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शायद किसी अबला की लॉटरी खुले...

रेणु अगालरेणु अगाल|सोमवार, 08 मार्च 2010, 10:29 IST

परकटी महिलाएं देश पर राज करेंगी. सोचिए कितनी बड़ी विपदा आज इस पुरुष प्रधान देश के सामने आ खड़ी हुई है. आप ये मत सोचिए कि महिला आरक्षण पर पुरुषों को अपनी गद्दी खिसकने की चिंता है, वो तो देश हित की सोच अवसाद ग्रस्त हो रहे है.

बताइए क्या कलियुग आ जाएगा. पत्नी मंत्री बनेगी और पति क्या रह जाएगा. समाज का खाका बदल जाएगा. भई तुलसीदास भी कह गए है ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी- ये सब ताड़न के अधिकारी. फिर भी देखिए ये सब क्या होने जा रहा है.

कई साल महिला आरक्षण विधेयक के विरोध के नायाब तरीकों--बिल की प्रतियाँ फाड़ना जैसे साहसिक क़दमों के बावजूद अगर ये हो ही रहा है तो अब पुरुषों ने ठान ली है कि उसे इस सारे खेल में अपने फ़ायदे के बारे में सोचना है.

पंचायत में कई प्रधान पतियों की चल निकली है तो अब सांसद पति बन कुर्सी के ख्वाब क्यों न देखे जाए. ये सब वैसे भी देश को बचाने के लिए कर रहे है, खुद के लिए थोड़े ही. विपदा की घड़ी में ही, सही नेतृत्व के गुण नज़र आने लगते हैं. तो भारत में भी इस विपदा की घड़ी में सक्षम लोगों की जमात काम में जुट गई है.

कुछ इस तर्क का सहारा ले रहे है कि इसमें हाइ सोसाइटी की औरतों का फायदा होगा, बेचारी आम औरत इस रेस से बाहर हो जाएगी. इसलिए वो उनकी आवाज़ बन कर इस का विरोध कर रहे है.

ऐसी सोच वालो से मेरा सवाल सीधा सा ये है-- ज़रा ये बताइए कि कौन से पिछड़े, ग़रीब पुरुष बिना आरक्षण के आगे बढ़ पाए?

अब ऐसा ही महिलाओं के साथ होगा. नेताओं की पत्नियां, बहनें, रिश्तेदार, ऊंचे घरानों की बहू-बेटियां संसद में पहुंचेंगी. पर इन सब के बीच एक-आध अबला की भी शायद लॉटरी खुल जाए. ऐसा होगा ही और उसके बाद तो जो हवा चलेगी, वो सभी को छुएगी - क्या परकटी और क्या सीधी साधी.

तो समझदारो, हवा को पहचानों, हवा के रुख को जानो और महिला आरक्षण को अपनी मुहिम में तबदील कर वाह वाही लूटो. कर के देखो...देश का वाकई भला हो जाएगा. और देश की आधी आबादी भी आप को सिर आंखों पर रखेगी.

आपका नहीं तो देश का, समाज का इससे फ़ायदा होगा. फिर आप अपने बारे में कब सोचते है.. आप तो देश के बारे में ही सोचते है ना..

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 10:59 IST, 08 मार्च 2010 संजय बेंगाणी :

    कितना मजा आएगा जब अपपदस्थ महिला अपने पति राबड़ सिंह को मुख्यमंत्री बनाएगी :)

    महिला दिवस की बधाई स्वीकारें.

  • 2. 11:05 IST, 08 मार्च 2010 महफूज़ अली :

    मैडम.... आपका लेख बहुत अच्छा लगा.... बस शीर्षक थोडा .... गड़बड़ था....

  • 3. 12:35 IST, 08 मार्च 2010 इंडियन:

    जाति के नाम पर आरक्षण मिल गया!
    पिछड़े वर्ग के नाम पर आरक्षण मिल गया!
    धर्म के नाम पर आरक्षण मिल गया!
    और अब लिंग के नाम पर भी आरक्षण मिल जाएगा!
    ... विजेताओं को बहुत-बहुत बधाई...
    परन्तु एक प्रश्न कचोट रहा है कि... योग्यता, काबिलीयत और कुशलता के नाम पर आरक्षण कब मिलेगा?

