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ख़ौफ़नाक है यह परिदृश्य

ममता गुप्ताममता गुप्ता|मंगलवार, 08 दिसम्बर 2009, 10:24 IST

पर्यावरण परिवर्तन एक कटु सत्य है जिससे आंखे चुराना शुतुर्मुर्ग की तरह अपना सिर रेत में छुपा लेने के बराबर होगा.

पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ये सच है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं ये सच है. ऐंटार्कटिक की बर्फ़ीली परतें तीव्र गति से पिघल रही हैं जिससे समुद्रों का जलस्तर चढ़ रहा है ये सच है. और ये सब हो रहा है हमारी आपकी ज़रूरतों के कारण.वैज्ञानिक जुटे हैं ऐसे तरीक़े खोजने में जिससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सके. राजनेता नई नीतियों पर विचार कर रहे हैं. और हम....

हम अपनी आदतों से बाज़ नहीं आते. हमारे पास अगर स्कूटर है तो हमें कार चाहिए. अभी तक पंखा चलाने से काम चल रहा था तो एयर कंडिशनर चाहिए. पहले बस में बैठकर पहाड़ों की सैर कर लिया करते थे लेकिन अब नज़र विदेशों की ओर है जहां पहुंचने के लिए विमान यात्रा ज़रूरी है.

तो क्या अब तक जितनी सुख सुविधाएं ईजाद हुई हैं उन्हे तिलांजलि दे दें तभी बचा पाएंगे अपनी पृथ्वी को?

सवाल ये नहीं सवाल दरसल ये है कि पृथ्वी रहने लायक बचेगी तब न. बहुतों का तर्क है कि अगले कोई दस बीस साल में तो ऐसा होने वाला नहीं तो अगली पीढ़ियों की चिंता हम क्यों करें.

हम अपने बच्चों के लिए धन दौलत और सम्पत्ति छोड़कर जाने में तो विश्वास करते हैं लेकिन रहने लायक ग्रह नहीं.

अगर हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे तो गंगा यमुना में पानी कहां से आएगा. इन जैसी नदियों पर निर्भर करोड़ों लोग कहां जाएंगे.

अगर समुद्रों का जलस्तर और चढ़ा तो बांगलादेश, मालदीव और नौरू जैसे देश जलमग्न हो जाएंगे. वहां रहने वाले लोग पड़ोसी देशों में शरण लेंगे जहां पहले से ही खाने पीने की किल्लत होगी.

पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण भूमध्यरेखा के आस पास के देशों में रहना संभव नहीं होगा तो बड़े पैमाने पर लोग अपेक्षाकृत ठंडे इलाक़ों की तरफ़ पलायन करेंगे.

कल्पना कीजिए ऐसी दुनिया की जहां पानी की भारी क़िल्लत है, रेगिस्तान फैलते जा रहे हैं, खेती मुश्किल से होती है इसलिए अनाज की पैदावार सीमित है, लोग भूखे प्यासे हैं.

जानते हैं भावी युद्ध पानी और ज़मीन के लिए लड़े जाएंगे.

ख़ौफ़नाक है न ये परिदृश्य. आप डरे कि नहीं.....

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:16 IST, 08 दिसम्बर 2009 rajesh chandra mishra:

    ममता जी मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ. हमारे लिए यह ख़तरे की घंटी है हमें चेत जाना चाहिए.

  • 2. 12:58 IST, 08 दिसम्बर 2009 hmmat singh bhati:

    आईना कभी झूठ नहीं बोलता. ममताजी आपने सच कहा है. सच को स्वीकार लोग करना नहीं चाहते. हम अपना नुक़सान कर रहे हैं फिर भी नहीं संभल रहे हैं. हमें कल की चिंता नहीं है. लेकिन हम यदि नहीं सुधरे तो खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहें.

  • 3. 13:51 IST, 08 दिसम्बर 2009 vinit nandwal:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. हम चाहते हैं कि कोई हमारे लिए कुछ कर दे, बस हमें तकलीफ न सहनी पड़े. अपनी सुख-सुविधाओं में हम कमी नहीं चाहते, बस सरकार कुछ ऐसे क़दम उठाए कि सब अपने आप ठीक हो जाए. लेकिन यह मुमकिन नहीं है. हमें सोचना चाहिए कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ कर जा रहे हैं. एक उज्जवल भविष्य या काला अंधकार.

