात भी सही है की बहुत सारे पत्रकार होंगे जो आपसे ज्यादा योग्यता रखते होंगे, तो क्या उनके लिए आपने अपनी नौकरी उन्हें दे दी. नहीं न. तो फिर आप कैसे कह रहे हैं की मुंबई के ग़रीब लोगों की चिंता छोड़कर शाहरुख़ पाकिस्तान के धनी क्रिकेटरों का ख़याल रख रहे हैं. सभी अपनी क़िस्मत का पाते हैं. कितने सारे कलाकार होंगे जो की बहुत अच्छी अदाकारी कर सकते हैं, पर उन्हें मौका नहीं मिला. उनपर तो आपका ब्लॉग नहीं आया. इनकी बातें छोड़िए, राजेश खन्ना. सुपरस्टार. कभी उनके लिए भी किसी ने ऐसा ही लेख लिखा होगा. आज उन पर ऐसी नौबत क्यों आ गई है कि वो 'सी' ग्रेड की फिल्मो में काम कर रहे हैं. आपने इस पर क्यों नहीं ब्लॉग लिखा. तो क्या मैं सोच लूँ के आपने शाहरुख़ पर ब्लॉग इसलिए लिखा. चूँकि शाहरुख़ पोपुलर हैं सो आप भी उसी बहाने अपनी पहुँच बढ़ाएंगे. बदलाव अचानक से नहीं आता है साहब, सामूहिक प्रयास की ज़रुरत होती है. जिसमे आपकी भी भागीदारी होनी चाहिए लेकिन कम से कम ऐसी सोच के साथ नहीं.
मैं ये कहना चाहता हूँ कि हमारे भारत देश में फ़िल्म के लोग इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनकी बयानबाज़ी होती है तो इतने सियासी लोग और पुलिस की व्यस्तता बढ़ जाती है. क्या सरकार ने कभी इतनी पुलिस सुरक्षा आम लोगों को दी है, अगर नहीं तो क्या अमीर लोग या एक्टर या नेता लोग ही ही अहम हैं देश के लिए.
ख़ान साहब, बहुत अच्छा लिखा है. मैं आप जैसे इंसान से बहुत ख़ुश हूँ.
आपने शाहरुख़ खान की बात की है, तो यहाँ यह बता देना भी प्रासंगिक होगा की शाहरुख़ खान आज जो भी है, अपनी मेहनत और काबिलियत के बलबूते है और उनकी सफलता ने यह साबित कर दिया है कोई भी अपने हुनर की बदौलत कामयाबी की बुलंदियों को छू सकता है. रही बात उनके हर मुँह खोलने पर धनवर्षा की तो यह तो उनके स्टारडम की वजह से है.
आपने एक और बात इन फिल्मी सितारों द्वारा अपने आस-पास के गरीबों के सुध न लेने की उठाई है, तो आंकड़े न होने की बात तो आपने भी स्वीकारी है. मेरा मानना है की बिना सच का पता लगाये कम-से-कम इन नामचीन हस्तियों पर आरोप तो न लगाये जाएँ.
मुझे तो ये समझ में नहीं आता कि हर बड़े कलाकार की फ़िल्म के साथ बड़े ही सुनियोजित ढंग से विवाद चालू हो जाता है. लेकिन इससे फ़िल्म की कमाई पर कोई असर नहीं पड़ता और फ़िल्म को फ़ायदा ही होता है. तो इसका मतलब ये है कि विवाद भी फ़िल्म बनाने वाले ही शुरू करते हैं जिससे कि लोगों में फ़िल्म के लिए उत्सुकता बढ़े और उनकी कमाई भी बढ़े. हाँ ये बात अलग है कि छह महीने बाद फ़िल्म को कोई पूछने वाला नहीं मिलता, लोग भूल जाते हैं कि ऐसी कोई फ़िल्म भी थी. क्या ये धोखा-धड़ी नहीं है?
शाहरुख़ ख़ुद भिखारी है वो क्या मदद करेगा ग़रीबों की. आप का लेख 100 प्रतिशत सच है लेकिन आप यह भूल गए कि भिखारी कैसे ग़रीब की मदद कर सकता है. लोगों का अमन चैन ख़ासकर मुसलमानों को परेशानी में डालने वाला और उनके नाम पर ही पैसे कमाने वाला ख़ान है ये.
