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राम नाम अल्लाह है

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|रविवार, 06 दिसम्बर 2009, 16:47 IST

इस बात का कोई महत्व नहीं है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को 17 साल पूरे हो गए. अगले साल 18वीं वर्षगाँठ होगी और उससे अगले साल 19वीं.

महत्व किसी बात का हो सकता है तो वह यह है कि क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर 1947 के विभाजन के बाद सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक घाव लगाया है.

इस घटना के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में एक-दूसरे के लिए कट्टरता की भावना बढ़ी है और इस भावना को कम कैसे किया जाए जो देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को दर्शाए.

छह दिसंबर 1992 का दिन असल में इतिहास की वह माता है जिसके तुंरत बाद मुबंई के दंगे और फिर 1993 में मुंबई धमाके, गुजरात नरसंहार, मालेगाँव बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस को आग लगाने जैसी घटनाएँ, सिमी, राम सेना और आज़मगढ़ जैसे नेटवर्क, मोदी स्टाइल राजनीति और कर्नल पुरोहित, वरुण गाँधी और मोहन भागवत जैसे ज़हन को जन्म दिया.

अगर बाबरी मस्जिद की 17वीं वर्षगाँठ याद रहेगी तो केवल इस आधार पर कि लिबरहान अयोग रिपोर्ट ने इस घटना में उन लोगों के शामिल होने की पुष्टि कर दी जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के अगले रोज़ अपने चहरों पर अफ़सोस का भभूत मल कर अख़बारों में तस्वीरें छपवाई थीं.

अगर वाक़ई लिबरहान अयोग की रिपोर्ट से यह परिणाम निलकता है कि यह कोई तुरंत जोशीला अमल नहीं था बल्कि एक योजना के तहत सब कुछ हुआ.

तो फिर इस रिपोर्ट की रोशनी में राष्ट्र और उसकी अदालतों का सिवाए इसके क्या कर्तव्य है कि वह न केवल इस अपराध में शामिल लोगों को कठघरे में लाए बल्कि यह घोषणा भी करें कि इस स्थान पर न केवल टूटी हुई मस्जिद का फिर से निर्माण होगा बल्कि हिंदू और मुसलमान मिल कर मस्जिद के बगल में एक शानदार मंदिर भी बनाएँगे.

ताकि वह राम जिसे मुस्लिम अल्लाह कहते हैं और वह अल्लाह जिसे हिंदू राम के नाम से जानते हैं, साथ-साथ रह सकें.

इस से कम पर तो कलंक का टीका मिटने से रहा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:29 IST, 06 दिसम्बर 2009 aditya:

    मैं तो कहता हूँ कि उस ढाँचे की जगह मंदिर बना दिया जाए. जो हुआ सो हुआ, उस जगह पर मंदिर ही बन सकता है.

  • 2. 17:48 IST, 06 दिसम्बर 2009 Abhay:

    बहुत दिनों के बाद आपने लिखा. अच्छा लगा. लेकिन ऐसा हो नहीं सकता. क्या करें सबको दिखावे वाले घमंड का कीड़ा जो काटे हुए है. हो सकता है मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूँ. लेकिन मंदिर और मस्जिद बनवा के रहेंगे की कसमे खाने वाले क्यूँ ये कसम नहीं खाते कि हम भारत के लोग भारत के किसी भी नागरिक को भूख से मरने नहीं देंगे .है तो बहुत सारा लिखने को लेकिन क्या फ़ायदा. बात वही ढाक के तीन पात पर जाके रुकेगी. मेरे यहाँ लिखने नहीं लिखने से क्या होगा.

  • 3. 18:00 IST, 06 दिसम्बर 2009 Sandeep:

    आपके विचार सराहनीय हैं. और भगवान करे ऐसा ही हो. कट्टरता हमें ऐसे विचारों से दूर ले जाती है और बेवजह हम एक-दूसरे को दुश्मन की नज़र से देखने लगते हैं. जिसका परिणाम ये होता है कि हम अपना असली धर्म इंसानियत भूल जाते हैं.

  • 4. 18:12 IST, 06 दिसम्बर 2009 Gaurav Shrivastava:

    मेरा मानना है कि आप 100 फ़ीसदी ग़लत हैं. आप कह रहे हैं कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के कारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मुद्दे बढ़े. ये ग़लत है. दरअसल ऐसा उस समय शुरू हुआ जब मंदिर तोड़ा गया और मस्जिद बनाई गई. वो मस्जिद इसलिए तोड़ी गई ताकि मंदिर दोबारा हासिल की जा सके. मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुसलमान क्यों नहीं ये स्वीकार कर रहे कि मस्जिद ग़लत तरीक़े से वहाँ बनाई गई और वो जगह हिंदुओं की है. इस तरह के भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करने की बजाए क्या आप एक सवाल का जवाब दे सकते हैं- मुस्लिम प्रभुत्व वाले देशों में मंदिर और चर्च बनाने की अनुमति क्यों नहीं दी जाती?

