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बदल गई है मुंबई

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 26 नवम्बर 2009, 04:46 IST

26 नवंबर की तारीख़ मेरे दिलो दिमाग पर खुद चुकी है जो मिटती नहीं है.

मुझे रात में टीवी पर फ़िल्म देखते हुए सोने की आदत है और इसी क्रम में चैनल बदलते हुए नज़र पड़ी ख़बरों पर. मुंबई में हमला हो गया है.

मैं क़रीब साढ़े ग्यारह बजे ऑफिस पहुंचा. रात में ही मुंबई जाने को कहा गया.

सुबह की फ़्लाइट में 99 प्रतिशत पत्रकार थे. कई बड़े और दिग्गज़ पत्रकार. कुछ छोटे मुझ जैसे. एयरपोर्ट से ताज तक पहुंचना याद नहीं लेकिन उसके बाद धमाके, पुलिस, लोगों के बयान और पुलिस की कार्रवाई ये सब याद है.

मैं बस घूमता रहता था. ताज से लियोपोल्ड, लियोपोल्ड से नरीमन हाउस और ओबेरॉय. तब तक जब तक घेराबंदी ख़त्म नहीं हुई.

अब साल बीत चुका है और फिर यहां हूं. बहुत कुछ बदला है जो दिखता है. कुछ बदला है जो नहीं दिखता है.

ताज के पास फोटो खींचने वालों की संख्या बढ़ गई है. पहले लोग गेटवे ऑफ इंडिया के साथ फोटो खिंचवाते थे. अब ताज के साथ खिंचवाते हैं.

मरीन ड्राईव पर चलते हुए शायद ही पहले कोई ओबेरॉय-ट्राइडेंट पर ध्यान देता था. अब सबकी नज़र उधर ज़रुर जाती है.

गलियों के भीतर स्थित नरीमन हाउस के बारे में बच्चा बच्चा जानने लगा है और विदेशियों में लोकप्रिय लियोपोल्ड में अब बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी जाने लगे हैं.

पुलिस की भारी तैनाती है और वो हथियारों से लैस अत्यंत सतर्क और तैयार दिखते हैं.

ताज के पास कमांडो की शक्ल के खिलौने बिकने लगे हैं. बीस बीस रुपए में बिकने वाले ये खिलौने बड़ी संख्या में खरीदे जाते हैं.

ताज के पास ही झंडे लग रहे थे. पता चला यहां कोई राजनीतिक दल बड़ा कार्यक्रम करने वाले हैं. मरीन ड्राइव पर लंबे कागज़ लगे हैं जहां आप 26/11 पर अपनी भावनाएं पेंट कर सकते हैं.

कोई किताब लिख रहा है कोई अपने चित्रों का प्रदर्शन कर रहा है. फ़िल्में तो बन ही रही हैं. नए सुरक्षा बल फोर्स वन का उदघाटन हो रहा है जहां उदघाटन के दौरान दो जवान बेहोश हो जाते हैं.

अख़बारों और टीवी चैनलों पर, जिसमें हम भी शामिल हैं, बहसें हो रही हैं.

मैंने भी इंटरव्यू लिए हैं लोगों के और बातचीत के दौरान वो टूटते से लगे. ख़ासकर वो लोग जिन्होंने परिवारजनों को खोया है.

कुछ अटपटा सा लगता है. मैं कभी ये सवाल नहीं पूछता कि आपको कैसा लग रहा है.

अक्सर बिना सवाल पूछे जवाब मिल जाते हैं उनकी आंखों से ही.. मेरा काम आसान हो जाता है.

मैं सोचता हूं अगर प्रभावितों का दुख, गुस्सा या नाराज़गी, संबंधित अधिकारियों तक मेरे ज़रिए पहुंच जाए तो मैं अपने काम को सफल मानूंगा.

किसी हादसे का व्यवसायीकरण कितना सही है ये विवाद का विषय है लेकिन इस व्यवसायीकरण को रोक पाना मुश्किल ही नहीं असंभव सा लगता है..