महबूब ख़ान साहब, जैसाकि आपने लिखा है, अगर कुछ ग़लत लिखूँ तो टोक दीजिएगा. तो मैं अपनी आपत्ति दर्ज करा रहा हूँ. आपकी टिप्पणी शाहरुख़ के काम से ज़्यादा निजी लग रही है. मुझे काफ़ी ताज्जुब है इस तरह के ब्लॉग से और मुझे काफ़ी आपत्ति हैं तो एक-एक करके लिख रहा हूँ--
कोई एक्टर अपनी फ़िल्म के प्रचार के लिए जानबूझकर विवाद खड़ा करते हैं या नहीं इस पर तो मैं कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन कोई भी फ़िल्म सिर्फ़ प्रचार और विवाद के कारण हिट हो सकती, ये बिल्कुल ग़लत है. नहीं तो रहना है तेरे दिल में सुपरहिट होती. उन्होंने तो हिंदुस्तान की एक-एक गली में पोस्टर पाट दिए थे. फ़िल्म हिट होने के लिए एक ही चीज़ की ज़रूरत होती है और वो है अच्छी फ़िल्म होना.
शाहरुख़ ने जो टिप्पणी पाकिस्तानी खिलाड़ियों के बारे में की वो उन्होंने आईपीएल से जुड़े होने और एक अच्छा इंसान होने के कारण की, जोकि एक साधारण सी बात है. मुझे लगता है कि आजकल साधारण बातें लोगों को पसंद नहीं आतीं, इसलिए विवाद ढूँढते हैं. जहाँ तक चैरिटी का सवाल है तो आप और हम किसी पर इसके लिए सवाल तो नहीं उठा सकते क्योंकि ये कोई ज़रूरी तो नहीं है. और मुझे कभी-कभी अभिनेताओं की गई चैरिटी का समाचार आप लोगों के ज़रिए ही मिलता रहता है. वैसे भी मेरा मानना है कि सबसे बड़ी चैरिटी ये है कि आप अपना काम पूरी ईमानदारी से करें, इसी से समाज को काफ़ी कुछ मिल जाता है.
हम चैरिटी के लिए किसी पर दबाव तो नहीं डाल सकते. ये तो अनैतिक बात है. मैं शाहरुख़ ख़ान का फ़ैन तो नहीं हूँ पर आपकी इस बात से ज़रूर सहमत हूँ कि इस ख़ान में दम तो है.
महबूब ख़ान जी, शायद आप लिखते समय ये भूल गए कि शाहरुख़ ख़ान एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं... आज उनकी बुलंदियों के पीछे उनकी बरसों की कड़ी मेहनत है. यही नहीं, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, संजीव कुमार इत्यादि भी अपनी मेहनत के बूते ही आज जाने और पहचाने जाते हैं. सुर्ख़ियों में आने और रहने वाली सभी महान हस्तियों के आगे-पीछे और साथ में लक्ष्मी जी रहती हैं. फिर आप स्वयं को क्यों भूल गए कि आज जहाँ आप हैं वहाँ आप अपनी क़ाबलियत के दम पर हैं... और क्या वहाँ धन और दौलत आपके साथ नहीं है? अब ये बात और है कि आप कितना धन दान में देते हैं ये शाहरुख़, प्रीटि ज़िंटा या शिल्पा शेट्टी के साथ-साथ हम जैसे पाठक को भी नहीं मालूम है. कुछ काम चुप-चुप भी करने पड़ते हैं...
भैया देश के लिए वो कुछ ना कुछ तो करते ही होंगे. मैं शक नहीं करता. मुझे लगता है कि उससे कुछ ज़्यादा ही मदद की आशा रखते हैं हम? देखिए हर चीज़ की व्यवस्था होती हैं, वो पैसा कमा रहे हैं अपनी अगली पीढ़ी के लिए, अपने लिए, अपने सगों के लिए. सीधी सी बात बस इतनी ही है.
महबूब भाई, यहाँ आपको और हमें कोई नहीं सुनने जा रहा है. मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ. यह सभी भारतीयों की समस्या है कि हम पहले आपने को देखते हैं और केवल अपने को ही देखते हैं, देश और राष्ट्र या समाज को नही देखते. देश में क्या कुछ हो रहा है उसपर टिप्पणी करने वाला या कोसने वाला कोई नहीं है.