  • 5. 18:21 IST, 06 दिसम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    दरअसल राम का नाम ख़ुदा के मायने में ही लिया जाता है. मर्यादा पुरुषोत्तम राम, जिन्हें इक़बाल ने इमाम-ए-हिंद कहा था. उनके नाम पर मंदिर बनाने में किसी को आपत्ति नहीं. यह सियासत बंद हो. लेकिन वो कैसे होगा.

  • 6. 19:27 IST, 06 दिसम्बर 2009 rohan:

    बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई थी. ये स्थान भगवान राम मंदिर के लिए हैं न कि मस्जिद के लिए. हम मस्जिद और मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन कम से कम हमारी धार्मिक और पवित्र जगह तो वापस मिलनी चाहिए तो बाबर और औरंगज़ेब के समय तोड़ दी गई थी.

  • 7. 19:56 IST, 06 दिसम्बर 2009 Mukesh Sakarwal:

    मैं पूरी तरह ये भूल गया था कि आज फिर छह दिसंबर है और 17 साल पहले भारतीय इतिहास का ये सबसे डरावना अध्याय है. मैंने तारीख़ भूलने की बात इसलिए कही है क्योंकि मैं ये बताना चाहता हूँ कि आम व्यक्ति शायद ही इसे याद रखता है लेकिन ये राजनेता, कट्टरपंथी ताक़तें अपने फ़ायदे के लिए नफ़रत का ज़हर फैलाती हैं. मैं आपकी सराहना करता हूँ. आपने सच लिखा है कि हमें 17वीं बरसी को अहमियत नहीं देनी चाहिए बल्कि इतिहास के इस काले धब्बे को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए. हमें लोगों से यह कहने की आवश्यकता है कि आपके राम हमारे अल्लाह हैं और मेरे अल्लाह आपके राम हैं. चलिए अपनी भावनाएँ, विश्वास और स्थान एक-दूसरे से बाँटें.

  • 8. 20:06 IST, 06 दिसम्बर 2009 Alankar:

    बहुत अच्छे विचार हैं. मैं नहीं जानता कि कब हम धर्म से इतर ज़िंदगी को पहचानेंगे. चलिए हम बहाई मंदिर की तरह एक ख़ाली चिंतन हॉल बनवाएँ. इसके लिए हम कर देने वाले लोगों के पैसे का इस्तेमाल करें, हिंदुओं और मुसलमानों की सेवाएँ ले और यह स्थान सबके लिए खुला रहे. सबसे अहम बात ये है कि भारत के लोगों को इसके पीछे के राजनीतिक खेल को समझना होगा. दुनिया में कई अहम चीज़ें हैं, जिन पर चिंता करने की आवश्यकता है.

  • 9. 20:18 IST, 06 दिसम्बर 2009 Jafar Zaidi:

    ये विवाद राजनेताओं ने अपने फ़ायदे के लिए खड़ा किया है.

  • 10. 21:15 IST, 06 दिसम्बर 2009 Sachin Sambre:

    बाबर कोई संत महात्मा तो थो नहीं. ना ही वे भारत में प्यार का संदेश लेकर आए थे. हमें किसे याद रखना चाहिए बाबर को या राम को? हमारे यहाँ धर्मनिरपेक्षता का काफ़ी सतही अर्थ निकाला जाता है जिसका अर्थ है मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता और हिंदुओं को नहीं.

  • 11. 23:12 IST, 06 दिसम्बर 2009 Rajan:

    ख्याल अच्छा है और यह सच भी है. जब तक लोगों में शिक्षा नहीं बढ़ेगी इन नेताओं की राजनीति वे समझ नहीं पाएँगे.

  • 12. 00:10 IST, 07 दिसम्बर 2009 Jitendra :

    काला दाग बाबर ने लगाया था, मंदिर को गिरा कर मस्जिद बनाई. आज अगर हिंदू ने वो काला दाग मिटा दिया तो आप रोते क्यों है.

  • 13. 00:53 IST, 07 दिसम्बर 2009 Raju,Baraker,Rajgir:

    ख़ान साहब असल मामला ये है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे. इस कालिख की कोठरी में सब काले हैं और एक-दूसरे को देख कर हंस रहे हैं. बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इस मामले का सचमुच हल देखना चाहते हैं. मेरी समझ से अदालत का फ़ैसला ही अंतिम होना चाहिए.