  • 4. 13:57 IST, 08 दिसम्बर 2009 शशि सिंह :

    डरना क्यों? हमें तो ऐश-मौज करना है. यह धरती क्या है?

  • 5. 14:02 IST, 08 दिसम्बर 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    ममता जी आपने बहुत सटीक लिखा है, जिस तरह की समस्या का हम सामना कर रहे हैं उसकी वजह प्रकृति के नियम को तोडना भी है. आज समय पर बारिश नहीं होती है, कहीं ज्यादा बारिश होती है तो कहीं बिलकुल सूखा है. जब भी इंसान ने प्रकृति को चैलेंज किया है, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी है और प्रकृति ने अपना संतुलन अपने आप किया है. भूस्खलन होना, महामारी फैलना ये सब प्रकृति से छेड़खानी के नतीजे हैं. हम लगातार पेड़ों को काटे जा रहे हैं, जिससे वातावरण में कार्बन की मात्रा बढती जा रही है, ग्लेशियर पिघल रहे है, ग्लोबल वार्मिंग हो रहा है. आज हमने प्रकृति को हानि पहुचाकर जितना विकास किया, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली हैं, जो हवा जीवनदायनी थी आज वही हवा प्राणों का हरण करनेवाली बन गयी है. फिर भी हम लोग अपनी आदतों से बाज नहीं आते हैं. अगर हमें आनेवाली पीढ़ी को बचाना है तो इस स्थिति को कम करना होगा, ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे, ज़मीन तो पहले भी उतनी ही थी जितनी आज है, लेकिन आबादी लगातार बढती जा रही है जो चिंता का विषय है.

  • 6. 14:55 IST, 08 दिसम्बर 2009 Mohammad Iftekhar Ahmed, Abu Dhabi:

    अल्लाह ने हमें जो वातावरण दिया है उसे समय रहते हमें बचाना है. हमें अकेले और समूह बना कर दुनिया को बचाने के लिए काम करना होगा.

  • 7. 15:43 IST, 08 दिसम्बर 2009 HARINDER SINGH FOZEDAR:

    कौन है ज़िम्मेदार इसके लिए?

  • 8. 15:51 IST, 08 दिसम्बर 2009 Ravi Shankar Tiwari Gunsej,Sasaram:

    ममता जी आपने बहुत सटीक लिखा है. सच को स्वीकार लोग करना नहीं चाहते.

  • 9. 20:12 IST, 08 दिसम्बर 2009 RAJIV K UPADHYAY:

    आज युवा नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन आने वाले दिनों में उन्हें ज़िंदगी बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा.

  • 10. 20:31 IST, 08 दिसम्बर 2009 parvez:

    ममता जी दुनिया तो कब ख़त्म होगी यह तो आने वाला समय बताएगा. लेकिन इतना ज़रुर है कि उपग्रहों पर आने वाला भूचाल जब परमाणु बम की तरह से विनाशक बन कर दुनिया का नाश करेगा तो शायद किसी को आश्चर्य नहीं होगा. मानव ने अपनी सुविधा के लिए जो भी इंतज़ाम किए हैं वह सिर्फ़ अपने आपको कब्र में खुद डालने जैसा है. रही बात पर्यावरण कि तो इसे अब नियंत्रित कर पाना आसान नहीं है.

  • 11. 23:03 IST, 08 दिसम्बर 2009 Prem Verma:

    ममता जी, आपकी चिंता सही और वाज़िब है. सभ्यताओं ने विकास के लिए सहअस्तित्व की अपेक्षा दूसरे के विनाश से अपने विकास वाला रास्ता चुना. हमने जंगल काट डाले, जानवरों को मार दिया. रेगिस्तानों का फैलाव किया. धुँआ उगलने वाले कारखाने लगाए और तो और हम अपना कचरा अंतरिक्ष में छोड़ आए. चाँद पर विस्फोट भी कर डाला. अब ऐसे में हमें मातमपुरसी करने का कोई हक़ नहीं है. अब तो कुछ ऐसा करें कि आने वाले पीढ़ियाँ आ सकें और अगर आएँ तो इस धरती पर रह सकें. इस तरह का ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद.

