छोटे राज्य, बड़ा खेल
किसी राज्य की दुर्दशा इस बात पर निर्भर है कि उसे चलाने वालों का दिमाग़ कितना छोटा है, न कि राज्य कितना बड़ा है.
तेलंगाना की चर्चा छिड़ते ही कई और बुझते दीयों को मानो तेल मिल गया है. गोरखालैंड, पूर्वांचल, बुदेलखंड...सभी जाग उठे हैं.
अलग राज्य की उम्मीद लगाए लोग अपने नेता से वैसा ही ज़ोरदार अनशन चाहते हैं, जैसा चंद्रशेखर राव ने किया.
कुछ दिन भूखे ही तो रहना पड़ेगा, लेकिन सोचिए अलग राज्य बन जाने के बाद 'खाने-पीने' की क्या कमी रह जाएगी?
दलील ये है कि दूर लखनऊ या कोलकाता में बैठे नेता-अफ़सर उनके इलाक़े की दुर्दशा क्यों करें, ये काम तो वो ख़ुद ही कर सकते हैं और बखूबी कर सकते हैं.
छोटे राज्य बनने के कई फ़ायदे हैं, अधिक लोगों को मंत्री बनने का मौक़ा मिलता है, अधिक अफ़सरों को नए कैडर में ऊँचे रैंक मिलते हैं, सड़क पर लाल बत्ती वाली गाड़ियाँ दिखती हैं जिससे शहर का रुतबा बढ़ता है.
नई राजधानी बनने से ज़मीन के दाम बढ़ जाते हैं, नई-नई योजनाओं के लिए पैसे आते हैं, पड़ोसी राज्यों से ठेकेदार आते हैं, नई कारों के शोरूम खुलते हैं, होटल-रेस्तराँ-बार, सबका धंधा फलता-फूलता है.
छोटे राज्य की अपनी विधानसभा भी होती है, छोटे राज्य में प्रतिभा पर रोक नहीं होती, निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री तक बन सकते हैं, राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है.
ग़रीब आदमी के लिए भी कम राहत की बात नहीं हैं छोटे राज्य. जिन दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए पहले सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता था वे काफ़ी नज़दीक आ जाते हैं इसलिए चक्करों की संख्या थोड़ी बढ़ भी जाए तो उतना नहीं खलता, अपनी भाषा बोलने वाले या अपने जैसे दिखने वाले लोगों को रिश्वत देने में शायद थोड़ी कम तकलीफ़ होती है.
अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है.
लेकिन अगर आप 'आम जनता' हैं और अपने प्यारे से, छोटे से राज्य का सपना देखकर भावुक हुए जा रहे हैं तो आपको भी उसी प्रक्रिया से गुज़रना होगा जिससे मेरे जैसे लाखों झारखंडी गुज़र चुके हैं, पहले लंबा इंतज़ार, उसके बाद मोहभंग.

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बहुत खूब.
राजेश छोटे राज्यों को बनाया ही इसलिए जाता है क्योंकि छोटी सरकारों को ख़रीदना बहुत आसान होता है. छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड में यही सब तो हो रहा है. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के शासन के दौरान का भ्रष्टाचार अब सामने आ रहा है. उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में भी कई मधु कोड़ा होंगे. छोटे राज्यों में आम आदमी उससे ज़्यादा बेहाल है जितना वह अविभाजित राज्यों में हुआ करता था.
राजेश जी, बहुत शानदार लिखा है आपने. काश, ये बात भारत की भोली-भाली जनता की समझ में आ जाए. लेकिन लगता है कि अब यह बात भारत की जनता कभी भी नहीं समझ पाएगी. वो बेईमान नेताओं की बातों में आकर अपना सबकुछ नुक़सान उठाती रहेगी.
राजेश जी, आप अंत में "मेरा भारत महान" लिखना भूल गए!
