वंदे मातरम् का चाबुक!
भारत से दूर रहकर भी अक्सर खीज होती है कि वंदे मातरम का भूत जब-तब डिब्बे से निकल आता है. यूँ भी कह सकते हैं कि अब यह भूत ना रहकर चाबुक बन चुका है. ये चाबुक कभी ग़ैरमुसलमानों के हाथ में होता है तो कभी मुल्ला मौलवियों के हाथ में.
देवबंद में वंदे मातरम नहीं गाने वाला प्रस्ताव पारित करने की शायद ज़रूरत या कोई प्रासंगिकता नहीं थी लेकिन दूसरी तरफ़ बात ये भी है कि क्या ऐसे किसी प्रस्ताव पर इतनी हाय-तौबा मचाने की ज़रूरत भी थी. मेरे ख़याल से मीडिया ने बिना वजह राई को पहाड़ बना दिया.
लेकिन मैं सोच रहा था कि भारत के मुसलमान अगर वंदे मातरम गा भी दें तो क्या उन पर 'ग़द्दार' होने का शक हट जाएगा, क्या उनकी ग़रीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा, सिस्टम में भागीदारी जैसी समस्याएँ दूर हो जाएंगी.
सिर्फ़ मुसलमानों की बात क्यों की जाए, भारत में पाँच साल से कम उम्र के छह करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, लगभग चालीस करोड़ लोगों को शिक्षा और प्रगति के अवसर मिलना तो दूर की बात है, उन्हें भरपेट खाना नसीब नहीं होता. भारत की पूरी आबादी अगर वंदे मातरम गाकर समस्याओं से छुटकारा पा सकती है तो इससे आसान रास्ता और क्या हो सकता है, लेकिन इसकी गारंटी कौन देगा ?
मुद्दा ये है कि जो लोग वंदे मातरम गाते हैं क्या वे सचमुच देश के लिए वफ़ादार हैं. ये कहना ज़रूरी नहीं है कि ये वफ़ादारी सिर्फ़ सीमा पर दुश्मन के ख़िलाफ़ बिगुल बजाने से ही साबित नहीं होती, देश के भीतर या बाहर रहते हुए भी देश की भलाई के बारे में सोचना और करना ज़रूरी है.
ऐसे लोग आपसे छुपे नहीं हैं जो बेईमानी, भ्रष्टाचार, लोगों के अधिकारों का हनन करके देश को दीमक की तरह चाटकर खोखला कर रहे हैं. ऐसे लोग लोकतंत्र को बदनाम करते हैं. इनमें बहुत से वो विधायक, सांसद, मंत्री और अधिकारी भी शामिल हैं जो हर रोज़ वंदे मातरम् गाते हैं मगर हद दर्जे के भ्रष्ट और बेईमान हैं. भारत में इतना भ्रष्टाचार फैला है कि इससे छुटकारा पाने के लिए उसे पूरी दुनिया में कम से कम 83 देशों से मुक़ाबला करना है. भारत के निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन में भी कम भ्रष्टाचार है.
यदि धर्म को एक तरफ़ रख दें तो भी किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ कोई काम करने के लिए मजबूर करना सीधे-सीधे उसके व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करना है, जिसकी गारंटी उसे संविधान या अंतरराष्ट्रीय संधियों में दी गई है. मैं अगर सिगरेट नहीं पीना चाहता या गोश्त नहीं खाना चाहता या... तो क्या कोई मुझे मजबूर कर सकता है. यहाँ इंग्लैंड के सरकारी स्कूलों में तो किसी धर्म का कोई तराना नहीं गाया जाता यहाँ तक कि महारानी की प्रशंसा वाला राष्ट्रगान भी नहीं क्योंकि बच्चे कहते हैं कि अगर किसी एक धर्म का गीत गाया जाए तो अन्य धर्मों के बच्चों की भावनाओं को ठेस पहुँचेगी.
तो वंदे मातरम् गाया जाए या नहीं, इसका बहिष्कार किया जाए या नहीं और इसे अनिवार्य बनाया जाए या नहीं, इस बहस को छोड़ कर कुछ और रचनात्मक बात पर बहस-मुबाहिसा हो तो क्या सबके हित में नहीं होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
ये हमारे महान देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि ज़िन्दा लोगों को मुर्दा बनाने में कोई कोताही नही होती और मुर्दा मुद्दों को उनकी क़ब्र से निकाल कर ज़िन्दा करने में भी कोई पीछे नही रहता. कभी वन्दे मातरम् तो कभी जिन्ना का भूत हमारे समाज में हो रही बहस को भटकाते रहते है. भूख, भ्रष्टाचार, न्याय,आतंकवाद-नक्सलवाद जैसे आम आदमी से जुड़े मुद्दों तो मानो हाशिये पर ही ठेले जाने की नियति ले कर आए हैं. जनता का व्यवस्था से विश्वास उठ रहा है और हमारा प्यारा देश झूठी समस्याओं के मकडजाल में उलझा अपनी क्षमता से काफी नीचा प्रदर्शन कर रहा है. शायद हम एक और जनजागरण की दहलीज पर खड़े हैं...पर इस बार इंतजार कुछ ज्यादा ही लम्बा है...कुछ ज्यादा ही हताशा भरा है...
यह हमारे देश की विडंबना ही है जब हमें देश की एकता और विकास बनाए रखने मे मद्द करनी चाहिए तब हम धरमवाद, जातिवाद और भाषावाद की राजनीत करके देश के विकास में बाधा खडी कर रही हैं. हमें इस सबसे ऊपर उठकर देश की अखंडता और विकास बनाए रखने मे सहयोग करना चाहिए.
वंदे मातरम् अगर गा भी दे तो हर्ज क्या है? कौन सा हमारा इमान डगमगा जाएगा? वैसे भी इसमें किसी बुत की इबादत करने जैसी कोई चीज़ नहीं है. वंदे मातरम् वतन परस्त होने का एहसास भी दिलाता है. कुरान में इस बात का ज़िक्र भी है कि जिस वतन में रहो वहाँ के उसूलों का पालन करो. वतन का एहतराम करना गुनाह नहीं. बार-बार इस मुद्दे को छेड़कर वक़्त गँवाने से बेहतर होगा अगर हमारे नेता और मौलवी कौम की तरक्की के लिए कोई काम करें.
