इस विषय के अंतर्गत रखें दिसम्बर 2009

नए साल के जश्न से पहले

विनोद वर्माविनोद वर्मा|गुरुवार, 31 दिसम्बर 2009, 14:04

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• एक सरकारी रिपोर्ट कहती है कि भारत में ग़रीबी बढ़ी है और अब हर तीसरा भारतीय दरिद्र है.

• मुंबई मेट्रोपोलिटन रिजनल डवलपमेंट अथॉरिटी के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड का कहना है कि मुंबई में 54 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है. लेकिन वे यातायात को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं.

• भारत के गृहमंत्री ने कहा है कि नक्सली अब देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में फैल गए हैं.

• झारखंड में मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा के ठिकानों पर छापों के बाद चार हज़ार करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति का पता लगा.

• आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी को एक सेक्स वीडियो के विवाद के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा है. हालांकि वे अपने आपको निर्दोष बता रहे हैं.

• एक अवयस्क बालिका रुचिका के साथ छेड़छाड़ और आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले पुलिस अधिकारी को 19 साल बाद सिर्फ़ छह महीने की सज़ा सुनाई गई है.

• पुराने रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव रेलवे की रिकॉर्ड कमाई की वजह से मैनेजमेंट गुरु बन गए थे. नई रेलमंत्री ममता बैनर्जी कह रही हैं कि लालू प्रसाद यादव ग़लत आंकड़े दे रहे थे.

• साल भर में औसतन एक हज़ार फ़िल्म बनाने वाले भारतीय बाज़ार में अच्छी कही जाने लायक फ़िल्मों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुँच पाई है.

• साल भर पहले 40 रुपए किलो बिकने वाली अरहर दाल इन दिनों 110 रुपए किलो बिक रही है.

ये सब वर्ष 2009 की सुर्खियों में से कुछ हैं.

आप कह सकते हैं कि मैं गिलास को आधा भरा देख नहीं पा रहा हूँ, आधा खाली देख रहा हूँ.

लेकिन जब नए साल में जाना हो तो अपने आपको यह याद दिलाना अच्छा रहता है कि बीते साल क्या कुछ था जिसे हम ठीक नहीं कर सके.

नए साल में हर कोई नए संकल्प लेगा. इनमें से अधिकांश संकल्प मौसम बदलने से पहले टूट चुके होंगे.

जब देश के राजनेता सिर्फ़ सकल घरेलू आय यानी जीडीपी में वृद्धि को देश की तरक्की का पैमाना मान बैठे हैं, तब यह चिंता करनी ही चाहिए कि ये सुर्खियाँ कब हमारी नज़रों से ओझल होंगीं.

बहरहाल, चलिए नए साल का जश्न मनाएँ.

सच्चाई का बँटवारा

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|सोमवार, 28 दिसम्बर 2009, 16:33

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मुझे एक रिटायर्ड जनरल ने एक वाक़या सुनाया कि अगस्त 1947 में देहरादून एकेडमी में अचानक यह आदेश आया कि कैडेट फैसला कर लें कि वे भारतीय सेना में रहेंगे या पाकिस्तानी फ़ौज का हिस्सा बनेंगे.

मुसलमान कैडेट्स को बताया गया कि उनके लिए पाकिस्तान जाना ज़्यादा उचित रहेगा. उसके बाद उनकी रवानगी के लिए व्यवस्था शुरू होगी.

फिर आदेश आया कि देहरादून की परिसंपत्ति का भी बँटवारा होगा जिसमें पुस्तकालय भी शामिल है.

जब पुस्तकों का बँटवारा होने लगा तो दिक्कत यह आ गई कि इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के 20 संस्करणों का क्या किया जाए.

एक कैडेट ने कहा-लो यह क्या मुश्किल है. आधे संस्करण पाकिस्तान के और आधे भारत के.

एक दूसरे से जुदा होने का सोच कर सब उदास थे लेकिन इस कैडेट का प्रस्ताव सुन कर सब हँस पड़े.

आख़िर फ़ैसला हुआ कि इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका भारत में ही रहेगा.

यह प्रस्ताव देना वाला कैडेट बाद में भारत और पाकिस्तान में से किसी एक की सेना का सेनाध्यक्ष बना (मैं नाम नहीं बताऊँगा).

विभाजन की तरह दोनों देशों ने सच और झूठ को भी आधा-आधा बाँट लिया.