  • 4. 14:01 IST, 08 मार्च 2010 A Javed:

    विरोध महिला आरक्षण का नहीं उसके स्वरूप का हो रहा है. तथ्यों को मिक्स न करें और बिना जज़्बात के सोचें. अगर मौजूदा स्वरूप क़ानून बन गया तो हम सांसद और विधायक नहीं चुन पाएँगे बल्कि उनके नाम पर मिस इंडिया चुनी जाएँगी. अगर आम सहमति से आरक्षण लागू हो तो भी तो महिलाओं को 33 प्रतिशत मिल रहा है तो फिर विरोध क्यों...
    नींव तो डाल दी आपने कि जो विरोध कर रहा है वह संकीर्ण है और जो समर्थन में है वह जागा हुआ है. सच तो यह है कि जो विरोध कर रहा है वही जागा हुआ है और दूरगामी सोच रखता है.
    इसलिए मैं कहता हूँ कि समर्थको जागो और सोचो...

  • 5. 14:15 IST, 08 मार्च 2010 Kapil Batra:

    जिस दिन योगता और क़ाबलियत संसदीय सीट पाने का पैमाना हो जाएगा. 90 प्रतिशत वर्तमान सांसद ग़ायब हो जाएंगें. इसलिए वो बिल कभी भी पास नहीं होगा. वैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है.

  • 6. 14:16 IST, 08 मार्च 2010 Sunil Soni:

    बहुत ख़ूब.

  • 7. 14:32 IST, 08 मार्च 2010 संदीप द्विवेदी :

    बहुत खूब लिखा है आपने...लेकिन आप शायद मुखिया पति से नहीं मिली....बिहार के पंचायत में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला है...लेकिन इसका पूरा उपयोग उनके पति महाशय कर रहे हैं....इसी प्रकार आगे सांसद पति देखने को मिलेंगे....भारतीय नारी अपने पति को देवता के रूप में पुजती है ऐसे में वो पति की हर हुक्म को भगवन का आदेश ही मानती है...महिला आरक्षण का विरोध करने वालों को महिलाओं के सांसद में पहुंचने से कोई आपत्ति नहीं है बल्कि आपत्ति है तो उनके पूजनीय पतिओं से....

  • 8. 14:54 IST, 08 मार्च 2010 Aeyan Siddharth Singh gautam:

    मैं नहीं जानता की कि किस प्रकार से इस महिला आरक्षण से लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा. यह देश के लिए शर्म की बात है कि आम आदमी इसके बारे में जानता तक नहीं है. सोनिया गांधी, जयललिता, ममता बनर्जी, सुषमा स्वराज महिला हैं और मैं नहीं जानता कि इन महिलाओं ने महिलाओं के लिए कुछ विशेष किया है.
    एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि ये तात्कालिक हल के रुप मे आरक्षण कुछ बद तक मदद कर सकता है, लेकिन बहुत देर तक इसका फ़ायदा नहीं होगा. देश के सामने अनेक समस्याएं हैं और प्राथमिकताएं अलग होनी चाहिए, जिसपर नज़र डालने की आवश्यकता है. इस देश में महंगाई, शिक्षा, रक्षा, सड़क और बिजली और उन जैसे अनेक मुद्दे हैं जिसपर नज़र डालने की ज़रूरत है.

  • 9. 15:39 IST, 08 मार्च 2010 abbas syed:

    अच्छा है रेणु जी कम से कम इससे तो महिलाओं का भला होगा.

  • 10. 15:53 IST, 08 मार्च 2010 vishal sharma:

    जिन पुरुषों को महिलाओं के आरक्षण से ईर्ष्या या गुस्सा आ रहा है, उन्हे में शुभकामनाए देना चाहूँगा कि अगले जन्म उन्हे ईश्वर स्त्री बनाए, जिससे, पुरुषों के खिलाफ किए जा रहे, अत्याचार का वो शिकार ना हो, और एक अच्छी स्त्री बनकर, कम से कम एक पुरुष (पति) को सम्मानजनक और बराबर का दर्ज़ा दे सके. अन्यथा, इस समाज में पुरुष होना किसी अभिशाप से कम नहीं.

  • 11. 16:01 IST, 08 मार्च 2010 vishnu agarwal:

    वैसे भी कौन से योग्य और काबिल राजनेता ही आरक्षण रहित चुनाव प्रक्रिया मे संसद तक गए हैं. यदि अयोग्य और भ्रष्ट राजनेता ही संसद और विधानसभाओं मे जा रहे है, तो क्या फर्क पड़ता है की वो स्त्री है या पुरुष? वैसे कम से कम बाहुबली, गुंडे और बलात्कारियों की संख्या तो कम हो जाएगी. महिलाए कम से कम पुरुष जितनी ख़तरनाक तो नही होती.