  • 14. 01:24 IST, 07 दिसम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    खान साहब मेरे ख्याल से भूतकाल में किसने क्या किया वह अब वर्तमान में कोई मायने नहीं रखता. मायने यह रखता है की 17 साल का समय ,आम आदमी की जेब से गया आठ करोड़ रुपया , 700 पन्नों की रिपोर्ट , 48 एक्सटेंसन , और परिणाम शून्य. यानी खोदा पहाड़ निकली चुहिया. मैं इतना कहना चाहता हूँ कि जनता अभी तक भी आँखों पर अज्ञानता की स्याह पट्टी बांधे बैठी है. अगली बार किसी और मंदिर या मस्जिद का रुख होगा और यह ज़नता पीछे चल देगी. मुझे एक कवि की पंक्तियाँ याद आ रही हैं कि - " पाया करीब जिसको उसीसे लिपट लिए ,सूरज ढला तो लोग कबीलों में बँट लिए."

  • 15. 01:30 IST, 07 दिसम्बर 2009 Anil Bakshi:

    मुझे हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ याद आ रही हैं:
    मुसलमान और हिंदू दो हैं, एक मगर उनका प्याला
    एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला
    दोनों रहते एक न जब तक मंदिर-मस्जिद को जाता
    बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला.
    विवादित जगह पर बेहतरीन विश्वविद्यालय और अस्पताल बनाया जाना चाहिए ताकि ग़रीबों का फ़ायदा हो.

  • 16. 03:40 IST, 07 दिसम्बर 2009 indrajeet:

    यह बेहद उलझा हुआ मसला है. यह कहना शायद सही नहीं है कि हिंदु और मुस्लिम के बीच खाई खत्म हो जाएगी यदि वहाँ मंदिर और मस्जिद बना दी जाए. मैं मानता हूँ कि इस मामले के लिए मुसलमान दोषी हैं.

  • 17. 08:43 IST, 07 दिसम्बर 2009 भावेश :

    वुसतुल्लाह साहब वैसे तो मैं आपकी लेखनी का कायल हूँ पर इस बार थोडा अफ़सोस जरुर हुआ. मुझे लगा कि आपने भी धर्म का चश्मा पहन कर ये ब्लॉग लिखा. ठीक है हम सबको अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए पर ये बात भी सही है की हर धर्म चाहे वो हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम धर्म सब में कुछ कुरीतियाँ या बुराइयाँ है. आपके अनुसार छह दिसंबर 1992 का दिन असल में इतिहास की वह माता है जिसके बाद देश में हिन्दू मुस्लिम कौम में दंगे फसाद बढे. क्या आज़ादी के बाद से यानि सन 1947 से 1992 तक क्या देश में कोई दंगे नहीं हुए. कश्मीर में धर्म के नाम पर जो कश्मीरी पंडितो का हश्र हुआ वो किस धर्म का हिस्सा था. आपको वरुण गाँधी और मोहन भागवत तो याद रहे पर बुखारी सरीखे मुल्लो को आप बिलकुल भूल गए. दरअसल ये सब कुछ देश की अनपढ़ और गंवार जनता को बरगलाने के लिए धर्म के ठेकेदारों का किया हुआ धंधा है जिससे की उनका व्यापर निर्विरोध चल सके और ऐसे खूनी व्यापारी जिनको हम धर्म के ठेकेदार या नेता के नाम से भी जानते है उनका कोई ईमान धर्म नहीं होता. इस प्रजाति के प्राणी हिन्दू या मुस्लिम सभी परिवारों में पैदा होते है.

  • 18. 09:12 IST, 07 दिसम्बर 2009 Mohammad Athar khan Faizabad Bharat:

    मस्जिद उसी जगह पर दोबारा बनना चाहिए जहाँ वह शहीद होने से पहले थी क्योंकि वहाँ राम मंदिर का कोई सबूत नहीं है. किस इतिहास की किताब में राम का जिक्र है? मंदिर बनाने की मांग करने वाले राम भक्त नहीं है सिर्फ़ वे अपनी राजनीति कर रहे हैं.

  • 19. 09:44 IST, 07 दिसम्बर 2009 Praveen kumar jha, Faridabad:

    मेरे विचार में विवादित जगह पर मंदिर या मस्जिद बनाने के बजाय स्कूल या खेल के मैदान बनाए जाने चाहिए.

  • 20. 10:02 IST, 07 दिसम्बर 2009 rajesh Daryani:

    पता नहीं हम लोग कब संकीर्ण धार्मिक विचार से बाहर निकलेंगे. अगर कोई हिंदू वेदांत का अध्ययन करे तो वह समझेगा कि ईश्वर एक निराकार, निर्गुण सत्य है जिसे मुसलमान अल्लाह के नाम से जानता है.

