उस भयावह रात की आँखो-देखी
मैं पिछले साल 26 नवंबर की रात एक दोस्त के साथ बहुत ही आराम से खाना खा रहा था. दिन भर का काम ख़त्म करके फिर काम पर लौटने की सोच दिमाग़ में आ ही नहीं सकती थी.
अचानक एक के बाद एक 'दक्षिण मुंबई में अंडरवर्ल्ड गुटों के बीच मुठभेड़' के टेक्स्ट मैसेज आने शुरू हो गए.
फिर एक दोस्त ने फ़ोन करके कहा "आतंकवादियों ने मुंबई के कई इलाक़ों पर हमला कर दिया है. ताज और ट्राइडेंट में भी घुस आए हैं".
यह सुनना था कि मैंने खाना अधूरा छोड़ा और अपने दोस्त से बिदाई ली. दिल्ली और लंदन में अपने साथियों को ख़बर दी, गाड़ी स्टार्ट की और दक्षिण मुंबई की तरफ चल पड़ा.
हमलों की ख़बर जंगल में आग की तरह फैल गई थी इसलिए सड़कें ख़ाली थीं. कुछ देर बाद मैं ट्राइडेंट होटल के सामने खड़ा था.
होटल के बाहर या तो पत्रकार खड़े थे या फिर पुलिस वाले. माहौल काफ़ी डरावना था. कहीं से भी गोलियां हमारी तरफ आ सकती थीं.
मैं एक पुलिस की गाड़ी के क़रीब खड़ा था. पुलिसवालों की वॉकी-टॉकी में बातचीत से हमें पता चला कि हमले कई जगह हुए हैं.
मेरे लिए यक़ीन न करने वाली ख़बर थी एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे की मौत. उसी दिन शाम सात बजे मैंने उनसे फ़ोन पर बात की थी.
मैं उनसे मालेगांव बम धमाके के केस के सिलसिले में बात करना चाहता था. उन्होंने केवल इतना कहकर फ़ोन रख दिया था कि वे एक मीटिंग में हैं और देर रात में फ़ोन करने को कहा था.
जब मुझे बंदूकधारियों के हाथ उनकी मृत्यु का पता चला तो उनके शब्द याद आए. मैं तो भूल गया था कि उन्होंने देर रात को फ़ोन करने को कहा था.
होटल के अंदर से रुक-रुक कर गोलियाँ और धमाकों की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं.
एक कैमरामैन ने होटल की ऊपर वाली मंजिलों पर जूम किया तो एक बंदूकधारी खिड़की के उस पार साफ़ दिखाई दे रहा था.
नीचे की कुछ खिड़कियों से कुछ लोग सफ़ेद रुमाल लहराकर हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे.
वो लोग अंदर कई घंटों से बंधक बने थे. उनके लिए बाहर निकलने के सारे रस्ते बंद थे.
उधर ताज होटल से भी धमाकों की आवाजें साफ़ सुनाई दे रही थीं. और एक ज़ोरदार धमाके के बाद मालूम हुआ कि ताज की पुरानी और ऐतिहासिक इमारत के एक गुम्बद में धमाके से काफ़ी क्षति पहुंची है.
मैं लगातार आठ घंटे वहां खड़ा रहा. खाना, पीना और अन्य ज़रूरतें सब भूल गया था. बस सही ख़बरें आप तक पहुँचाने की कोशिश में लगा था.
मैं पिछले 21 वर्षों से पत्रकार हूँ और इस लंबे अरसे में मैं पंजाब, कश्मीर, दिल्ली, मुंबई और पूर्वोत्तर भारत में चरमपंथी घटनाओं की रिपोर्टिंग करता आया हूँ.
तीन साल पहले मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों में मरने वालों को बिल्कुल क़रीब से भी देखा है.
लेकिन पिछले साल 26 नवंबर को हुए हमले कई मायनों में अलग थे. आम तौर से बम के धमाके होते हैं और फिर रिपोर्टर घटना स्थल पर पहुँचते हैं.
धमाके करने वाले आराम से फरार हो जाते हैं, लेकिन 26 नवंबर के हमलों में आप हमावारों को अपनी आँखों से देख सकते थे.
वो दिलेरी से गोलियाँ चला रहे थे. पुलिसवालों को भी मार रहे थे और आम निहत्थे लोगों को भी. यह सब लाइव टीवी पर दिखाया जा रहा था.
मुश्किल बात यह थी कि हमले जारी थे और 60 घंटों तक चलते रहे जिसके दौरान लोग मरते जा रहे थे.
ऐसे में मरने वालों की सही संख्या का पता लगाना मुश्किल हो रहा था. अधिकारियों के पास भी ख़बरें सही नहीं थीं.
उदाहरण के तौर पर एक समय में उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री आरआर पाटिल ने कहा 25 बंदूकधारी शहर में हमले कर रहे हैं, जबकि बाद में यह मालूम हुआ कि उनकी संख्या केवल 10 थी.
दूसरी दिक्कत यह पेश आ रही थी कि 60 घंटों तक हमले जारी रहने के कारण कई तरह की अफ़वाहें फैल रही थीं.