  • 12. 18:20 IST, 08 मार्च 2010 sunil kumar:

    यह बहुत ही निराशाजनक है कि सारा मीडिया लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव को विलेन के रुप में प्रस्तुत कर रहा है. जबकि उन्होंने बार-बार कहा है कि वो आरक्षण के विरुद्ध नहीं और उनकी मांग है कि ये आरक्षण 50 प्रतिशत तक दिया जाए. लेकिन इस आरक्षण में भी आरक्षण होना चाहिए, ताकि समाज के दबे और उपेक्षित तबक़े को नुमाइंदगी मिल सके. लालू और मुलायम जो मांग कर रहे हैं उसमें बुराई ही क्या है. अगर उनकी मांग नहीं मानी गई और ये विधेयक पारित हो गया तो इसका फ़ायद दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक बिरादरियों को नहीं मिलेगा.

  • 13. 19:20 IST, 08 मार्च 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेणु जी आपका लेख शानदार है लेकिन किसी अबला को ये अधिकार मिल जाए ये सच नहीं लगता. कल ही मैंने बीबीसी पर जानी मानी आईपीएस ऑफ़िसर किरण बेदी का सुना. जिससे मालूम पड़ा कि वो कितनी हिम्मत और प्रतिभा की धनी हैं. मेरे ख़्याल से यह सब एक राजनीतिक खेल है. कांग्रेस, बीजेपी और कम्युनिस्ट सब चोर-चोर मौसेरे भाई हैं. सवाल यह नहीं हैं कि महिला को हक़ मिले. लेकिन ऐसा नहीं हो कि वो हक़ केवल फ़िल्मी दुनिया और शहरी महिलाओं तक सीमित रह जाए. क्या इस बिल से किसी भी ग़रीब महिला को संसद में पहुंच का मौक़ा मिलेगा?

  • 14. 19:36 IST, 08 मार्च 2010 Bhim Kumar Singh:

    मैं नहीं समझता कि आरक्षण जैसी व्यवस्था से किसी का कुछ भला हो सकता है. जरूरत जन प्रतिनिधियों की योग्यता के मानक तय करने की है, न कि आरक्षण जैसी घटिया इंतजाम की. वैसे भी ऊंचे पद पर बैठी महिलाओं ने देश की उपेक्षित महिलाओं के लिए कुछ नहीं किया है.

  • 15. 20:49 IST, 08 मार्च 2010 Hiren:

    ये विधेयक सिर्फ़ रानीतिक हित साधने का मामला है. जो पार्टियाँ इस विधेयक का समर्थन कर रही हैं वो पार्टियाँ चुनाव में 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को क्यों नहीं देती. और जो पार्टियाँ इस का विरोध कर रही हैं वो उन तबक़ों की महिलाओं को टिकट क्यों नहीं देती जिनके आधार पर विरोध कर रही हैं. मेरे ख़्याल से सभी पार्टियाँ सीटें हासिल करना चाहिती हैं और किसी को असल मुद्दे से मतलब नहीं है.

  • 16. 00:48 IST, 09 मार्च 2010 आशुतोष सिंह:

    जाति के नाम पर आरक्षण का विरोध करने वाला मीडिया, आज लिंग के आधार पर आरक्षण का समर्थन कर रहा है समझ में नहीं आया. रेणु जी आपका लेख कहीं से भी समझ से परे है, प्रश्न ये है कि आरक्षण की ज़रूरत क्यों है? क्योंकि भारतीय राजनीति में महिलाओं की संख्या कम है? ज़्यादा महिलाएं आ भी जाएं तो क्या हो जाएगा ? इंदिरा गाँधी 15 वर्ष तक देश की प्रधानमंत्री रहीं तो कितनी महिलाओं का भला हो गया? सोनिया गाँधी भी पिछले 10 वर्ष से छद्म प्रधानमंत्रित्व कर रही हैं तो क्या महिलाओं की स्तिथि में कुछ परिवर्तन हुआ है? शीला दीक्षित 15 वर्ष से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और सबसे ज़्यादा बलात्कार के मामले दिल्ली से ही आते हैं, उस पर शीला दीक्षित का बयान आता है कि महिलाओं को ज़्यादा रात को घर से बहार नहीं निकलना चाहिए. तो रेणु जी महिलाओं का भला इस आरक्षण से तो बिलकुल नहीं होने वाला है. ज़रूरत है महिलाओं को उचित शिक्षा, स्वास्थ्य, और सम्मान देने की, न कि संसद में आरक्षण का झुनझुना पकड़ा के ज़्यादा गंभीर मामलों से धयान हटाने की. रेणु जी महिला आरक्षण का बिल पास तो हो जाएगा पर क्या आपको लगता है 30 प्रतिशत महिलाओं के संसद में आने से बलात्कारों की संख्या कम हो जाएगी, या दहेज हत्याएं घट जाएँगी, या छेड़छाड़ की घटनाओं में कोई कमी आने वाली है? तो ज़रूरत है आप जैसे पत्रकारों को जागने की, जागिए और देश का ध्यान सही और उचित ज़रूरत की ओर ले जाइए, न कि आरक्षण का ढोल पीट कर महिलाओं को गुमराह कीजिए.

