मैं छुट्टी मनाने नहीं जा सकता...
रूबिया सईद के अपहरण की घटना को पूरे बीस साल हो गए हैं. भारत के तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी और श्रीनगर में मेडिकल की छात्रा रूबिया का 8, दिसंबर 1989 को अपरहरण हुआ था.
कश्मीर घाटी में लोकसभा चुनाव का बहिष्कार एक बड़ी स्टोरी थी, लेकिन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट यानी जेकेएलएफ़ के ज़रिए रूबिया का अपहरण एक राष्ट्रीय उन्माद बन गया.
दो दशक पूर्व, एक युवा पत्रकार के तौर पर मैं 10 दिसंबर को श्रीनगर पहुँचा यह जानते हुए भी कि मुझे घाटी की राजनीति की बहुत कम जानकारी है. लेकिन यह स्टोरी बेहद रोमांचकारी थी और मदद के लिए कई कश्मीरी दोस्तों का सहारा था.
भाग्य की बात कि इंडियन एयरलाइन्स (याद रहे उस समय निजी विमानसेवाएँ नहीं होती थीं) की जम्मू-कश्मीर जाने वाली उड़ान में मेरे बराबर की सीट पर बैठे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपहरण गाथा में प्रगति का क्रमवार विवरण सुनाया जिसके बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी थी.
इसे कहते हैं क़िस्मत!
रूबिया का अपहरण करने वाले जेकेएलएफ़ ने जब उन्हें रिहा किया तो उससे पहले वीपी सिंह सरकार ने कई चरमपंथियों को आज़ाद किया. रूबिया के अपहरणकर्ताओं में से दो-यासीन मलिक और जावेद मीर-इस समय श्रीनगर में मौजूद हैं.
तेरह दिसंबर, 1989 को रूबिया रिहा हुईं और लगा कि जैसे श्रीनगर का हर नागरिक-और बहुत से बाहर वाले भी-सड़कों पर निकल आया है. हवा में जैसे आज़ादी की ख़ुशबू घुल गई थी.
मुझे याद है श्रीनगर अस्पताल के बाहर एक युवा डॉक्टर ने कहा, यह तो फ्रांसीसी क्रांति की तरह का माहौल लग रहा है.
और फिर भारत सरकार की तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई-अर्धसैनिक बल के हज़ारों कर्मचारियों की तैनाती. बंकर और सैनिक चारों तरफ़ छा गए.
हज़ारों जानें जा चुकी हैं, भारत सरकार का फिर पूरा नियंत्रण है, आज़ादी पाने की मांग धीमी पड़ गई है. लेकिन इसके बावजूद यह भी सच है कि हर महीने कोई न कोई कश्मीरी रहस्यमय परिस्थितियों में ग़ायब हो जाता है.
घाव पर मरहम लगाना अब भी बाक़ी है, लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं. सशस्त्र सेनाओं के पास अब भी विशेषाधिकार हैं.
केंद्र सरकार की सभी समितियों और बयानों के बावजूद, कश्मीरियों की स्वायत्तता की मांग पर क़तई कोई ध्यान नहीं दिया गया है.
पिछली बार जब मैं कश्मीर गया था तो वह 1995 में एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट था. मेरे अंदर से आवाज़ आती है कि मुझे वहाँ छुट्टी मनाने नहीं जाना चाहिए. वहाँ की आबोहवा में बहुत सी दर्दनाक दास्तानें मौजूद हैं.

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यह ब्लॉग आपके एकतरफा विचार को प्रकट करता है. कश्मीरी पंडितों का क्या कोई मानवाधिकार नहीं है? क्या उन्हें कश्मीर में रहने का हक़ नहीं है? क्या कभी कोई दुखी हिंदू की ओर भी नज़र उठाता है?
आश्चर्य है कि सबको कश्मीर याद आता है, कश्मीर का दर्द याद आता है पर कश्मीरी पंडित या हिंदू याद नहीं आते है. आपको हर महीने गायब होते कश्मीरी याद हैं पर बेघर हो गए हिंदू नहीं.
