नए साल के जश्न से पहले
• एक सरकारी रिपोर्ट कहती है कि भारत में ग़रीबी बढ़ी है और अब हर तीसरा भारतीय दरिद्र है.
• मुंबई मेट्रोपोलिटन रिजनल डवलपमेंट अथॉरिटी के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड का कहना है कि मुंबई में 54 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है. लेकिन वे यातायात को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं.
• भारत के गृहमंत्री ने कहा है कि नक्सली अब देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में फैल गए हैं.
• झारखंड में मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा के ठिकानों पर छापों के बाद चार हज़ार करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति का पता लगा.
• आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी को एक सेक्स वीडियो के विवाद के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा है. हालांकि वे अपने आपको निर्दोष बता रहे हैं.
• एक अवयस्क बालिका रुचिका के साथ छेड़छाड़ और आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले पुलिस अधिकारी को 19 साल बाद सिर्फ़ छह महीने की सज़ा सुनाई गई है.
• पुराने रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव रेलवे की रिकॉर्ड कमाई की वजह से मैनेजमेंट गुरु बन गए थे. नई रेलमंत्री ममता बैनर्जी कह रही हैं कि लालू प्रसाद यादव ग़लत आंकड़े दे रहे थे.
• साल भर में औसतन एक हज़ार फ़िल्म बनाने वाले भारतीय बाज़ार में अच्छी कही जाने लायक फ़िल्मों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुँच पाई है.
• साल भर पहले 40 रुपए किलो बिकने वाली अरहर दाल इन दिनों 110 रुपए किलो बिक रही है.
ये सब वर्ष 2009 की सुर्खियों में से कुछ हैं.
आप कह सकते हैं कि मैं गिलास को आधा भरा देख नहीं पा रहा हूँ, आधा खाली देख रहा हूँ.
लेकिन जब नए साल में जाना हो तो अपने आपको यह याद दिलाना अच्छा रहता है कि बीते साल क्या कुछ था जिसे हम ठीक नहीं कर सके.
नए साल में हर कोई नए संकल्प लेगा. इनमें से अधिकांश संकल्प मौसम बदलने से पहले टूट चुके होंगे.
जब देश के राजनेता सिर्फ़ सकल घरेलू आय यानी जीडीपी में वृद्धि को देश की तरक्की का पैमाना मान बैठे हैं, तब यह चिंता करनी ही चाहिए कि ये सुर्खियाँ कब हमारी नज़रों से ओझल होंगीं.
बहरहाल, चलिए नए साल का जश्न मनाएँ.

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उम्मीद करें कि आने वाले साल में हम वह ठीक कर पाएँ जो पिछले साल नहीं कर पाए थे.
यह बीबीसी हिंदी पर अपने तरह का पहला ब्लॉग है. इसमें हाल की घटनाओं पर रोशनी डाली गई है. इसमें से केवल एक चीज से मैं समहत नहीं हूँ, ‘‘जब देश के राजनेता सिर्फ़ सकल घरेलू आय यानी जीडीपी में वृद्धि को देश की तरक्की का पैमाना मान बैठे हैं, तब यह चिंता करनी ही चाहिए कि ये सुर्खियाँ कब हमारी नज़रों से ओझल होंगीं.’’ विनोद जी देश के नेता और बुद्धिजीवी जनता को गुमराह कर रहे हैं(पत्रकार भी इनमें से एक हैं). अगर आपको लगता है कि अधिकारियों को जीडीपी की चिंता है तो आप ग़लत है. नेताओं का देश की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है.उनके अपने हित हैं.
आपकी टिप्पणियाँ बहुत सटीक हैं. यह जानकर अच्छा लगा कि बीबीसी पर भारत-पाकिस्तान के अलावा जनता की तकलीफ़ों पर भी ब्लॉग लिखा गया.
सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तान हमारा और मेरा भारत महान है क्योंकि भारत विश्व की तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. वैसे व्यापक मंदी का असर भारत पर बहुत नहीं पड़ा है.