सच क्या है और झूठ क्या. इसका पता लगाना मुश्किल हो रहा था. दूसरी तरफ टीवी चैनलों में आपसी मुक़ाबलों के कारण कुछ चैनल अफ़वाहों को सही ख़बर की तरह प्रसारित कर रहे थे.
अफ़वाहों की पुष्टि करने वाले अधिकारी मैदान में थे इसलिए जिसकी मर्ज़ी में जो आ रहा था वो कर रहा था.
दूसरी तरफ सभी ख़बरें बेबुनियाद नहीं थीं. जैसे कि अजमल कसाब की गिरफ़्तारी के बाद उसका यह स्वीकार करना की वो पाकिस्तान के पंजाब का है.
लेकिन हमारे लिए दिक्कत यह थी कि बिना किसी अधिकारी की पुष्टि के यह ख़बर हम नहीं चला सकते थे.
बहरहाल इन हमलों ने पहली बार मुंबई के अमीरों की बस्तियों में दहशत फैला दी थी. पहली बार बड़े-बड़े होटलों को निशाना बनाया गया था. शायद पहली बार अमीर लोगों के सगे-संबंधी हमलों में मारे गए थे.
मैं यहाँ अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जिनके या तो रिश्तेदार या दोस्त या जान-पहचान के लोग इन हमलों में या तो मारे गए या बंधक बनाए गए थे.
ऐसा अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ. मेरी भी 20 साल पुरानी एक पत्रकार दोस्त ताज महल होटल में मारी गईं.
इस शहर में अक्सर लोग यह कहते हैं कि ये हमले उनके लिए निजी क्षति थी.

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मत याद दिलाएं उस राष्ट्रीय शर्मनाक घटना की !
जुबैर साहब आपने जो बयाँ किया वह दिल दहलाने वाली घटना थी जिसने न केवल मुंबई को बल्कि पूरे भारत को हिला कर रख दिया था. आपने जो पत्रकारों की भूमिका पर तथ्य दिए वो बिलकुल ही सही हैं. पत्रकार खबर को तिल का ताड़ बनाने मे उस्ताद होते हैं. खबर पहुँचाने की प्रतियोगिता में देश की गरिमा और पत्रकारिता की छवि का भी धयान रखना चाहिए.
कंधार विमान अपहरण के बाद दूसरी बार आतंकवाद ने उच्च मध्यम वर्ग की दुनिया में हमला किया था, कंधार अपहरण में यह वर्ग किसी तरह से अपनों की जान बचाने के लिए शर्मनाक ढंग से समर्पण की मुद्रा में था. इन दोनों घटनाओं ने इस वर्ग को महसूस कराया है की ये घटनाएँ सिर्फ खबर नही होतीं. दुःख ये है की मीडिया इस घटना को भी सेलिब्रेट करना चाहता है.
ज़ुबैर साहब आपने तो आँखों देखी लिख दिया, जो सच है, लेकिन नेता जो झूठ बोलते रहे हैं एक बार फिर से कुर्सी पर विराजमान हो गए हैं. देश की बदकिस्मती है कि जो हमें सुरक्षित नहीं रख सकते, उन्हीं के हाथों फिर से कमान है. यदि जान पर खेल कर पत्रकार रिपोर्ट न करें तो नेता सच पर पर्दा डालते रहेंगे.
मुंबई में 60 घंटे चले तांडव को मीडिया ने जिस बेशर्मी से दुनिया को दिखाया, उसे नहीं दिखाना चाहिए था. मीडिया में हमले को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया. उन्होंने अपवाहों को फैलाने में मदद की.
जो लोग आतंकवादी हमले में मारे गए वे निर्दोष लोग थे. यही कारण है कि हमारे राजनेता कोई ठोस कार्रवाई आतंकवाद के ख़िलाफ़ नहीं कर रहे हैं.
हम बस आंख बंद कर 26/11 के दूसरे भाग का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि भाग एक से कोई सबक हमने नहीं लिया. यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान इस हमले के लिए ज़िम्मेदार है, हम नपुंसक की तरह बैठे हुए हैं.
मुंबई की दुर्घटना काफ़ी दिला हिलाने वाली थी. आज भी याद करके डर लगता है. मीडिया ने इसे काफ़ी उछाला, साथ में ख़बर की होड़ ने लोगों को गुमराह भी किया.
आपने सही कहा कि पहली बार अमीरों की बस्तियों पर हमला हुआ..जिसका परिणाम देखने को भी मिला की एक साल से भारत में कोई आतंकी घटनाएं नहीं हुई. मेरा ये नहीं कहना कि आतंकी घटनाएं होने चाहिए थे. मगर जब तक आतंकियों के शिकार आम लोग, गरीब लोग होते रहे तब तक सरकार की नींद नहीं खुली. पर जैसे ही आतंकियों की पहुंच अमीरों तक पहुंची सरकार की आंखे खुली की खुली रह गई. सोचा, यार जब तक ये गरीबों को निशाना बनाते थे तब तक ठीक था पर इनकी पहुंच तो हमारे गिरेबां तक होने लगी. काश सरकार की नींद तब खुल गई होती जब दिल्ली, यूपी, मुंबई की आम जनता आतंकियों के निशाना बने. आज हम 26/11 की वर्षगांठ नहीं मना रहें होते और ना ही हमारे जांबाज़ जवान हमसे दूर होते और न ही उन आंखों में आंसू होते जिन्होंने अपने को खो दिए.