पाकिस्तान दे दिया, बांग्लादेश दे दिया, अल्पसंख्यक के नाम पर हज की सब्सिडी दे दी, आरक्षण देने की सोच रहे हैं, एक तरफ तो आप जैसे बुद्धजीवी लोग अल्पसंख्यक लोगों को सारे अधिकार देने की बात करते हैं, तो जम्मू और लद्दाख के लोगों को क्या दिया जाए...? आप हीं बता देते तो अच्छा होता? आपको तो बहुत जानकारी है घाटी के समस्या की...हद होती है हर चीज़ की.
ये कैसा लेख है... वो रूबिया सईद का अपहरण और रिहाई ही थी जिसने घाटी में चरमपंथ की शुरुआत की थी. ओछी राजनीति के चलते ही हिंदुओं के दर्द को कोई नहीं देखता. वे वर्षों से बेघर हैं. आपके लेख से लगता है कि आप भी अलग कश्मीर के समर्थक हैं.
आप लोगों को और कोई काम नहीं है, यदि कश्मीर को अलग ही करना चाहते तो कोई और रास्ता अपनाएँ. कश्मीऱी पंडितों के हाल पर कोई नहीं रोता. अब मुझे समझ में आने लगा है कि हिंदुस्तान क्यों ग़ुलाम रहा होगा.
आपका ये कथन कतई सही नहीं कहा जा सकता है. आपने कहा है कि भारत सरकार के सभी बयानों के बावजूद कश्मीरियों की स्वायत्तता की माँग पर कतई कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा और वहाँ की आवोहवा में बहुत सी दर्दनाक दास्ताने हैं, लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं, सेना के पास विशेषाधिकार हैं आदि आदि. दरअसल भारत सरकार के कारण ही वहाँ आज़ादी की खुशबू है. भारत के सभी राज्यों से अधिक कश्मीर के लोगों को मदद हासिल होती है. रूबिया सईद का अपहरण और रिहाई एक नाटक की तरह खेला गया. रूबिया रिहा हुईं और अपहरण करने वाले नेता बन गए. आपको पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के बारे में भी कभी कुछ कहना चाहिए.
बीबीसी से अनुरोध है कि निष्पक्षता के सिद्धांत का पालन करते-करते भारत विरोधी रुख़ न अपना लें.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से तुलना करके देख लें. भारत प्रशासित कश्मीर में कम ही लोग गायब हुए होंगे. जब से भारत ने बांग्लादेश को मुक्त कराया है, पाकिस्तान भारत के हर कौने में होनेवाली बगावत को मदद देता रहा है. पंजाब में भी यही हुआ था. क्या भारत पाकिस्तान को कामयाब होने दे?
माफ़ कीजिएगा, मगर समझ में नहीं आया कि आप कहना क्या चाह रहे हैं.
आपने लिखा है कि आप छुट्टियाँ मनाने कश्मीर नहीं जा सकते हैं क्योंकि वहाँ की हवा में कई दर्दनाक़ कहानियाँ तैर रही हैं. आपने उनमें से किसी एक को लिखने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं? क्या आप किसी से डरे हुए हैं? क्या आप सरकार से डरे हुए हैं कि वह आप पर चरमपंथी होने का ठप्पा लगा देगी या पत्रकार अब उन दर्दनाक़ कहानियों से अधिक सरकारी सुविधाओं को महत्व देने लगे हैं. आपको अपनी जि़म्मेदारियाँ समझते हुए उन कहानियों का बताना चाहिए.
आप कहना क्या चाहते हैं? आज और कल के बदलाव के लिए ज़िम्मेदार कौन है? भारत सरकार या यासीन मलिक?आज घाटी में कश्मीरी पंडित नहीं है तो उनका दर्द किसी को पता नहीं है. कभी उनका भी भरा-पूरा संसार था. स्वायत्ता की माँग कोई भी कर सकता है. उस समय भारत कहाँ रह जाएगा, जरा इस पर भी सोचिए.