जनाब, हम सब भारतीय इस तरह का कार्य कर अपना समय, ज्ञान और शक्ति बर्बाद कर रहे हैं. कोई भी बाल शिक्षा, महिलाओं के विकास और महाँगाई पर बात नहीं कर रहा है. इस समय चीनी 40 रुपए प्रति किलो और दाल 95 रुपए प्रति किलो मिल रही है. इन मुद्दों पर क्यों कोई मुसलमान या हिंदू सड़क पर नहीं आ रहा है? हम सब गुलामी की मानसिकता से ग्रसित हैं.
महबूब साहिब अगर मुस्लिम समाज या मज़हब में किसी बात की रोक है तो ये है ज़बर्दस्ती. मैं आप जैसे मीडिया के लोगों को बताना चाहता हूँ कि मेहरबानी करके मज़हब को तमाशा मत बनाएं. अगर इंसान के दिल को दर्द होती है तो इसका हाल इंसान ही जानता है, लेकिन हमारे भाईयों की ज़िद है कि जबतक मुसलमान वंदे मातरम् नहीं गाते हैं तो वो भारतीय नहीं हो सकते. क्या आज़ादी से लेकर मुस्लिम समाज का योगदान सिर्फ़ वंदे मातरम् ना गाने की वजह से ख़तरे में पड़ जाएगा. मेरी अपनी सभी भाईयों से अनुरोध है कि समय रहते इल्ज़ाम ढूँढना बंद करें वरना ऐसा न हो कि ये मज़हब की दीवार इतनी गहरी जाए कि इसमें नई नस्लें दफ़न हो जाए. इसलिए हम सब का फ़र्ज़ है मसलों को खुले दिल से सुलझाने की कोशिश करें.
मुझे लगता है यहाँ मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है कि मुसलमानों को वंदे मातरम् गाना चाहिए या नहीं. यह एक और गंभीर मामले की ओर संकेत देता है कि मुस्लिम जगत में उनका मज़हब सबसे ऊपर है. ध्यान रखना चाहिए कि जीवन के अन्य कई पक्ष भी महत्वपूर्ण हैं. आप उनको धर्म के सामने अनदेखा नहीं कर सकते. यह सभी धर्मों पर पूरा उतरता है. दूसरी बात यह कि क्यों मुल्लाओं के पास इतनी ताक़त है कि वे आम मुसलमानों का जीवन निर्धारित कर सकें? ऐसा क्यों है कि उत्तर प्रदेश के दूरदराज़ इलाक़े में रहने वाले सुहैल हमीद को वही करना है जो मुल्ला कहें? यह बहुत दुख की बात है लेकिन अब भी कई मुसलमान इस बात को मानते हैं.
मुझे यह ब्लॉग बहुत अच्छा लगा. क्या गा लेने से ही ईमानदारी या वतनपरस्ती साबित हो जाती है? भारत में हर तरफ़ महामारी फैली है, भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध का हर तरफ़ बोलबाला है और किसी को किसी की सुध नहीं है. सरकारी काम की तो बात ही क्या है जब तक आप के चप्पल-जूते नहीं घिस जाते तब तक कोई काम नहीं होता. बड़ी बात तो यह है कि कोई काम के लिए न ही कहता है और न ही काम करता है. चाहे जहाँ चले जाओ चारों तरफ़ एक ही चीज़ है-भ्रष्टाचार. शिकायत करो भी तो किस से. पुलिस जनता की हिफ़ाज़त के लिए है लेकिन सब से बड़ी असुरक्षा उन्हीं से है. वंदे मातरम् गा कर इनको सुलझाया नही जा सकता है लेकिन भारत की समझदार जनता इसको लेकर बड़ा विवाद बनाना चाहती है.
महबूब जी, आपने बहुत सटीक लिखा है कि हमारे नेता और मौलवी आये दिन कुछ न कुछ ऐसे मुद्दे उठाते जिन्हें सुनकर ऐसा लगता हैं कि ये लोग चाहते क्या हैं.? जिस देश का अन्न खाते हैं तो उस देश के प्रति कुछ तो सम्मान बनता हैं. "वन्दे मातरम" और "जन गन मन" ये दोनों भारत की आत्मा है. कुरआन में भी इस बात का जिक्र हैं कि जिस वतन में रहो वहां के नियमों का पालन करो, वतन का एहतराम करना गुनाह नहीं है, बल्कि इसमें तो हमे गर्व होना चाहिए. ये लोग ऐसे मुद्दे उठाकर आम जनता का ध्यान दूसरी समस्याओं से हटा देते हैं. आज हमारे देश में लोगों को शिक्षा, अन्न, दवाई और मूलभूत आवशयकता की वस्तुओं की ज़रूरत है. पहली बात तो ये है कि हमे देश की समस्याओं की तरफ ध्यान देकर उनका निराकरण करना चाहिए जैसे बीमारी, कुपोशण, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार आदि. और रही बात किसी को मजबूर करने कि तो देखिये भारत में जितनी "आजादी" उतनी दुनिया के किसी भी देश में नहीं है. यहाँ पर हर तरह की आज़ादी है मसलन "नेता लोगों को जनता के पैसे का दुरुपयोग करने की" "चारा खाने की" "विदेश यात्रा करने की" ये तो कुछ भी नहीं है जनाब अगर पूरी लिखने लगे तो बहुत सी परतें खुल जाएगी.
