« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

क्या बदला भोपाल में?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 02 दिसम्बर 2009, 17:35 IST

भोपाल गैस दुर्घटना के पच्चीस साल. वर्ष 2001 की वे यादें ताज़ा हो गईं जब बीबीसी हिंदी रेडियो की श्रंखला इंसाफ़ की रिकॉर्डिंग के सिलसिले में भोपाल गई थी.

दरअसल भारत में मानवाधिकारों की स्थिति पर आधारित इन रेडियो पैकेज में एक अंक भोपाल त्रासदी के बारे में भी था.

लंदन से भोपाल पहुँचने पर पता चला कि आने से पहले जो भी रिसर्च की थी वह अपर्याप्त थी. ज़मीनी हालात काग़ज़ात में दर्ज आँकड़ों से बहुत अलग थे.

दुर्घटना के 17 वर्ष बीत जाने पर भी पीड़ित मुआवज़े की राशि का इंतज़ार ही कर रहे थे.

वे जो अपना सब कुछ गंवा चुके थे, दरबदर की ठोकरें खाने पर मजबूर थे.

उन्हें यह साबित करने के लिए ज़मीन-आसमान एक करना था कि उनकी दुर्दशा गैस की विभीषिका का ही नतीजा था.

अस्पतालों में लंबी-लंबी लाइनें थीं. सत्रह वर्ष से साँस की तकलीफ़ से परेशान रोगियों का समय घर पर कम डिस्पेंसरियों में ज़्यादा गुज़र रहा था.

भुक्तभोगियों की आपबीती सुन कर रोंगटे खड़े हो रहे थे. एक महिला ने जब बताना शुरु किया कि उसने दो दिसंबर, 1984 की उस रात कौन सी सब्ज़ी बनाई थी और वह अपने पति का खाने पर इंतज़ार कर रही थी कि....

या फिर एक बूढ़ी, निस्सहाय महिला अपने इकलौते बेटे को याद कर के कह रही थी कि वह कॉलेज में पढ़ता था और आज होता तो क्या पता डॉक्टर होता या इंजीनियर.

ये सब आवाज़ें रेडियो पर प्रसारित हुईं तो अनगिनत श्रोताओं के मन को छू गईं. सैंकड़ों पत्र आए जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे श्रोताओं ने मध्यप्रदेश के इस शहर में रह रहे लोगों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कीं.

आज 25 साल बाद एक बार फिर भोपाल पर सबकी नज़र है. कितना कुछ बदला है इसका जायज़ा लेने की कोशिश की जा रही है.

आज भी भोपाल में लोग प्रदूषित जल पी रहे हैं और बीमारियों से जूझने को मजबूर हैं. मुआवज़े की राशि आज भी उनकी पहुँच से बाहर है.

अपनों को खोने के दर्द से जूझ रहे इन लोगों को इंसाफ़ मिल पाएगा? और कब?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 20:13 IST, 02 दिसम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ये दुख की बात है कि 25 साल में भोपाल गैस पीड़ितों को न मुआवज़ा मिला और न इंसाफ़ मिला. लोगों में एकता और जाग्रति की ज़रूरत है ताकि बेईमान नेताओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जा सके और तब कुछ लोगों को राहत मिल सकती है.

  • 2. 22:17 IST, 02 दिसम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, यक़ीन मानिए अगर श्रोताओं के पत्रों से उन पीड़ितों को राहत मिल सके तो कल ही आप बीबीसी पर अपील करें, दुनिया के हर कोने से पत्रों का अंबार लग जाएगा. हमारे नेताओं को दुत्कारने की ज़रूरत है, जिस दिन ऐसा हो जाएगा सभी पीड़ितों को पैसा, न्याय और सबकुछ मिल जाएगा.

  • 3. 00:39 IST, 03 दिसम्बर 2009 Akhil:

    सलमाजी, मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा और मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ. मैं इसी क्षेत्र से आता हूँ और मेरा मानना है कि ये हम लोगों की कमी है कि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर हम संवदेनशील नहीं हैं और कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते हैं.यही वजह है कि लोगों को न्याय नहीं मिल पाता है. हम लोग सरकार की अनियमितताओं, भ्रष्ट्राचार और न्याय में देरी को अपना भाग्य मान लेते हैं. मैं लोगों की पीड़ा से बखूबी परिचित हूँ लेकिन ये भी जानता हूँ कि कुछ होने वाला नहीं है. भोपाल त्रासदी को लेकर अगले दो दिनों तक हल्ला रहेगा और उसके बाद हम अगले 25 साल तक इंतज़ार करते रहेंगे. ये दिखाता है कि हमारा समाज किस तरह है. मुझे माफ़ करें मैं ऐसा ही महसूस करता हूँ.