आप ग़लत सोच रहे हैं, इसलिए आप छुट्टियाँ मनाने कश्मीर नहीं जा सकते हैं. आप उन लोगों के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं जिन्होंने इस समस्या के कारण अपना घर-बार सब खो दिया है. आप जरा उनके बारे में भी सोचिए.
अमित बरुआ जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह असहमत हूँ. आपने केवल एकपक्षीय बात कही है. अमित जी, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. आपने यह क्यों नहीं लिखा कि आतंकवादियों को पाकिस्तान पिछले 25 साल से सहयोग कर रहा है. कई लोग अबतक लापता है. उनमें से अधिकतर को आतंकवादियों ने मार दिया क्योंकि उन लोगों ने उन्हें किसी तरह का समर्थन नहीं दिया. अगर आप ध्यान से सोचेंगे तो आपको इस बात का एहसास होगा कि इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कौन है.
आपने यह क्या लिखा, आप कहना क्या चाहते हैं. लगता है आप अल्पसंख्यकों को ख़ुश करना चाहते हैं.
अमित बरुआ जी की बात में बहुत दम है. आज ये कह रहे हैं कि कश्मीर में लोग घुट-घुट कर जी रहे हैं. कल यह कहेंगे कि असम के लोगों को स्वतंत्र असम दे दो, फिर महाराष्ट्र के लोग भी उत्तर भारतीयों से त्रस्त हैं तो महारास्ट्र को देश से अलग कर राज ठाकरे को महाराष्ट्र का राष्ट्रपति बना दो. फिर अपने नक्सली भाई भी क्या ग़लत कर रहे हैं तो उन्हें भी उनके अधिकार दे दिए जाएँ कि वे जहाँ चाहें अपनी बंदूक लहराएँ. अभी केवल राजधानी रोकी है कल हवाई जहाज़ रोकेंगे. भाई आज़ादी का तो यही मायने है. लेकिन शायद आपको यह नहीं मालूम कि इस आज़ादी की क़ीमत हमारे जवान अपनी जान देकर चुकाते हैं. सेना के लोगों को ही जान देने का विशेषाधिकार है ऐसा क्यों?
भारत में रहकर हिंदुओं के बारे में बात नहीं करना ही शायद बुद्धिजीवी होने की निशानी है.
अमित जी, आपने अपने ब्लॉग में कश्मीरी पंडितों के बारे में क्यों नहीं लिखा?
प्रिय बरुआ जी, किसी भी नेता ने कश्मीरी पंडितों की समस्या पर ध्यान नहीं दिया. आपने अपने ब्लॉग में जिन नेताओं का नाम लिया है, वे कश्मीर से दो लाख पंडितों को भगाए जाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. जिस तरह अन्य नेताओं ने कश्मीरी पंडितों की ओर से आँखें मूँद रखी हैं, उसी तरह आपने ने भी अपनी आँखें मूँद ली हैं. एक ट्रेन के डिब्बे में 52 युवकों को ज़िंदा जला दिया गया लेकिन किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया. अगर ऐसा ही रहा तो अफ़जल गुरु एक दिन जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बन जाएँगे. अगर आप लोगों ने अपनी आँखें ऐसी ही बंद कर लीं तो अंधेरा ज़रूर फैलेगा.
क्या स्वतंत्र पत्रकारिता इसे कहते हैं? आपके ब्लॉग में कश्मीरी हिंदुओं का कोई जिक्र नहीं है. क्या वे लोग अपने प्रदेश से बाहर घुट-घुटकर नहीं जी रहे हैं? बाकी के कश्मीरी कम से कम अपने राज्य में तो हैं. हर साल भारत सरकार हज़ारों करोड़ रुपए का पैकेज राज्य को देती है. उस पैसे का क्या होता है? सेना तो अपने बजट से वहाँ रह रही है. ऐसे में सरकारी पैकेज का पैसा कहाँ जा रहा है. अमित जी आपने उन पैसों के बारे में तो अपने ब्लॉग में कुछ भी नहीं लिखा.