महबूब जी आपको ये भी सलाह हैं की आप दुनिया के दूसरे देशों से भारत की तुलना नहीं करें, उनकी अलग परम्पराएं है और हमारी अलग. हाँ आपने ये बात बहुत अच्छी कही है कि इन मुद्दों को छोड़कर कुछ और रचनात्मक बात पर बहस होनी चाहिए. देश की समस्याओं के बारे में सोचा जाना चाहिए. और भ्रष्टाचार में मामलों में तो हमारा देश आगे हैं. आप किसी भी दिन का समाचार पत्र देख लीजिये फलाना नेता घूंस लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. ऐसे वाकयों से हमारे समाज पर, आम इंसान पर क्या प्रभाव पड़ेगा? किस तरह से वो इन नेताओं पर विश्वाश करेगा...? आप देखेंगे कि ऐसे नेता देश की संसद में हंगामा खड़ा करते है, जिन प्रश्नों को सरलता से सुलझाया जा सकता हैं उनके लिए पूरे दिन सदन की कार्यवाही ठप कर देते हैं. आपको यहाँ पर ये भी बताना चाहूँगा कि संसद की बैठक पर एक मिनिट का खर्चा 26 हज़ार रुपये आता है, यानी एक घंटे का खर्चा 15 लाख 60 हज़ार रुपये, तो क्या ये जनता के पैसे का "सदुयोग" है....?
मोहम्मद सुहैल हमीद, अगर आपको वंदे मातरम् से कोई एतराज़ नहीं है तो आप इसे गाएँ और ज़ोर-ज़ोर से गाएँ. लेकिन क्या मैं पूछ सकती हूँ कि इसे ज़बरदस्ती किसी से भी गवाया जा सकता है? क़ुरान ने यह भी नही कहा है कि तुम दूसरों की नक़ल इसलिए करो ताकि तुम्हारा फ़ायदा हो. मेरा मानना है कि आपको एक बार फिर यह लेख पढ़न चाहिए. आप लिखते हैं,.... " वंदे मातरम् अगर गा भी दे तो हर्ज क्या है? कौन सा हमारा इमान डगमगा जाएगा? वैसे भी इसमें किसी बुत की इबादत करने जैसी कोई चीज़ नहीं है. वंदे मातरम् वतन परस्त होने का एहसास भी दिलाता है. " इसका मतलब है कि वंदे मातरम् गा लेना वतनपरस्ती की गारंटी है. आप से गुज़ारिश है कि अपने विचार अपने तक ही रखें.
महबूब साहब, इसमें क्या ग़लत है यदि कोई मुसलमान देशभक्ति का गीत गा लेता है? आपके लेख में मुसलमानों की तरफ़दारी की गई है. यदि आप अपने देश से अपनी माँ की ही तरह प्रेम करते हैं तो आपको देश की भावनाओं का भी आदर करना चाहिए. इस मामले को राजनीतिक रंग मत दीजिए.
महबूब साहब शायद आप ये कहना चाहते हैं कि वंदे मातरम् गाना ही किसी व्यक्ति की देश से वफ़ादारी का एक मात्र मापदंड़ है और यही हर समस्या का सामाधान है. इसी प्रकार मैं यह कह सकता हूं कि वंदे मातरम ना गाना ही सारी समस्याओं का हल है. आज बात वंदे मातरम् की है कल को यह जन-गण-मन और जय हिंद हो सकता है. एक भारतीय होने के नाते हमें संविधान का पालन करना चाहिए. हमारा संविधान कहता है कि वंदे मातरम जन गण मन के बराबर है.
महबूब साहब, इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद यही लिखने का मन हुआ कि इतिहास गवाह है धर्म इंसान को बहुत कमज़ोर बनाता है. इस सुंदर से संसार को नरक की भट्टी जैसा रूप अगर किसी ने दिया है तो वो धर्म है और धर्म के पीछे इंसान है. इस धर्म के चक्र में अनगिनित युद्ध हुए, अनगिनित जिंदगियाँ मौत के हवाले हुईं. कई देशों के विभाजन हुए तो कई देश दुनिया के नक्शे से ग़ायब हो गए. सुंदर हसीन वादियाँ इंसानों की लाशों से पटी पडीं हैं. आखिर क्यों? पाक-पवित्र दिलों में नफ़रत और द्वेष के बीज धर्म ने बोए. इतना ज़रूर हुआ है कि धर्म ने एक जैसे लहू के रंग व् गुण के होते हुए व्यक्ति से व्यक्ति को अलग पहचान दी व धर्म के ठेकेदारों को दुकान चलाने का ज़रिया दिया. वन्दे मातरम के बहाने हर तरह के तथाकथित धर्म रक्षकों को बैठे बिठाए यहाँ वहां अपनी -अपनी वाक्पटुता में महारत सिद्ध करने का मौक़ा मिल गया. यह समझ पाना आज तक कठिन है कि जब सूरज -चाँद ,धूप -छाँव की कोंई जात-पात व धर्म नहीं तो इंसान कैसे बंट गया. देश-प्रेम कोई दिखाने की चीज़ नहीं वो भी अपने ही देश में? यह कैसी धर्म निर्पेक्षता का स्वांग रचा जा रहा है. जो जिस आदमी का काम है वह न करके बाकी सब कुछ करने में इतना डूबा हुआ है कि अपने असली फर्ज़ से अनजान बना हुआ है. राष्ट्र-भक्ति के लिए भी अब धर्म गुरुओं से प्रमाण-पत्र लेना होगा. कुछ तो फ़र्क़ होना चाहिए नेताओं व धर्मगुरुओं में ,क्योंकि धर्म बहुत ही नाज़ुक नस है जिसको दबाते ही दुनिया में काया पलट होता आया है और शायद दुनिया के अंत तक होता रहेगा. धर्म ही दुनिया की फ़ना का कारण बनता नज़र आ रहा है, ज़रिया भले कोई भी हो. आज का मीडिया भी धर्म के नाम पर होने वाले मुद्दों में खूब खाद-पानी डाल रहा है.
मेरे विचार से सुहैल हलीम को उदारवादी होने का इनाम दिया है तानिया अरोड़ा ने... तो कैसा महसूस कर रहे हैं सुहैल साहब आप? मैं यह जानना चाहता हूं कि भारतीय मुस्लिम को अपनी वफ़ादारी किसको दिखानी है? यह हमारा वतन है, यहां सब बराबर हैं, हिंदुस्तान किसी की जागीर नहीं जो यहां किसी को अपनी वफ़ादारी सिद्ध करने के लिए जान देनी पड़े.
दिखा दिया न कि मैं मुसलमान हूँ. अरे धर्म से ऊपर देश होता है.