राजेश जी बहुत ख़ूब लिखा है आपने. एकदम सटीक. जनता की भावुकता का फ़ायदा नेता उठाते हैं. नेता बस कुर्सी चाहते हैं.
राजेश जी, बहुत ही उम्दा लिखा है आपने. अफ़सोस आजाद भारत की बुनियाद ही बंटवारे पर पड़ी है. सब जानते है एक विशेष व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पूरे देश को हिन्दू मुस्लिम धर्म के नाम पर विभाजित कर दिया गया था. आज उस व्यक्ति विशेष की वंशावली पूरे देश को अपनी बपौती समझ कर राज कर रही है. उस समय के डाले हुए वो बंटवारे के बीच अब पेड़ बन गए है. आज के नेता, उसी तर्ज पर, अब देश की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके इसे, भाषा और प्रान्त के नाम पर, छोटे छोटे राज्यों में बाँट रहे है.
मैं आपकी बातों से सहमत हूँ, जैसे यदि गोरखालैंड की मांग पूरी होती है तो जसवंत वहाँ के मुख्यमंत्री बन सकेंगे...
राजेश जी, बेशक झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड ने भी नए राज्य बनने से पहले बहुत सारे सपने संजोए थे लेकिन सपनों को चकनाचूर होते देर नहीं लगी. कोई फ़ायदा नहीं हुआ. हां राजनेताओँ का स्वार्थ सिद्ध हुआ.
मेरा भारत महान!!!
देश की ख़राब हालत के लिए सबसे ज्यादा जनता और छोटे दल ज़िम्मेदार हैं. अपना उल्लू सीधा करने के लिए वे अलग राज्य की मांग करते हैं.
क्या ख़ूब लिखा है. इतनी साफगोई से बखिया उघेड़ी है.
आपने बिल्कुल सही लिखा है, छोटे राज्य बनने से मुझ जैसे आम आदमी को छोड़ कर बाक़ी सबको फ़ायदा होगा. अभी मैं छत्तीसगढ़ में रहता हूं. मैं भी पहले बड़ा ख़ुश था लेकिन राज्य बनने के 10 साल बाद मुझे सिर्फ़ नेताओं और अफ़सरों का ही विकास दिखता है. आम आदमी सिर्फ़ आंकड़ों में ही विकसित नज़र आता है. मेरे राज्य में भी अधिकारी निरंकुश हैं, नेताओं को रूपया बनाने से फ़ुर्सत नहीं, बेहतर था जब मेरे राज्य की राजधानी भोपाल में थी और कभी-कभी बड़े अधिकारी और नेता आते और उनके आने से थोड़ा विश्वास होता था पर अब तो इसके भी लाले पड़ गए हैं. पूरे राज्य में हम सब चोर हैं फ़िल्म का प्रदर्शन चल रहा है. मेरे विचार से राज्यों को इतना छोटा होना ही नहीं चाहिए क्योंकि इसमें आम आदमी को छोड़ कर सबका विकास होता है.
"मिले सुर मेरा तुम्हारा" सबको अलग राज्य चाहिए. जो राजनेता अपनी गाड़ी नहीं चला सकते उनको भी राज्य चाहिए चलाने के लिए. मैं इन राजनेताओं से यह पूछना चाहता हूं क्या छोटे-छोटे राज्य प्रगति के सूत्र है? इन 62 सालों में देश का अनुभव तो बिलकुल अच्छा नहीं नहीं रहा है. यहाँ तक कि इतिहास में भी देखे तो हमसे अलग हुए संप्रभु राज्य अफ़गानिस्तान , पाकिस्तान , बर्मा, श्रीलंका, और बंगलादेश का क्या हाल है? मैं इनकी चर्चा यहाँ नहीं करना चाहता कि किन परिस्थितियों में जुड़े या अलग हुए. वर्तमान में हमारे पास 28 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश है. दो राज्य जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के बारे में पाकिस्तान और चीन की क्या राय है यह आज किसी से छुपी नहीं है. अगर थोड़ा इतिहास पर नज़र डाले तो 1956 से हमारा मानचित्र बदलने लगा. अगर हम सारी मांगों को मान कर राज्य बना दे तो निकट भबिष्य में हमारे पास तेलंगाना, गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, बिदर्भ, प्रदेश होंगे और कुछ समय बाद कोडागु, तुलुनाडू, पूर्वांचल, भोजपुर, कोसल, अंगिका, मिथलांचल, गोंडवाना, कामतापुर, कर्बिआन्लोन्ग, रायलसीमा, विद्या प्रदेश, सौराष्ट्र,....... शायद भारत की हर कमिश्नरी को एक राज्य बनाना पड़े. आख़िर क्या सोचकर संविधान निर्माताओं ने राज्यों के संख्या सिमित की जबकि 1947 में हमारे पास सैकड़ो छोटे छोटे प्रदेश थे. मेरा मानना है प्रगति साथ रहने से होती है अलग अलग रहने से नहीं.