मैं आप की बात समझाता हूँ कि कुछ लोग हर महीने गायब हो जाया करते हैं लेकिन ऐसा केवल कश्मीर में ही नहीं होता. गाज़ियाबाद, नोएडा, देहरादून, मुंबई और आंध्र प्रदेश में भी मासूम लोगों को अपराधी बताकर मुठभेड़ों में मार दिया जाता है. जो ग़लत है.
मैं मानता हूँ कि कश्मीर के लोग जिसके साथ रहना चाहे रहे हों पर कश्मीरी कौन हैं? अंततः हैं तो भारतीय ही न. अगर वो पाकिस्तान के साथ चले जाएंगे तो उनका शोषण ही होगा. आज भी हम बंटवारे की बात करते हैं तो कहते हैं की ग़लत हुआ तो फिर वही ग़लती दोहराई जाए केवल इसलिए की कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल है और वे हिंदुस्तान के साथ नहीं रहना चाहते हैं क्योंकि वहाँ शरिया लागू नहीं हो सकता. मैं नहीं जानता कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के हालात कैसे हैं लेकिन सुना है कि भारतीय कश्मीर से बुरे हालात हैं. इसी कश्मीरी आतंकवादियों ने हिंदुओं को मारकर भगा दिया. उनके ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया गया. अगर भारत कश्मीर घाटी को मुक्त कर देता है तो जो लद्दाख के लोग और जम्मू के लोग पाकिस्तान या स्वतंत्र कश्मीर के साथ नहीं रहना चाहते उनका क्या होगा? लद्दाख को चीन और पाकिस्तान के हाथों मरने के लिए कैसे छोड़ा जा सकता है.
आज जहाँ यूरोपीय यूनियन अपने मतभेद भूलकर प्रगति के लिए साथ आ रहा है वहाँ अलगावाद के रास्ते पर चलने से न केवल कश्मीर का नुक़सान होगा बल्कि भारत को भी नुक़सान उठाना पड़ेगा.
पहले इतिहास पढ़िए, फिर बात करिए. आवेश में आकर कोई बात नहीं कहनी चाहिए. असम, महाराष्ट्र या पंजाब में अलगाववाद की बात तब शुरू होती है जब अधिकार समान रूप से नहीं मिलते हैं. कश्मीरियों की भी यह कहानी है. उन्हें स्वायत्ता मिलनी ही चाहिए.
आज तक पाकिस्तान का एक भी पत्रकार नहीं मिला जो यह कह सके की पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर को आज़ाद कर देना चाहिए. अपने बुद्धिजीवी तो कबसे चिल्ला-चिल्ला कर राग अलाप रहे हैं.
ज्योती जी आपने बहुत अच्छा कहा. मैं आपके विचारों की प्रसंशा करता हूँ.
अमित जी. कश्मीर के नाम पर उल्फ़ा का दर्शन बताना चाह रहे हैं. असम ने उल्फ़ा को नकार दिया, अब आप ऐसा क्यों कह रहे हैं. मुझे आपकी बात समझ में नहीं आई.
अमित जी क्या जम्मू कश्मीर के रहने वाले हैं? क्या आपने कश्मीरी पंडितों की हालत देखी है. क्या आपने यह सोच रखा है कि चरमपंथी जो कहेंगे वही सच होगा? बीबीसी से इस तरह के ब्लॉग की उम्मीद नहीं थी.
अमित जी मुझे माफ़ करें आपका ब्लॉग एकतरफ़ा है. इसमें कश्मीरी पंडितों और उनके परिवार के बारे में कुछ नहीं कहा गया है. जिन्होंने असुरक्षा के कारण अपनी पूरी संपत्ति वहाँ छोड़ दी. अगर कश्मीर को आज़ादी दे भी दी जाए तो वह ज़िंदा कैसे रहेगा? क्या वह अपने पड़ोसियों की सहायता पर निर्भर रहेगा? कश्मीरियों को बात समझनी चाहिए और देश की मुख्य धारा में उन्हें ख़ुद का साबित करना चाहिए.