आपने वंदे मातरम् का मुद्दा तो उठाया है लेकिन उलेमा के बाक़ी फ़तवों के बारे में कुछ नहीं कहा. कैसी विडंबना है कि वंदे मातरम् के सामने बाक़ी मुद्दे कम पड़ जाते हैं. ज़रा उनपर भी ग़ौर करें और कोई लेख लिखें. पहली बात यह है कि मुल्ला-मौलवी और साधु-संतों को लोगों के लिए क़ानून बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए. अगर किसी को क़ानून बनाने का अधिकार है तो वह लोक-सभा, राज्य सभा और विधान सभा है. अगर मुल्ला-मौलवी और साधु-संत के फ़तवों पर देश चले तो ऐसे ही लड़ते रहेंगे.
वंदना न तो उपासना है और न ही अराधना. वंदना सिर्फ़ तारीफ़ है. अधिकतर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान इसी पर आधारित हैं, चाहे वह ईरान का हो या मलेशिया, ब्रिटेन या सऊदी अरब का. इसलिए इस्लाम के नज़रिए से इसके गाने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसमें किसी के सामने सिर झुकाने जैसी कोई बात नहीं है. यहां एक बात उल्लेखनीय है कि इसकी पृष्टभूमि आनंद मठ है जिसका यह गीत एक हिस्सा है. आनंद मठ देश की एकता और अखंडता के हित में नहीं है. बहस इसकी पृष्टभूमि पर होना चाहिए. वंदे का गायन ग़ैर-इस्लामी नहीं है. हिंदी में आनंद मठ मौजूद है पहले उसे पढ़ें फिर कोई टिप्पणी दें.
वैसे तो हज़ारों मुद्दे हैं पर हर की याद वंदे मातरम गाने या न गाने से क्यों जुड़ गई? देश-प्रेम को हर धर्म से पहले और अलग रखा जाए. जब यह गीत रखा गया तो सय मसला नहीं उठा था तो फिर अब क्यों?
वैसे तो नमाज़ पढ़ना और पूजा करना भी किसी के अच्छे इंसान होने का सबूत नहीं है. वंदे मातरम का गाना सच में इस बात का प्रमाण-पत्र नहीं कि वह देश भक्त है. लेकिन वंदे मातरम का विरोध सच में एक कट्टर मानसिकता का परिचय देता है. यह वही लोग हैं जो अपने अधिकारों के लिए चिल्लाते हैं और जिस देश में यह बहुमत में हैं वहा यह दूसरे लोगों के अधिकारों का हनन करते हैं. ये कट्टर मानसिकता जो हर देश हर समाज के लिए विनाशकारी हैं. वंदे मातरम का विरोध सरासर ग़लत है.
यहां मैं यह याद दिलाना चाहुंगा कि हमें अपनी टिप्पणी देने से पहले यह पता कर लेना चाहिए कि वंदे मातरम की हर पंक्ति का मतलब क्या है. भारत एक धर्म निर्पेक्ष देश है लेकिन इसमें दुर्गा और लक्ष्मी के प्रति निष्ठा प्रकट की गई है. मुसलमान अपने देश की धरती को मां के समान प्रेम करते हैं लेकिन पूजा करते हैं सिर्फ़ उसकी जो इस धरती का ही नहीं बल्कि सारे ब्रहमांड का रचयिता है.
मुझे तानिया अरोड़ा की टिप्पणी पर कुछ कहना है. अगर हम मुद्दे के अंदर झांके तो पता चलता है कि यह सिर्फ़ मुसलमानों के वंदे मातरम गा कर अपनी वफ़ादारी सिद्ध करने की बात नहीं है. इसके गाने से देश के प्रति वफ़ादारी सिद्ध नहीं होती, उदाहरणस्वरूप सरकार में हमें अपने प्रतिनिधियों को देखना चाहिए. वह गांधी की तस्वीर के नीचे हर काम करते हैं. अगर मुसलमान इसे गाते हैं और जीवन के दूसरे पहलू में भी सहिष्णुता दिखाते हैं तो ग़ैर-मुस्लिमों के दिल में उनकी छवि के प्रति बदलाव आएगा. इससे सामाजिक सदभाव को बढ़ावा मिलेगा. वंदे मातरम के गायन को व्यापक संदर्भ में देखने की ज़रूरत है सिर्फ़ देश से वफ़ादारी के प्रमाण के तौर पर नहीं.
मेहबूब साहब ये भारत है यहां पर इस तरह के कई डब्बे रखे हुए हैं जिनमे अलग-अलग तरह के भूत बंद है, इन डब्बों पर बाक़ायदा निर्देश लिखे हुए हैं कि किस भूत को कब बाहर निकालना है, और हमारे नेताओं को अपने फ़ायदे के लिये जब किसी भूत की ज़रूरत होती है उस भूत वाला डब्बा खोल लिया जाता हैं अगर खुद नही खोलते बनता तो किसी और से खुलवा लेते है. कभी हिंदू धर्म गुरूओं से कभी मुस्लिम मौलवियों से, ये छोटे छोटे भूत बड़े काम के हैं इनका इस्तेमाल कई बार बड़े भूतों पर से ध्यान हटाने के लिए भी किया जाता है.
रही वंदे मातरम की बात तो एकेश्वरवाद की सबसे बड़ी समस्या ये है कि आप आदर सारे खुदाओं और देवी देवताओं का कर सकते हैं पर अराधना आपको एक ईश्वर की ही करनी होती है. आप या कई और लोग दलील दे सकते हैं कि कहने में क्या हर्ज है, तो साहब मुसलमानो का सब कुछ कहने पर ही आधारित है जब कोई व्यक्ति इस्लाम क़बूल करता है तो उसे सबसे पेहले ये केहना होता है कि "मैं गवाह हूं कि सिवाए एक खुदा के कोई और खुदा नहीं है" ये इस्लाम का आधार है, शायद इसलिए ही मुसलमानो के लिए देश माता पिता गुरू या कोई भी आदरणीय तो हो सकते हैं पर पूज्यनीय सिर्फ़ खुदा होता है, आप फ़िर कहेंगे भई कहने में क्या हर्ज है तो मै पूछूंगा क्या आप या दूसरे लोग सिर्फ़ कहलवाना चाहते है?