मैं सम्मानपूर्वक आपसे असहमत हूँ, क्योंकि हमें इस बात की क्षमता नहीं है कि किसी के दाने देने पर की कसौटी पर परखे और ये कि ख़ान ने कितना दान दिया है देते हैं. दान का असल मतलब होता है- एक हाथ से दो तो दूसरे हाथ को पता नहीं चले. अगर को वो पैसा कमा रहे हैं तो इसका मतलब है कि वो अच्छा काम कर रहे हैं.
शायद आपको मालूम हो कि शाहरुख़ सबसे अधिक आयकर जमा करने वाले अभिनेताओं में से एक हैं. वो आम आदमी से इस उच्चाई पर पहुंचे हैं. लेकिन इस मुक़ाम पर पहुंचने के लिए उन्हें काफ़ी मेहनत करनी पड़ी है. आज वो 16 घंटे काम करते हैं. हमें उनके होसले को सलाम करना चाहिए.
फॉक्स जैसे स्टूडियो का बैकअप होने के कारण माय नेम इज खान का प्रचार तो वैसे भी खूब होता ही. लेकिन फिर भी आपकी बात अकाट्य है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों वाली टिप्पणी पर मचाए गए बवाल के कारण ये फिल्म रिलीज से पहले लगातार और लंबे समय तक सुर्खियों में रही. शाहरुख ने जानबूझ कर विवाद कराया इसका कोई सबूत नहीं है. वैसे शाहरुख की एक्टिंग की धार जैसे-जैसे कम हो रही है, उनकी व्यावसायिक बुद्धि धारदार होती जा रही है. इसमें कुछ बुरा भी नहीं है. हीरोगिरि तो जिंदगी भर किसी की नहीं चली है, लेकिन पैसे का मुनाफेदार कारोबार जरूर किया जा सकता है. रही बात चैरिटी की तो मुझे लगता है आगे चल कर शाहरुख ज़रूर बढ चढ कर इस फिल्ड में भी सक्रिय होंगे. एक तो दान पुण्य पर ध्यान केंद्रित करने की उनकी उम्र नहीं हुई है, फिर पहले अरबों-खरबों की कमाई हो जाए तो उनकी चैरिटी से बड़ी आबादी का भलो हो सकेगा.
खान साहब दुरुस्त फरमाया आपने! धंधा है पर गंदा है ये! हमाम में सब नंगें हैं. भूखा नंगा क्या किसी की मदद करेगा? रूपये - पैसे की खनक के आगे सब कुछ फीका है. यह बड़े दर्जे के भिखारी हैं इनकी भीख अन्तराष्ट्रीय स्तर की है. तो इधर राजनीतिक भिखारी कुएं के मेंढक हैं. बस पीढी -दर पीढी कुएं के दायरे में ही टर्र-टर्र करके कटोरा भरे का भरा.
यह धंधा है पर गंदा है, इसमे शाहरूख से ज़्यादा मेहनत ठाकरे साहब ने की है आखिर पाट्री के लिए धन भी तो जुटाना है.
महबूब साहब, आपने बिल्कुल सही लिख पर कौशल देश मे लोगों को नेक काम मे किसी की मदद करने का रिवाज नही है. बहुत सी टिप्पणिया तो ऐसी हैं कि जैसे आपने उनको दान का कह कर उनकी भैस को लठ मार दिया.
दान के मिथक
१) मेहनत की कमाई से दान करने की जरूरत नही है, यह कम तो काले धन वालों को करन है
२) सिर्फ अमीर लोग ही दान करते हैं- आमेरिक देश मे हर कोई अपनी आय का 4प्रतिशत से 10 प्रतिशत दान करते हैं, जबकी खुद के मकान का लोन अभी बाकी है तब भी. दान आमदनी पर होता है,
आपका कहना सही है. ब्रिटेन जैसे देशों में बहुत से अभिनेताओं को बहुत संघर्ष करना पड़ता है लेकिन फिर भी वो ग़रीब लोगों की मदद करने के लिए अच्छा-ख़ासा धन ख़र्च करते हैं. पश्चिमी देशों में तो बिलगेट जैसे अमीर लोग भी अरबों डॉलर ख़र्च करते हैं लेकिन भारत में अंबानी जैसे लोगों ने देश के लिए कुछ नहीं किया है.