  • 21. 10:09 IST, 07 दिसम्बर 2009 akram:

    यह एक विवादास्पद मुद्दा है. इस बात के कोई सबूत नही है कि राम उस जगह पर ही पैदा हुए थे. विवादास्पद जगह पर एक राष्ट्रीय भवन बनना चाहिए. यदि मंदिर वहाँ बनाना है तो मस्जिद भी वहाँ बननी चाहिए.

  • 22. 10:17 IST, 07 दिसम्बर 2009 rohan:

    ख़ान साहब यह खरी-खरी नहीं है, आपके विचार पक्षपातपूर्ण हैं. इस भूमि पर राम ने जन्म लिया था तो मंदिर भी उन्हीं का बनना चाहिए. मस्जिद और किसी जगह पर बने उसमें क्या दिक्कत है.

  • 23. 10:50 IST, 07 दिसम्बर 2009 Brajesh Dueby:

    मेरे ख्याल में वहाँ एक अत्याधुनिक अस्पताल बनाया जाना चाहिए जिसमें ग़रीब अपना इलाज करवा सकें. राम रहीम तो जब जगह है उनके लिए हम अपने दिल में मंदिर बनाए तो अच्छा हो.

  • 24. 10:53 IST, 07 दिसम्बर 2009 Hemant Mistry:

    हज़ारों वर्ष से वहाँ मंदिर था और हम चाहते हैं कि वहाँ पर मंदिर बनाया जाए, हमें अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

  • 25. 10:59 IST, 07 दिसम्बर 2009 anshul:

    ख़ान साहब ने शाहबानो, गोधरा, बांग्लादेशी घुसपैठिए, मुंबई धमाके, लव जिहाद, कश्मीरी पंडितो की स्थिति आदि के बारे में कुछ नहीं लिखा. जब तक हमारे बुद्धिजीवी चुन चुन कर मुद्दों को उठाते रहेंगे इस मामले का निपटारा नहीं हो सकता.

  • 26. 12:14 IST, 07 दिसम्बर 2009 rajeev sinha:

    आम तौर पर मैं टिप्पणी नहीं लिखता लेकिन मुझे लगता है कि मंदिर मस्जिद का झगड़ा किसी को कुछ नहीं देगा. इसलिए मैं कहूँगा कि वहाँ एक प्राइमरी स्कूल खोला जाए.

  • 27. 12:36 IST, 07 दिसम्बर 2009 Amit Shahi:

    कम से कम एक न्यूज़ चैनल को निर्णय नहीं देने चाहिए, उसे तथ्यों को सामने लाने का कार्य करना चाहिए , वसुतुलाह खान क्या कभी ऐसी भी सलाह दे सकते है कि उस जगह पर एक मंदिर बना दिया जाये और मस्जिद के लिए एक अलग स्थान खोज लिया जाए ? हम प्रतीक्षा करेंगे .आप सब केवल हिन्दुओं से महानता दर्शाने को कहते हैं , वाकई यह हास्यास्पद है कि आप भारत की समस्याओं का हल मस्जिद बनवा कर निकालना चाहते हैं , आपको हमेशा लगता है की मुस्लिम का कोई दोष नहीं है ? खुद आईने के सामने खड़े होकर देखिए , जो भी चोरी करता हैं वही सबसे ज्यादा चिल्लाता है की दूसरा चोर है.

  • 28. 12:43 IST, 07 दिसम्बर 2009 satyendra:

    धर्म को नेताओं के हाथों का औजार नहीं बनने देना चाहिए.

  • 29. 13:51 IST, 07 दिसम्बर 2009 Ashiq:

    बिलकुल सही फरमाया.

  • 30. 14:19 IST, 07 दिसम्बर 2009 Ravi Shankar Tiwari Gunsej Sasaram:

    ये हमारे महान देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि ज़िन्दा लोगों को मुर्दा बनाने में कोई कोताही नही होती और मुर्दा मुद्दों को उनकी क़ब्र से निकाल कर ज़िन्दा करने में भी कोई पीछे नही रहता. मुझे लगता है कि मंदिर मस्जिद का झगड़ा किसी को कुछ नहीं देगा.

  • 31. 14:32 IST, 07 दिसम्बर 2009 Ajay Pal Singh:

    इस समय आपने बिलकुल ठीक कहा है. पूरा अंक आपको मिलता है. दोनों तरफ़ के नेताओं को सिर्फ़ वोट बैंक की चिंता है. वर्तमान में तनाव कोई नहीं चाहता. हमें रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता है.