वंदे मातरम न गाने पर मुसलमानों की वफ़ादारी पर सवाल उठाने वालों की अक़्ल पर आदरपूर्वक सवाल उठाने का दिल करता है, क्या किसी चीज़ या वयक्ति के लिए प्रेम दर्शाने के लिए उसको पूज्यनीय बताना ज़रूरी है? क्या पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन इन सबको हम प्यार आदर और सम्मान नही देते? तो क्या हमें उनके प्रति प्रेम और आदर भी एक तरीक़े से ही दिखाना चाहिए? मसलन काम पर जाने से पेहले पत्नी के पैर छूकर उससे आशीर्वाद ले लिया जाए. वर्ना वो ये सोचेगी के आप माता जी को ज़्यादा प्रेम करते हैं.
राई को पहाड़ बनाने मे एक मिनट भी नहीं लगता साहब, अपने स्कूल और कालेज के दौर में दिल पर हाथ रख कर "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" गाया है, और उसे दिल से मेहसूस किया है, और आज जब विदेश में हैं तो और ज़्यादा मेहसूस कर रहे हैं. अब अगर कोई चाहे तो इस पर भी फ़तवा निकलवा दे कि काबा हिंदोस्तान में नही है इसलिए इसे सारे जहां से अच्छा केहना कुफ़्र है.
एक रोज़ फ़िल्म काबुली वाला का वो गाना "ऐ मेरे प्यारे वतन" सुनते सुनते बरबस आंखों से आंसू लिकल पड़े, दोस्तों ने देखा तो कहा सच है यार बाहर आओ तो देश की ज़्यादा ही याद आती है पर मालूम अगर तुझे अभी कोई वी.एच.पी, बजरंग दल या आर.एस.एस. वाला ऐसे रोते हुए देखेगा तो यही कहेगा कि --- ढोंग कर रहा है.
और मुझे भी लगता है कि मेरा दोस्त सही केह रहा था, भारतीय मुसलमान आतंकवाद के खिलाफ़ लेक्चर दे या पाकिस्तान के खिलाफ़ सचिन के छक्के पर ताली बजाए या शाहिद आफ़रीदी के उड़ते हुए विकेट पर सीटी मारे बाज़ू में बैठे हुए कई भाइयों को यही लगता है कि नाटक कर रहा है. यानी शक की जड़ें बहुत गहरी हैं और जब-जब ये सूखने लगती हैं कोई न कोई आकर इसमे ढेर सारा पानी डाल जाता है.
वंदे मातरम गाने से किसी को राष्ट्र भक्ति का प्रमाण-पत्र भले न दिया जा सके पर वंदे मातरम गाने से इनकार करने पर सम्बंधित व्यक्ति की राष्ट्र भक्ति अवश्य शंका के दायरे में आ जाती है. मान्यवर मोहम्मद पैग़म्बर साहबने भी अपने अनुयाइओं को अपने देश के प्रति वफ़ादार रहने का आदेश दिया है. हाँ जिन्हें राजनीति की दूकान चलानी है, उन्हें एतराज़ हो सकता है. मुसलमानों को मत की मशीन माना जाता है. यह मशीन बिगड़ न जाए इसलिए उन्हें शिक्षा से वंचित रखा जाता है. जो मुसलमान दुन्यवी शिक्षा प्राप्त करते है उनमें से ज़्यादातर व्यवहारिक होते हैं और वंदे मातरम गाने से इनकार नहीं करते. कुछ लोग जानते है कि मुसलमान पढ़ेंगे तो मत के दलालों के झांसे में नहीं आएंगे. चुनाव के समय बड़े पयमाने पर मतों का सौदा करनेवाले वंदे मातरम जैसे मुद्दों को लेकर मुसलमानों को बाकी समाज से अलग रखने के हथकंडे अविरत अजमाते रहते हैं.
आम मुसलमान को अपनी रोजी रोटी के अलावा और कोई दिलचस्पी नहीं है. उन के पास इन सब बालों के लिए समय भी नहीं है. पर मत दलाल धार्मिक भावनाओं को उतेजित कर ऐसी बातों में उलझाते रहते है. सरकार में बैठे राजनीतिक दल को इस में मज़ा आता है वे जान बूझ कर मुसलमानों को शिक्षा से वंचित रखते हैं ऐसा मुझे लगता है. यद्यपि मुसलमान अब धीरे-धीरे यह सब समझने लगे है. और आवाज़ भी उठाने लगें है. कई जगहों पर मुसलमानों ने वंदे मातरम् का समूह गान करके सूझबूझ का परिचय दिया है.
महबूब साहब आपने बहुत अच्छा लिखा है कि अगर भारत के मुसलमान वंदे मातरम गा भी लेते हैं तो क्या उससे उनके ग़द्दार होने का शक मिट जाएगा. और आप ने इंग्लैंड के स्कूलों में किसी मज़हब के गीत न होने का जो उदाहरण दिया है मेरे विचार से भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए.
बिना समझे टिप्पणी देना उचित नहीं है प्रिया जी, वास्तव में महबूब साहब न तो इस मद्दे का समर्थन कर रहे हैं और न ही इसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं बल्कि वह कहना चाहते हैं कि और भी बड़े मुद्दे हैं जिनकी ओर ध्यान जाना चाहिए मगर नहीं जाता है. आप जैसे लोग भारत को नीचा दिखाते हैं. आपने महबूब साहब पर बड़ी सहजता से टिप्पणी कर दी क्योंकि वह मुसलमान हैं अगर यही चीज़ कोई ग़ैर-मुस्लिम लिखता तो क्या आप उसके बारे में भी यही कहतीं?
मुसलमानों को अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए वंदे मातरम गाने की ज़रूरत नहीं है. हमें अपने देश से प्यार करने के तरीक़े बताने की भी ज़रूरत नहीं. अगर देखा जाए तो भारत को एक इकाई में पिरोने का कारनामा मुसलमानों का ही है और अब यह कैसी विडंबना है कि उन्हें ही वफ़ादारी साबित करनी पड़ रही है.