भाई विनीत कुमार ने बिल्कुल सच लिखा है. मेरे ख़्याल से सबसे अधिक नेताओं का बचाव करने वाले पत्रकार ही हैं. जिसका ताज़ा उदाहरण रुचिका का मामला है, लेकिन भारत में न जाने कितनी रुचिका होंगी जो राठौर जैसे अधिकारी या नेता का शिकार बनती हैं. फिर भी मीडिया ख़ामोश रहता है. आपने अपने इस लेख में मीडिया और नेताओं के बारे में कुछ भी नहीं लिखकर इंसाफ़ नहीं किया है. फिर भी आप का लेख बहुत अच्छा है.
जो बीत गई वो बात गई. क्यों की अगर आप जाने न भी देना चाहे तो इसका कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, दुनिया आगे निकल जाएगी; सबको जल्दी है सब को आगे जाना है... तो बहरहाल 2009 की विरासत को साथ लेकर 2010 के साथ चलते हैं.
इस वर्ष के सब से बड़े आयोजन में से एक है भारत में कॉमन वेल्थ खेलों का आयोजन; इसके आयोजन करने का गौरव दिल्ली को प्राप्त हुआ. वैसे इस गौरव की जानकारी आज-कल नहीं काफी सालो पहले से इस शहर के पास थी; मगर शायद तैयारिओं में कल पर टालने का रवैया कुछ ज़्यादा ही लंबा चल पड़ा है. दिल्ली की लाइव हालत ये हैं कि चारों तरफ तैयारियों पे जोर है, फ्लाई ओवेर्स के कंकाल हर जगह दिखाई दे रहे हैं, सड़क बनाई फिर उखाड़ी और फिर बनाई जा रही है, रंग रोगन कर लीपा पोती भी की जा रही है, देखना बूढ़े शहर को ब्यूटी पार्लराइजड कर चमका न दिया तो कहना. हवा में प्रदूषण का स्तर "विश्व स्तरीय" है... यमुना जो खेल गाँव के पास से बहती है, उसकी बात छोडिए वहां कौन जायेगा; सदियों पुरानी नदी है साफ़ होने में कुछ सदिया तो लग ही सकती है.... पुल पर बड़े बड़े बोर्ड लगवा देंगे किसी को कुछ नज़र नहीं आएगा. रही साफ़ हवा और यमुना की बदबू की बात; तो कोई सूंघ नहीं सकता .... मगर हाँ तैयारिया तो समय पर पूरी होंगी फिर चाहे जैसे भी हों. बीसीसीआई की पिच हिट हुई है....खुदा न करे इन खेलों की तैयारियाँ ऐसे सुपर हिट हों. शुभ कामनाओं सहित "बेस्ट ऑफ़ लक" क्यों की लक का ही सहारा है.
आगे आगे देखिये होता है क्या.
विनोद जी! इस नव वर्ष में यदि हम 2009 के आंकड़ों के तह में जाएंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. आएं नूतन वर्ष का स्वागत करें और ये आशा करते हैं कि 2010 आम आदमी के लिए राहत देने वाला होगा. नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित.
आपने पिछले वर्ष का बहुत सटीक विश्लेषण किया है, इससे आने वाले वर्ष के लिए हमें सीख मिली है...
विनोद जी आपने छोटे से ही लेख में काफ़ी कुछ कह दिया है. मैं आपके इस बात से सहमत हूँ कि नया संकल्प बदलते मौसम की तरह बदल जाएगा.
विनोद जी, ज़िंदगी में तो ग्लास को आधा भरा देखना सही लगता है लेकिन जहाँ हमारा हर तीसरा भाई दरिद्र हैं और आठ से 20 रुपए पर ज़िंदगी काट रहा है वहाँ यह हमारे गाल पर तमाचा है. ज्यादातर पत्रकार सत्ता के दलाल हैं, जो वहीं चीज़ दिखाते हैं जो सत्ता और पैसे वाले देखना चाहते हैं. आशा है नए वर्ष में पत्रकार पिछले वर्ष की ग़लतियों से सबक लेते हुए और मुस्तैदी से सच्चाई को सामने लेकर आएँगे.