अधिकतर भारतीय इतिहासकार और पत्रकार आप को बताएँगे कि बँटवारे के समय लगभग डेढ़ से पौने दो करोड़ हिंदू और सिख पाकिस्तान में शामिल होने वाले इलाक़ों से निकल गए या हताहत हुए.

लेकिन वही इतिहासकार या पत्रकार ठीक तौर से नहीं बता पाएँगे कि कितने मुसलमान भारत से पाकिस्तान आए और कितने क़त्ल हुए.

इसी तरह पाकिस्तान में अगर किसी इतिहासकार या पत्रकार से यही सवाल पूछा जाए तो वह झट से कहेगा कि एक करोड़ मुसलमान घरों से उजड़े और 20 लाख क़त्ल हुए.

लेकिन हिंदू और सिख कितने उजड़े और क़त्ल हुए उस का ठीक से अंदाज़ा नहीं है.

आप पाकिस्तान में किसी से पूछें कि 1971 में सेना ने कितने बंगाली क़त्ल किए तो वह कहेगा कि शायद चंद हज़ार मरे होंगे.

और फिर अगली सांस में कहेगा कि मुक्ति वाहनी ने ग़ैर बंगाली पाकिस्तानियों की पूरी-पूरी आबादियाँ ख़त्म कर दीं.

आप ढाका में किसी से पूछें कि तुम लोगों ने कितने ग़ैर बंगाली मारे तो वह कहेगा कि चंद सौ मरे होंगे. लेकिन 10 लाख बंगाली क़त्ल हुए और 20 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार हुआ.

अगर आज हिंदुस्तान के बँटवारे के 62 साल बाद और पाकिस्तान के बँटवारे के 38 साल बाद भी तीनों देशों के इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का यह रवैया है, तो यक़ीन कर लें कि मेरे और आप के जीवन में तो वह साउथ एशियन ट्रूथ ऐंड रिकंसीलिएशन कमीशन (South Asian Truth and Reconciliation Commission) बनने से रहा जो आधे सच को बाक़ी आधे सच से मिलाकर झूठ को एक गहरी क़ब्र में दफ़ना सके.

पहले से ही बिके हुए हैं

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 22 दिसम्बर 2009, 17:16

टिप्पणियाँ (40)

पिछले दिनों अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक ने 'न्यूज़ फ़ॉर सेल' यानी 'बिकाउ ख़बरों' पर एक अंक निकाला.

इसमें ज़िक्र किया गया है कि किस तरह चुनावों के दौरान ख़बरों के लिए नेताओं को पैसे देने पड़ रहे हैं. किस तरह ख़बरें प्रकाशित-प्रसारित करने के लिए दरें तय कर दी गई हैं. इसमें अख़बारों के साथ टेलीविज़न चैनल भी बराबरी से शरीक हैं.

हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान बीबीसी हिंदी ने भी ख़बरों के विज्ञापन में तब्दील हो जाने की रिपोर्ट छापी थी. दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी ने वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के साथ मिलकर अख़बारों की इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था, जो अभी भी जारी है.

इस बीच भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग के बीच एक बैठक भी हुई है जिसमें दोनों ही संस्थाओं ने अपनी-अपनी तरह से बेबसी ज़ाहिर कर दी है कि वे इसे नहीं रोक सकते.

हो सकता है कि इस घटनाक्रम से कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा हो लेकिन इस पेशे में लंबे समय से होने की वजह से मैं जानता हूँ कि ख़बरों के प्रकाशन के लिए पैसे लिए जाने का सिलसिला नया तो हरगिज़ नहीं है.

मैंने इसे संस्थागत रुप लेते देखा है. चुनाव सुधारों की क्रांति करने वाले दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने पहली बार कहा था कि अख़बारों में दिए जाने वाले विज्ञापनों का ख़र्च या तो राजनीतिक दलों का ख़र्च माना जाएगा या फिर उम्मीदवारों का.

इस घोषणा ने न केवल उम्मीदवारों को साँसत में डाला बल्कि अख़बारों की भी साँसें रोक दीं. एकाएक चुनावी विज्ञापन घट गए. अख़बारों में चुनाव का उत्सवी माहौल ख़त्म होने लगा. और उसी समय शुरु हुआ, उम्मीदवारों से नक़द वसूलने का सिलसिला, इस अलिखित समझौते के साथ कि ख़बरों में विज्ञापन की भरपाई की जाएगी और इस ख़र्च का कहीं ज़िक्र भी नहीं किया जाएगा.