महबूब साहब शहरुख भला क्यों अपनी मेहनत की कमाई को दान में दे...क्या तब उसे किसी ने दान दिया था जब वो खुद स्ट्रगल कर रहा था. आज अगर वो इस मुकाम पर है तो अपनी मेहनत के दम पर. और उसका हिस्सा वो किसी दूसरे से क्यों बांटे?? हालांकि वो कितना हिस्सा दान में देता है इसकी गवाह ऊपर इस ब्लॉग पर की गई टिप्पणियों में साफ है. रही बाद जिन मुंबई के लोगों को आप मजबूर और ग़रीब बता रहे हैं वो केवल अपने काहिलपन की वजह से हैं क्योंकि मुंबई शहर ने बड़े बड़े कंगालों को माला माल बना दिया है बशर्ते आपमें मेहनत करने का माद्दा हो...धीरूभाई अंबानी को देखिए...इतिहास इसका गवाह है. तो आपसे अनुरोध है कि कंगालों का पक्ष लेने के बजाए कुछ और करें.
महबूब साहब आपने एकदम सही वक्त पर सही मुद्दा उठाया है. शाहरूख के पक्ष में जनता सिनेमा हॉल की ओर उमड़ पड़े हैं और उनकी फिल्म शिवसेना के विरोध के बावजूद सुपरहिट होने की ओर बढ़ रही है. जनता उन्हें कितना प्यार करती है इसका इससे बड़ा क्या प्रमाण हो सकता है लेकिन उन्होंने आज तक इस देश की जनता के लिए क्या किया है, क्या दिया है? कुछ भी नहीं. शाहरुख अगर आपका लेख पढ़ते तो उन्हें अपने मन में झांककर देखना चाहिए और गरीब जनता के लिए कोई सार्वजानिक निर्माण करना चाहिए.
ख़ान साहब, आपने बिल्कुल सही लिखा है. शाहरुख़ ख़ान सस्ती लोकप्रियता के पीछे भागने वाले इंसान हैं.
महबूब भाई, क्या बात है, आपके द्वारा किंग ख़ान से की गई छोटी सी गुज़ारिश (उम्मीद) को बहुत से बंधु बिलावजह ग़लत समझ रहे हैं. किंग ख़ान, दान दें या ना दें, ये उनकी इच्छा है लेकिन उन्हें इस बात का अवश्य ध्यान रखना होगा कि समाज उनसे कुछ अपेक्षाएँ रखता है. ख़ुदा करे उनकी हर फ़िल्म हिट हो, उन पर दौलत की दिन-रात बरसात हो, उनका यश दिन दूना और रात चौगुना बढ़े, मगर उनसे समाज के लिए कुछ करने की उम्मीद तो मुझे भी है, महबूब भाई, बिल्कुल आपकी ही तरह. वो जिस परोपकार में हाथ बटाएंगे, देश की जनता उनके साथ हो लेगी जिससे देश का विकास और ग़रीबों का भला अवश्य होगा. एक पुर उम्मीद ब्लॉग के लिए कोटि-कोटि बधाइयाँ.
मैं आप से सौ प्रतिशत सहमत हूँ. हमारी हिंदूस्तानी जनता गांधी के तीन बंदर हैं. मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ.
जवाब नहीं आपके लेख का...।
महबूब साहब, इसमें कुछ सच्चाई भी है और कुछ नहीं भी. पर इतना ज़रूर है कि अमीरों की पहचान तभी है जब हम ग़रीब हैं और नेता हों या अभिनेता, सब सिर्फ़ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. शाहरुख़ ख़ान ने अपनी फ़िल्म के प्रचार के लिए मुँह खोला, तो शिव सेना ने अपनी विरासत के लिए. आम जनता की कौन सोचता है.