  • 17. 07:31 IST, 09 मार्च 2010 Sa chin Roka:

    मैं रेणु अगाल के विचोरों से सहमत हूं.

  • 18. 07:38 IST, 09 मार्च 2010 Sachin Roka:

    मैडम का लेख मुझे बहुत पसंद आया है. आगामी दिनों में भी ऐसे आलेख की अपेक्षा है.

  • 19. 09:20 IST, 09 मार्च 2010 Not Available:

    मेरे विचार से आप की साइट पर अच्छे विचारों का कोई मोल नहीं है.

  • 20. 10:00 IST, 09 मार्च 2010 rewati raman jha:

    महिलाओं को और भी आगे आने की ज़रूरत है, ख़ास तौर से बिहार जैसे राज्य में. यहां आज भी वे अपने अधिकार को नहीं जानती हैं. कुछ महिलाओं की स्थिति से सारी महिलाओं की स्थिति का पता चल जाए ऐसी बात नहीं है.

  • 21. 11:02 IST, 09 मार्च 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PANJAB :

    रेणु जी इस बात की उम्मीद पहले से ही नहीं थी कि यह विधेयक इतनी आसानी से भारतीय राजनीति के गले उतरेगा. अफ़सोस इस बात का है कि यह विध्येयक भोंडी राजनीति की भेंट चढ़ रहा है. यहाँ कौन किसका हिमायती है सबको सब ख़बर है. सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि जब कुछ माननीय अध्यक्ष महोदय की कुर्सी तक पहुँच कर सदन की मान-मर्यादा का हनन कर रहे थे तब भी मार्शल वहां मौजूद नहीं थे? तो क्या यह पहले से नियोजित था? ऐसा माहौल पैदा होने ही क्यों दिया गया. गुनाह करो और माफ़ी मांग लो बस इतना ही काफ़ी है? ऐसे नेताओं से और क्या उम्मीद की जा सकती है. यह क्या किसी अबला की मर्यादा का सम्मान करेंगें? अगर इतनी ही फ़िक्र है महिलाओं के हितों की तो ये तथाकथित नेता अपने कार्यकाल में महिलाओं की बेहतरी का सबूत दें? और अगर इन्होंने ऐसा कुछ किया भी है तो बस अपने पुरुष प्रधान स्वार्थ के उल्लू को सीधा करने का एक प्रयास मात्र था! जो कुछ कल सदन में हुआ वह शर्मसार कर देने वाला था. हमारी बीमार मानसिकता का जीवंत उदाहरण था.| दुःख होता है कि जिस देश की धरती को भारत माता कहा जाता है और औरत को देवियों का दर्जा दिया जाता है उस देश में महिलाओं का कितना सम्मान होता है यह कल दुनिया के सामने कुछ बिमार राजनीति के शिकार लोगों ने बड़ी आसानी से प्रस्तुत कर दिया. इन राजनीति के ठेकेदारों को महज अपने वोट बैंक की चिंता है भले ही इसके लिए कितन भी गिरना पड़े.

  • 22. 12:14 IST, 09 मार्च 2010 BARA BABOO JHA:

    मैं हर प्रकार के आरक्षण का विरोध करता हूं, चाहे वह धर्म, जाति, नस्ल या लिंग के आधार पर हो. लोकतंत्र में हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार है, इसलिए हमें उन लोगों को उनके अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए. जब किसी भी सीट से किसी महिला को चुनाव लड़ने की इजाज़त है तो पुरूष को चुनाव लड़ने से क्यों वंचित किया जा रहा है. आरक्षण हमेशा के लिए किसी मसले का हल नहीं है. सांसदों का चुनाव पूरी तरह से जनता पर छोड़ दिया जाना चाहिए.

