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हैप्पी न्यू इयर वाया ईमेल

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 04 जनवरी 2010, 15:00 IST

अभी-अभी मेरी एक सहयोगी ने एक लिफ़ाफ़ा थंमाया जो मेरे नाम था और हमारी एक पार्टनर साइट से आया था.

लिफ़ाफ़े में बंद ग्रीटिंग कार्ड देख कर एक सुखद आश्चर्य हुआ. आप यक़ीन कीजिए नववर्ष की शुभकामनाओं वाला यह पहला और एकमात्र कार्ड है जो डाक से आया है.

ऐसा नहीं है कि शुभकामनाएँ नहीं मिलीं. बहुत मिलीं और ढेरों मिलीं. लेकिन फ़ोन पर, एसएमएस से, ईमेल से, ईकार्ड से या फिर फ़ेसबुक पर संदेश के रूप में.

किसको फ़ुर्सत है कि कार्ड ख़रीदे, डाकटिकट का इंतज़ाम करे और फिर लेटर बॉक्स में उसे डालने जाए.

लेकिन सच मानिए. यह कार्ड देख कर लगा कि यदि किसी ने इतनी मेहनत की है तो वह सच मायने में धन्यवाद का पात्र है.

ईमेल पर तो ऐसे भी संदेश मिले जो थोक के भाव दसियों लोगों को बढ़ाए गए थे. यानी संदेश भेजने वाला सिर्फ़ आप के बारे में ही नहीं सोच रहा था.

डाक से आया पत्र या कार्ड आपको ही संबोधित होगा या ज़्यादा से ज़्यादा आपके परिवार के सदस्यों को.

और अगर आपको इस तरह की डाक रद्दी की टोकरी में फेंकने की आदत नहीं है तो यह कार्ड बरसों-बरस आपके पास सुरक्षित रहेगा और आगे चल कर जब आप पुरानी तस्वीरों की तरह अपनी यादों की पोटली खंगालेंगे तो आपको याद आएगा कि फ़लां वर्ष में आपके एक मित्र ने आपको यह कार्ड भेजा था.

आज इलेक्ट्रॉनिक युग में ईमेल एक सुविधाजनक साधन है. आप पहली जनवरी की सुबह किसी को शुभकामनाएँ भेजें तो वह पलक झपकते ही आपके मित्र तक पहुँच जाएँगी.

लेकिन डाक से कार्ड भेजने के लिए आपको कम से कम पाँच दिन पहले उस मित्र को याद करना होगा.

पर, अगर दोस्ती है तो यह तो हक़ बनता है, भाई...

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:58 IST, 04 जनवरी 2010 ghughutibasuti:

    डाक से मिले पत्र तो अब दुर्लभ हो गए हैं. उनका अपना ही महत्व था. उनमें अपनापन होता था. नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

  • 2. 17:32 IST, 04 जनवरी 2010 Abhishek Anand:

    सलमा जी, काश मुझे आपके डाक का पता मालूम होता...नव वर्ष की मंगलकामनाएँ आपको.

  • 3. 18:09 IST, 04 जनवरी 2010 ANIL MISHRA:

    मेरा मानना है कि शुभकामनाएँ महत्वपूर्ण होती हैं न कि माध्यम. फिर भी कार्ड या पत्र से मिले शुभकामनाओं से अपार ख़ुशी मिलती है.

  • 4. 18:34 IST, 04 जनवरी 2010 Surendra:

    इस साल हमने भी अपने घर और कुछ ख़ास दोस्तों को डाक से ही संदेश भेजा है नववर्ष पर. डाक है आजकल ख़ास लोगों के लिए.

  • 5. 18:44 IST, 04 जनवरी 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, हक़ीक़त यह है कि आपको डाक या ईमेल किसी से भी कार्ड या ग्रीटिंग्स या शिकायत भेजो आप उसे बीबीसी की बड़ी सारी रद्दी की टोकरी में डाल देती हैं. यह बीबीसी का निजाम है शायद. वरना बीबीसी हिंदी सेवा भी अपने श्रोताओं के लिए कार्ड, कैलेंडर, डायरी भेजना बंद नहीं करती.