महबूब साहब, आपने शाहरुख़ के बारे में तो ये ब्लॉग लिख दिया है. शाहरुख़ ने अपनी फ़िल्म के प्रचार के लिए ये सब नौटंकी की है. आज हर क्षेत्र में मीडिया पर ग़लत तरीक़े से प्रचार हो रहा है. आमिर ख़ान अपनी फ़िल्म के प्रचार के लिए कभी जनता के बीच भेस बदलकर तो कभी लोगों के बाल काटते नज़र आते हैं. ये सब फिल्म प्रचार के लिए करते हैं इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन आपने राहुल गाँधी का नाम क्यों नहीं लिया जो ग़रीबों की बस्ती में जाकर रात गुज़ारते और खाना खाते हैं, वो भी तो अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं. ये सब ड्रामा है आम आदमी को बेवकूफ़ बनाने का. आज देश में कोई भी क्षेत्र हो सब प्रचार ही तो हो रहा है और इसमें मीडिया भी साथ देती है. दोष उसका भी तो है.
आपका ब्लॉग कुछ चीज़ों के बारे में सार्थक प्रश्न उठाता है. जो नामी-गिरामी हस्तियाँ हैं उनको समाज के प्रति अपने दायित्वों से मुकरना नहीं चाहिए. सुनील दत्त, नरगिस दत्त, सुनील गावस्कर, शबाना आज़मी वग़ैरा कई ऐसे लोग अपनी जवाबदेही से रूबरू रहे हैं. लेकिन सभी चीज़ों के लिए बाज़ारवाद को दोष देना शायद ग़लत होगा. यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वो अपने समाज के प्रति क्या योगदान देना चाहता है. वैसे आज के समाज की सोच और चाहत भी शाहरुख़ ख़ान जैसे लोगों को अपना मक़सद हासिल करने में मदद करती है.
कई टिप्पणीकारों ने इतने रोचक तर्क रखे हैं कि उन पर तोताराम के कार्टून बन सकते हैं. मुलाहिज़ा फ़रमाएं. -शाहरुख़ टैक्स अदा करते हैं, सो चैरिटी क्यों करें. तो चैरिटी कर-चोरों के लिए है क्या? -शाहरुख़ ने मेहनत से पैसा कमाया है, ख़ैरात में क्यों बाँटें, तो क्या ख़ैरात बाँटने के लिए पहले भ्रष्ट तरीक़े से पैसा कमाना होगा? -मुंबई के ग़रीब अपनी काहिली के कारण ग़रीब हैं, तो क्या 'ग़रीब उन्मूलन' अभियान चलाया जाय ताकि सिर्फ़ धनी लोग ही बच जाएँ?
आपने जो भी लिखा क्या मैं ये समझूं कि आपने भी नाम कमाने के चक्कर में शाहरुख़ को निगेटिव दिखाया, अगर नहीं तो आपने उसकी एक भी पॉज़िटिव बात क्यों नहीं लिखी. हम बहुत से ऐसे अच्छे काम करते हैं जो बताना नहीं चाहते. मैं कहता हूं कि आप ख़ूब लिखें लेकिन पूरी जानकारी के साथ, आधी-अधूरी जानकारी सभी के लिए ख़तरनाक होती है जैसे शिव सेना को ये ही नहीं पता था कि किसा बात की माफ़ी मांगना है शाहरुख़ को क्योंकि जो शाहरुख़ ने कहा वही देश के गृह मंत्री ने भी कहा, उन्हें बोलने की किसी को हिम्मत नहीं.
ख़ान साहब, शाहरुख़ ख़ान ने क्या सारे देश का ठेका ले रखा है? हमारे देश में बहुत से करोड़पति और भी हैं. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों हर कोई हाथ धोकर शाहरुख़ के पीछे पड़ा है. हमारे देश में सरकार नाम की भी कोई चीज़ है या नहीं. ग़रीबों को देखना, देश का विकास करना, सरकार का काम है, किसी व्यवसाई या फ़िल्म स्टार का नहीं.
खान साहब ! क्या आप वाकई मे सोचते है, कि जिस देश मे आम आदमी चीनी, आलू, प्याज़ और ना जाने कितनी आवयश्क चीज़ों के दाम बढ़ने से परेशान है, उन लोगों को इस बात की फिक्र है कि माइ नेम इज़ ख़ान का क्या होगा या शिव सेना या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) मे से किस की जीत होगी????????????????