तब टेलीविज़न चैनल नहीं थे इसलिए यह तकनीक अख़बारों ने अपने दम पर विकसित की. धीरे-धीरे नक़द के बदले ख़बरें प्रकाशित करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित रुप दे दिया गया और यह तय कर दिया गया कि कितने पैसे में कितनी जगह मिलेगी. ठीक विज्ञापन की तरह.

जिन दिनों चुनाव नहीं होते उन दिनों भी कई मीडिया ग्रुप ख़बरों के लिए सौदे में लगे रहते हैं. यह सौदा सरकारी विज्ञापनों के अलावा होता है. कभी किसी को अपने लिए शहर की सबसे क़ीमती ज़मीन कौड़ियों के मोल चाहिए होती है, तो कभी अख़बार के कथित घाटे की भरपाई के लिए खदान की लीज़ चाहिए होती है. अब तो मीडिया ग्रुपों की दिलचस्पी कई तरह के उद्योग-धंधों में हो चली है.

सरकारें मीडिया हाउस के मालिकों को उद्योग-धंधों में उचित-अनुचित लाभ देती हैं और बदले में या तो वे सरकार की तारीफ़ में ख़बरें छापते हैं या फिर सरकार की कमियों-कमज़ोरियों को अनदेखा करते चलते हैं.

ग़रीब आदिवासियों की पीड़ा अब अख़बारों में इसलिए नगण्य जगह पातीं हैं क्योंकि इससे राज्य सरकार की किरकिरी हो जाती है.

यह सिलसिला सिर्फ़ सरकार और अख़बार या टेलीविज़न चैनल के बीच नहीं है अब औद्योगिक घराने भी ख़बरें ख़रीदना सीख गए हैं.

सो मीडिया तो बहुत पहले बिक चुका था, दुनिया को इसका पता बाद में चला. और दुनिया को फ़िलहाल जितना पता है, भारत का मीडिया उससे कहीं ज़्यादा बिका हुआ है.

इस ख़रीद-फ़रोख़्त का दुखद पहलू यह है कि उपकृत होने और करने का सिलसिला पहले व्यक्तिगत स्तर पर होता था और बाद में यह मीडिया हाउस के प्रबंधकों और उम्मीदवारों के बीच बाक़ायदा शुरु हो गया. यह धीरे-धीरे उन पत्रकारों तक भी पहुँच गया, जो कभी अपने आपको श्रमजीवी कहते थे.

कुछ ही अख़बार या टेलाविज़न चैनल होंगे जो बिकाउ नहीं हैं, लेकिन सौभाग्य से ऐसे पत्रकार अभी भी कम हैं जो अख़बार के कॉलमों या टीवी के स्लॉट की तरह सहज सुलभ हैं.

छोटे राज्य, बड़ा खेल

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|सोमवार, 14 दिसम्बर 2009, 06:25

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किसी राज्य की दुर्दशा इस बात पर निर्भर है कि उसे चलाने वालों का दिमाग़ कितना छोटा है, न कि राज्य कितना बड़ा है.

तेलंगाना की चर्चा छिड़ते ही कई और बुझते दीयों को मानो तेल मिल गया है. गोरखालैंड, पूर्वांचल, बुदेलखंड...सभी जाग उठे हैं.

अलग राज्य की उम्मीद लगाए लोग अपने नेता से वैसा ही ज़ोरदार अनशन चाहते हैं, जैसा चंद्रशेखर राव ने किया.

कुछ दिन भूखे ही तो रहना पड़ेगा, लेकिन सोचिए अलग राज्य बन जाने के बाद 'खाने-पीने' की क्या कमी रह जाएगी?

दलील ये है कि दूर लखनऊ या कोलकाता में बैठे नेता-अफ़सर उनके इलाक़े की दुर्दशा क्यों करें, ये काम तो वो ख़ुद ही कर सकते हैं और बखूबी कर सकते हैं.

छोटे राज्य बनने के कई फ़ायदे हैं, अधिक लोगों को मंत्री बनने का मौक़ा मिलता है, अधिक अफ़सरों को नए कैडर में ऊँचे रैंक मिलते हैं, सड़क पर लाल बत्ती वाली गाड़ियाँ दिखती हैं जिससे शहर का रुतबा बढ़ता है.

