जो दिख रहा है बस उतना ही नहीं है
मराठी बनाम हिंदी. राज ठाकरे बनाम अबु आज़मी. बाला साहब बनाम सचिन तेंदुलकर. महाराष्ट्रीय बनाम भारतीय. कल्याण सिंह बनाम मुलायम सिंह.
इन सब मामलों पर पिछले दिनों इतना कुछ लिख दिया गया है कि इन किस्सों और किस्सों के पीछे की राजनीति को दोहराने का लाभ नहीं है.
आप सब इन मुद्दों की बारीकियों से अवगत हैं. कब कल्याण सिंह को लोध वोट बैंक ज़रुरत बन जाता है और कब मुसलमानों की नाराज़गी भारी पड़ने लगती है.
आप यह भी जानते हैं कि मामला किसी के मराठी प्रेम या हिंदी प्रेम का नहीं है. हर किस्से के पीछे मकसद सिर्फ़ एक है. कैसे यह राजनेता इन मुद्दों पर जनता को उकसाएँ, उनकी भावनाएँ भड़काएँ और अपना उल्लू सीधा करें.
राज ठाकरे के मराठी प्रेम का असली निशाना शिवसेना है. उनके विधायकों ने अबू आज़मी को कटघरे मे खड़ा कर मराठी मानुष को लामबंद करने की कोशिश की तो बालासाहब ठाकरे की शिवसेना ने अपने पैरों तले और ज़मीन खिसकने के डर से सचिन तेंदुलकर को ही आड़े हाथों ले डाला.
अब इसको आप एक चतुर राजनीतिक पलटवार कहेंगे या हताशा में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला देने का एक अनूठा उदाहरण, यो तो आपकी राजनीतिक सूझ-बूझ और समझ पर निर्भर करता है पर एक बात तय है.
भारतीय राजनेताओं ने जैसे कसम खा ली है कि अपने स्वार्थ और हित के लिए वह किसी भी स्तर तक गिरने और कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. अवसरवादिता की राजनीति चरम पर है.
आप देख रहे हैं कि कैसे कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने राज ठाकरे का इस्तेमाल शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को निपटाने के लिए किया. बेचारे उद्धव ने कुछ सौम्य और सभ्य रहने की कोशिश की तो तमाम पंडितों ने यह लिख मारा कि उनमें बाला साहब वाले तेवर और पकड़ नहीं है.
अब सचिन के मुक़ाबले स्वयं मैदान में उतरे बाला साहब स्वयं अपनी ही विरासत की लड़ाई लड़ रहे हैं.
क्या विडंबना है. कहते हैं न कि शेर की सवारी...अपने ही तैयार किए गए भतीजे और राजनीतिक चेले से निपटने के लिए बालासाहब को अपनी ही उपज से ज्यादा उग्रवादी बनना पड़ रहा है.
उधर कुछ राजनीतिक समीक्षकों के लगातार यह अंदेशा जताते रहने के बावजूद कि राज ठाकरे नए भिंडरावाले हो सकते हैं और कांग्रेस को समय रहते चेत जाना चाहिए, कांग्रेस है कि ख़तरे के तमाम सिगनल देखते हुए भी अनदेखा करना चाह रही है.
और क्यों न करें. उनका राजनीतिक उल्लू तो राज ठाकरे की प्रासंगिकता से सध ही रहा है. देश की चिंता तब कर ही लेंगे जब बहुत देर हो चुकी होगी.
कितनी बार पहले भी तो देश को विनाश के कगार तक तकरीबन धकेल कर, भारत के महान नेताओं ने अंतिम समय में देश को हमेशा बचा ही लिया है.

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"अब सचिन के मुक़ाबले स्वयं मैदान में उतरे बाला साहब स्वयं अपनी ही विरासत की लड़ाई लड़ रहे हैं" एकदम सटीक बात कही है आपने...शत-प्रतिशत सहमत हूँ..
जो आपने लिखा है वह सोलह आने सच है. काश राजनेता इस सच को स्वीकार करके अपने को सुधारने का पर्यास करते तो देश तेज़ी से प्रगति करता. संजीव जी शुक्रिया.
