मेरा परिवारवाद बनाम तेरा परिवारवाद
सुना है कि लालकृष्ण आडवाणी इन दिनों ठीक तरह से सो नहीं पा रहे हैं.
उनके सपनों में दिवंगत विजया राजे सिंधिया आ रही हैं और उनसे शिकायत कर रही हैं कि वे उनके परिवार की राजनीति पर वार कर रहे हैं.
सुना है कि उनका कहना है कि वसुंधरा राजे सिंधिया उनकी बेटी होने की वजह से राजनीति में नहीं हैं और न ही वसुंधरा राजे का बेटा दुष्यंत उनकी वजह से भारतीय जनता पार्टी का टिकट पाता रहा है. उन्हें यह भी नाराज़गी है कि यशोधरा राजे लगभग दो दशक अमरीका में रहकर यदि मध्यप्रदेश में राजनीति कर रही हैं तो वह सिंधिया परिवार की वजह से तो है नहीं.
कहा जा रहा है कि जागते हुए भी लालकृष्ण आडवाणी जी को कई लोग परेशान कर रहे हैं.
लोग बता रहे हैं कि गोपीनाथ मुंडे मुँह फुलाए बैठे हैं कि उनकी बेटी पंकजा विधायक क्या बन गईं पार्टी को परिवारवाद दिख रहा है. उनका कहना है कि पूनम महाजन को टिकट इसलिए थोड़े ही मिला कि वे उनकी भतीजी हैं, वह तो दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की बेटी होने के नाते मिला था.
सुना है कि सांसद मेनका गांधी कह रही हैं कि एक तो वे कांग्रेस वाले गांधी परिवार की काट की तरह पार्टी की सेवा कर रही हैं और उस पर अब आडवाणी जी को उनका बेटा वरुण अखर रहा है. उनकी शिकायत है कि एक तो पार्टी के लिए वरुण गांधी ने अपने सेक्युलर होने का पारिवारिक चोगा उतार दिया और उसका यह फल मिल रहा है.
हिमाचल के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल सफ़ाई देते घूम रहे हैं कि आडवाणी जी ने जो परिवारवाद की बात कही है वह उनके बेटे अनुराग ठाकुर पर लागू नहीं होती.
अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा और भतीजी करुणा शुक्ला भी सुना है कि सफ़ाई दे रहे हैं कि उन्होंने अटल जी के नाम से कभी राजनीति नहीं की, इसलिए उन्हें परिवारवाद की परिभाषा से अलग रखा जाए.
कल्याण सिंह को लग रहा है कि पार्टी से अलग क्या हुए आडवाणी जी को उनका बेटा राजबीर सिंह खटक रहा है.
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राहत की साँस ले रहे हैं कि अच्छा हुआ उनकी पत्नी को पार्टी का टिकट नहीं मिला उधर जसवंत सिंह सोच रहे हैं कि अब आडवाणी उनके बेटे मानवेंद्र सिंह की राजनीति के पीछे पड़ गए हैं.
लेकिन भाजपा के निकटतम सहयोगी और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सुना है कि बेचैन हैं कि आडवाणी जी एनडीए में रहकर साथ देने का अच्छा सिला दे रहे हैं. उनका कहना है कि उनका बेटा सुखबीर सिंह अपने दम पर उप मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष है. उनकी बहू हरसिमरत कौर अपनी क़ाबिलियत पर सांसद हैं. उनका भतीजा मनप्रीत बादल और उनके दामाद अवधेश सिंह कैरों इसलिए मंत्री हैं क्योंकि उनसे क़ाबिल लोग राज्य में थे ही नहीं. वे पूछ रहे हैं कि यदि सुखबीर के साले विक्रम सिंह मजीठा को मंत्री न बनाया होता तो सुखबीर के लिए कुर्सी कौन खाली करता?
सुना है कि बाला साहब ठाकरे कह रहे हैं कि यदि आडवाणी में ठीक राजनीतिक समझ होती तो वे उद्धव ठाकरे को परिवार के बेटे की तरह आगे बढ़ाते. वे कह रहे हैं कि जीवन भर भतीजे राज ठाकरे को राजनीति सिखाने के बाद वह बेवफ़ाई कर गया इसलिए उसे ठाकरे परिवार का नहीं मानना चाहिए.
अभी इस पर संघ-परिवार की ओर से कुछ सुनाई नहीं पड़ा है. कहा जा रहा है कि वे विश्लेषण और मंथन कर रहे हैं कि कहीं आडवाणी जी ने नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाने की नाराज़गी में संघ-परिवार पर तो टिप्पणी नहीं की है?
भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में जब से लालकृष्ण आडवाणी ने परिवारवाद की राजनीति पर टिप्पणी की है तब से कांग्रेसी बगलें झाँक रहे हैं. वे कह रहे हैं कि नेक काम की शुरुआत तो अपने घर से ही होनी चाहिए और यदि कोई अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाएगा तो देश को कैसे आगे बढा़ सकेगा? कांग्रेस का एक धड़ा कह रहा है कि वे भाजपा पर परिवारवाद की राजनीति के लिए पलटवार इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे एक ही परिवार को परिवार मानते हैं शेष को वे देख ही नहीं पाते.
कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव की पार्टी ने कहा है कि आडवाणी परिवारवाद की बात कहकर सेक्युलर ताक़तों को कमज़ोर करना चाहते हैं. उन्हें आशंका है कि कहीं आडवाणी जी को अमर सिंह ने बरगला तो नहीं लिया.
जनता असमंजस है कि किस परिवार की राजनीति को परिवारवाद माने और किसे नहीं?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
आप कहना क्या चाहते हैं?
सच में भारतीय राजनीति की सही तस्वीर पेश की हैं.
कौन किसकों क्या बोले जब सब ही एक से हैं.
मतला अर्ज़ है-
हमाम में सब नंगे हैं!
भैया हर-हर गंगे हैं!!
समझ नहीं आया.
मेरे ख़्याल से बात एक दम साफ़ है. कोई भी दूध का धुला नहीं है. सब एक ही तरीके की राजनीति कर रहे हैं. परिवारवाद किसी एक ही पार्टी की बपौती नहीं. इसका लुत्फ़ सभी उठा रहे हैं.
लेखक ने बहुत ही शानदार तरीक़े से परिवारवाद के विषय को रखा है. भारतीय राजनीति में परिवारवाद एक तरह से अभिन्न अंग बन गए हैं जैसे भ्रष्टाचार. पता नहीं जनता को कब अक़्ल आएगी. क्या वो चुनाव के समय तक वायदे का हिसाब लेगी. अंधेर नगरी चौपट राजा.
विनोद जी, बाकई में आप की सोच की मैं दाद देता हूँ, जिस व्यंगात्मक शैली में आपने राजनीति में परिवारवाद की छाई हुई काली छाया को उजागर किया है, वह शायद ही कोई करता. आज ज़रूरत है आम जनता को परिवारवाद की राजनीती से ऊपर उठकर सही व्यक्ति को अपना नेता चुनने की. वैसे यह वक़्त भी दूर नहीं दिखता, मुलायम सिंह की पुत्रवधू और पूनम महाजन एक ताज़ा उदाहरण हैं.
वर्मा जी, बात वही है. हमाम में सभी नंगे हैं.
विनोद जी, लगता है कांग्रेस ने आप पर कोई कुत्ता छोड़ दिया है. इसलिए आपने कांग्रेस के परिवारवाद का नाम तक नहीं लिया.
वाह भाई वाह, क्या खूब ब्लॉग लिखा है. बुधवार (सप्ताह के बीच में ही) आडवाणी जी की खटिया खड़ी कर दी. सप्ताहांत तक तो भाजपा हो जाएगा. पता है ना भा .ज. पा. क्या है? भागो जनता पकड़ेगी.
इस ब्लॉग में विनोद जी ने जिन परिवारों का जिक्र किया है दरअसल वे परिवारवाद पर चोट बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अब देश नहीं दिखाई दे रहा है, काबिलियत भी नज़र नहीं आ रही है, विचारधारा से कोई मतलब नहीं, समझ और सूझ-बूझ से कोई मतलब नहीं,यही नहीं जैसे देश से यदि विदेशी गए तो सारा योगदान इन्हीं का. कथित नेता, नेत्री के पुत्रों, पुत्रियों और पत्नियों का ही रहा होगा. यहाँ तक की जब नेता किन्ही कारणों से अकारण स्वर्गवासी हो जाते है, तो उनके उक्तों को सहानुभूति के वोट बटोरने का हथियार बनाया जाता है, काश देश इन सहानुभूति के कामों को पेट पालने तक ही सिमित रखे तो काम चल जाएगा, पार्टियों का नाम लिए बिना यह कहना चाहूँगा की नेता का बेटा नेता तो, ग़लती से ही डकैतों के बेटों को डकैत बनने से भी नहीं रोकना चाहिए, मगर विनोद जी ये शर्माएँगे नहीं.?
विनोद जी, ऐसा महसूस होता है कि आप अगले चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे. क्योंकि आप बाकी पार्टियों के परिवारवाद पर तो खूब लिखा है लेकिन कांग्रेस पर पर्दा डाल दिया है. आज के जमाने में एक सच्चे पत्रकार की यही पहचान है.
'मेरा मुझ में कुछ नहीं परन्तु तेरा है पर मेरा है, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर, लेकिन जहाँ हक़ न मिले वहाँ लूट सही, हम पंछी इक डाल के, अंधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे, लूटो भैया लूटो कोई रिश्तेदार, नाती, संबंधी छूटने न पाए क्योंकि कल हो न हो, कौन कहता है कि नेता ईमानदार और रहमदिल नहीं होते. कम से इस नेक काम में तो हमारे राजनीतिक प्रतिनिधी ईमानदार और समय के पाबंद हैं.