  • 32. 14:40 IST, 07 दिसम्बर 2009 भूपेश गुप्ता :

    वुसत साहब, अल्लाह कभी पैदा नहीं हुआ, भगवान ने जन्म कभी लिया ही नहीं, ना ही किसी और मज़हब में कोई ऐसी सत्ता पैदा हुई कि उसे आलौकिक माना जाय. सच्चाई यही है कि सभी (राम या अल्लाह या यीशु) एक इंसान थे और अलग-अलग परिस्थितियों में उन्होंने अपना सन्देश आम लोगों को दिया और मर गए. अब हम उन मरे हुए महापुरुषों के नाम पर उस लकीर को पीट रहे हैं जिसका कोई वजूद ही नहीं. अच्छा हो कि सारे मंदिर-मस्जिद गिराकर वहां मुफलिसों को तालीम दी जाए, उन्हें चढावे की रकम से कपडे और छत दें वहीं छोटी सी डिस्पेंसरी हो जहां मासूम बच्चों का इलाज हो. सारे देवताओं की मूर्तियाँ नीलाम करके, उस रकम से गरीबों का पेट भरें. वुसत साहब ना तो आपने और ना ही आपके ब्लॉग पर कमेन्ट लिखने वाले किसी और भाई ने भूख देखी है, इसीलिये हम राम या अल्लाह के लिए लिख बैठते है. हो सके तो एक दिन किसी मंदिर की चौपाल या मस्जिद के अहाते में बैठकर आप और हम भीख मांगकर देखें कि कितना दर्द होता है जब एक जून की रोटी के लिए भी दुत्कार झेलना पड़ती है. अगर हम इस दुत्कार को नहीं झेल सकते तो हमें कोई हक नहीं कि हम राम या अल्लाह की नुमाइंदगी भी करें.

  • 33. 14:52 IST, 07 दिसम्बर 2009 Rajesh Arora:

    मैं हिंदूवादी नहीं हूँ लेकिन यदि भगवान राम का मंदिर भारत में ही नहीं बने तो यह देश के सहनशक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा है. यदि आगे आकर भारतीय मुसलमान इसकी पहल करे तो हिंदू-मुस्लिम एकता की यह एक मिसाल बन जाएगा.

  • 34. 14:55 IST, 07 दिसम्बर 2009 Mandar:

    खाड़ी देशों में हिंदू देवी-देवताओं के फ़ोटो ले जाने पर मनाही है. अफ़ग़ानिस्तान में गौतम बुद्ध की मूर्ति ढहा दी गई. कितने मंदिर पाकिस्तान में बचे हैं ? हिंदुओ को सहनशीलता सीखाने के बजाय मुसलमानों को सहनशीलता सीखने की ज़रूरत है.

  • 35. 16:40 IST, 07 दिसम्बर 2009 maneesh kumar sinha:

    ख़ान साहब आप ऐसा कह रहे हैं जैसे कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के पहले हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद हुए ही नहीं. हिंदू और मुस्लिम संस्कृति में काफ़ी फ़र्क़ है. भारतीय मुसलमान कुछ भी त्याग नहीं करना चाहते. उस मस्जिद के लिए वे लड़ रहे हैं जिसका वे इस्तेमाल हीं नहीं करते थे.

  • 36. 17:31 IST, 07 दिसम्बर 2009 dave:

    भारतवर्ष में यह एक नहीं कई मंदिर टूटे और लूटे गए और लोगों ने ज्यादातर को भुला भी दिया है. पर जब एक आतताई सिर्फ एक पराजित प्रजा या धर्मं विशेष को नीचा दिखाने के लिए किसी भवन का निर्माण किया हो तो बात मंदिर या मस्जिद की ना रहकर एक समग्र प्रजा के आत्मसन्मान की हो जाती है. इस सीधी सी बात को अगर समझ लिया होता तो न तो राजनीति होती न तो खून खराबा होता न तो ऐसी बरसियाँ गिननी पड़ती और न तो आप और मैं इस बहस में पड़ते. इतिहास यूँ ही नहीं पलटता, इतिहास जब करवट बदलता है तो पूरी प्रजा को प्रसूति की वेदना से भी ज्यादा वेदनाएं झेलनी पड़ती है.

  • 37. 18:15 IST, 07 दिसम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ख़ान साहब आपने शानदार लिख दिया है. लेकिन आपकी बदकिस्मती है कि आप मुसलमान है. इस वजह से कुछ पाठकों ने आप पर प्रहार किया है.

  • 38. 19:53 IST, 07 दिसम्बर 2009 chandra kant:

    मैं समझता हूँ कि जब तक मुसलमान आगे होकर मंदिर बनाने की पहल नहीं करते तब तक उनकी देशभक्ति शक के दायरे में ही रहेगी.

