सिर्फ़ बातों से नहीं होगा...
भारत में किसी भी खेल के साथ जनता के समर्थन की विडंबना है कि जिस खेल में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहता है उसे ही लोगों का समर्थन मिलता है.
अब अगर प्रदर्शन अच्छा होगा तभी लोग वो खेल देखेंगे, लोग खेल देखेंगे तो उस खेल में पैसा लगेगा, पैसा लगेगा तो खिलाड़ियों के भाव बढ़ेंगे, खेलों की सुविधाएँ बढ़ेंगी.
इसके बाद प्रदर्शन और अच्छा होगा, और लोग खेल देखेंगे, और पैसा आएगा.
एक अजीब सा दुष्चक्र है ये जिसमें भारतीय खेल पड़ा हुआ है और शायद उसी का शिकार हुआ है हॉकी भी.
मगर हॉकी किसी एक खिलाड़ी के बेहतर प्रदर्शन की बदौलत सुधर नहीं सकती, टीम गेम है इसलिए पूरी टीम को एकजुट होकर खेलना पड़ेगा तभी सबको उसका फ़ायदा होगा.
इस प्रक्रिया में भारत ने जब विश्व कप में पाकिस्तान को 4-1 से हराया तो अचानक हॉकी का गुणगान शुरू हो गया मगर अगले ही मैच में भारत को ऑस्ट्रेलिया से 5-2 से हार मिली.
ये स्कोर सुनकर लगेगा जैसे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने भारत की ख़ूब दुर्गत की होगी मगर ऐसा था नहीं.
दोनों हाफ़ के पहले कुछ मिनटों को छोड़ दें तो भारत ने भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को काफ़ी परेशान किया, अंतर ये था कि भारतीय उनकी गति और क्षमता की बराबरी नहीं कर सके.
इसके अलावा शुरुआती मिनटों में ही गोल हो जाने से टीम के मनोबल पर भी असर पड़ा.
अब ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे मौक़े पर सिर्फ़ स्कोर लाइन देखकर टीम का समर्थन न छोड़ दिया जाए.
किसी समय शीर्ष पर रही भारतीय हॉकी गर्त से उबरने के लिए संघर्ष कर रही है और उसी प्रक्रिया में रैंकिंग में 12 नंबर की इस टीम ने दूसरे नंबर की टीम ऑस्ट्रेलिया के सामने बहादुरी से प्रदर्शन किया.
लोगों की मौजूदगी स्टेडियम में इस बार उतनी नहीं थी जितनी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में थी मगर लोगों ने काफ़ी ज़ोर-शोर से टीम का साथ तो दिया.
भारतीय टीम को अभी पूल में ही तीन मैच और खेलने हैं.
अगर उसका प्रदर्शन अच्छा रहा तो संभव है कि वो पूल की पहली दो टीमों में भी आ जाए पर अगर वो पहली दो में नहीं आ पाती तब भी लोग उतनी ही उत्सुकता से भारतीय हॉकी टीम का समर्थन करते रहेंगे या विश्व कप ख़त्म होने के बाद टीम और खिलाड़ी भुला दिए जाएँगे.
विश्व कप का आयोजन जब भारत को दिया गया था तो कहा गया कि इससे भारत में हॉकी में नई जान फूँकने में मदद मिलेगी मगर जिस अफ़रा-तफ़री में ये आयोजन हो रहा है और जिस तरह अंतिम कुछ दिनों में हॉकी के बजाय सिर्फ़ सुरक्षा का ही मसला सुनाई देता रहा मुझे नहीं लगता कि आयोजन का मूल उद्देश्य पूरा हो पाया है.
विश्व कप के मुख्य प्रायोजक ने वीरेंदर सहवाग, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और प्रियंका चोपड़ा को हॉकी का समर्थन करते दिखाया.
राज्यवर्धन भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच में दिखे भी मगर ये हस्तियाँ भारत के कितने मैचों में टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँच पाएँगी, देखते जाइए.
कुछ अन्य प्रमुख लोग भी ट्विटर या दूसरे ज़रियों से टीम का हौसला बढ़ाने वाले बयान तो दे रहे हैं मगर क्या वो स्टेडियम तक पहुँचने की भी पहल करेंगे.
गड्ढे से निकलने की कोशिश में भारतीय हॉकी आधे रास्ते तो पहुँची दिखती है और ज़रूरत इस बात की है कि बाक़ी आधे रास्ते में अगर उसका हाथ फिसलने भी लगे तो जनता के समर्थन के रूप में हाथ बढ़ाया जाए.