अफ़सोस की बात है कि हमें ईमानदार नेता तो चाहिए पर ईमानदार बच्चा नहीं. मौक़ा मिलते ही सभी हाथ साफ़ करते हैं.
राजेश जी अगर मायावती छोटे राज्य का समर्थन नहीं करतीं और कहतीं कि वह उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के टुकड़े नहीं होने देंगी तो आपके जैसे अधिकांश पत्रकारों की क़लम से निकलता कि मायावती का दिमाग़ बहुत छोटा है और वह एक महारानी के जैसा व्यवहार कर रही हैं. जब जनता छोटा राज्य चाह रही है तो मायावती उनको क्यों देना नहीं चाहतीं हैं.
राजेश जी इस विषय पर बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन आपने सिर्फ़ एक ही पहलू पर प्रकाश डाला है. छोटे राज्यों के (जहां वास्तव में आवश्यकता है ) अनगिनित फ़ायदे भी तो हैं. आपने जो-जो कमियाँ (गोरखधंधे) छोटे राज्यों के बनने के बाद गिनवाई हैं उनसे इन्कार नहीं किया जा सकता. यह शत प्रतिशत सही है कि और भले ही कुछ फले-फूले न लेकिन भूमाफ़िया ख़ूब फलता है नए राज्य बनने के बाद. लेकिन लंबे चौड़े राज्य जहाँ नेताओं द्वारा भूखे को और भूखा मारकर व भरे पेट को और भरने का रवैया बना रखा है ,जहाँ नेता व प्रशाशन सालों तक झांकने नहीं जाते तो वहां के लोग किसे अपना दर्द सुनाएं. कुछ क्षेत्र तो ऐसे भी हैं जो कि आज़ादी के बाद से ही राजनितिक उपेक्षा का शिकार बने हुए हैं. मैं भी इस बात के ख़िलाफ़ हूँ कि किसी भी नए राज्य के गठन में भावुकतावश निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए.
राजेश जी, इस गर्मागर्म विषय पर बहुत अच्छा लिखा है लेकिन आपने सिर्फ़ एक ही पहलू पर प्रकाश डाला है. छोटे राज्यों के (जहां वास्तव में आवश्यकता है) अनगिनित फ़ायदे भी तो हैं. जो-जो कमियाँ छोटे राज्यों के बनने के बाद सामने आती हैं उनसे इनकार नहीं किया जा सकता. यह शत प्रतिशत सही है कि और भले ही कुछ फले-फूले न पर भूमाफिया खूब फलता है. नए राज्य बनने के बाद लेकिन लंबे-चौड़े राज्य जहाँ नेताओं द्वारा भूखे को और भूखा मारकर व भरे पेट को और भरने का रवैया बना रखा है, वहाँ के लोग किसे अपना दर्द सुनाएं. कुछ क्षेत्र तो ऐसे भी हैं जो कि आज़ादी के बाद से ही राजनितिक उपेक्षा का ग्रास बने हुए हैं. मैं भी इस बात के खिलाफ़ हूँ कि किसी भी नए राज्य के गठन में भावुकतावश निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए. इसका आधार वहां की जनता का इस बात के लिए झुकाव और रुझान होना चाहिए न कि कुछ राजनितिक परिवारों की साठ-गाँठ और सत्तालोलुपता का ज़रिए हो.