मेरे विचार से हम इसपर बहस कर रहे हैं कि यह ठीक नहीं है क्योंकि यह बहस का मुद्दा ही नहीं है. वैसे में ऐसे कई नेताओं को जानता हूं जिन्हें पूरा वंदे मातरम आता ही नहीं है. बस बात समाप्त.
वंदे मातरम् एक राष्ट्रीय गीत है और कुछ नहीं.
हिंदुस्तानी मुसलमान ने अपनी वफ़ादारी का सबूत हर मौक़े पर दिया है और देते रहेंगे, ये मुद्दा सिर्फ़ राज नेताओं तक महदूद है और अकसर अवाम ऐसा नहीं सोचती. वैसे हमारी नेता को भी सोचना चाहिए कि राज नेता ऐसी बात न कहें जिससे नफ़रत पैदा हो.
यह मेरा आप सबसे विनम्र अनुरोध है कि , खान, सऊदी अरब द्वारा की गई टिप्पणी पढ़ें. यह सबसे अच्छा जवाब है. वंदे मातरम् देशभक्ति की बात नहीं है, यह कुछ बुनियादी मान्यताओं के ख़िलाफ़ है. तथ्य यह है कि कोई भी मुसलमान किसी भी देशभक्ति के गीत पर कोई आपत्ति नहीं पाता है लेकिन वंदे मातरम् अलग है. मैं जन गण मन से प्यार करता हूँ, और मुझे हर एक देशभक्ति के गाने से प्यार है. लेकिन, वंदे मातरम् 'ईश्वर एक है' के ख़िलाफ़ जाता है. एक और बात, इस्लाम देशभक्ति को प्रोत्साहित करता है. 'कोई मुस्लिम उस वक़्त तक अच्छा मुसलमान नहीं है' अगर वह देशभक्त नहीं है.
अमित जी यह सिर्फ़ मुस्लिम की बात नहीं है अगर मुस्लिम की बात होती तो मुंबई में हिंदी का विरोध करने वाले तो मुस्लिम नहीं हैं.
कृपया बेतुके मुद्दों की वजह से मुसलमान भाइयों पर शक न करें. हर समय, हर मोड़ पर वे उतने ही भारतीय रहे हैं जितने हम हिंदू भाई. यदि भगत सिंह पर हम फ़ख्र करते हैं तो अशफ़ाक़ पर भी उतना ही करते हैं. यदि हमारे हिंदू राष्ट्रपतियों ने देश का मान बढ़ाया है तो भूतपूर्व राष्ट्रपति अबुल कलामजी ने हर ओर भारत का परचम फहराया है. वंदे मातरम् को मुद्दा बनाकर उसकी साख कम न होने दें. हमें मुसलमान भाइयों की देशभक्ति पर फ़ख्र है. हमारे पास और भी कई चुनौतियां हैं जिनका हमें मिलजुल कर सामना करना है. और सबसे पहले ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें हम पर नेताओं के विचार इस हद तक असर न करने पाएं और हम लगातार राष्ट्र विकास के अपने कार्य में जुटे रहें, समय पर टैक्स अदा करें, और ऐसे भड़काउ मुद्दों पर अपने कान न दें.
वन्दे मातरम् हर नेता को यह याद दिलाने के लिए कि आपका पहला कर्त्तव्य राष्ट्र विकास के मुद्दों पर पूरा ध्यान देना है, भ्रष्टाचारियों में अन्यों का नाम आने पर उतना दु:ख नहीं होता जितना उनका नाम आने पर, क्योंकि वे हमारा नेतृत्व कर रहे हैं. फिर क्यों समय समय पर हमारी भावनाओं पर कोड़े पड़ते रहते हैं.
वन्दे मातरम् हर नेता को यह याद दिलाने के लिए संपूर्ण भारत आतंकवाद की भट्टी में जल रहा है. हम गांधी के अनुयायियों को किस बात की सज़ा मिल रही है. हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करें.
वन्दे मातरम् हर नेता को यह याद दिलाने के लिए कि नक्सली भारत के ही नागरिक हैं और नक्सलवाद के प्रति उनके आकर्षण की वजह है दूरदराज़ के गांवों में अपर्याप्त विकास. आप उनका यथोचित विकास करके उन्हें संतुष्ट करें. अंत में मेरे किसी शब्द से कहीं किसी आम भारतीय की कोई भावना आहत हुई हो तो क्षमा चाहूंगा.
एक बात कहना चाहता हूं, ख़ास तौर से अमित शर्मा से क्योंकि उनका मानना है कि "देश धर्म से ऊपर होता है" मेरे विचार से यह बात एक दम ग़लत है. मेरा तर्क है कि इंसाद देश से नहीं होता बल्कि देश इंसानों से होता है. अच्छे इंसान का मतलब है अच्छा देश. बुरे इंसान मतलब बुरा देश. और अच्छा इंसान होने के लिए आपको किसी धर्म का पालन करना ही पड़ता है, चाहे वह कुछ भी हो.
आपने बड़ी वाजिब बात कही है. हम किस आधार पर स्तुतिगान करने में लगे हैं जबकि देश की आधी जनसंख्या अपनी पीड़ा में ही दबी पड़ी है. वैसे वंदे मातरम गाने वालों ने कौन सा गुल खिला दिया है. उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर और भारत माता के पूजन के नाम पर सिर्फ़ ईर्षा और विष की राजनीति करते हैं.
वाह, बहुत ख़ूब, आप सबने अपने अपने तर्क दिए चलिए मैं बात को समाप्त करता हूँ. हमारे देश की आधी जनता साक्षर भी नहीं है, तो उसे पहले तो स्कूल में लाएं फिर जो चाहे पढ़ाएं. आधी जनता भूखी है. पहले उसे खिलाएं फिर जो चाहे पाठ पढ़ाएं. आधी जनता बीमार है पहले उनकी चिकित्सा का इंतिज़ाम करें फिर जो चाहें कहें. किसी ने क्या ख़ूब कहा है.