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 05:59 IST, 26 नवम्बर 2009 KULDEEP JAIN:

    झा जी, बदला बहुत कुछ है, कुछ दिखता है कुछ नहीं दिखता है. बीबीसी जैसी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं 'जो नहीं दिखता है' उसे दिखाना चाहती हैं, वे हमें उन लोगों तक ले जाती हैं जो इस घटना का शिकार हुए. हमें बताती हैं कि क्षतिपूर्ति में कितनी देरी हुई है. कुछ अन्य पहलू भी हैं जो नहीं दिखते हैं जैसे विभिन्न संसाधनों का दुरुपयोग, पुलिस में सुधार लागू न करना जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है, कोड़ा के अलावा अन्य लोगों के द्वारा काले धन को वैध बनाने का काम इत्यादि.

  • 2. 09:23 IST, 26 नवम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB :

    सुशील जी, वास्तव में जिस तन लागे सो तन जाने. ऐसे मौक़ों के व्यवसायीकरण की ताक में हमेशा से ही कुछ संकीर्णवादी राजनितिक दलों के संवेदनहीन लोग बने रहेगें. यह धंधा तो इस घटना के कुछ समय पश्चातही शुरू हो चुका था जब कुछ निष्ठुर राजनितिक दलों ने राष्ट्र के नाम कुर्बानियां देने वाले वीर, साहसी, सैनिकों ,जवानों व् आम लोगों को श्र्द्दान्जलियाँ अर्पित करने में भी मराठी व ग़ैर मराठी के तराज़ू में तोल डाला. आख़िर यह चंद लोग इतने क्रूर व बेदर्द कैसे हो सकते हैं? कहाँ हमारी मातृभूमि के संस्कारों में कमी रह गई? क्योंकि जब किसी सैनिक ने अपने प्राणों को दांव पर लगाकर या अपने जीवन की प्रवाह किए बिना किसी इंसान की जान बचाई तब यह नहीं सोचा कि सामने कोई हिंदी भाषी है, कोई मराठी है, कोई स्वदेशी है या विदेशी है. सैनिक सिर्फ़ सैनिक होता है राष्ट्र का गौरव ही उसका धर्म होता है. लेकिन हाय रे मेरे देश के नेता जो ऐसे नाज़ुक मौक़ों पर भी राजनीती की दुकान चलाना नहीं भूलते. जान - माल की हानि जो हुई सो हुई गुज़रा वक़्त व परिवारों के हमेशा के लिए बिछुड़े प्रियजन वापस नहीं आने वाले लेकिन इन समाज के ठेकेदारों व राजनितिक दुकानदारों को अपने अनैतिक कारनामों से बाज़ आना चाहिए. अगर दुखी ,पीड़ित को मीठा नहीं दे सकते तो दो बोल मीठे जैसे बोलकर दुखदर्द तो बाँट सकते हैं, बजाए इसके कि भाषा ,मज़हब व ज़ात -पात के नाम पर विषाद फैलाएं! अब बदली हुई मुंबई के पुलिस अधिकारी व वर्तमान सरकार के नेता भी बीते हुए कल पर कीचड़ उछाल रहे हैं जो कि एक चिंताजनक विषय है. यह तथ्य उस समय क्यों नहीं उजागर किए गए. सत्य को छिपाना भी एक अपराध है.