जहां तक छोटे राज्यों का सवाल है झारखंड से बुरा उदाहरण देश के लिए और क्या हो सकता है. जब तक नेताओं की नियत और नीति ठीक नहीं होती छोटे राज्य बनने से कुछ भी लाभ नहीं होगा. हां इतना ज़रूर है कि नए राज्य के नाम पर अलग फ़ंड आवंटित होंगे जिसका लाभ तो शुरूआत में दिखाई देगा लेकिन फिर वही बात जिसका ज़िक्र आपने अपने लेख में बख़ूबी किया है, होना शुरू हो जाएगा... भ्रष्टाचार... भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार. तब क्या अलग हुए राज्यों का बटवारा फिर से शुरू नहीं होगा? आख़िर विकास के झूठे सपने दिखा कर नेता राज्यों का वँटवारा कब तक करते रहेंगे?
राजेश जी आप का हास्य ज़बर्दस्त व्यंग में डूबा हुआ है. इस प्रकार की सृजनात्मक रचना के लिए धन्यवाद.
राजेश जी, लंदन मैं बैठकर ये विश्लेषण ठीक लगता होगा लेकिन राज्य का बनना किसी समाचार संस्थान का ब्यूरो खुलना नहीं है जिसका मज़ाक करियर बनाने के रूप में उड़ाया जाए. यह किसी इलाक़े के लोगों की व्यवस्था का मामला है.
बात छोटे राज्य की नहीं है, यह तो नेताओं की दुकान चलाने के लिए रचा गया एक शब्द मात्र है. . असल सवाल है कि मेरे इलाके में नाली खडंजे, अस्पताल, स्कुल बनने और चलने का नियंत्रण, उसकी व्यवस्था का नियंत्रण पटना या रांची में क्यों हो? लखनउ या हेदराबाद में क्यों हो. मेरे नज़दीक, मेरे शहर से ही क्यों न हो.
छोटे राज्यों की मांग का विरोध करने वालों का दुराग्रह ये भी है कि झारखण्ड बनाने से क्या हुआ, एक कोड़ा मिला. निर्दलीय मुख्यमंत्री बना. लेकिन क्या झारखंड बनाने से पहले कोड़े नहीं थे. अगर झारखंड नहीं बना होता तो क्या इससे कम भ्रष्टाचार होता. जिस विधान सभा का चुनाव नाली खडंजा बनवाने के वादे पर लादा जाता हो, उस विधान सभा को तो हर गली मोहल्ले स्तर तक लाना ही होगा. हमें देश को छोटे छोटे प्रजातंत्रों में ही बांट देना चाहिए, जैसा कि गांधी कह गए थे. और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को केंद्र और राज्यों के चंगुल से निकालना होगा.
एक दिन ऐसा आएगा कि देश में बाँटने के लिए कुछ नहीं बचेगा, इसके बाद नेता देश के विभाजन के लिए अनशन करना शुरू कर देंगे.
मुझे लगता है कि भाषा के आधार पर राज्यों का बंटवारा पूरी तरह ग़लत है.इस समय कांग्रेस भी गंदी राजनीति कर रही है. राज्यों को भी अपने क्षेत्र के विकास के बारे में सोचना चाहिए.
छोटे राज्य बनाने से पैसों की बरसात होगी. चारों ओर विकास की गंगा बहेगी, विकास होगा तो नेता भी मालामल बनेंगे. कोई पूछने वाला भी नहीं होगा. लेकिन इसमें ग़रीब का भला होता दिखाई नहीं देता है.