  • 12. 01:19 IST, 09 दिसम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ममता जी, आपका लेख बहुत शानदार है. इसमें कोई शक नहीं लेकिन क्या आप या आपका परिवार इस मामले में जागरूक है. सच्चाई यह है कि कोई भी सरकार या जनता इस मामले में जागरूक नहीं है. आप कितना भी जागरूकता अभियान क्यों न चला लें ये लोग नहीं समझेंगे. दुनिया अपनी अंत की ओर तेज़ी से बढ़ रही है.

  • 13. 01:57 IST, 09 दिसम्बर 2009 राज भाटिया:

    ममता जी, आप लेख लिख रही हैं या हमें डरा रही हैं? आपने जो बातें लिखी हैं, वह तो सबको मालूम है.

  • 14. 16:27 IST, 09 दिसम्बर 2009 noopur:

    लोग आज तक इस मामले की गंभीरता को समझ नहीं पाए हैं. मुझे लगता है कि लोग किसी बड़े परिवर्तन के बाद इसे समझेंगे लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होगी.

  • 15. 19:59 IST, 09 दिसम्बर 2009 Shailendra Mishra:

    ममता जी, आपने जो भी कहा है वह सच लगता है. क्योंकि पानी और धरती के बिना जीवन संभव ही नहीं होगा. हम लोगों को अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए दीर्घकालिक विकास के बारे में सोचना चाहिए.

  • 16. 22:36 IST, 09 दिसम्बर 2009 DHARMA JAIN:

    हाल के दिनों में प्राकृतिक आपदाओं के कारण सभ्यताओं का लोप हो रहा है जो कि इंसान के नियंत्रण से बाहर है. आने वाले दिनों में प्रकृति के अनियंत्रित दोहन और विकास से यह ख़त्म ही हो जाएगी.

  • 17. 23:34 IST, 09 दिसम्बर 2009 Mahesh Kumar Mishra:

    पर्यावरण संरक्षण के लिए आपका लेख अच्छा है. आपका लेख सच से रुबरु कराता है. लेकिन ममता जी यहाँ एक बात और करनी पड़ेगी कि बुद्धिजीवी भी इस मसले पर गंभीर, चिंताजनक और सोचनीय जैसी टिप्पणी ही करते हैं. लेकिन ज़मीनी हक़ीकत अलग है. कोई भी देश पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई क़ानून बनाने की बात नहीं करता है. राजनेता भी इस मसले पर गंभीर नज़र नहीं आते हैं क्योंकि इस मुद्दे पर वोट नहीं मिलेगा. आबादी लगातार बढ़ रही है. लोगों के पास मूलभूत सुविधाओं की लंबी सूची है. ऐसे में धरती अपने संसाधनों को कबतक लुटा पाती है. इस पर तो सिर्फ़ क़यास ही लगाए जा सकते हैं. बहरहाल पर्यावरण संरक्षण के लिए ज़रूरी है एक क़ानून की जो कार्बन उत्सर्जन को रोके.