अमित जी, आख़िर आप कश्मीर की स्वायत्ता का राग क्यों अलाप रहे हैं? क्या आपको लगता है कि ऐसा होने से कश्मीर में सबकुछ ठीक ठाक हो जाएगा. धरती का स्वर्ग क्या एक बार फिर स्वर्ग बन पाएगा. क्या यह झुनझुना दे देने से कश्मीरियों को सारी खुशियाँ मिल जाएँगी? आप इसे क्यों नहीं स्वीकार करते हैं कि स्वायत्ता या आज़ादी समस्या का हल नहीं हो सकता है. मुझे नहीं लगता कि आप भारत में छुट्टी बिताना पसंद करेंगे.
आपको यह पता नहीं है कि आप क्या संदेश देना चाहते हैं.
यह कैसा लेख है जो उल्टी दास्तान बयान कर रहा है. हमें कश्मीर की समस्या का इलाज़ उसकी जड़ में खोजना चाहिए.
आप भारतीय हैं, इस पर मुझे शक है. पहले भारतीय इतिहास को पढ़ें और फिर भारतीय बनें.
मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या लिखूं. मैं किसी का पक्षधर नहीं हूँ. लेकिन यह लेख पढ़कर मुझे सदमा लगा है कि आप कश्मीर में स्वायत्तता की बात कर रहे हैं. अपने ही देश और घर में विस्थापित होकर रह रहे लोगों की बात कोई नहीं करता है. ऐसे में स्वायत्तता बेमानी लगती है. जब घर का ही एक सदस्य दर-बदर ठोकरें खाने को मज़बूर हो, खानाबदोश जीवन जीने को लाचार हो और दबंग सदस्य किसी और की कठपुलती बनकर मानवता और अपनत्व को भूला बैठा रहे. पीढ़ियों से क़ायम अपने बज़ूद से बेदखल किए गए लोगों के इन्साफ़ पर हर कोई राजनितिक रोटियाँ सेंक रहा है. उधर दूसरी तरफ पड़ोसी देश से निकाह कर लाई गई दुल्हनों की तस्वीरें छाप कर हर जगह सुर्खियाँ बनाई गईं. जब घर के लोग पड़ोसी के इशारों पर गुमराह हों, अपनों की बात सुनने को तैयान न हों ,शांतिपूर्वक हल के लिए पहल न करें, बीच में बिचौलियों की भूमिका तय करें तो फिर कोई क्या कर सकता है. रुबिया सईद के अपहरण की घटना ने हाल के वर्षों में घटे चरमपंथी घटनाओं की नींव को पक्का करने और राजनितिक व कूटनीतिक विचारधाराओं के ध्वस्त होने के आसार को बल दिया. अगर उसी समय परिपक्व कूटनीतिक मानसिकता का परिचय दिया गया होता तो बहुत सारी मानवता को शर्मसार करने वाली गतिविधियाँ जन्म न ले पातीं. भारतीय सेना क्या करे जब लोग अपने ही घर के पर्दों का चीरहरण करने में लगे हैं. लगता है कि इस स्वर्ग को पड़ोसियों की या फिर अपनों की ही नज़र लग गई है.
ब्लॉग के लेखक काफ़ी भोले-भाले इंसान हैं. आप कभी सेना, बीएसएफ़ और सीआरपी के जवानों से बात करें वे आपको सच्चाई बताएँगे. वे लिबिया, सूडान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के चरमपंथियों को पकड़ते हैं. ये चरमपंथी पाकिस्तान प्रायोजित होते हैं और इन्हें स्थानीय आतंकवादियों का समर्थन मिला होता है. वे कश्मीर में मौज़-मस्ती करने नहीं आते हैं, वे हत्यारे हैं. वे लोगों को मार रहे हैं. आप इन चरमपंथियों की वकालत क्यों कर रहे हैं. क्या आप भारत को तबाह करने की इच्छा रखते हैं? आप क्या चाहते है?
मुझे आपकी राष्ट्रियता को लेकर संदेह है.
भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं को काफ़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी थी. उनके पास केवल दो ही विकल्प थे, या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या फिर मरने के लिए तैयार रहें. आज यही हालत कश्मीर की है. वहाँ चरमपंथियों ने पंडितों के लिए तीन विकल्प दिए हैं, या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या कश्मीर छोड़ दे या मरने के लिए तैयार रहें. आपके विचार पढ़ने के बाद मैं यह समझ सकता हूँ कि इस पतन का कारण क्या है.
अमित बरुआ जी, आपको कुछ भी लिखने से पहले कई बार सोचना चाहिए. कृपया आप अपने विचार को दुनिया में फैलाए न. आप चिट्ठियों में देख सकते हैं कि कोई भी आपके इस विचार से सहमत नहीं है.
बरुआ जी, आपने सही कहा कि आप छुट्टी मनाने कश्मीर नहीं जा सकते हैं क्योंकि वहाँ की जनता नहीं चाहती है कि आप वहाँ आए. कश्मीर के लोग स्वायत्ता की माँग कर रहे हैं वे कश्मीर को एक प्लेट में कश्मीरी पंडितों के खून के साथ सजाकर पाकिस्तान को नहीं सौंप सकते हैं. आप जैसे पढ़े-लिखे लोग हर उस क़दम के पक्ष में हैं जिससे देश का बंटवारा होता हो. ऐसे लोग अपने इस विचार पर गर्व भी करते हैं. आपने कभी यह सोचा है कि ग़ैर कश्मीरी वहाँ ज़मीन क्यों नहीं ख़रीद सकते हैं, कश्मीर को अलग दर्जा क्यों मिला हुआ है, कश्मीरियों को चीन अलग से वीजा क्यों देता है, पाकिस्तान कश्मीर को मुद्दा क्यों उठाता रहता है. वह केवल इसलिए कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग कश्मीर को पाकिस्तान को दे देने की वकालत करते हैं. देश के अन्य राज्यों में भी रोज-रोज अपहरण की घटनाएँ होती रहती हैं. इसलिए कृपया हमारे सुरक्षा बलों को देश न दें. वे काफ़ी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और देश की एकता के लिए अपनी जान गंवाते हैं.
अमित बरुआ जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह असहमत हूँ, आपने केवल एकपक्षीय बात कही है. अमित जी, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. आप इतने प्रबुद्ध पत्रकार हैं और ये एक पक्षीय बात आपको कतई शोभा नहीं देती. निष्पक्षता आपका सबसे पहला हथियार है. आप इसका त्याग क्यों करना चाहते है? आपका ये आलेख मेरी समझ से बिल्कुल जलेबी की तरह उलझा हुआ दिखा रहा है.
बहुत ग़ैरज़िम्मेदाराना ब्लॉग लिखा है अमित जी. आश्चर्य हुआ पढ़कर.
मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या लिखूँ. शायद इसीलिए भारत को एक सॉफ्ट स्टेट कहा जाता है. मुझे लगता है कि कोई भी राष्ट्रभक्त कश्मीर की स्वतंत्रता की बात नहीं सोच सकता.
पता नहीं आप कहना क्या चाह रहे हैं.
अमित जी आपका ब्लॉग पढ़ कर मुझे रानी मुखर्जी की एक फ़िल्म का एक गाना याद आ रहा है- हद कर दी आपने...
अमित बरुआ जी बहुत निराशा हुई आपका ब्लॉग पढ कर. कश्मीर भारत के लिए बोझ है जिसका कोई आर्थिक योगदान नहीं है और तथाकथित आजादी मिल जाने पर भी वो केवल पाकिस्तान का पिट्टू ही बना रहेगा. एकबात याद रखने की है, कश्मीर देश का एकमात्र राज्य है जहाँ मुस्लिम आबादी हिन्दुओं से ज्यादा है तभी इस देश से अलग होने और स्वायत्तता की बातें की जा रही है. पर उन लाखों कश्मीरी पंडितो का क्या जिनको उनकी जमींन से उखाड दिया गया, उनके बारे मैं आपने एक शब्द न लिखा गया. क्यों?