हमीं जब न होंगे तो क्या रंगे-महफ़िल
किसे देख कर आप शरमाइगा
भाई अगर इस देश की आधी जनता वंदे मातरम जानती ही नहीं है, और एक चौथाई को लगता है कि वह उसके धर्म के विरुद्ध जाता है तो आप लोगों को क्या लगता है कि उसे बदल नहीं देना चाहिए. इस देश में इतने पढ़-लिखे समझदार लोग हैं, शायर हैं कवि हैं. क्या वह एक नया राष्ट्रगीत नहीं लिख सकते. देश के निर्माण के लिए एक नए राष्ट्रगीत लिखवाने की कोशिश करनी चाहिए. लोग कुछ तो सकारात्मक करें.
सबसे पहले मैं कहना चाहूँगा कि किसी को कुछ करने या नहीं करने के लिए उस पर दबाव डालना ठीक नहीं है. दूसरा, हमें संविधान का पालन करना चाहिए और हर भारतीय को उसका सम्मान करना चाहिए. कुछ लोगों की ग़लतियों को पूरे समुदाय के ऊपर थोपना ठीक नहीं है. हमें यह समझना होगा कि हमारे नेता सिर्फ़ अपनी भलाई चाहते हैं उन्हें आम जनता से कुछ लेना-देना नहीं है.
एक शेर याद आ रहा है जो यहाँ पर फिट बैठता है उनके लिए जो इस बहस में पड़े हुए हैं.
एक शख़्स चिल्ला रहा था; जुल्मो सितम का मारा
सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ता हमारा.
वंदना और अराधना में फर्क़ होता है. यहाँ पर मामला एकेश्वरवाद या मूर्तिपूजा का नहीं है. इस मामले की तह में जाना जरूरी है. आनंद मठ बिना पढ़े इस पर हो हल्ला हो रहा है. सभी राष्ट्रगान में देश और धरती की प्रशंसा ही होती है. आनंद मठ का जोर देश की एकता पर है. इस गान में जहाँ पर भारत माँ की तुलना दुर्गा और सरस्वती से की गई है उस भाग को वंदे मातरम से पहले ही हटा दिया गया है.
जनाब मेरी आप से गुज़ारिश है कि अपनी राय देने से पहले आप समझें कि इस्लाम में अल्लाह के इलावा किसी की भी पूजा वंदना जायज नहीं है. ये सच है के जिस मुलक में रहो वहां के कानून की पैरवी करो लेकिन जो कानून आपके बुनियादद से टकराती हो वो नहीं.
मैं इस ब्लॉग से बिलकुल इत्तेफाक रखता हूँ कि और भी बड़ी वजहें है बहस के लिए फिर इन गैर ज़रूरी बातों में वक़्त क्यों बर्बाद किया जाए.
समस्या ये है कि क्यों मुसलमान अभी तक किसी मौलवी के फतवे को अपने विवेक से उपर मानते हैं, क्या कोई ऐसी टीम सहज ढंग से खेल पाएगी जिसके कुछ मेम्बर अपने खेल के लिए कही और से भी निर्देश पाने की अपेक्षा रखते हों. अगर कोई लाल कपड़े देख कर चिढ़ता है तो उसको दुनिया से लाल कपड़े खत्म करने की जगह अपनी आदत ठीक करनी चाहिए, नहीं तो चिढ़ाने वाले फ़ायदा उठाते ही रहेंगे.
अगर फ़र्क़ नहीं पड़ता है तो नहीं कराना चाहिए. वैसे भी क़ुरान को मानने से भी ग़रीबी नहीं गई, अशिक्षा नहीं गई तो उसको भी छोड़ देना चाहिए. बराबर है ना भाई?
मेरे ख़याल से राष्ट्रगान 'जन गण मन' तो सभी गाते हैं तो फिर वंदे मातरम् की ज़रूरत ही क्या है. इसके अलावा अगर कोई और गीत चाहिए देश को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए तो इक़बाल का लिखा हुआ -'सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्ताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा' को क्यों ना अपना लिया जाए. यह भारत की धर्मनिर्पेक्ष भावना का आदर करते हुए बख़ूबी देश का गुणगान करता है. ये बात यहाँ बार-बार कही जा चुकी है कि भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म का मूलाधिकार दिया गया. इसका साफ़ अर्थ है कि किसी भी नागरिक को उसके धर्म के विरुद्ध आचरण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. होना तो यह भी चाहिए कि किसी सरकारी समारोह या प्रक्रिया में कोई भी धार्मिक प्रतीक या प्रथा नहीं शामिल होनी चाहिए जबकि अनेक सरकारी समारोहों में हिंदू प्रथाओं का इस्तेमाल किया जाता है, क्यों? जब देश धर्मनिर्पेक्ष है तो सरकारें और उनका आचरण भी तो धर्मनिर्पेक्ष होना चाहिए.
इससे ज़रा हटकर बात करें तो ये भी तो सोचें कि भारतीय पुलिस उसी क़ानून पर काम करती है जो अंग्रेज़ों की हिफ़ाज़त के लिए बनाया गया था. आज भी पुलिस सिर्फ़ ताक़तवर और सत्तासीन लोगों की हिफ़ाज़त के लिए काम करती है, आम आदमी पर जब चाहे, यूँ ही डंडा घुमा देती है. भारतीय लोग इस सिस्टम को बदलने के बारे में क्यों नहीं सोचते जहाँ हर नागरिक का एक मूलभूत सम्मान हो और कोई भी सरकारी अमला नागरिक के आत्मसम्मान को हानि ना पहुँचा सके. मुद्दा ये ही है कि भारत में एक नागरिक के तौर पर आम आदमी के आत्मसम्मान की कोई क़द्र ही नहीं है. पश्चिमी देशों से अगर कुछ सीख सकते हैं तो वो ये कि वहाँ नागरिकों के अधिकारों में कोई यूँ ही दख़ल नहीं दे सकता, चाहे वे अधिकार किसी भी तरह के हों.
मेरे ख़्याल से मुस्लिम धर्म अपने लोगों को भी विवेक से सोचने की आज़ादी नहीं देता. इसलिए ये लोग कुरान और मुल्लाओं की बातों का अंधानुकरण करते हैं.