नई राजधानी बनने से ज़मीन के दाम बढ़ जाते हैं, नई-नई योजनाओं के लिए पैसे आते हैं, पड़ोसी राज्यों से ठेकेदार आते हैं, नई कारों के शोरूम खुलते हैं, होटल-रेस्तराँ-बार, सबका धंधा फलता-फूलता है.

छोटे राज्य की अपनी विधानसभा भी होती है, छोटे राज्य में प्रतिभा पर रोक नहीं होती, निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री तक बन सकते हैं, राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है.

ग़रीब आदमी के लिए भी कम राहत की बात नहीं हैं छोटे राज्य. जिन दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए पहले सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता था वे काफ़ी नज़दीक आ जाते हैं इसलिए चक्करों की संख्या थोड़ी बढ़ भी जाए तो उतना नहीं खलता, अपनी भाषा बोलने वाले या अपने जैसे दिखने वाले लोगों को रिश्वत देने में शायद थोड़ी कम तकलीफ़ होती है.

अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है.

लेकिन अगर आप 'आम जनता' हैं और अपने प्यारे से, छोटे से राज्य का सपना देखकर भावुक हुए जा रहे हैं तो आपको भी उसी प्रक्रिया से गुज़रना होगा जिससे मेरे जैसे लाखों झारखंडी गुज़र चुके हैं, पहले लंबा इंतज़ार, उसके बाद मोहभंग.

मैं छुट्टी मनाने नहीं जा सकता...

अमित बरुआअमित बरुआ|मंगलवार, 08 दिसम्बर 2009, 16:49

टिप्पणियाँ (48)

रूबिया सईद के अपहरण की घटना को पूरे बीस साल हो गए हैं. भारत के तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी और श्रीनगर में मेडिकल की छात्रा रूबिया का 8, दिसंबर 1989 को अपरहरण हुआ था.

कश्मीर घाटी में लोकसभा चुनाव का बहिष्कार एक बड़ी स्टोरी थी, लेकिन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट यानी जेकेएलएफ़ के ज़रिए रूबिया का अपहरण एक राष्ट्रीय उन्माद बन गया.

दो दशक पूर्व, एक युवा पत्रकार के तौर पर मैं 10 दिसंबर को श्रीनगर पहुँचा यह जानते हुए भी कि मुझे घाटी की राजनीति की बहुत कम जानकारी है. लेकिन यह स्टोरी बेहद रोमांचकारी थी और मदद के लिए कई कश्मीरी दोस्तों का सहारा था.

भाग्य की बात कि इंडियन एयरलाइन्स (याद रहे उस समय निजी विमानसेवाएँ नहीं होती थीं) की जम्मू-कश्मीर जाने वाली उड़ान में मेरे बराबर की सीट पर बैठे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपहरण गाथा में प्रगति का क्रमवार विवरण सुनाया जिसके बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी थी.
इसे कहते हैं क़िस्मत!

रूबिया का अपहरण करने वाले जेकेएलएफ़ ने जब उन्हें रिहा किया तो उससे पहले वीपी सिंह सरकार ने कई चरमपंथियों को आज़ाद किया. रूबिया के अपहरणकर्ताओं में से दो-यासीन मलिक और जावेद मीर-इस समय श्रीनगर में मौजूद हैं.

तेरह दिसंबर, 1989 को रूबिया रिहा हुईं और लगा कि जैसे श्रीनगर का हर नागरिक-और बहुत से बाहर वाले भी-सड़कों पर निकल आया है. हवा में जैसे आज़ादी की ख़ुशबू घुल गई थी.

मुझे याद है श्रीनगर अस्पताल के बाहर एक युवा डॉक्टर ने कहा, यह तो फ्रांसीसी क्रांति की तरह का माहौल लग रहा है.

और फिर भारत सरकार की तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई-अर्धसैनिक बल के हज़ारों कर्मचारियों की तैनाती. बंकर और सैनिक चारों तरफ़ छा गए.

हज़ारों जानें जा चुकी हैं, भारत सरकार का फिर पूरा नियंत्रण है, आज़ादी पाने की मांग धीमी पड़ गई है. लेकिन इसके बावजूद यह भी सच है कि हर महीने कोई न कोई कश्मीरी रहस्यमय परिस्थितियों में ग़ायब हो जाता है.

घाव पर मरहम लगाना अब भी बाक़ी है, लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं. सशस्त्र सेनाओं के पास अब भी विशेषाधिकार हैं.