छोटे-छोटे राज्य बनाने से निश्चित रूप से उस प्रदेश का विकास होगा. बहन मायावती अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए भले ही अलग पूर्वांचल का समर्थन करें पर यहाँ के लोग जानते हैं कि यह उनके भविष्य के लिए घातक है.
बंटवारे का बंटवारा, महाराष्ट्र इसका ताज़ा उदाहरण है. भाषा और संस्कृति के नाम पर महाराष्ट्र और गुजरात का बंटवारा हुआ. लेकिन आज फिर महाराष्ट्र के अंदर ही विदर्भ को अलग राज्य बनाने की माँग की जा रही है. कारण बताया जाता है कि विदर्भ नेताओं की उपेक्षा और भ्रष्ट्राचार का शिकार हुआ है. आखिर कारण एक ही है भ्रष्टाचार और उपेक्षा. इसलिए नेता अपनी नियत और नीति दुरुस्त करे. आज ज़रूरत इस बात की है बंटवारे की नहीं.
छोटे राज्यों की मांग का यह कह कर मजाक उड़ाना ठीक नहीं होगा कि, ‘लखनऊ या कोलकाता में बैठे नेता-अफ़सर उनके इलाक़े की दुर्दशा क्यों करें, ये काम तो वो ख़ुद ही कर सकते हैं और बख़ूबी कर सकते हैं’ यह सही है कि राजनेताओं ने अपनी छवि बहुत हद तक ख़राब कर दी है. पर इस का अर्थ यह तो नहीं कि अपेक्षित विस्तार को न्याय न दिया जाए. बड़े राज्यों की यह समस्या आम है कि बड़े शहरों ख़ास कर राजधानी के आसपास के बड़े शहरों का ही विकास होता है. दूर-दराज के पिछड़े क्षेत्रों की ओर कोइ ध्यान नहीं देता. मंत्री पद भी बड़े शहर के नेताओं को ही मिलता है. जो जहाँ से मंत्री बनता है वह वहीं के विकास की चिंता करता है.
हर माँग भले सही न हो पर हर माँग ग़लत भी नहीं हो सकती. हम गुजरात के कच्छ को देखें तो यह विस्तार पूरे गुजरात का एक चौथाई विस्तार है. पर जब वित्तीय आवंटन की बात आती है तब उसे एक ज़िले के बराबर भी धन नहीं मिलता है. कच्छ स्वतंत्रता से पहले एक स्टेट था. स्वतंत्रता के बाद 1 जून को 1948 को हिन्दी संघ में उसका विलय हुआ तब समुद्री राज्य का दर्जा दिया गया था. बाद में मोरारजी भाई के राजकीय हितों के लिए मुंबई द्विभाषी राज्य की रचना की गई तो कच्छ को यहाँ की जनता से पूछे बिना ही इसे मुंबई राज्य में मिला दिया गया.फिर 1960 में गुजरात की रचना हुई तो फ़ुटबॉल की तरह उसे गुजरात का हिस्सा बना दिया गया.जनता की इच्छा क्या है इस की चिंता किसी ने नहीं की. कच्छ के नेताओं ने सिर्फ़ अपने हितों को ही देखा.
गुजरात की किसी भी सरकार ने कच्छ के विकास की चिंता नहीं की. 2001 का विनाशकारी भूकंप ही वास्तव में कच्छ का तारणहार बना. देश-विदेश से मिली सहायता से तहस नहस कच्छ का पुनर्वास हुआ है. भूकंप के नाम पर उद्योगों को कर राहत की सुविधा मिलने से कई उद्योग यहाँ आए पर इस में कच्छावासियों को कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ. ज्यादातर रोजगार कच्छ के बहार के लोगों को दिया जाता है. यहाँ तक की गुजरात के ही उद्योगपति अपने अपने क्षेत्रों से मज़दूर ले आते है. अब बताइए इसका उपाय अलग कच्छ राज्य नहीं हो सकता है. यहाँ गरीबों को घर बनाने के लिए जमीन राहत भाव से नहीं दी जाती पर उद्योगों को 10-15 रुपए के भाव से दी जाती है. पशुओं के चारागाह भी उद्योगों के हवाले कर दी जाती है. स्थानीय नेता शांतिभंग की कारर्वाई के डर से चुप्पी साध लेते है. इस का उपाय तो अलग कच्छ राज्य ही हो सकता है.