बरुआ साहब आप कहना क्या चाहते हैं, कुछ समझ नहीं आया...
एक चीज़ बहुत साफ़ समझ में आती है कि लेखक भी एक तथाकथित बुद्धिजीवी हैं. हर आदमी स्वतन्त्रता की बात कर रहा है तो ठीक भी है पर स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छंदता की बात क्यों शुरू हो जाती है? कश्मीरी स्वायत्तता चाहता है पर हर चुनाव में स्वायत्तता की बात करने वाले क्यों अल्पमत में रह जाते हैं? बिना शक आज़ादी हर आदमी का अधिकार है पर स्वतन्त्र आदमी के कुछ कर्तव्य भी हैं या नहीं? आपने कहा की रुबिया सईद कांड के बाद भारत सरकार की तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई और अर्धसैनिक बलों के कर्मचारी हर तरफ़ छा गए. आपके हिसाब से उसके बाद क्या होना चाहिए था? सरकार इंतज़ार करती कि कोई और पागल फ़िर से किसी का अपहरण कर ले और कुछ अपराधियों को छुडवा ले? वे अपराधी, जो आज घाटी से एक समुदाय विशेष को भगा देने के लिए ज़िम्मेदार हैं. कोई भी इस देश में किसी भी आदमी/समुदाय के बुरे हालात पर ख़ुश नहीं होगा पर केवल एक ही समुदाय के लोगों की बात क्यों की जाए? सबकी क्यों नहीं? आप कश्मीरी हिंदुओं के बारे में भी कुछ शोध करें. कुछ उनके बारे में भी बताएं, अगर निष्पक्षता है तो दिखनी भी चहिए.भले ही वो राजनीति हो या पत्रकारिता. पर दुख होता है जब निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दुकानें शुरु हो जाती हैं.
इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है. यह तो भारतीय दर्शन सा हो गया है कि अल्पसंख्यकों के गुण गाओ और लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष बन जाओ. यह मानसिक दिवालियापन के अलावा कुछ नहीं है.
अमित बरुआ जी, आपका लेख सच्चाई बयान करता है लेकिन कुछ छद्म देशप्रेमी सच्चाई को स्वीकार करने से कतरा रहे हैं. जहाँ तक कश्मीर के विस्थापित पंडितों की बात है तो मैं इस बात का प्रत्यक्ष गवाह हूँ कि उर्दू के नाम पर चलने वाले ज्यादातर सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों में उच्च पदों पर सिर्फ़ कश्मीरी पंडित बिराजमान हैं. भारत सरकार इन पंडितों पर अकूत रकम खर्च करती है लेकिन अगर कोई कश्मीरी मुसलमान देश के किसी भी भाग में अपना रोजगार भी शुरू करना चाहे तो यही देशप्रेम के छद्म झंडाबरदार उसका जीना दूभर कर देते हैं. इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कश्मीर में आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित मुस्लिम समुदाय है लेकिन उसके अधिकारों की बात करना गुनाह समझा जाता है. ये है साफ़्ट स्टेट का हार्ड उदाहरण.
यह हमारी ही मानसिकता को प्रकट करता है. हम हिंदुस्तानी जबतक अपने आप को कोस नहीं लेते तब तक हमें नहीं लगता कि हम विकसित देशों के लोगों और विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं.
सही ही कहा है किसी शायर ने....वो कत्ल भी करें तो चर्चा नही होता!
बरुआ जी, आप नें कश्मीर की बात तो कही, लेकिन कश्मीरी हिंदुओं और पंडितों के तरफ ध्यान ही नहीं दिया. क्या इस देश में राजनेताओं के बाद अब पत्रकारिता भी मुस्लिम तुष्टिकरण करने लगी है? इससे पहले वुसतुल्लाह ख़ान जी का राम-मंदिर पर लेख इसी का उदाहरण था. क्या आप लोग पूर्वाग्रह से ग्रस्त हुए बिना जनता को सही तस्वीर से अवगत नहीं करा सकते?