दो कौड़ी का ब्लॉग है. ब्लॉग पर आपकी जलन का साया है. शाहरुख खान दिल्ली का एक साधारण लड़का था जो अपनी मेहनत से बुलंदी पर पहुँचा है. इस देश में ग़रीबों की मदद का ठेका सरकार का है शाहरुख़ का नहीं. वो रील लाइफ़ और रीयल लाइफ़ दोनों में हीरो बनकर ऊभरा है. उससे जलने की बजाए सिख लें.
शाहरुख ख़ान न तो हिंदू हैं और न ही मुसलमान है. इसका धर्म सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा है और वो ख़ुद पैसे की चक्कर में रहता है तो वो किसी की क्या मदद करेगा.
ख़ान साहब, शुक्रिया एक नेक लेख लिखने के लिए. लेकिन ये सच है कि अगर राजनेता और अभिनेता अपनी कमाई का दस प्रतिशत भी नेक काम में ख़र्च करते तो आज देश की हालत ये नहीं होती.
शाहरुख़ ख़ान आज सारी दुनिया में जाना जाने वाला नाम है. यहाँ तक कि वे गूगल पर सबसे अधिक सर्च किए जाने वाले सेलेब्रेटी हैं. उनपर इस तरह की भाषाहीन अभद्र टिप्पणी करने वाला कोई समझदार इंसान तो नहीं हो सकता. शब्बीर ख़ान साहब शायद यह भूल रहे हैं कि मुस्लिम को मुसीबत में डालने वाला इंसान शाहरुख़ ख़ान नहीं बल्कि अमरीकन और पाकिस्तानी हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक लालच के लिए इस्लाम और मुस्लिम कौम को बदनाम किया है.
आपने जो भी लिखा है वह एक सच लगता है. लेकिन जो पैसा वे कमा रहे हैं वह कहीं न कहीं उनके पैसों पर ही आप लोग फ़ोकस करें जो हमारे पैसे की कमाई को अपनी तीजोरी के लिए उपयोग करते हैं. आपके हिसाब से सेलिब्रेटी ने सौ-दो सौ करोड़ रुपए कमा लिए, आप उन नेताओं के लिए क्या कहेंगे जो एक हज़ार लाख से कम की तो सोचते ही नहीं हैं. मीडिया का काम ऐसे लोगों को सामने लाना है.
महबूब ख़ान साहब, आप बिल्कुल सही हैं. हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं. सबको अपनी बात कहने का अधिकार है.
हाँ भाई. जरा शिव सेना की दादागिरी पर भी ध्यान दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा. क्या उन्होंने सभी लोगों को ठेका ले रखा है. जब चाहे जिसपर भी ऊँगली उठा देते हैं. ऐसे लोगों को आप जैसे लोग ऊँगली उठाने से डरते हैं जिससे इनकी हिम्मत और भी बढ़ती है. यह मानते हैं कि शाहरुख़ ख़ान का पैसा कमाना पेशा है लेकिन ठाकरे कितने बड़े समाज सेवक हैं सबको पता है, जरा उनकी काली करतूतों पर भी ध्यान दें.
दान देने के लिए दिल का होना भी ज़रुरी है. शाहरुख मौक़ापरस्त हैं और केवल अपने ही बारे में सोचते हैं.
शुक्ला जी मुझे नहीं मलुम आप भरतीय फ़िल्म ही देखते हैं या दुसरी भाषा की भी फ़िल्में देखते है .दुनीया में बंबईया फ़िल्मी दुनिया नक़ल पर चलती है. ये लोग ग़रीबों की क्या मदद करेंगे जो कहानी, संगीत, पट्कथा, ड्रेस, बालों का स्टाईल, सीन, आदि तक चुरा कर आपनी झोली भरते है. माई नेम इज़ ख़ान फ़िल्म में शाहरुख ख़ान पूरी तरह से रेन मैन फ़िल्म के हिरो होफ़ मैन की नक़ल करते मिले हैं. आज से 15 साल पहले की अमरीकन फ़िल्म का बासी है जिसको आप अच्छा बोल रहे हो.
महबूब जी ने जो लिखा है बहुत सही, खान बन कर खान का अपमान भी किया. अमीर ग़रीब की गर्दन ही रेतेता है. भांड ग़रीब की मदद क्या करेगा (शाहरुख ने खुद ही कहा था मै भाड हु)