हर मांग भले सही न हो, पर हर मांग गलत भी नहीं हो सकती. हम गुजरात के कच्छ को देखें तो यह विस्तार पुरे गुजरात का एक चौथाई विस्तार है. पर जब वित्तीय आवंटन की बात आती है तब उसे एक डिस्ट्रिक हिसाब से ही धन प्राप्ती होती है. कच्छ स्वतंत्रता से पूर्व एक स्टेट था. स्वतंत्रता के बाद १९४८, १, जून को हिन्दी संघ में उस का विलय हुआ तब सी स्टेट का दरजा दिया गया था. बाद में स्व. मोरारजीभाई के राजकीय हितों के लिए मुंबई द्विभाषी राज्य की रचना की गई तो कच्छ को यहाँ की जनता को पुच्छे बिना ही इसे मुंबई राज्य में मिला दिया गया. फिर १९६० में गुजरात की रचना हुई तो फुटबोल की तरह उसे गुजरात का हिस्सा बागा दिया गया. जनता की इच्छा क्या है इस की चिंता किसीने नहीं की. कच्छ के नेताओंने सिर्फ अपने स्थापित हितों को ही देखा.
गुजरात की किसी भी सरकारने कच्छ के विकास की चिंता नहीं की थी. २००१ का विनाशक भूकंप ही वास्तव में कच्छ का तारनहार बना है. देश विदेश से मिली सहाय से तहस नहस कच्छ का पुनर्वसन हुआ है. भूकंप के नाम पर उद्योगों को कर राहत की सुविधा मिलाने से कई उद्योग यहाँ आये पर इस में कच्छावासीओं ख़ास लाभ नहीं हुआ है. उद्योगों को ही लाभ हुआ है. ज्यादातर रोजगारी कच्छ बहार के लोगिन को दी जाती है. यहाँ तक की गुजरात के ही बिनाकच्छी उद्योगपति अपने अपने क्षेत्रों से मझदूर ले आते है. कच्छ में उपलब्ध होते हुए भी गांधीधाम पास के एक उद्योग के लिए कच्छ बहार मोरबी से कामादारों के बस के द्वारा हररोज लाया जात है. परिवहन का अतिरिक्त खर्च उठाकर भी वे लोग अपने क्षेत्र के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते है और कच्छीओं को ठेंगा दिखाता है. इस का उपाय तो अलग कच्छ राज्य ही हो सकता है न ?
यहाँ गरीबों माथा ढंकने के लिए जमीन राहत भाव से नहीं सी जाती, पर उद्योगों को १०-१५ रुपये के भाव से दी जाती है. मवेसीओंके चारे के लिए उपलब्ध जमीन भी उद्योगों के हवाले कर दी जाती है. स्थानिक नेता शिस्तभंग की कार्यवाही के डर से चुप्पी साध लेते है. इस का उपाय तो अलग कच्छ राज्य ही हो सकता है न ?
-राम ठक्कर
भुज-कच्छ
काफ़ी अच्छा लिखा है. उम्मीद है कि हमारे नेता जी, भैया जी को यह बात समझ में आए और वे इन फ़ालतू के मुद्दों को छोड़कर जनसेवा के मुद्दों पर थोड़ा समय देंगे.
समझ में नहीं आता कि भारत कि जनता कहाँ से भोली भाली है. प्रजातंत्र में जनता अगर भोली-भाली होती तो नेता भी ईमानदार होते. बबूल के बीज से आम नहीं फलेगा. भारत में हर तरह के भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता दोषी है जो गुंडे और बदमाशों को वोट देती है. गुरुदत्त ने इसी कथित भोली-भाली जनता का 'प्यासा' फ़िल्म में काफी अच्छा चित्रण किया था. आंध्र प्रदेश की हद तक मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि यहाँ ईमानदारी की बात करने वाला एक राजनेता जरूर है मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता लेकिन उसकी पार्टी जनता का तिरस्कार ही झेल रही है.