भारत के मैचों के दौरान मेजर ध्यान चंद राष्ट्रीय स्टेडियम की जो भी गूँज बाहर तक सुनाई देती है वो और भी दूर तक सुनाई देगी तभी भारत में हॉकी का कल्याण संभव है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
अगर खेल की बात करें तो भारतीय टीम का प्रदर्शन पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेले गए मैच से ज्यादा अच्छा था. अंतर बस इतना था की इस बार ऑस्ट्रलिया को बहुत सारे पेनाल्टी कॉर्नर मिले जिन्हें उन्होंने गोल में बदल दिया. लेकिन कोई बात नहीं. अब लोगों ने कम से कम पूरा मैच तो देखना शुरू कर दिया है. पर मुझे शिवेंद्र सिंह के बाहर निकलने का कारण समझ में नहीं आया. वह भी तब जब विपक्षी टीम ने कोई शिकायत नहीं की हो. क्या ये जान बूझ कर भारतीय खिलाड़ियों का मनोबल तोड़ने की कोशिश नहीं है. यह सही है कि खेल सिर्फ़ एक खिलाडी का नहीं है लेकिन अगर क्रिकेट के किसी मैच में सहवाग या तेंदुलकर के न खेलने का मनोवैज्ञानिक असर तो पड़ ही जाता है. मेरी शुभकामनाएँ भारतीय खिलाडियों के साथ है. चक दे इंडिया.
मुकेश जी, लिखने से पहले आप अपने गिरेहबान में तो झांक लेते कि बीबीसी और एक खेल पत्रकार होने के नाते आपने हॉकी के साथ कितना इंसाफ़ किया है. आपका यह कहना कि हॉकी एक खिलाड़ी का नहीं है तो क्या बकवास खेल क्रिकेट क्या एक खिलाड़ी का खेल है. मेरे ख्याल से केवल हॉकी ही नहीं बल्कि अन्य खेलों का भी भारत में जनाजा निकल रहा है. इसके लिए सबसे अधिक मीडिया ज़िम्मेदार है, उसमें बीबीसी भी शामिल है. क्योंकि मैं बीबीसी के मुक़ाबले अन्य कोई भी चैनल नहीं पसंद करता.
आपने बिल्कुल सही लिखा है, मुकेश. आपके लफ़्जों में भी वहीं कशीश है जो आपकी आवाज में है.
कल भारत के मैच में हारने के बाद भी मैं उसके प्रदर्शन से ख़ुश था. जहाँ एक ओर दूसरे देश के खिलाडी विश्व कप के लिए रणनीति बना रहे थे वहीं हमारे खिलाड़ी एक महीने पहले पैसे क़ि दिक्कत से जूझ रहे थे और तो और टीम क़ि क्या दुर्दशा है आप तो जानते ही हैं. अब अगर ऐसे में भी हमारी टीम कड़ा टक्कर दे सकती है ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम को तो आप इससे ज्यादा क्या उम्मीद रखते हैं. कल राजपाल सिंह की ओर से दूसरा गोल देखने लायक था और तीसरे गोल में भारत की तरफ से तो कोई कमी नहीं थी लेकिन शायद ऑस्ट्रेलिया की किस्मत अच्छी थी कि उसने गोल रोक दिया.
मुकेश जी, मैं आपके ब्लॉग से पूरी तरह सहमत हूँ , सिवाय ब्लॉग की शुरुआत में लिखी बातों से. मेरे नज़र से पसंदगी का कोई विकल्प नहीं होता. 60 साल के बाद टेस्ट क्रिकेट में अब हम अव्वल है, वनडे मैचों में अभी भी नहीं. अब इन क्रिकेटरों को कितना प्रोत्साहन चाहिए? अभिनव बिंद्रा के गोल्ड जीतने के बाद भी आज लोगों को क्रिकेट ही ज्यादा पसंद है. हॉकी को अपने आप को लोगों की पसंद बनाने के लिए वक़्त लगेगा. यह सच है कि हॉकी में इंडिया कभी अव्वल था. इसकी दुर्दशा का कारण उसका बोर्ड है. खिलाडी या लोगों की पसंद बाद की बात है. मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि अभी की टीम को समय दे अपने आप को साबित करने में. इस कप को इनकी अग्निपरीक्षा न समझें, मंजिलें अभी और भी हैं.
मुकेश जी, बिल्कुल सही है, यह दुनिया भी उगते सूर्य को प्रणाम करती है या यूँ कह लें कि जोर वाले का पत्थर ही पहाड़ चढ़ा करता है. आज हॉकी के प्रति जो मीडिया के माध्यम से आम खेल प्रेमियों के बीच जगह बन पाई है वह क़ाबिले तारीफ़ है. यानी कि अब हमारी हॉकी पेज थ्री की हिस्सेदारी की ओर अग्रसर है तो इस खेल को और भी जगह मिलने की उम्मीद है. आशा है कि हॉकी जल्द ही अपना खोया हुआ मकाम हासिल कर लेगी. लेकिन इस काम में केवल प्रायोजकों और प्रसिद्ध हस्तियों के बलबूते ही कुछ होने वाला नहीं हैं. आम खेल प्रेमियों को भी जी जान से इसका समर्थन करना होगा. जो जज्बा हम भारतियों में क्रिकेट के खेल के दौरान दिखता है उसी उत्साह की ज़रुरत हॉकी को ऊँचाइयों तक ले जाने में हमें करनी होगी. हमें अपने आप से यह सवाल करना होगा कि क्या हम ऐसा कर पा रहे हैं? बजाय इसके कि हम औरों पर दोषारोपण करें?