  • 39. 20:03 IST, 07 दिसम्बर 2009 Sanjeev:

    यह लेख और इसका शीर्षक दोनों ही भ्रामक है.

  • 40. 20:54 IST, 07 दिसम्बर 2009 himmat singh bhati:

    ख़ान साहब लगता है कि आपका दिल अभी भरा नहीं है आप चाहते हैं कि हिंदू-मुसलमान में और ख़ून-खराबा हो. बड़ी मुश्किल से लोग विभाजन की त्रासदी को भूलने लगे हैं, लोग बाबरी की याद भी भूल रहे हैं और आप फिर से इसे कुरेद रहे हैं.

  • 41. 23:42 IST, 07 दिसम्बर 2009 sanjeev:

    वुसत साहब भावना आपकी अच्छी है लेकिन आज हम इंसानियत से दूर और हैवानियत के पास पहुँच गए हैं, हमें लोगों को रुलाने में ख़ुशी होती है. दूसरों को ख़ुश देख कर हमें दुख होता है.

  • 42. 01:16 IST, 08 दिसम्बर 2009 PRADEEP SHUKLA:

    आप मक्का और मदीना के बगल में मंदिर की बात कर सकते हैं? कल अगर कोई ताक़त के बल पर मुस्लिम धार्मिक जगह पर कब्जा कर ले तो क्या आने वाली पीढ़ियाँ उसे स्वीकार कर लेंगी ? अगर नही तो अयोध्या और काशी मे मस्जिद की बात करना एक दम ग़लत है. ज़ोर ज़बरदस्ती से हथियाई चीज़ को मुसलमान भाई अपना समझ बैठे. ये बात किसी से छुपी नही है. बाबर जैसे अनेक अतताइयो ने भारत के अनेक मंदिरो को नुकसान पहुचाया. सोमनाथ पर हमले का इतिहास गवाह है. यह सब जानते हुए भी आप विवादित ढॉचे की पैरवी कर रहे हैं. इराक़ और पाकिस्तान मे रोज धमाके हो रहे है. उसको बचाने की किसी को चिंता नही है बस अयोध्या मे ही मस्जिद की ज़रूरत है. कितनी मस्जिदों का पुनर्निर्माण इराक़ , अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ मे मे रहा है ?

  • 43. 07:26 IST, 08 दिसम्बर 2009 Ankuresh kumar:

    क्या मुसलमान मक्का में मंदिर बनवाने की इजाज़त देगें? यदि हां तो हम भी अयोध्या में भी मस्जिद बनवाने के लिए तैयार हैं.

  • 44. 07:46 IST, 08 दिसम्बर 2009 ram agarwal:

    वुसतुल्लाह ख़ान का बयान हिन्दू मुस्लिम एकता में ज़हर घोलने के सिवाय कुछ भी नहीं है. इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता. यह सब जानते हैं की बाबर जैसे आक्रान्ता ने श्री राम मंदिर का ऊपरी हिस्सा तोड़ कर उसे मस्जिद में तब्दील किया था. भारत के लोगो ने बाबर की इस भूल को ठीक कर हिन्दुओ को उनकी अमानत सौप दी है. इस भूमि पर राम मंदिर था और राम मंदिर ही बनना चाहिए और वुसतुल्लाह ख़ान को मुस्लिम समुदाय को समझाना चाहिए तभी भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता का इतिहास लिखा जा सकता है.

  • 45. 10:21 IST, 08 दिसम्बर 2009 BHEEM SINGH:

    श्रीमान, नेता लोग अपनी खिचड़ी पका रहे हैं और अप लोग अपनी खीर पका रहे हैं. इस मुद्दों पर वक़्त बर्बाद करना मूर्खता है.

  • 46. 10:30 IST, 08 दिसम्बर 2009 Royalhearts:

    भारत एक लोकतांत्रिक देश है. देश में हिंदू बहुसंख्यक भले हो लेकिन मुसलमानों का भी हक़ यहाँ है. यह मुद्दा सिर्फ़ राजनेताओं ने बनाया है. जनता हमेशा बेवकूफ बनती है और बनती रहेगी. उन्होंने ही तो इन नेताओं को चुना है.

  • 47. 16:01 IST, 08 दिसम्बर 2009 abrar ahmed, jeddah:

    राम नाम अल्लाह है? मैं आपसे बिलकुल सहमत नहीं हूँ. अल्लाह किसी का बेटा या बाप नहीं है, वो सारे संसार का रचयिता है. भगवान राम दशरथ के पुत्र और इंसाफ़ पसंद राजा थे. कृपया ख़ालिक और मख़लूक को मत मिलाइए.