बीबीसी, आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. आपको नए संवाददाताओं की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. फ़ारूक़ साहब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों को कवर कर लेंगे.
राजेश जी आपकी बातें पूरी तरह ठीक हैं.
ये लेख बिल्कुल सही समय पर आया है. प्रियदर्शी जी आपने आईना दिखाने का काम किया है. ये सच है कि छोटे राज्य बनाने से झोलाछाप नेताओं को भी जनता को लूटने का मौका मिलेगा. आम जनता को भी ये समझना चाहिए कि इन छोटे राज्य समर्थक राजनेताओं का साथ न दें बल्कि उनका समूल विरोध करें.
छोटे राज्यों के निर्माण से संकुचित मानसिकता को बढ़ावा मिलता है, क्षेत्रवाद बढ़ता है, इससे विकास बिल्कुल नहीं होता है.
राजेश जी मुझे आपके विचार बहुत पसन्द आय है और मै इस प्रकार के विचारो को समय की जरुरत मानता हु।
परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है, मैं पूछता हूँ तो क्या अब परिवार में कोई समस्या नहीं होती? राज्य छोटा करने से कुछ नहीं होगा, नेता लोगों को अपनी लालच छोटी करनी होगी. छोटा हो या बड़ा. सुधार बढाओ समस्या घटाओ.
परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है, मैं पूछता हूँ तो क्या अब परिवार में कोई समस्या नहीं होती ? राज्य छोटा करने से कुछ नहीं होगा, नेता लोगों को अपनी लालच छोटी करनी होगी. छोटा हो या बड़ा - सुधर बढाओ समस्या घटाओ.
दसूरे राज्य बनाने की माँग करने वालों की बात तो नहीं मालूम लेकिन पृथक बुंदेलखंड राज्य की कथित माँग कहीं नहीं है. यूपी में कोई मायावती बोलती है तो कोई राजा बुंदेला बोलते हैं. एमपी में कोई नहीं बोलता. मैं सागर में रहता हूँ और यहाँ कोई पृथक बुंदेलखंड बनाने की माँग नहीं है. बनेगा तो हम उसका विरोध करेंगे. आंदोलन करने वाले लोग कौन हैं. जनता से किसने पूछा? जनमत कहाँ है? यानि ये राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का मामला है न कि कोई पब्लिक डिमांड या विकास की सोच. छोटे राज्यों से विकास नहीं होता. अगर यह मिथक नहीं है तो छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद, झारखंड में भ्रष्टाचार और उत्तराखंड में मौन क्यों है? विकास क्यों नहीं हुआ. राजेश की हर बात से सहमत हूँ.
यही इस देश की असलियत है और जब तक जनता ऐसे लोगों को वोट देती रहेगी तब तक यह सब कुछ चलता रहेगा.
दोस्तों जनता को क्यों दोष देते हो... अखंड भारत की बात करने वाली भाजपा और रा.स्व.सं. ही जब भारत के आंतरिक राज्यों को आपस में बांटने पर लगी है तो किसका विश्वास किया जा सकता है. भाजपा हो या कांग्रेस या फिर कोई छोटा दल. सभी अपने हितों के लिये भारत के टुकड़े करने में लगे है. पहले भी प्रधानमंत्री का पद पाने के लिये देश के टुकडे कर चुके हैं.