परिवारवाद तो इसलिए फल-फूल रहा है कि जनता नेताओं के परिवार वालों को वोट देती है. परिवारवाद को सिर्फ़ इसलिए नकार दें कि यह परिवारवाद है,यह बात समझ में नहीं आती है. कोई भी पार्टी उसे ही चुनाव लड़ाएगी जो चुनाव जीतता है. अगर वह किसी नेता के परिवार का हुआ तो उसमें पार्टी का क्या दोष. सारा दोष तो आम जनता का है जो भेड़ों की तरह है जिसे भेड़िए से बचाने के लिए उनके मालिक ने यह तो रटवा दिया कि भेड़िया आएगा और हमें खा जाएगा, उससे बचकर रहना.लेकिन इसे अमल में कैसे लाना है यह नहीं सिखा पाया और भेड़िया सबको खा गया. इसलिए श्रीमान जी नेताओं को दोष देना छोड़िए और समस्या की जड़ काटने की कोशिश कीजिए.
हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, अंजाम गुलिस्ताँ क्या होगा.
ये बीबीसी का एक और प्रयास है, यह साबित करने के लिए कि कांग्रेस की कमीज भाजपा की कमीज से अधिक सफेद है.
ब्लॉग तो अच्छा है लेकिन अस्पष्टता भी साफ़ है.
लेखक महोदय, आप सही हैं, राजनीति में और सब जगह परिवारवाद है लेकिन आपने एक जगह इशारा करके यह बता दिया कि आप भी परिवारवाद के शिकार हैं. तभी तो आपने अपने लेख में कांग्रेस का जिक्र तक नहीं किया है.वहाँ तो पीढ़ियों से परिवारवाद है, उसे आप कैसे भूल गए.
निराश किया विनोद आपने इस लेख से, एकतरफा लेख है ये..कांग्रेस का उल्लेख तो किया ही नहीं,
नेहरु परिवार, जो शायद परिवारवाद का जनक है..आप उल्लेख करना ही भूल गए..
कलम तो आजाद होनी चाहिए, आपने ने उसे कैद कर दिया,
हम हिन्दुस्तानी दूसरों पर तो खूब उँगलियाँ उठाते हैं..अरे उन सब को तो चुनते हमीं है अपने ही वोटों से , फिर क्या पूरा ठीकरा उन पर फोड़ें.
और किसी का भतीजा हो या बेटा कोई, या बहु और बेट...देश के विकास का होना चाहिए
बहुत ठीक हुआ उनकी इस देश को कोई ज़रुरत नहीं है.
इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवारवाद भारतीय राजनीति के लिए एक कुरीति बन गई है. प्रत्येक नेता अपनी विरासत अपने परिवार के ही सदस्यों के हाथों में सौंपना चाहता है. किसी को भी न तो देश की चिंता है न ही पार्टी की. कभी यही ग़लती धृतराष्ट्र ने भी की थी और उसे अपने सौ पुत्रों को खोना पड़ा था. क्या दूसरे आम कार्यकर्ताओं में योग्यता बिल्कुल नहीं होती? कहा जाता है कि भारत को सिर्फ़ पाँच हज़ार परिवार ही चलाते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस देश में योग्यता की जगह सर्वत्र भाई-भतीजावाद का बोलबाला होगा वह देश कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता. आडवाणी जी ने सही मुद्दा उठाया है और उन्होंने तो स्वयं अपने बच्चों को राजनीति से दूर रखकर देश के समक्ष उदाहरण पेश किया है. मैं जनता से भी आह्वान करता हूँ कि वे राजनीतिक परिवारवाद को पूरी तरह नकार दें और आने वाले चुनाव में उसे धूल चटा दें.
विनोद जी, लोगों की आँखें खोलने के लिए साधुवाद.
विनोद जी राजनीति में तो आपको होना चाहिए, क्योंकि जनता की न सही नेताओं की नब्ज अच्छी तरह पकड़ पा रहे हैं. कांग्रेस के आपको टिकट मिल ही जाएगी.
बहुत ही ख़ूबसूरत तरीक़े से व्यंगात्मक शैली का प्रयोग किया है आपने. परन्तु कांग्रेस को क्यों माफ़ कर दिया आपने समझ में नहीं आया!
जबतक नेता परिवारवाद से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक इस देश का भला नहीं होगा.
बेहद ख़ूबसूरत शैली का इस्तेमाल किया है आपने। कुछ साथियों का सवाल लाज़मी है, भाजपा पर आपने सटीक निशाना साधा, कांग्रेस पर नहीं साधने की जो वजह मुझे दिखती है.. वो शायद ये हो सकती है कि सपना भाजपा के वरिष्ठ नेता को आया और सपने में आने वालीं भी भाजपा की ही थीं। इंतज़ार है कब किसी कांग्रेसी के ख़्वाबों में कोई कांग्रेसी आएगा और अपने परिवारवाद को अपने मुताबिक़ कहेगा।
फिर कहूंगा, शानदार सर।।