  • 48. 17:09 IST, 08 दिसम्बर 2009 neyaz ahmad:

    राम भगवान नहीं मर्यादा पुरुषोतम थे. भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, इस वजह से उनके ख़िलाफ़ लोगों को बोलने का हक़ है. यह महज़ भाजपा की राजनीति के सिवाय कुछ नहीं है.

  • 49. 09:49 IST, 09 दिसम्बर 2009 Siyaram Singh:

    आप 100 फ़ीसदी ग़लत हैं. आप कह रहे हैं कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के कारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मुद्दे बढ़े. ये ग़लत है. दरअसल ऐसा उस समय शुरू हुआ जब मंदिर तोड़ा गया और मस्जिद बनाई गई. वो मस्जिद इसलिए तोड़ी गई ताकि मंदिर दोबारा हासिल की जा सके. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुसलमान क्यों नहीं यह स्वीकार कर रहे हैं कि मस्जिद ग़लत तरीक़े से वहाँ बनाई गई और वह जगह हिंदुओं की है. इस तरह के भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करने की जगह क्या आप एक सवाल का जवाब दे सकते हैं कि मुस्लिम प्रभुत्व वाले देशों में मंदिर और चर्च बनाने की अनुमति क्यों नहीं दी जाती?
    बाबर कोई संत महात्मा तो थे नहीं. न ही वे भारत में प्यार का संदेश लेकर आए थे. हमें किसे याद रखना चाहिए बाबर को या राम को? हमारे यहाँ धर्मनिरपेक्षता का काफ़ी सतही अर्थ निकाला जाता है जिसका अर्थ है मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता और हिंदुओं को नहीं.
    काला दाग बाबर ने लगाया था, मंदिर को गिरा कर मस्जिद बनाई. आज अगर हिंदू ने वह काला दाग मिटा दिया तो आप रोते क्यों है?

  • 50. 12:41 IST, 09 दिसम्बर 2009 Alkesh:

    आज चीन 12 फ़ीसदी की रफ़्तार से विकास कर रहा है. इसलिए मुझे लगता है कि हमें भी अपने राम और अल्लाह की अपने मन में बसाकर अपने देश की प्रगति के बारे में सोचना चाहिए. मंदिर-मस्जिद जो भी बनाना है, उसके लिए बेहतर यही होगा कि फ़ैसला न्ययापालिका को करने दें, नेताओं का यही मंसूबा है कि वे टुकड़े डालकर लोगों को आपस में लड़ाएँ. पढ़े-लिखे भारतीय मंदिर-मस्जिद के बारे में बहुत अधिक नहीं सोचते हैं. वे सबसे पहले अपने विकास और करियर के बारे में सोचते हैं.

  • 51. 12:49 IST, 09 दिसम्बर 2009 sudhir dixit:

    वुसतुल्लाह ख़ान जी, आपने यह सिद्ध कर दिया है कि कोई व्यक्ति कितना भी पढ़-लिख जाए और बुद्धिमान हो जाए, वह अपनी जड़ों को नहीं भूल सकता है. आपका ब्लॉग पढ़कर लगा कि आप भी धार्मिक रूप से उन्मादी व्यक्ति हैं.आपने अपने ब्लॉग में केवल उन्हीं घटनाओं का जिक्र किया है जो मुसलमानों के खिलाफ़ घटित हुईं. आपने उन घटनाओं को भुला दिया जो हिंदुओं के खिलाफ़ हुईं.

  • 52. 14:39 IST, 09 दिसम्बर 2009 S.Ranjan:

    ख़ान साहब, आपने उसी जगह मस्जिद बनाने की बात कर पता नहीं कौन से हिंदू-मुस्लिम एकता की बात की है. ईमानदारी से कहें तो पहले वहाँ राम मंदिर थी और मंदिर वही बनना चाहिए. मैं यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ कि इसी से हिंदुओं की भावना का सम्मान हो सकता है. मस्जिद कहाँ और कब बनाना है ये तब देखा जायगा. आप का लेख इस सांसोधन के बिना पूर्वाग्रह से भरा हुआ लगता है.

  • 53. 16:37 IST, 09 दिसम्बर 2009 Vikas:

    ख़ान साहब नमस्कार, जिस तरह आप मक्का मदीना पर समझैता नहीं कर सकते, उसी तरह हम मंदिर पर कोई समझौता नहीं कर सकते हैं. आपका ब्लॉग तो अच्छा है लेकिन उसकी अंतिम लाइन तेज़ धार वाली तलवार के वार की तरह है.