  • 6. 18:53 IST, 04 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    सलमा जी, आपने सही फ़रमाया है. इस महंगाई के ज़माने में और भागमभाग वाली ज़िंदगी में समय निकाल कर किसी अपने को आज भी कार्ड भेजकर शुभकामना देना बहुत बड़ी बात है. क्योंकि लोगों के पास समय ही कहाँ है.

  • 7. 18:57 IST, 04 जनवरी 2010 AAFAAQ AHMAD:

    डाक से मिले पत्रों की अपनी छटा निराली है. डाक से भेजे पत्र अतीत के उन बिरले दिनों की याद दिलाते हैं जो हम से छूट कर अब दूर तक कहीं बिखर सी गई हैं. सलमा जी, काश मैं भी आपको इस ब्लॉग से पहले ही डाक से माध्यम से नए साल की मुबारकबाद दे पाता. ख़ैर नववर्ष आपके लिए सपनों की नई सौगात लेकर आए.

  • 8. 19:05 IST, 04 जनवरी 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    सलमा जी, बंद लिफ़ाफ़े में शुभ कामनाएं आपको आईं लेकिन इस बंद लिफ़ाफ़े का सुखद अहसास मैं अब तक लिखते समय भी महसूस कर रहा हूँ. सच कहा आपने ग्रीटिंग कार्ड में बधाई संदेश अब किसी-किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होते हैं. वास्तव में आज मजबूरी को छोड़कर किसी के पास डाकघर और लेटर बॉक्स के पास पहुँचने का वक़्त नहीं है. एक वक़्त था जब ख़ास मौक़ों पर राजी-ख़ुशी के संदेशों के साथ डाकिए का बेसब्री से इतंज़ार किया जाता था. रंग-बिरंगे लिफाफों में बंद अपनों का प्यार, बधाई संदेश बड़ा ही सुखद आभास होता था. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम कलम से लिखे दो शब्दों का स्थान कभी भी नहीं ले पाएँगे. वैसे आपका लेख पढने के बाद मैंने प्रण किया है कि दिन, त्यौहार और ख़ास मौक़ों पर जितना हो सके बधाई संदेश पत्र द्वारा बंद लिफाफे में ज़रूर भेजूंगा. और हाँ कोशिश करूंगा कि एक-आध पत्र बीबीसी हिंदी को भी लिखूंगा क्योंकि अब तक तो ई मेल से ही बीबीसी हिंदी से रूबरू हो पा रहा था. मुझे याद आ रहा कि मैंने बीबीसी हिंदी को आख़िरी कलम से लिखा पत्र 1993 या इसके आस पास लिखा था. आपने वाक़ई ही सोचने को मजबूर किया है.

  • 9. 20:52 IST, 04 जनवरी 2010 himmat singh bhati:

    सलमा जी आपने सही कहा है, वैज्ञानिक युग में संदेश भेजने के कई साधन उपलब्ध हैं. वैश्वीकरण के ज़माने में तेज़ी से भाग रही ज़िंदगी के साथ महंगाई की मार झेल रहे लोगों के पास समय का अभाव है.

  • 10. 22:09 IST, 04 जनवरी 2010 Israr ahmad:

    सलमा जी. आपको नए साल की शुभकामना.

  • 11. 23:01 IST, 04 जनवरी 2010 ranjit kumar:

    सलमा जी, ईमेल से नए साल की बधाई देने वालों में एक और नाम मेरा भी शामिल कर लीजिए. ये सच है कि आज हमने ख़ुद को मशीन पर आश्रित कर लिया है. लोग हैप्पी न्यू इयर भी ख़ुद से मोबाइल या कंप्यूटर पर नहीं लिखते, बस किसी ने मेल या मैसेज किया, उसे फ़ॉरवार्ड कर देते हैं. यही वजह है कि डाकिए का थैला आज हल्का हो चुका है. लिफाफे और पोस्टकार्ड एक छोटे से सिम कार्ड में सीमित हो चुके हैं. अक्षरों की पहचान नहीं रखने वाले लोग डिज़िटल भाषा समझ रहे हैं. तभी तो अब कोई नहीं कहता- जाते ही ख़त लिखना.