बीबीसी मैं रोज़ देखता हूँ लेकिन जब भी हॉकी की ख़बर पढ़ना चाहता हूँ तो हॉकी की एक भी ख़बर देखने को नहीं मिलती है. आज जब मैंने दूसरे टीमों के मैचों का स्कोर देखना चाहा तो, कोई ख़बर नहीं मिली. मंगलवार को पाकिस्तान का स्पेन से मैच था, उसकी ख़बर कहाँ है. इंग्लैंड का दक्षिण अफ्रीका से मैच था, उसकी भी कोई ख़बर नहीं है. इसके बाद आप कहते हैं कि हॉकी की हालत ख़राब है.
यह सच है कि इस बार हॉकी को उबारने के लिए ज़ोरदार कोशिश हुई है. चाहे वह इंडियन हॉकी फ़डरेशन हो, प्रमोट करने वाले स्टार हों या दर्शक. सभी ने हॉकी के लिए फिर वही प्यार दिखाया है. लेकिन इस विश्व कप के ख़त्म होने के बाद सब ख़त्म हो जाएगा.
मुकेश जी, आप की बात से पूरी तरह सहमत हूँ और सचमुच दुर्भाग्य है कि जिस देश का राष्ट्रीय खेल ह़ॉकी हो, वहाँ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हॉकी वर्ल्ड कप को शुरू होने से पहले दिन हेड लाइन भी नसीब नहीं थी. शुक्र है बीबीसी है वरना क्या कहें.
ऐसा सभी खेलों के साथ होता है कि जब उसमें अच्छा प्रदर्शन होता है तभी उसे जनसमर्थन भी मिलता है. हॉकी के साथ भी यही बात लागू होती है. एक समय हमारे इतिहास में ऐसा भी था जब भारतीय जनता हॉकी खिलाड़ियों को सिर-आँखों पर बैठाती थी. अस्सी के दशक में पश्चिमी देशों ने षड्यंत्र कर हॉकी के नियमों में इस तरह के बदलाव कर दिए कि हॉकी में कलात्मकता की जगह ताकत की प्रधानता हो गई और भारत हॉकी में पिछड़ता चला गया. इसमें जलते पर नमक का काम किया भारतीय हॉकी फेडेरशन ने. उसके अधिकारियों का ध्यान कभी हॉकी के विकास पर रहा ही नहीं. वैसे वर्तमान टीम में वह दमखम नहीं दिखता जिससे वह विश्व कप जीत सके. देखिए भारत किस स्थान पर रहता है. वैसे उसे विश्व हॉकी फेडेरशन के भारत विरोधी रवैए के खिलाफ भी खेलना होगा सिर्फ प्रतिद्वंद्वी टीमों के खिलाफ ही नहीं.
हम एक बार फिर चैंपियन होंगे.
मुकेश यह देख कर अच्छा लगा कि क्रिकेट की चें चें के बीच कोई हॉकी की बात भी कर रहा है. लेकिन यह कहना चाहूंगा कि आपने अधूरी तस्वीर पेश की है. सिर्फ़ समर्थन के बूते तो हॉकी की मौजूदा हालत को बेहतर कर पाना शायद कठिन होगा. असल में इसके लिए बड़े पैमाने पर बदलाव और नई पहल करने की ज़रूरत है. हॉकी इंडिया की भूमिका को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं जो वास्तव में सबसे महत्वपूर्ण है. अक्सर आरोप लगाया जाता है कि देश में सिर्फ़ क्रिकेट की बात होती है लेकिन ऐसा कहने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि बीसीसीआई ने देश में क्रिकेट के लिए जो ढांचा खड़ा किया है वह उसकी लोकप्रियता के लिए सबसे ज़रूरी था. तो हॉकी के लिए क्या किया जा रहा है.... कितने टूर्नामेंट होते हैं देश में? कितने प्रशिक्षक और कितने एस्ट्रोटर्फ़ स्टेडियम हैं हमारे पास? क्रिकेट से तुलना करेंगे तो कुछ नहीं है. ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि हॉकी लोकप्रिय होगी और हम एक बार फिर दुनिया की आला टीमों में शुमार होंगे. सब कुछ बदलना होगा... पहले बुनियादी ढांचा बनाएं... अच्छे खिलाड़ी तैयार करें. दुनिया की शीर्ष टीमों को हराने का माद्दा पैदा करें और लगातार कुछ बड़े टूर्नामेंट जीतें... देश की जनता और स्पॉन्सर अपने आप आपके पीछे खड़े हो जाएंगे. महज़ एक मैच में पाकिस्तान को हराने से कुछ नहीं होगा... क्यांकि अंत में तो टीम शेष मैच हार गई.