  • 54. 12:16 IST, 10 दिसम्बर 2009 sujeet:

    अयोध्या, मथुरा और काशी हिंदुओं के लिए पवित्र स्थान हैं, जैसे मुसलमानों के लिए मक्का-और मदीना. मुसलमान भाइयों का इन तीन शहरों से कोई धार्मिक जुड़ाव नहीं है. उन्हें चाहिए कि वे ख़ुद आगे बढ़कर मंदिर निर्माण की शुरुआत करें.इससे हिंदू-मुस्लिम एकता भी बढ़ेगी.
    हिंदू उसी अयोध्या में मस्जिद भी बना देंगे. हिंदू किसी धर्म की विरोध नहीं करता है. लेकिन अपने धर्म की रक्षा करना ग़लत भी नहीं है.

  • 55. 12:35 IST, 10 दिसम्बर 2009 sujeet:


    ख़ान साहब, मोहन भागवत, मोदी और वरुण गांधी आपको चरमपंथी लगते हैं? रामसेना और सिमि आपको एक जैसे संगठन लगते हैं. क्या धार्मिक संगठन बनाने का अधिकार केवल मुसलमान को हैं हिंदू को नहीं. आपका ब्लॉग पढ़कर मुझे लगता है कि आपको पत्रकारिता छोड़ देनी चाहिए.

  • 56. 17:14 IST, 10 दिसम्बर 2009 संजय बेंगाणी:

    जब राम और अल्लाह एक ही हैं तो आप जिद क्यों कर रहे हैं. बाबर ने जहाँ मंदिर तोड़ा था वहाँ मंदिर बन जाने दें. आपने जिन घटनाओं का जिक्र किया है अगर वे ढांचा गिराने से हुईं तो आज पाकिस्तान में जो हो रहा है तो क्या वहाँ भी कोई मस्जिद गिराई गई थी.

  • 57. 19:02 IST, 10 दिसम्बर 2009 Akash:

    इस समस्या को सबसे बेहतर समाधान यह है कि मुसलमान भाई वहाँ एक भव्य हिंदू मंदर बनवा दें. इस मंदिर का प्रबंधन हिंदू-मुसलमान दोनों की ओर से किया जाना चाहिए. हिंदू-मुसलमान भारत माता की दो भुजाएँ हैं.

  • 58. 13:52 IST, 11 दिसम्बर 2009 mukesh pandey:

    मैं बार-बार दूसरों के द्वारा सोमनाथ मंदिर के रूप में लूटा गया तो कभी अपने ही सपूतों के द्वारा बाँटा भी गया. मैं कभी भारत से हिंदुस्तान, पाकिस्तान बना. मैं जो अतीत था, आज उसकी केवल परछाई रह गई है. आज के मैं पर मेरा मानना है कि मैं के सपने बार-बार यूँ ही बनते और टूटते रहेंगे. जब तक कि इसे साकार करने की शपथ हम आज और अभी नहीं ले लेते.

  • 59. 23:38 IST, 13 दिसम्बर 2009 Amit:

    क्या हिंदुओं को अपने धार्मिक स्थलों के निर्माण का अधिकार नहीं है. आपका लेख पक्षपात पूर्ण है.

  • 60. 10:25 IST, 14 दिसम्बर 2009 maneesh kumar sinha:

    ख़ान साहब कृपया मुस्लिम भाइयों से कहिए वे एक भी ऐसे मंदिर का निर्माण करें जिसे मुस्लिम आततायियों ने तोड़ डाला था. यदि आप सत्ता में होते तो क्या ऐसा करते, जवाब दीजिए.

  • 61. 19:52 IST, 15 दिसम्बर 2009 piyush:

    मैं आपकी भावना को समझता हूँ और आपको यही कहना चाहता हूँ की मोर का पंख लगा लेने से कौवा मोर नहीं हो जाता.

  • 62. 14:33 IST, 16 दिसम्बर 2009 Krishan :

    खान साहब, माफ़ कीजिए लेकिन आपका यह लेख सचमुच बहुत निराशाजनक है, आप अगर सच में धार्मिक चश्मा लगाकर ही लेख लिखते हैं तो आपको सच में पत्रकारिता करना छोड़ ही दीजिए. मैंने आपके कई लेखों को पढ़ा है, आप शुरुआत काफ़ी आदर्शवादी बनकर करते हैं लेकिन आख़िर तक आते-आते आपके मन का सच उजागर हो ही जाता है. आपको क्यूँ लगता है की वहाँ मस्जिद ही बना चाहिए? क्या मक्का और मदीना में आप मंदिर बनवाने को तैयार हैं. आपके पाकिस्तान में रोज मस्जिद टूटती रहती है क्या आप वह यूँ ही हाय-तौबा मचाते हैं?

  • 63. 08:34 IST, 17 दिसम्बर 2009 ayush:

    यह एकपक्षिय विचार है.

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