  • 3. 09:53 IST, 26 नवम्बर 2009 nirmla.kapila:

    बहुत संवेदनशीलता से अपनी भावनाओं को रखा है उन शहीदों को शत शत नमन्

  • 4. 10:46 IST, 26 नवम्बर 2009 praveen sinha:

    शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले/
    वतन पर मरने वालो का यही अंतिम निशां होगा

    मेरी तरफ़ से ये कालजयी पंक्तिया समर्पित हैं 26/11 के शहीदों को. एक आम आदमी होने के नाते मुझे पूरी निष्ठा है भारतीय सेना और पुलिस पर. लेकिन अगर एक साल का हम विश्लषण करें तो राजनेताओ की तरफ़ से हमेशा ग़लत विवाद उठाया गया है. किसी की नज़र में ये छोटी घटना थी तो कोई हमले के समय घर में छुपा था, एक महानुभाव का आंकलन है कि पुलिस वालों ने बुल्लेट प्रूफ़ ही नहीं पहना था. लेकिन बुल्लेट प्रूफ़ घटिया है इस बात को बस औपचारिक बहस दे कर भुला दिया जाता है क्योंकि यहाँ वोट बैंक नहीं है. नियुक्ति के समय पर गोपनीयता की शपथ लेने वाले राजनेता और पदाधिकारी लिब्रहान आयोग की रोपोर्ट लीक कराने में तो सक्षम हैं लेकिन राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए नहीं. राज्य सभा और विधान सभा में तो मर्दानगी दिखाते हैं लेकिन ऐसी घटना होने पर तब तक कैमरे पर नज़र नहीं आते जब तक ख़तरा टल नहीं जाए .ऐसी घटना होने पर चाहे दिल्ली बम विस्फोट हो या मुंबई एक भारतीय खाना खाना तक भूल जाता है लेकिन ये ड्रेस बदलना नहीं भूलते है.
    दुख तो इस बात का है कि इसे हर कोई भुनाने पर लगा है एक अभिनेता कहते है आप एक ख़ास कंपनी की मोबाइल से बात करंगे तो पैसा पुलिस को दिया जाएगा लेकिन ख़ुद उस विज्ञापन के लिए कितना लिया होगा ये नहीं बताते अगर एक विज्ञापन की कमाई पुलिस को दे देते तो शायद लाखो कॉल के बराबर होता. एक बेहतर भविष्य की उमीद के साथ.

  • 5. 12:20 IST, 26 नवम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सुशील जी आप इससे क्या संदेश देना चाहते हैं मुझे समझ में नहीं आ रहा है. रहा सवाल मुंबई की सुरक्षा का तो वह न तो कल सुरक्षित थी और न आज सुरक्षित है. मुंबई ही नहीं पूरा हिंदुस्तान बेईमान नेताओं के कारण किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं है.

  • 6. 20:11 IST, 26 नवम्बर 2009 Manish Sharma:

    संसद पर हमले के बाद भारत पर ये दूसरा हमला था. मुझे शर्म आती है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी भारत सरकार चुप रही और उसने कुछ नहीं किया. राजनेता विदेशों में घूमने-फिरने और अपने ऐशो आराम में मस्त हैं और आम आदमी के दुख दर्द का उन्हें कतई ख़्याल नहीं है.

  • 7. 22:20 IST, 26 नवम्बर 2009 RANJIT KUMAR:

    आपने जिस अंदाज़ में 26/11 की तमाम बातें कह दी हैं वह एक बार सभी को इस बात का एहसास कराता है कि समय का पहिया कभी नहीं रुकता, घाव कितने गहरे क्यों न हों धीरे-धीरे भर ही जाते हैं. लेकिन 26/11 के घाव नहीं भरें तो अच्छा है ताकि हमारे शासकों को आम लोगों की ज़िंदगी को लेकर थोड़ी चिंता होती रहे.

  • 8. 14:47 IST, 27 नवम्बर 2009 PREM SHANKAR TIWARI GONDA U.P.:

    सर्वप्रथम मै उन शहीदों को नमन करता हूँ जिन्होंने इस हमले मे अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. जो कुछ 26/11 को हुआ उसे भूलना तो बहुत ही कठिन है मगर उससे सबक लेना चाहिए ताकि भविष्य मे ऐसी घटना घटित न हो.

  • 9. 13:16 IST, 29 नवम्बर 2009 Rajiv:

    आपकी लेखनी बहुत अच्छी और प्रभावशाली हैं.

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