  • 4. 08:23 IST, 03 दिसम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    दरअसल ये तीसरी दुनिया का देश है इसलिए सब चलता है, कोई बात नहीं. आदमी की यहाँ औकात कीड़े मकोड़ों से ज़्यादा नहीं, हाँ अगर ये अमरीका या फिर यूरोपीय देश होता और कंपनी भारत की होती तो उसे ज़िंदगीभर के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता. ये कटु सत्य है जो मान लेना चाहिए.

  • 5. 08:43 IST, 03 दिसम्बर 2009 BALWANT SINGH :


    सलमाजी ब्लॉग पढकर इस घटना के प्रति अपनी 13 साल की आयु के मनोभाव याद आ गए. बहुत ही मर्मभेदी दृश्य रहा होगा. लेख में प्रस्तुत जीवंत वर्णन मन को छू लेने वाला है. परन्तु फिर भी हमारे नेताओं और अफसरों का मन क्यों नहीं पसीजता है? इन वर्षों में शायद ही कुछ बदला हो. अगर नहीं बदला है तो बस बेसहारा लोगों का नसीब जो आज तक किसी सुनहरी किरण की आस में पलकें बिछाए बैठे हैं. और इंतज़ार है कि खत्म होता नज़र नहीं आता है. 25 साल का समय कम नहीं होता. सूरत शहर में प्लेग के संक्रमण के बाद वहां का जो काया पलट हुआ वो जग जाहिर है, उससे सीख लेकर ही इस त्रासदी के बाद भी अगर कुछ ठोस क़दम उठाए गए होते तो शायद इस दुर्घटना का गुबार कुछ तो छंटता. अगर अब तक सरकार पीड़ितों को जीवन की मूलभूत ज़रुरत साफ़ पीने योग्य पानी भी उपलब्ध नहीं करवा सकी तो और क्या उम्मीद की जा सकती है. मुझे तो लगता है की कुछ भ्रष्ट, स्वार्थी और लालची लोग ऐसी घटनाओं का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं ताकि अपनी राजनीति की दुकान चमका सकें और मुआवज़े के नाम पर घोटाले कर सकें और अपनी भरी हुई जेबों को बेसहारा, पीड़ितों का हक़ मारकर ठूंस-ठूंस कर खूब भर सकें.

  • 6. 08:58 IST, 03 दिसम्बर 2009 Amit Prabhakar:

    भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल पूरे होने पर मुझे पीड़ितों और उनके परिवारों को लेकर बहुत अफ़सोस है. मैं घटना के बारे में तो बहुत कुछ नहीं कर सकता लेकिन उद्योग लगाने में स्थान का ध्यान दिया जाना चाहिए. अक्सर हम इसकी अनदेखी कर देते हैं जिससे ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का शिकार बन जाते हैं.

  • 7. 09:14 IST, 03 दिसम्बर 2009 Vinod B:

    हिंदुस्तान में इंसाफ़ की उम्मीद की ही नहीं जा सकती है. ये एक बहुत बड़ा उदाहरण है. यहाँ पर सिर्फ़ कानून बना है बड़े लोगों के फायदे के लिए. एक आम आदमी तो सिर्फ़ झूठी उम्मीद ही रखकर जिंदा है. कितने ही घोटाले हुए है, हादसे हुए है, पर सज़ा कितनों को मिली है. अगर कोई कचहरी सज़ा दे भी देती है तो ऊपर अपील और फिर उसके ऊपर अपील में बरसो बीत जाते हैं. गुनाहगार बच जाता है और फरियादी एड़िया रगड़ रगड़ के मर जाता है.

  • 8. 11:36 IST, 03 दिसम्बर 2009 UDIT SHUKLA,Sonsari,Sitapur (UP):


    सलमा जी, आपका ब्लॉग पढ़कर गैस पीडि़तों की वास्तविकता का पता चला. यह वास्तव में बेहद दयनीय है. उस स्थिति को सोचकर कि किसी ने अपना बेटा, किसी ने अपना पति और किसी ने अपने किसी अन्य क़रीबी रिश्तेदार को खोया(या यह कहें कि छीन लिया गया.) मन वास्तव में बहुत दुखी हो गया. क्या हमारी बड़बोली सरकारों से इतना भी नहीं हो सकता की वे पीड़ितों को मुआवज़ा ही दिला दें. पर शायद हमारे नेताओं को क्षेत्रवाद, भाषाई झगड़े या किसी अन्य तरह के वोट बैंक पर कब्ज़ा करने के अलावा किसी दूसरे काम के लिए समय ही नहीं है. अगर किसी बड़े नेता का कोई रिश्तेदार अगर इस हादसे में मरा होता तो क्या यही हालत होती? मेरी देश के नीति निर्माताओं से अपील है कि वे गैस पीड़ितों के अथाह दुख को थोड़ा सा महसूस करें. उनकी मदद करें वे वैसे ही बहुत दुखी और परेशान हैं. इस अवसर पर बरसी आदी मनाकर ढोंग न करें.