  • 23. 17:03 IST, 09 मार्च 2010 Akhilesh chandra:

    रेणु जी आपका ख़्याली पुलाव बेस्वाद लगा. आपने जिन चीज़ों की कल्पना की है क्या उससे बेहतर हालात देश में नहीं हैं? क्या कर लेंगी महिलाएं आरक्षण के झुनझुने की मदद से संसद में पहुंच कर, समाज में क्या बदलाव आ जाएगा? क्या महिलाएं अपने पति के बिना और उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला ले सकती हैं? क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार रुक जाएगा? आप महिला हैं सिर्फ़ इसलिए आरक्षण का पक्ष ले रही हैं. आज़ादी के छह दशक बाद भी हम आरक्षण से सुधार की बात करते हैं तो यह शर्मनाक है.

  • 24. 00:53 IST, 10 मार्च 2010 yogesh pareek:

    पति ने पत्नी से कहा तुलसीदासजी ने कहा है - ढोर गंवार शुद्र पशु नारी ये सब ताड़न के अधिकारी ,इसका अर्थ समझती हो ,महिला ने जवाब दिया - हाँ ,इसमें एक जगह मैं हूँ बाकी तीन जगह आप हो.
    प्रगति के पथ पर निरंतर आगे बढ़ने का वक़्त आ गया है .
    नारी खुद को अबला न ही कहे और न ही समझे.

  • 25. 08:56 IST, 10 मार्च 2010 शशि सिंह :

    मुझे हैरानी है कि सिर्फ 33 फीसदी पर ही संतोष क्यों? संख्या बल के लिहाज से हमारी माताओं-बहनों का हक़ तो 50 फीसदी का बनता है।

  • 26. 10:00 IST, 10 मार्च 2010 Deepak:

    अधिकतर पुरुष वर्ग महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करता है. संसद में भी 80 प्रतिशत दल इसके समर्थन में हैं. पर इन संसदीय मामलों में बेचारे तुलसीदास कहाँ से आ गए. पर शायद ब्लॉग को बेहतर बनाने के लिए यह ज़रूरी रहा होगा.

  • 27. 10:56 IST, 10 मार्च 2010 suresh baranwal:

    आखिर हम किसी के विकास के लिए आरक्षण की ही बात क्यों करते है. क्या विकास के लिए आरक्षण शिक्षा से अधिक आवश्यक है? राबड़ी देवी ने विधान सभा में बैठ कर क्या कर लिया? फूलन देवी संसद में सोती थी. देश की समस्याओं को महिला सांसदों ने कम नहीं किया है. बेहतर होता यदि हम इतना ध्यान और उर्जा महिलाओ की शिक्षा के मुद्दे पर लगाते. देश के विकास के लिए शिक्षा ही सबसे प्रभावशाली हथियार है, आरक्षण इस हथियार को कुंद करने और देश को भ्रम में रखने का एक घटिया विषय मात्र है. आरक्षण कोई भी हो, जड़ से ख़तम होने चाहिए. वंचितों को शिक्षा दो, देश का और उस वर्ग का विकास स्वतः होगा. सुरेश बरनवाल, सिरसा

  • 28. 11:36 IST, 10 मार्च 2010 A JAVED, QATAR:

    महँगाई दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है. अभी तेल का दाम बढ़ा तो पूरा विपक्ष चिल्लाया. बोतल से जिन्न निकला (महिला आरक्षण) और सब महँगाई सब भूल गए. विधेयक पास हो या न हो महँगाई और तेल के दाम से ध्यान तो हटेगा ही न. चित भी हमारी और पट भी हमारी.नुक़सान किसी भी सूरत में नहीं. सरकार की शायद यही नीति.

  • 29. 15:20 IST, 10 मार्च 2010 sanjay suman:

    रेणु अगाल आपका लेख बहुत अच्छा है. शायद किसी अबला की लॉटरी खुले. यही कहूँगा कि नारी तुम पहचानो अपनी ताक़त को. तुम एक इकाई नहीं हो, तुमसे बनी है एक इमारत.