केंद्र सरकार की सभी समितियों और बयानों के बावजूद, कश्मीरियों की स्वायत्तता की मांग पर क़तई कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

पिछली बार जब मैं कश्मीर गया था तो वह 1995 में एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट था. मेरे अंदर से आवाज़ आती है कि मुझे वहाँ छुट्टी मनाने नहीं जाना चाहिए. वहाँ की आबोहवा में बहुत सी दर्दनाक दास्तानें मौजूद हैं.

ख़ौफ़नाक है यह परिदृश्य

ममता गुप्ताममता गुप्ता|मंगलवार, 08 दिसम्बर 2009, 10:24

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पर्यावरण परिवर्तन एक कटु सत्य है जिससे आंखे चुराना शुतुर्मुर्ग की तरह अपना सिर रेत में छुपा लेने के बराबर होगा.

पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ये सच है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं ये सच है. ऐंटार्कटिक की बर्फ़ीली परतें तीव्र गति से पिघल रही हैं जिससे समुद्रों का जलस्तर चढ़ रहा है ये सच है. और ये सब हो रहा है हमारी आपकी ज़रूरतों के कारण.वैज्ञानिक जुटे हैं ऐसे तरीक़े खोजने में जिससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सके. राजनेता नई नीतियों पर विचार कर रहे हैं. और हम....

हम अपनी आदतों से बाज़ नहीं आते. हमारे पास अगर स्कूटर है तो हमें कार चाहिए. अभी तक पंखा चलाने से काम चल रहा था तो एयर कंडिशनर चाहिए. पहले बस में बैठकर पहाड़ों की सैर कर लिया करते थे लेकिन अब नज़र विदेशों की ओर है जहां पहुंचने के लिए विमान यात्रा ज़रूरी है.

तो क्या अब तक जितनी सुख सुविधाएं ईजाद हुई हैं उन्हे तिलांजलि दे दें तभी बचा पाएंगे अपनी पृथ्वी को?

सवाल ये नहीं सवाल दरसल ये है कि पृथ्वी रहने लायक बचेगी तब न. बहुतों का तर्क है कि अगले कोई दस बीस साल में तो ऐसा होने वाला नहीं तो अगली पीढ़ियों की चिंता हम क्यों करें.

हम अपने बच्चों के लिए धन दौलत और सम्पत्ति छोड़कर जाने में तो विश्वास करते हैं लेकिन रहने लायक ग्रह नहीं.

अगर हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे तो गंगा यमुना में पानी कहां से आएगा. इन जैसी नदियों पर निर्भर करोड़ों लोग कहां जाएंगे.

अगर समुद्रों का जलस्तर और चढ़ा तो बांगलादेश, मालदीव और नौरू जैसे देश जलमग्न हो जाएंगे. वहां रहने वाले लोग पड़ोसी देशों में शरण लेंगे जहां पहले से ही खाने पीने की किल्लत होगी.

पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण भूमध्यरेखा के आस पास के देशों में रहना संभव नहीं होगा तो बड़े पैमाने पर लोग अपेक्षाकृत ठंडे इलाक़ों की तरफ़ पलायन करेंगे.

कल्पना कीजिए ऐसी दुनिया की जहां पानी की भारी क़िल्लत है, रेगिस्तान फैलते जा रहे हैं, खेती मुश्किल से होती है इसलिए अनाज की पैदावार सीमित है, लोग भूखे प्यासे हैं.

जानते हैं भावी युद्ध पानी और ज़मीन के लिए लड़े जाएंगे.

ख़ौफ़नाक है न ये परिदृश्य. आप डरे कि नहीं.....

राम नाम अल्लाह है

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|रविवार, 06 दिसम्बर 2009, 16:47

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इस बात का कोई महत्व नहीं है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को 17 साल पूरे हो गए. अगले साल 18वीं वर्षगाँठ होगी और उससे अगले साल 19वीं.

महत्व किसी बात का हो सकता है तो वह यह है कि क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर 1947 के विभाजन के बाद सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक घाव लगाया है.

इस घटना के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में एक-दूसरे के लिए कट्टरता की भावना बढ़ी है और इस भावना को कम कैसे किया जाए जो देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को दर्शाए.

छह दिसंबर 1992 का दिन असल में इतिहास की वह माता है जिसके तुंरत बाद मुबंई के दंगे और फिर 1993 में मुंबई धमाके, गुजरात नरसंहार, मालेगाँव बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस को आग लगाने जैसी घटनाएँ, सिमी, राम सेना और आज़मगढ़ जैसे नेटवर्क, मोदी स्टाइल राजनीति और कर्नल पुरोहित, वरुण गाँधी और मोहन भागवत जैसे ज़हन को जन्म दिया.