  • 12. 11:08 IST, 05 जनवरी 2010 अजय अवस्थी :

    सलमा जी
    नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं
    मुझे भी आज के इस त्वरित सन्देश की भागती हुई दुनिया में डाक से आने वाले लिफाफों की कमी अखरती है हमने वो समय देखा है जब घंटों तक हम डाकिये के आने का इन्तजार किया करते थे और जब लिफाफा खोलते थे ..अपना नाम लिखा देखते थे ...उसका सुख अलग ही था मगर आज.... मुझे ढेरों एसएमएस प्राप्त होते हैं..ढेरों ईमेल प्राप्त होते हैं .... तो भी वो एक डाकिया कहीं न कहीं से यादों में आकर हमें उस गुजरे वक़्त में तो ले ही जाता है शायद उस गुजरे वक़्त में लोग एक दूसरे के प्रति ज्यादा भावुक हुआ करते थे.

  • 13. 13:22 IST, 05 जनवरी 2010 vanita raghuvanshi:

    सलमा जी, आपका ये आर्टिकल पढ़कर पुराने दिन याद आ गए। ना जाने कितने साल हुए जब हम नव वर्ष पर या ऐसे ही खास मौकों पर बाज़ार में जाकर खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड लाते थे और फिर सबके पते ढूंढकर उन्हें डाक के ज़रिए वो कार्ड भेजते थे। वाकई वो भी एक अलग ही मज़ा था। अब अपने खास लोगों को शुभकामना संदेश देना तो आसान हो गया है, लेकिन इस आसानी ने ही इसे एक फ़र्ज़दाएगी बना दिया है।

  • 14. 16:27 IST, 05 जनवरी 2010 Avnish Kumar:

    डाक से बधाई संदेश मिलना वाक़ई एक सुखद अनुभव है पर ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी समस्याओं के मद्देनज़र मुझे ख़ुशी होती ह कि लोग इस माध्यम का कम से कम इस्तेमाल कर रहे हैं. ज़रा सोचिए केवल एक सुखद अनुभव के लिए इस धरती पर से इतने सारे पेड़ों का कटना कहाँ तक उचित है.

  • 15. 18:26 IST, 05 जनवरी 2010 ANIS KHAN SHAHAN. NEW DELHI:


    सलमा जी और बीबीसी को नए साल की मुबारक़बाद. महज़ 15 साल पहले की बात है जब मैं अपनी किशोरावस्था में दोस्तों, रिश्तेदारों और अन्य लोगों को मुबारक़बाद देने के लिए लाजपतनगर सेंट्रल मार्केट, साउथ एक्सटेंशन और कनॉट प्लेस की कार्ड गैलरियों के चक्कर लगाया करता था. अगर किसी कार्ड में लिखा संदेश पसंद आता तो उसकी डिजाइन नहीं अगर किसी की दोनों चीजें पसंद आती थीं तो उसकी क़ीमत जेब पर भारी पड़ जाती थी. बहुत जोड़-घटाने के बाद कार्ड की ख़रीदारी होती. फिर कार्ड को अपनी ओर से सजाना और उस पर संदेश लिखना, इसी बात में ही घंटों या कई दिन लग जाते थे. अगर इससे भी बात नहीं बनती तो दूसरे कागज पर अपने दिल की बात लिखते और कार्ड वाले लिफ़ाफ़े में डाल देते. इसके बाद पोस्ट ऑफ़िस जाते और लेटर बॉक्स में कार्ड डालकर घर लौटते. उसके बाद भी दिल नहीं मानता था जबतक कि वापसी में कार्ड के मिलने या जवाबी कार्ड नहीं आ जाता था. लेकिन अब तो हर शुभकामनाएँ पल में आती और पल में जाती हैं. इसके बाद भी किसी से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि बदलना वक्त का नाम और काम है.

  • 16. 11:06 IST, 06 जनवरी 2010 Arunesh:

    आपके ब्लॉग से यह समझ में नहीं आया कि आप ईमेल का समर्थन कर रही हैं या नहीं. आप आज भी ग्रीटिंग कार्ड चाहती हैं पुराने वाले. आपने ऐसे कितने ग्रीटिंग अपने दोस्तों को भेजे हैं?