  • 30. 16:45 IST, 10 मार्च 2010 brajkiduniya.blogspot.com:

    राजनीति शतरंज की बिसात के समान होती है न कि लौटरी.जो मेहनत करेगा और साम, दाम, दंड और भेद चारों के प्रयोग की क्षमता को धारण करता होगा इस क्षेत्र में वही सफल रहेगा चाहे वो पुरुष हो या महिला.कहा जाता है कि भारत को सिर्फ ५००० राजनीतिक परिवार ही संचालित कर रहे हैं.बदली हुई स्थिति में नए लोगों के लिए जरूर ज्यादा मौके होंगे क्योंकि अब आरक्षण रोटेट होता रहेगा.

  • 31. 16:56 IST, 10 मार्च 2010 braj kishore singh, hajipur, bihar:

    आरक्षण चाहे जिस तरह का भी हो देश के लिए अच्छा नहीं है.आप चाहे सोने की बैसाखी का ही प्रयोग क्यों न कर रहे हों आप वास्तव में विकलांग हैं.धीरे-धीरे महिलाएं स्वयं ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे आ रही हैं तब फिर उन्हें आरक्षण देने की क्या जरूरत है? अनुसूचित जातियों और जनजातियों को मिल रहे आरक्षण का लाभ भी कुछ बड़े राजनीतिज्ञ और उनके परिवार के लोग ही उठाते आ रहे हैं इसलिए उनकों मिल रहे आरक्षण को भी समाप्त कर देना चाहिए.

  • 32. 19:02 IST, 10 मार्च 2010 sonal panday:

    आपके विचार बहुत व्यंग्यात्मक हैं.

  • 33. 22:35 IST, 10 मार्च 2010 Ram Lakhan Ram, BHU, Varanasi:

    रेणु जी महिला आरक्षण विधेयक सही मायने में प्रासंगिक तब होता जब समाज के पीड़ित और वंचित महिलाओं को भी भागीदजारी मिलती. कांग्रेस, बीजेपी और लेफ़्ट के शिर्ष नेताओं को केवल महिलाओं की भागीदारी की चिंता है. इन नेताओं को सही मायनों में समाज के समग्र विकास की चिंता नहीं है. हमें सोचना चाहिए कि आख़िर कुछ तो कारण है कि आज भी समाज का एक बड़ी वर्ग पिछड़ा हुआ है.

  • 34. 11:36 IST, 11 मार्च 2010 skarya:

    जरूरतमंद-कमजोर तबकों की महिलाओं हेतु उचित प्राविधान न करके महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास कराने वालों की नीयत साफ नहीं है. ऐसे लोगों ने ही आदिवासियों के साथ भारी पक्षपात करके उन्हें नक्सलवादी बनने को मजबूर कर दिया.असली क्रीमीलेयर वाले यही वे लोग हैं जो सदैव गरीबों का हक मारते आए हैं.यही लोग आज संख्या-बल पर अपने स्वार्थ और बदनीयती से परिपूर्ण उस विधेयक को कानून का रूप देना चाहते हैं जो कमजोर तबकों की प्रगति को रोकने वाला भयानक कृत्य है.अब ये पूरे राष्ट्र में अजारकता फैलाना चाहते हैं.

  • 35. 16:48 IST, 12 मार्च 2010 skarya:

    रेणु जी, आप ही बताएं कि कमजोर तबकों की महिलाओं हेतु आरक्षण की मांग में बुराई क्या है? विश्व,मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि आज भी भारत में जातिवाद की जडे़ इतनी गहरी और भयानक हैं कि आए दिन यहाँ दलित,पिछड़ी या अन्य कमजोर वर्गों की महिलाओं के साथ ज्यादातर दबंग वर्गों द्वारा ज्यादतियाँ-बलात्कार की घटनाएं की जाती हैं, उनकी बेटियों की बारात चढ़ने से रोकी जाती हैं, उन्हें मँहगा न्याय भी नहीं के बराबर मिल पाता है, मेहनतकश मजदूर यही महिलाएं है, बच्चे कुपोषण-अशिक्षा से ज्यादा पीड़ित हैं. ऐसा क्यों?

  • 36. 22:29 IST, 14 मार्च 2010 zayedsayeed:

    औरत मंत्री और मर्द खाना बनाएगा.

  • 37. 11:21 IST, 18 मार्च 2010 Ramkomal Yadav:

    निकम्मे मंत्रियो की संख्या कम होगी.

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