  • 18. 08:52 IST, 10 दिसम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    ममता जी, इस विषय के दो पहलू उभर कर सामने आते हैं. सिक्के का एक पहलू जो सबके सामने है और जिससे आज पूरी दुनिया में हाहाकार मचा है. कोपेनहेगन शिखर सम्मलेन का आयोजन ताज़ा उदहारण है. मजे की बात देखिए कि इस संवेदनशील विषय को चर्चा का विषय बनाने के लिए दुनिया भर के हज़ारों प्रतिनिधि हजारों टन ईंधन फूंक कर इस पृथ्वी के आगोश में अब तक झोंक चुके हैं. यह सिलसिला बहुत देर तक चलने वाला है. कई चार्टर्ड विमान आसमान की छाती को भेदते दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने को जहरीली गैसों के गुबार से बदनुमा करते रहेंगे. सूचना प्राद्यौगिकी के युग में भी इस तरह से अनायास ही लाखों टन ईंधन फूंककर इस तरह सम्मलेन करना कहाँ तक तर्कसंगत है. क्या सदस्य देश विडियो कोंफ्रेंसिंग द्वारा अपने-अपने देश में रहकर किसी एक देश को केंद्र मानकर अपना पक्ष रखकर इस समेलन का आयोजन नहीं कर सकते थे? इस समय जो हानिकारक गैसों का उत्सर्जन हुआ उसकी जबाबदेही किसकी है. इस संबंध में कुछ आंकड़े और तर्क ऐसे हैं जो कि प्रस्तुत करने वाले वैज्ञानक और उनको प्रायोजित करने वाली संस्थाएँ और कंपिनयां ही समझ सकती हैं. कुछ तथ्य आम आदमी की समझ से बाहर हैं. वास्तव में जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ी चुनौती है ,हमारे ग्रह के लिए स्याह आंधी का खामोश इशारा है, तो परवाह कौन करता है? क्या हमने नए हवाई अड्डों का निर्माण रोका है ,लाखों टन गोला बारूद और ईंधन फूंककर सांझा सैनिक युद्धाभ्यास रोके हैं ,लाखों टन इंधन फूंककर सैर सपाटे के नाम पर अंधी कमाई के चक्कर में अनायास ही विमानों का उड़ना रोका है? शांतिपूर्वक हल होने वाले मसलों में भी गोला बारूद , हवाई हमलों को रोका है? क्या हमने धरती के सीने को चीरकर बड़े- बड़े जीवाश्म इंधन की खोज रोकी हैं? बड़े -बड़े नाभिकीय परीक्षण रोके हैं? अनायास खनन रोके हैं? एक तरफ बात करते हैं कार्बनडाईऑक्साइड के उत्सर्जन की तो क्या कारों और दुपहिया वाहनों के बेतहाशा निर्माण पर रोक के बारे में जिक्र करते है? वास्तव में कुछ संशयी लोगों की मिलीभगत के कारण यह संवेदनशील मुद्दा आम लोगों की पहुँच से बाहर है. पूर्वी एंजिलिय़ा विश्वविद्यालय की सीआरयू से दुनिया में संदेश पहुंचा वह अपने आप में सब कुछ कहता है.
    दूसरा पहलू यह कि कुछ वैज्ञानिकों ने 2012 तक लघु हिम युग की बात की तो कुछ ने पृथ्वी के वातावरण की तुलना मंगल ग्रह से की. किसका विशवास किया जाए. कुछ परिवर्तन अवश्यंभावी हैं जैसा कि हज़ारों साल पहले हिम युग की शुरुआत के साथ हुआ था. अगर अब पृथ्वी का ज्यादातर हिस्सा जलमग्न की तैयारी में है तो हम मानव सभ्यता इसको कुछ समय तक टाल तो सकते हैं लेकिन इसे रोकना शायद ही किसी के वश में हो. मैं अपने देश की बात करता हूँ आम आदमी इस समस्या से पल्ला झाड कर बैठा है क्योंकि हमारी मानसिकता है कि हर समस्या का समाधान सरकार ही करेगी.

  • 19. 09:41 IST, 13 दिसम्बर 2009 mahendra rana:

    हाँ, मैं ममता जी से सहमत हूँ. आज हम विज्ञान युग में जी रहे हैं, जब पूरी दुनिया के वैज्ञानिक एकमत से ये कह रहे हैं कि मनुष्य की गतिविधियों के कारण ही धरती का तापमान बढ़ रहा है तो हमारे नीति निर्माता इस तथ्य को क्यों नहीं समझ रहे हैं.

  • 20. 14:38 IST, 15 दिसम्बर 2009 MM Singh:

    ममता जी, एक बहुत ही ख़तरनाक भविष्य की ओर हमारा ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद,
    सिर्फ़ नेता या धनवान ही इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं. इस बरबादी के लिए हम सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार हैं. पढ़े-लिखे लोग ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं. सब आपकी तरह से इतनी संवेदनशीलता से नहीं सोचते हैं.

  • 21. 22:46 IST, 08 जनवरी 2010 DEEPA TOMAR:

    आपने अच्छा लिखा है. नव वर्ष के पावन अवसर पर मेरी ओर से आपको और पुरे बीबीसी परिवार को नव वर्ष की शुभ कामनाएं.

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