जब कभी इस तरह की बात उठाई जाती है तो समझ लीजिए इसके पीछे कोई गहरी साज़िश चल रही है. संसद में बात जब महंगाई की उठने वाली हो लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट लीक हो जाती है, जब देवीलाल विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए चुनौती बनते हैं तो मंडल कमीशन की रिपोर्ट से धूल झाड़ दी जाती है, और जब राजनीति के हाशिए पर पहुंचने का डर हो तो बाबरी मस्जिद पर हमला बोला जाता है. वंदे मातरम पर विवाद भी पूरी तरह प्रायोजित है समाज को बांटने वाली घिनौनी राजनीति का सड़ा गला हिस्सा है. इससे देशभक्ति के नाम पर धर्म की राजनीति करने वालों को तुरूप का पत्ता नज़र आता है. मैं निजी रुप से इस बात पर क़तई विश्वास नहीं कर सकता कि मुसलमानों को ख़ुद को देशभक्त साबित करने के लिए किसी भी अग्नि परिक्षा से गुजरने की ज़रूरत है.
भई वाह. आपने कितनी चतुराई से भारत के राष्ट्र गीत वंदेमातरम को धर्म से जोड़ दिया. मैं आपको याद दिलाना चाहूँगा कि ये वही गीत है जिसे आज़ादी की लड़ाई में सभी भारतीयों ने एक साथ गाया था. उस समय न तो कोई मुसलमान था और न ही कोई ग़ैर मुसलमान. फिर आज इस विभाजन की आवश्यकता क्यों है. मेरा मानना है कि सरकार को सभी भारतीयों के लिए वंदे मातरम गाना अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि हममें राष्ट्रीयता की भावना बनी रहे.
महबूब साहब, आपने बहुत खूब फ़रमाया है. वंदेमातरम के अलावा हिंदुस्तान में और भी बहुत सारी समस्याएं हैं. यही कारण है कि आज वो कुर्बानियां जाया जा रही हैं, जिनमें हिन्दुओं का भी खून बहा और मुसलमानों का भी. जब-जब देश को ज़रूरत आन पड़ी दोनों ने अपने लहू बहाए. अफ़सोस की बात ये है कि मुस्लिम भाइयों को बार-बार अपनी वफ़ादारी साबित करनी पड़ती है. जिस धर्म को जोड़ने का काम करना चाहिए आज वो बाँट रहे हैं. फतवा जारी करने की ज़रूरत है तो विकास के लिए और सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए किया जाए. हाँ एक सवाल और क्या मज़हब मुल्क से बड़ा होता है, यह हमें तय करना है कि परिवार, समाज, राष्ट्र में हम किसे तवज्जो देते हैं. धर्म के ठेकेदारों को यह समझना होगा कि फसाद खड़ा करने के बजाय अगर दिलो को जोड़ने, भूखों का पेट भरने, जलालत और जहालत मिटाने में अपनी रूचि दिखाएँ तो ये सच्ची देशभक्ति होगी.
आए दिन हम कुछ ना कुछ मुद्दे में उलझते जाते हैं. कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर तो कभी नस्ल के नाम पर. जिसे देखो कुछ न कुछ बोलता रहता है चाहे कुछ मालूम हो न हो. मातृभाषा बोलने वाला मार खाता है और मारने वाला देशभक्त कहलाता है, आज हमारी यही पहचान बन गई है. जर्मनी की दीवार टूट गई लेकिन हम देश का बटवारा करने पर तुले हैं.
ग़रीबी और पिछड़ेपन के लिए मुसलमान ख़ुद ही ज़िम्मेदार है. साथ ही उनकी कट्टरवादी सोच भी ज़िम्मेदार है. सबसे पहले उन्हें मुल्लाओं की गिरफ़्त से बाहर आना चाहिए. भारतीय समाज किसी के बीच भेदभाव नहीं करता और न हीं करेगा.
महबूब जी, इसमें क्या ग़लत है यदि कोई मुसलमान देशभक्ति का गीत गा लेता है? आपके लेख में मुसलमानों की तरफ़दारी की गई है. यदि आप अपने देश से अपनी माँ की ही तरह प्रेम करते हैं तो आपको देश की भावनाओं का भी आदर करना चाहिए. इस मामले को राजनीतिक रंग मत दीजिए.
भई वाह. आपने कितनी चतुराई से भारत के राष्ट्र गीत वंदेमातरम को धर्म से जोड़ दिया. मैं आपको याद दिलाना चाहूँगा कि ये वही गीत है जिसे आज़ादी की लड़ाई में सभी भारतीयों ने एक साथ गाया था. उस समय न तो कोई मुसलमान था और न ही कोई ग़ैर मुसलमान. फिर आज इस विभाजन की आवश्यकता क्यों है. मेरा मानना है कि सरकार को सभी भारतीयों के लिए वंदे मातरम गाना अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि हममें राष्ट्रीयता की भावना बनी रहे.
ग़रीबी और पिछड़ेपन के लिए मुसलमान ख़ुद ही ज़िम्मेदार है. साथ ही उनकी कट्टरवादी सोच भी ज़िम्मेदार है. सबसे पहले उन्हें मुल्लाओं की गिरफ़्त से बाहर आना चाहिए. भारतीय समाज किसी के बीच भेदभाव नहीं करता और न हीं करेगा.
लगभग सौ साल पहले बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना की थी. स्वतन्त्रता संग्राम के समय यह गीत क्रांतिकारियों और देशवासियों में जोश भरने का ज़रिया था. आज फिर देशवासियों में जोश भरने का समय आ गया है. सभी देश भक्त मुसलमान भाइयों से अपील है कि फ़तवों को दरकिनार कर वंदे मातरम गाएं, आख़िर वतन हम सभी का है. मादरे-वतन से प्यार के इज़हार के लिए किसी फ़तवे की क्या ज़रुरत?
मेरा मानना है कि किसी को वंदे मातरम् गाने के लिए मजबूर नही करना चाहिए, और दूसरी बात जो सच्चा हिनदुस्तानी है वह ज़बरदस्ती नही बलकि दिल से वंदे मातरम् गाता है.