  • 9. 11:44 IST, 03 दिसम्बर 2009 Syed Nafees Ahmed:

    सलमा जी, आपने जो लिखा वह तो सही है लेकिन हमारे नेता जिन्होंने किसी का भला तो किया नहीं उन्हें तो पैसों से मतलब है चाहे किसी ग़रीब की जान ही क्यों न चली जाए.

  • 10. 13:15 IST, 03 दिसम्बर 2009 himmat singh bhati:

    सलमा जी, भोपाल क्या दुनिया बदल गई है. इस बदलाव में घर-परिवार, नाते-रिश्ते सब बदल गए हैं. सभी जगह स्वार्थ ने जगह ले ली है. अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है पीडि़तों का दुख-दर्द. इन लोगों ने सहायता या मदद के इंतज़ार में 25 साल गुजार दिए. जिन घरों के चिराग इस हादसे में बुझ गए वही इस दर्द की समझ सकते हैं. लगता है कि पीड़ित लोगों का यह जीवन ही नागुज़र सा बीत जाएगा. कोई उनका दर्द नहीं समझ पाएगा. सरकार और क़ानून उनके लिए छलकपट हैं. आप भगवान से यह प्रार्थना करें कि वह उनकी मदद करे. सलमा जी आपने उनका दर्द जाना और बहुत मार्मिक लिखा. अगर जि़म्मेदार लोगों को आपकी बात सुनाई दे तो कुछ बात बने.

  • 11. 00:21 IST, 05 दिसम्बर 2009 Tej Bahadur Yadav :

    सलमा जी, भोपाल गैस त्रासदी की 25वीं बरसी पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओजस्वी भाषण दिया. उन्होंने कहा ‘एंडरसन को हमारे हवाले करो.’ जो मुखिया प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं करा पा रहे हैं, दलितों को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं, राजधानी से सटे विदिशा, रायसेन ज़िलों में आदिवासी एवं दलितों के बच्चों को ज़िंदा जला देने वाले ‘ताक़तवर’ अपराधियों को सज़ा नहीं दिलवा पा रहे हैं, वे एंडरसन को पकड़कर अपने हवाले किए जाने की झूठी गर्जना करते हैं. वास्तव में इनके ऐसे भाषणों का लक्ष्य गैस पीड़ितों के असंतोष को दबाना एवं वास्तविक और ज़रूरी मुद्दों से ध्यान हटाना होता है. यह साजिश है. 25 साल बाद भी गैस त्रासदी के आस-पास के इलाक़ों को स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं करा पाने की सरकार एवं प्रशासन की कमज़ोरियों को छिपाने की साजिश. साजिश गैस पीड़ितों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाने की नाकामी को छिपाने की. एंडरसन को फाँसी दे देने से गैस पीड़ितों को राहत नहीं मिल जाती है. मुख्यमंत्री के कह देने भर से एंडरसन का प्रत्यर्पण नहीं हो जाता है. क़ानूनी प्रक्रियाएं एवं व्यवस्था आखिर क्यूं है. मुख्यमंत्री से लेकर सभी ज़िम्मेदार लोगों ने दरअसल ज़रूरी मुद्दों से ध्यान बंटाने का ही काम किया है. सबसे बड़ी ग़लती तो उस अधिकारी एवं विभाग ने की जिसने ज़हरीली गैस भंडारण वाली इस कंपनी को शहर के बीचों-बीच उत्पादन इकाई लगाने की अनुमति दी.

  • 12. 11:05 IST, 05 दिसम्बर 2009 MD TARIK QUMAR:

    मुझे मालूम नहीं इतनी बड़ी त्रासदी पर हमारी सरकार को कोई मुआवजा क्यों नहीं मिला. इस देश में सिर्फ़ धर्म बिकता है और धर्म बेचने का काम कोई और नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक पार्टियां करती हैं. उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कितने लोग मरे और कितने ही लोग आज भी उस दर्द से मर रहे हैं. असलियत ये है कि हम असली मुद्दों को भूल जाते हैं.

  • 13. 11:29 IST, 05 दिसम्बर 2009 parvez alam:

    सलमा जी, भोपाल कांड के न्याय के इंतज़ार में 25 साल का एक लंबा सफ़र तय कर चुका है. उस दौर की राजनीति काफी हद तक ठीक थी लेकिन आज राजनेता पीड़ितों को राहत दिलाने की बजाय वोट की राजनीति कर रहे हैं.

  • 14. 15:03 IST, 05 दिसम्बर 2009 sunita singh:

    कभी-कभी लगता है कि घटनाओँ की बरसी पर ही हमें त्रासदी की याद क्यों आती है?

  • 15. 16:27 IST, 14 दिसम्बर 2009 Amit Pareek:

    हमारे नेताओं को जनता के बीच काम करना चाहिए.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.