  • 17. 12:29 IST, 06 जनवरी 2010 praveen sinha:

    सलमा जी, जब सब कुछ डिजिटल हो चुका है तो शुभकामनाएँ क्यों न हों. पिछले दिनों मेरे एक मित्र की शादी थी, उन्होंने दूर रहने वाले क़रीब सभी दोस्तों या रिश्तेदारों को स्कैन किया हुआ शादी कार्ड ईमेल किया था. इसको दो कारण है एक किसी को शिकायत नहीं होगी की आपका कार्ड नहीं मिला और दूसरा किसी का नाम छूटने का डर क्योंकि हमारे मेलबॉक्स में लगभग हर किसी का नाम सुरक्क्षित रहता है. अगर मैं अपनी बात करूँ तो ऐसे मेरे सैकड़ों जानने वाले है जिन्हें मैं केवल हर पर्व या उत्सव की शुभकामनाएँ देता या लेता हूँ. आम भाषा में सस्ता और टिकाऊ माध्यम है मेल या इंटरनेट. लेकिन सबसे बड़ी बात है मार्केटिंग पहले के सालों में कुछ कंपनियां पेपर कार्ड की प्रचार करती थीं नए साल दिवाली, दशहरा में बाज़ार कार्डो से भर जाते थे यहाँ तक की गली के जनरल स्टोर वाले भी कार्ड का स्टाल लगा लेते थे लेकिन शहर से गाँव अब यह कही नज़र नहीं आता, हा इंटरनेट पर तरह-तरह के लुभावने लिंक्स नज़र आने लगते ई-कार्ड्स के लगभग हरेक सेट्स पर. क्योंकि अभी भी भारत का एक बड़ा तबका ई-वर्ल्ड से दूर है और ऐसा नहीं है कि शुभकामनाएँ लेना या देना उन्होंने बंद कर दिया है. एसएमएस एक आंशिक माध्यम है. लेकिन परिवर्तन संसार का नियम है.

  • 18. 13:53 IST, 06 जनवरी 2010 manoj kumar:

    सलमा जी, नए साल की शुभकामनाएँ.

  • 19. 12:44 IST, 07 जनवरी 2010 बी. एल. भाटी:

    सलमा जी, नमस्कार, इंटरनेट और कंप्यूटर के युग में डाक द्वारा बधाई संदेश भेजने के विषय पर टिप्पणियाँ आमंत्रित करने के लिए आपको धन्यवाद. डाक द्वारा अपने हाथ से लिखा गया संदेश अपनेपन की भावना को इंगित करता है लोग इसे सालों तक संजो कर रखते हैं लेख की कलात्मकता लिखने वाले के वक्तित्व का आइना होती है उसका अंतर्मन उसमे झलकता है. भारतीय डाक विभाग विश्व का सबसे बड़ा विभाग है और समय के साथ तालमेल करते हुए नवीनतम तकनीकी अपनाते हुए, नए-नए सेवाएँ देने को तत्पर है. आज भी ई-पोस्ट और स्पीड पोस्ट से अपने संदेशों को तीव्र गति से पहुँचाया जा सकता है. इसलिए मेरा सभी से अनुरोध है कि सभी इस इंटरनेट के युग में भी डाक से संदेश भेजने की महता को समझते हुए अपने संदेशों को डाक से भेजना जारी रखें, ताकि लोग यह गुनगुनाते रहेंगे "आप का ख़त मिला, आप का शुक्रिया" और "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में फूल नहीं मेरा दिल है" .

  • 20. 09:18 IST, 12 जनवरी 2010 rajeev kumar:

    यदि लोग ईमेल के जरिए शुभकामना भेज कर पेड़ की रक्षा कर रहे हैं तो यह बेहतर ही है.

  • 21. 11:59 IST, 16 जनवरी 2010 ankiet:

    सलमा जी पहले तो नए साल की मुबारक.
    मैं सच बताता हूँ..मैं आज भी दिवाली और बर्थडे ग्रीटिंगस के लिए कार्ड भेजता हूँ..हाँ ये सच है कि काफ़ी सारे दोस्तों को भेजने में मेरा पॉकेट ज्यादा दबाव में आ जाता है .. पर कार्ड्स भेजने की ख़ुशी ही कुछ और है...लेकिन ये भी सच हे कि मुझे ग्रीटिंग्स मिलते हैं पर वो मेल से ही आते हैं..डाक से बहुत कम...

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