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गंदगी पर साफ़गोई

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|सोमवार, 30 नवम्बर 2009, 00:38 IST

गंदगी पर साफ़ शब्दों में बात करना ठीक नहीं. 'गंदगी' नहीं कहना चाहिए, कहना चाहिए 'सफ़ाई का अभाव है', और जब सफ़ाई हो जाए तो कहना चाहिए कि 'गंदगी का अभाव है'.

कहेंगे कि राजनीति में 'सच का अभाव' है तो कोई बुरा नहीं मानेगा, कहेंगे कि 'झूठों की भरमार है' तो नेताओं की भावनाएँ आहत होंगी.

अब मंत्रियों को इतना तो समझना ही चाहिए, ज्यादातर मंत्री समझते भी हैं, लेकिन साफ़-सुथरे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भूल गए कि गंदगी पर उनके बयान से 'गंदे लोगों' की भावनाएँ आहत हो सकती हैं.

उन्हें यह कहने की क्या ज़रूरत पड़ी थी कि गंदगी के मामले में भारत के शहरों का कोई मुक़ाबला नहीं है, भारत के किस शहरी को यह बात मालूम नहीं है.

दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले 'गंदे आदमी' ने मंत्री जी के बयान पर एतराज़ नहीं किया जिसे नहाने के लिए पानी नहीं मिलता, बुरा मान गए नई दिल्ली के सफ़ेद बंगलों में रहने वाले कई लोग.

जाकी रही भावना जैसी...जयराम रमेश ने गंदगी की बात की तो मानो सबको अपनी-अपनी गंदगियों का खयाल आ गया और दिल दुखने लगा.

एक पूर्व मंत्री बोले कि इस तरह कचरे की बात करने से देश की साख गिर जाएगी. उन्हें शायद लगता है कि विदेशी पर्यटक आएँगे तो वे कचरे के ढेर को भी 'इक्रेडिबल इंडिया' का टूरिस्ट एट्रैक्शन समझ लेंगे और इंडिया की साख बची रहेगी.

पर्यावरण मंत्री की ही पार्टी के लोग कह रहे हैं कि 'उन्हें सही शब्दों का चुनाव करना चाहिए था', शायद कचरे के बारे में बात करने से पहले थिसॉरस पलटना चाहिए था.

अगर तैमूरलंग के राज में कोई मुहावरे के तौर पर कहता कि 'आपका प्रशासन लंगड़ा है,' तो उसकी क्या दशा होती? गंदगी के राज में ऐसी बात कहना साफ़ दिखाता है कि जयराम रमेश में 'राजनीतिक परिपक्वता का अभाव' है.

राजनीतिक परिपक्वता होती तो किसी ज्वाइंट सेक्रेटरी का लिखा एक साफ़-सुथरा भाषण पढ़ते जिसमें 'सफ़ाई सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार की ओर से उठाए गए महत्वपूर्ण क़दमों' पर प्रकाश डाला गया होता.

एक विपक्षी नेता ने सवाल पूछा कि 'उनकी ही सरकार है, बयान क्यों दे रहे हैं, सफ़ाई क्यों नहीं कराते'?

मेरे ख्याल में यह एक वाजिब टिप्पणी है लेकिन समस्या को स्वीकार किए बिना समाधान की दिशा में कैसे बढ़ा जा सकता है?

वैसे यह हैरत की बात है कि भारत सरकार के एक मंत्री को गंदगी दिख रही है क्योंकि वह जहाँ भी जाता है, कुछ ही घंटे पहले उस जगह को चमका दिया जाता है.

मंत्री जी बयान देने के बाद अब शायद झाड़ू उठाने वाले हों, देखते हैं कहाँ-कहाँ से, कैसी-कैसी और कितनी गंदगी साफ़ करते हैं?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 09:05 IST, 30 नवम्बर 2009 ghanshyam tailor:

    मंत्री जी ने बिलकुल सही कहा है, भारत का कोई शहर साफ़-सुथरा नहीं है. लोग साफ़-सफ़ाई केवल अपने घर की और घर के बाहर की चाहते हैं. सार्वजनिक स्थानों को हर कोई गंदा करता है. सड़कों पर गंदगी फैलाना, कहीं भी कूड़ा डाल देना लोगों की आदत बन गई है. भारत के लोग जब दूसरे देश जाते हैं तो वहां के कानून का पालन करते हैं लेकिन अपने देश में कानून का पालन करने में उन्हें शर्म आती है. जब तक हम अपने देश के प्रति ज़िम्मेदारी नहीं समझेंगे, गंदगी ऐसी ही फैलती जाएगी.

  • 2. 12:08 IST, 30 नवम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी, बहुत अच्छा लिखा आपने लेकिन जो इन नेताओं के अंदर गंदगी भरी हुई है वह कौन साफ़ करेगा. बाहरी गंदगी तो कोई न कोई साफ़ कर सकता है और ज़रूरत पड़ी तो कर भी देंगे. लेकिन बेईमान नेताओं के दिल में, दफ़्तर में, उन की पार्टियों में जो गंदगी भरी हुई है उसे कौन दूर करेगा.