मैं तो यही कहुंगा की जिस भाषा और संस्कृती के आधार पर इन राज्यों की एकता कायम है और इसे अपने आपसी स्वार्थ और तथाकथीत तरक्की के नाम पर ये लोग तोड़ रहें है वो गलत है... अलग राज्य के बजाय बेहतर ये होगा की अलग देश की मांग की जाये... उदाहरण के लिये गुजरात या महाराष्ट्र स्वतंत्र राष्ट्र और उसमें सौराष्ट्र, कच्छ, विदर्भ जैसे राज्य... इससे फायदा ये होगा की जिनको राज्य चाहीये उन्हे राज्य भी मिल जायेगा और अखंड गुजरात या महाराष्ट्र भी बचा रहेगा.
जय हिंद!
जब नेहरु जी ने देश को छोटे और भाषा के आधार पर वर्गीकृत किया तब विचार था की देश को बाटा जाय और भारत देश पर सबकी निर्भरता बनी रहे. पर आज परिस्थितियां बदल चुकी है देश एक है. आज देश को बाटना इसे बाटने जेसा ही है. हम बात रहेइ और भारत से इन राज्यों की निर्भरता कम हो रही है. हलाकि व्यवस्था(सिस्टम) को बदलना मुश्किल है. ये हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था का साइड इफ़ेक्ट है. इसके लिए किसी को दोष देने की बजाये हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे तभी हम इस समस्या का समाधान पा पाएँगे.
उत्तर प्रदेश के विभाजन का मसला मूल रूप से छोटे प्रदेश बनाम बड़े प्रदेश का मसला नहीं है। उत्तर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों की विकास की जरूरतें अलग अलग हैं। उनके शासन प्रशासन की जरूरतें अलग अलग हैं। यह दअरसल विभाजन नहीं प्रदेश के पुनर्गठन की मांग है। और उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद जो प्रदेश बनेंगे वे कोई छोटे प्रदेश नहीं होंगे। उदाहरण के लिए आप हरित प्रदेश को ही लें। यह प्रदेश अगर बनता है तो कर्नाटक या राजस्थान के जितना बड़ा राज्य होगा। साथ ही यह पंजाब, हरियाणा, केरल जैसे कई राज्यों से काफी बड़ा होगा। पूर्वाचल भी अगर अलग प्रदेश बनता है तो यह कोई छोटा प्रदेश नहीं होगा। बुंदेलखंड इनमें से थोड़ा छोटा जरूर हो सकता है लेकिन उसके गठन की मांग तो सबसे पुरानी है।
छोटे राज्यों के नाम पर अक्सर पूर्वोत्तर के राज्यों के उदाहरण दिए जाते हैं और यह कहा जाता है कि ऐसे राज्य पिछड़ जाते हैं। लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों की समस्या अलग है। उनके बनने के कारण भी अलग हैं। वे आदिवासी पहचान पर आधारित राज्य हैं, या यह कह सकते हैं कि एथनिक पहचान के आधार पर बनाया गया है। इसलिए बनाया गया है कि वहां अलग अलग क्षेत्रों में रहने वालों की एथनिक पहचान के बीच एक तरह का तनाव था, यह तनाव न रहे इसलिए उन्हें अलग राज्य का दर्जा दिया गया। वहां राज्य बनाने में विकास का मसला था ही नहीं, और राज्य बनने के बाद विकास हुआ भी नहीं।
बहुत छोटे राज्य बनाने का समर्थन नहीं किया जा सकता। जैसे कुर्ग को अलग राज्य बनाने की बात चलती है, अब एक जिले को लेकर राज्य बनाने की बात तो नहीं ही मानी जा सकती। ऐसी ही दिक्कत गोरखालैंड में भी है। लेकिन यह समस्याएं उत्तर प्रदेश में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश का संतुलित विकास हो सके इसके लिए इसका पुनर्गठन जरूरी है उत्तर प्रदेश में दिक्कत इसलिए भी नहीं है क्योंकि ज्यादातर राजनैतिक दल इसके समर्थक हैं। सिर्फ समाजवादी पार्टी ही है जो कुछ कारणों से इस तरह के पुनर्गठन का विरोध कर रही है, बाकी भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस इसका समर्थन कर रहे हैं।