अगर बाबरी मस्जिद की 17वीं वर्षगाँठ याद रहेगी तो केवल इस आधार पर कि लिबरहान अयोग रिपोर्ट ने इस घटना में उन लोगों के शामिल होने की पुष्टि कर दी जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के अगले रोज़ अपने चहरों पर अफ़सोस का भभूत मल कर अख़बारों में तस्वीरें छपवाई थीं.

अगर वाक़ई लिबरहान अयोग की रिपोर्ट से यह परिणाम निलकता है कि यह कोई तुरंत जोशीला अमल नहीं था बल्कि एक योजना के तहत सब कुछ हुआ.

तो फिर इस रिपोर्ट की रोशनी में राष्ट्र और उसकी अदालतों का सिवाए इसके क्या कर्तव्य है कि वह न केवल इस अपराध में शामिल लोगों को कठघरे में लाए बल्कि यह घोषणा भी करें कि इस स्थान पर न केवल टूटी हुई मस्जिद का फिर से निर्माण होगा बल्कि हिंदू और मुसलमान मिल कर मस्जिद के बगल में एक शानदार मंदिर भी बनाएँगे.

ताकि वह राम जिसे मुस्लिम अल्लाह कहते हैं और वह अल्लाह जिसे हिंदू राम के नाम से जानते हैं, साथ-साथ रह सकें.

इस से कम पर तो कलंक का टीका मिटने से रहा.

क्या बदला भोपाल में?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 02 दिसम्बर 2009, 17:35

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भोपाल गैस दुर्घटना के पच्चीस साल. वर्ष 2001 की वे यादें ताज़ा हो गईं जब बीबीसी हिंदी रेडियो की श्रंखला इंसाफ़ की रिकॉर्डिंग के सिलसिले में भोपाल गई थी.

दरअसल भारत में मानवाधिकारों की स्थिति पर आधारित इन रेडियो पैकेज में एक अंक भोपाल त्रासदी के बारे में भी था.

लंदन से भोपाल पहुँचने पर पता चला कि आने से पहले जो भी रिसर्च की थी वह अपर्याप्त थी. ज़मीनी हालात काग़ज़ात में दर्ज आँकड़ों से बहुत अलग थे.

दुर्घटना के 17 वर्ष बीत जाने पर भी पीड़ित मुआवज़े की राशि का इंतज़ार ही कर रहे थे.

वे जो अपना सब कुछ गंवा चुके थे, दरबदर की ठोकरें खाने पर मजबूर थे.

उन्हें यह साबित करने के लिए ज़मीन-आसमान एक करना था कि उनकी दुर्दशा गैस की विभीषिका का ही नतीजा था.

अस्पतालों में लंबी-लंबी लाइनें थीं. सत्रह वर्ष से साँस की तकलीफ़ से परेशान रोगियों का समय घर पर कम डिस्पेंसरियों में ज़्यादा गुज़र रहा था.

भुक्तभोगियों की आपबीती सुन कर रोंगटे खड़े हो रहे थे. एक महिला ने जब बताना शुरु किया कि उसने दो दिसंबर, 1984 की उस रात कौन सी सब्ज़ी बनाई थी और वह अपने पति का खाने पर इंतज़ार कर रही थी कि....

या फिर एक बूढ़ी, निस्सहाय महिला अपने इकलौते बेटे को याद कर के कह रही थी कि वह कॉलेज में पढ़ता था और आज होता तो क्या पता डॉक्टर होता या इंजीनियर.

ये सब आवाज़ें रेडियो पर प्रसारित हुईं तो अनगिनत श्रोताओं के मन को छू गईं. सैंकड़ों पत्र आए जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे श्रोताओं ने मध्यप्रदेश के इस शहर में रह रहे लोगों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कीं.

आज 25 साल बाद एक बार फिर भोपाल पर सबकी नज़र है. कितना कुछ बदला है इसका जायज़ा लेने की कोशिश की जा रही है.

आज भी भोपाल में लोग प्रदूषित जल पी रहे हैं और बीमारियों से जूझने को मजबूर हैं. मुआवज़े की राशि आज भी उनकी पहुँच से बाहर है.

अपनों को खोने के दर्द से जूझ रहे इन लोगों को इंसाफ़ मिल पाएगा? और कब?

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