  • 3. 14:39 IST, 30 नवम्बर 2009 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":

    राजेश जी, बहुत दुख हुआ आपका यह लेख पढ़ कर. क्या आप लोगों के पास मुद्दों का अभाव है जो ऐसे विषय उठा रहे हैं. आपके अब तक के सभी लेखों में यह सबसे कमज़ोर है. कृपया महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखें जिनसे समाज का कुछ भला हो.

  • 4. 14:53 IST, 30 नवम्बर 2009 udit shukla:

    मैं समझता हूँ कि मंत्री जी की बात न सिर्फ निराशाजनक है कि बल्कि मूर्खतापूर्ण है. जब वे ही ऐसी बात करेंगे तब व्यवस्था में सुधार कौन लाएगा. मैं नहीं मानता कि आम लोगों के लिए यह शर्म की बात है. अंतत सुधार सरकार के ही जिम्मे है. जय राम रमेश को जिम्मेदारी लेते हुए सुधार के लिए काम करना चाहिए.

  • 5. 19:43 IST, 30 नवम्बर 2009 himmat singh bhati:

    देखा जाए तो भारत में ग़रीब गंदगी नहीं फैलता बल्कि अमीर गंदगी फैलाते है जिसे ग़रीब साफ करते हैं. भारत में सफ़ाई का अभाव है और लोगों में इसे लेकर कोई चेतना नहीं है.

  • 6. 07:07 IST, 01 दिसम्बर 2009 rohit:

    सफ़ाई अभियान को सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. क्यों नहीं हम निजी क्षेत्र के अधीन इसे लाए. साथ ही हर व्यक्ति को भी साफ़-सफ़ाई पर ध्यान देना होगा तब हीं जाकर हमारा आस-पड़ोस स्वच्छ और सुंदर बन पाएगा.

  • 7. 09:43 IST, 01 दिसम्बर 2009 gauri shankar:

    बहुत अच्छा लिखा है आपने.

  • 8. 10:50 IST, 01 दिसम्बर 2009 राजेश कुमार:

    राजेश जी, आपने बहुत साफ़ शब्दों में सफ़ाई से अपनी बात कही है. मुझे नहीं लगता कि यह मुद्दा, छोटा मुद्दा है. शायद बाहरी सफ़ाई से ही हम आंतरिक सफ़ाई की ओर जा सकते हैं. आपके मुहावरे प्रभावित करते हैं और अभिव्यक्ति मुद्दे को उजागर करती है.

  • 9. 11:05 IST, 01 दिसम्बर 2009 raj:

    भारत में बहुत गंदगी है, पता नहीं क्यों. सभी भारतीयों को साफ़ सफ़ाई पर ध्यान देना चाहिए ताकि हमारा देश भी अन्य देशों की तरह ही साफ़ रहे.

  • 10. 12:48 IST, 01 दिसम्बर 2009 Hemant:

    बहुत ही उम्दा लिखा है आपने बहुत बहुत धन्यवाद

  • 11. 13:39 IST, 01 दिसम्बर 2009 सोफ़िया मर्चेंट:

    राजेश जी, मुझे आपका ब्लॉग पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आपने बहुत ही प्रासंगिक मुद्दा उठाया है। भारत शायद उन कम औद्योगिक देशों में से है जहाँ पर अभी तक इतनी सारी गंदगी फैली हुई है। दूसरे देशों में जैसे कि चीन और पाकिस्तान में भी काफ़ी हद तक गंदगी का अभाव है। लेकिन एक भारत ही है जो दुनिया में इतनी तरक्क़ी करने के बावजूद खुद अपने देश में पीछे रह गया है। और यह काफ़ी अफ़सोस की बात है।

  • 12. 13:43 IST, 01 दिसम्बर 2009 शान खान:

    आपका बहुत धन्यवाद इस लेख के लिए। यह मैं आपका पहला पीस पढ़ रहा हूँ और मुझे इसका अंदाज़ बहुत अच्छा लगा। अगर मैं आपका यह लेख न पढ़ता, तो शायद मैं भारत के नेता लोगों की बात पर कुछ गौर न करता। अब इसको पढ़कर न सिर्फ़ इस बात पर सोचने को मजबूर हो गया हूँ और ऊपर से आपके तंज से लुत्फ़ भी पा रहा हूँ। इन सब बातों को एक नए रूप में देखना चाहिए।

  • 13. 13:47 IST, 01 दिसम्बर 2009 रामु खरेल:

    यह आपने बिल्कुल सच बात कही कि आज भारत में चारों ओर गंदगी फैली हुई है। ऐसी समस्याओं को आगे लाना एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि इनके बारे में बात किए बिना इनका हल नहीं होगा। आपने अच्छी तरह व्यंग्यात्मक रूप में समस्या को बताया है। मैं उम्मीद कर रहा था कि आप इसके हल के बारे में भी कुछ ज़रूर लिखेंगे। आज जैसे लोगों की इस अवाम को सख़्त ज़रूरत है ताकि यहाँ कि गंदगी दूर हो सके। कृपया पाठकों को ऐसे लेख से समस्या का हल करने का उपाय भी बताएँ, उनको सुझाव दें और ऐसे लेख लिखते रहें।

  • 14. 13:50 IST, 01 दिसम्बर 2009 अरुबा नियाज़ी:

    यह अच्छा मुद्दा उठाया राजेश जी। आज भारत को सफ़ाई की बहुत ज़रूरत है। इसके बारे में बात करने से ही कुछ होगा। इसके साथ-साथ नेताओं और सरकार पर उँगली उठाना ज़रूरी है ताकि वे भी जान सकें कि इस गंदगी के ज़िम्मेदार वे भी हैं। लोगों की आदत तभी बदलेगी जब सरकार का दबाव पड़ेगा और उनको सफ़ाई करने पर मजबूर किया जाएगा। सीधी ज़बान से कोई नहीं मानने वाला।

  • 15. 13:53 IST, 01 दिसम्बर 2009 विल विलियम्स:

    मैं भारत में तीन महीने से हूँ - विदेशी की हैसियत से पढ़कर बहुत खुशी हुई। प्रासंगिक व्यंग्य है और आपने अच्छे सवाल उठाए हैं। मैं आपको बधाई देता हूँ और इतना अच्छा लिखने के लिए धन्यवाद देता हूँ।

  • 16. 15:55 IST, 01 दिसम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    क्या मंत्री आम आदमी से अलग है जो उसके पहुँचने से पहले जगह साफ़ कर दी जाती है,.

  • 17. 08:37 IST, 02 दिसम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR PUNJAB:

    भारत को सांप -सपेरों के देश की उपाधि तो पहले से ही हासिल है,. और अब सरकार के मंत्री ही "अतुल्य भारत " को "कचरे की टोकरी " से अलंकृत कर रहे हैं. किसे दोष दिया जाए हमारी मानसिकता को ,सरकार को या स्वंय को, मेरे ख्याल से कुछ आचरण हमें पशुओं से सीखना चाहिए कि जहाँ उठा-बैठा जाता है कम से कम उस स्थान को साफ़ -सुथरा रखा जाए. पता नहीं आजकल जयराम रमेश को क्या हो गया है. कभी कॉंग्रेस के थिंक टैंक कहे जाने वाले जयराम रमेश विवादों से पीछा नहीं छूट रहा है. अगर गहराई से सोचा जाए तो जो हमारे परिवेश में विद्यमान है वह हमारे विचारों की उपज है, अगर मन मंदिर में झाडू लगा हो तभी यह अंतर्निविष्ट होकर बाहर दिखेगा.

  • 18. 17:43 IST, 02 दिसम्बर 2009 rupesh:

    सच कड़वा होता है और हमे कबूल कर लेना चाहिए की हम गंदगी फैलाने में नंबर वन हैं. शाम होते ही अपने घरेलू जानवर को अपने ही स्ट्रीट को गन्दा करना कोई हमसे सीखे. अगर जानवर पालना ही है तो उसके लिए घर में एक छोटा सा टायलेट क्यों नहीं बना लेते हम वरना देश और अपनी सडको को गन्दा करने के लिए पालतू जानवर पालने की क्या जरुरत है. कोकोकोला के कैन और बाकी चीजें अपने कार की खिड़की के बाहर जब तक हम फेंके नहीं है तब तक हमारा खाना नहीं पचता है. घर से बहार निकलकर जब तक सडको और गलियों को हम गन्दा नहीं करते है हमे रात को नीद ही नहीं आती है. घर में अगर हम आने वाली पीढ़ी को ये सब नहीं सिखायेंगे तब तक सफाई की बात करना भी पाप है लेकिन हमे शायद लगता है की हमने वोट दिया है सरकार को तो शायद इसलिए भी दिया है कि सरकार आकर हमारे कार के बाहर आकर हमारे कोकोकोला के कैन और बाकी गन्दगी उठाये और हमे थैंक्यू बोले. मुझे भी और सभी को भी अपनी अपनी मानसिकता बदलनी होगी.

  • 19. 19:22 IST, 02 दिसम्बर 2009 himmat singh bhati:

    जहाँ हमारे अपने ही निमंत्रण दे कर बुलाते हैं, जहाँ अपने ही अपने होते हैं, हम वहाँ भी जूठन और गंदगी बिखेरने में किसी भी तरह की शर्म महसूस नहीं करते तो और जगहों का क्या होता है सब जानते हैं.

  • 20. 22:18 IST, 03 दिसम्बर 2009 birendra :

    बहुत अच्छा लिखा है पर लिखने से क्या होगा कर के दिखाना होगा लोगों को.

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