ज़ुबैर साहब, चाँद अशआर आपकी नज़र कर रहा हूँ-
भर चुके ज़ख्मों को अब फिर न खरोचा जाए
इस नए दौर में कुछ हट के भी सोचा जाए
पुत रहीं फिर से हैं दीवारें सियाह रंगों से
हुकमरानों से कहो इनको तो पोछा जाए..
हकीकत में यह मुंबई पर न होकर राष्ट्र की अस्मिता पर हमला था और इस दौरान हमारे नेता और मीडिया ने जो तेवर दिखाए वह अपने आप में सवालिया निशान खड़े करते हैं. आप जैसे पत्रकारों की बदौलत ही सही मायनों में पत्रकारिता सांस ले पा रही है. यह अच्छी बात थी कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस घटना को स्थान मिला लेकिन जिस ग़ैर जिम्मेदाराना ढंग से मीडिया ने चरमपंथियों तक पाकिस्तानी आकाओं के ज़रिए पल-पल की ख़बरें पहुंचाई वह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ था. अगर सीधी घटनाओं का प्रसारण चरमपंथियों तक न पहुंचता तो शायद यह मुठभेड़ जल्दी खत्म हो सकती थी. मीडिया अंधे की लाठी बनकर अपने फर्ज़ से विचलित रहा और अब भी यही हाल है. दुःख इस बात का है कि सरकार का रवैया इस दौरान उदासीन रहा और अब तक भी यह सिलसिला जारी है.
इस घटना को याद रखना बेहद ज़रूरी है, जिससे देश के अंदर रहने वाल गद्दारों और बाहरी आंतकवादियों की करतूतें हमें कचोटती रहे.
इस देश में राजाओं की सुधि ली जाती है और आम लोगों के मरने पर किसी को कोई दुख नहीं होता, कोई कुछ सीख नहीं लेता. इस पर सिर पीटने से क्या फ़ायदा. मुंबई हमले से पहले भी सैकड़ों लोग हमलों में मारे गए लेकिन किसी ने उससे सबक क्यों नहीं ली?
26/11 को जो हुआ था वो बेहद दुखद था. 200 लोग मारे गए मगर ख़ुशी इस बात की है जो
इसके ज़िम्मेदार दरिंदे आतंकी थे उन्हें हमारी महान सेना ने मार गिराया और एक को ज़िंदा पपकड़ लिया. पूरा देश आज भी उस घटना को याद करता है तो रोने को दिल करता है कि किस तरह पाकिस्तान से आए दरिंदों ने बेक़सूरों का क़त्लेआम किया. मरने वालों के लिए पूरे देश में शोक सभाएं हुईं और मारे गए को मुआवज़ा भी मिला मगर क्या ऐसा ही दुख देश को तब भी हुआ था जब गुजरात में आतंकियों ने महीनों तक मुस्लिमों का नरसंहार किया था क्या उन आतंकियों को भी ऐसे ही फ़ौज ने मारा था जैसे ताज में मारा.
भारत सरकार ने 26 नवंबर की घटना से कुछ सबक़ लेकर कुछ तरक़्क़ी की है पर लगता नहीं है कि राजनीतिक पार्टियां आतंकवादी हमले पर आभी भी एक-जुट हैं! न ही आतंकवादियों कोई सज़ा मिली है और न ही क़ानून में कोई तबदीली की गई है.
मुंबई की घटना आंखें खोलने वाली थी. आख़िर हम ख़ुफ़िया रिपोर्ट पर कार्रवाई क्यों नहीं कर सके?
आतंकवादी कभी दिलेर नहीं होते.
यह सब भुला देना सरल नहीं है. भूलना भी नहीं चाहीए. बल्कि इस दर्दनाक घटना से हमें कुछ सबक लेना चाहीए. सबक यह है की हम लाख कोशिश करें पाकिस्तान सुधरनेवाला नहीं है. पाकिस्तान के कट्टरपंथी नेतृत्व को पाकिस्तान मिला इस से संतोष नहीं है. उसे पूरे भारत पर नियंत्रण करना है. विभाजन के पश्चात वहाँ नारे लगाए गए थे, ‘हंस के लिया पाकिस्तान लडके लेंगे हिन्दुस्तान’ वहाँ आज भी यही मानसिकता बनी हुई है. आतंकवादिओं को इस उदेश्य से ही प्रोत्साहित किया जाता है. भारत ने कई बार झुक कर बात की पर पाकिस्तान का रवैया वही का वही रहा है. भारतीय नेतृत्व को समझ लेना चाहिए की पाकिस्तान ऐसे मानने वाला नहीं है.
धन्यवाद.