कल जो कुछ महाराष्ट्र में हुआ वो अचानक नहीं हुआ, इसकी रुपरेखा बहुत पहले तैयार हो चुकी थी. बहुत पहले से मानसे के मुखिया राज ठाकरे ने इस बारे में चेतावनी देनी शुरू कर दी थी लेकिन हम सचेत नहीं हुए. मानसे वालों ने पहले हमे सड़क पर पीटा, मां-बहन की, नंगा किया और उसके बल पर विधानसभा में दाख़िल हुए और कल वहां भी हमें पीट गए. हम तब भी चुप थे और आज भी चुप ही रहेंगे क्योंकि हमारी केंद्रीय सरकार उस वक्त भी शांत थी और आज भी खामोश है.
जब हमें सड़क से उठा-उठा कर पीटा जा रहा था, गाली दी जा रही थी, मुम्बई से भागने को बोला जा रहा था तब क्यों नहीं इन लोगों को रोका गया? क्यों हम पिटते रहे और सरकारें चुप बैठी रहीं? क्यों किसी को भी उस वक़्त आज का अन्देशा नहीं हुआ? क्यों किसी ने भी उस वक़्त राज को रोकने की ज़रुरत महसूस नहीं की?
लोग पिट रहे थे, मीडिया तस्वीर दिखाने में लगी हुई थी. नेता अपनी-अपनी राजनीति कर रहे थे और राज ठाकरे दिनों-दिन मज़बूत हो रहे थे. राज ने यह सब बहुत पहले ही सोच लिया था.
इस पूरे मसले पर कांग्रेस की चुप्पी ने दिखा दिया है कि राजनितिज्ञ अपने फ़ायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं. किसी भी हद तक गिर सकते हैं. बड़ी से बड़ी घटना पर भी मौन रह सकते हैं, और किसी छोटी से छोटी बात पर भी बेवजह की उछल-कूद मचा सकते हैं.
हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि कल की घटना के बाद कुछ बदलेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला. सब कुछ वैसा का वैसा ही रहेगा क्योंकि यहां हर कोई बिका हुआ है, हम और आप भी.
भाजपा ने राम मंदिर के लिए वही किया, कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के साथ वैसा ही किया, मायावती ने दलित वोट के लिए ब्राहमनों के साथ वही किया लेकिन सभी को बाद में पछताना पड़ा. आशा करते हैं कि जल्द ही राज ठाकरे के लिए भी वह दिन आएगा.
संजीव जी! मैं आपके विचारों से पूर्णत: सहमत हूँ. यह हमारे देश की राजनीतिक फलसफ़े का स्याह और बदनुमा हिस्सा है जिसे सरकार और नेता हमेशा से ही नज़रंदाज़ करते आए हैं. और अंतत: देश की भोली - भाली जनता को ही इसके बुरे परिणाम भुगतने को असहाय और मजबूर किया जाता है. जिस मुम्बई पर बाल ठाकरे और राज ठाकरे अपना हकट ठोकते हैं क्या आज की मुम्बई को इस मकाम पर खड़ा करने में सिर्फ मराठी मानुष का ही हाथ है? ताली एक हाथ से नहीं बजा करती है. इन्हें अगर मराठी मानुष से इतना ही लगाव है तो देश के अन्य हिस्सों से मराठी नौकरी - पेशा लोगों को बुलाकर महाराष्ट्र में पाल सकते हैं ? अगर आज उत्तर भारतीय और अन्य प्रान्तों के लोग यहाँ से चले जाते हैं तो मुम्बई की गति मंद होकर रुक जाएगी. अब समय आ गया है कि ऐसे स्वार्थी , दम्भी और घटिया राजनीति करने वालों को सबक सिखाने के लिए फिल्म उद्द्योग ,अन्य महत्वपूर्ण उद्द्योग यहाँ से उत्तरभारतीय या अन्य राज्यों में स्थान्तरित किए जाएँ. भले ही इसमें अनगिनित टेक्सी ड्राईवर,भोले -भाले दूध वाले ,और सब्जी वालों से लेकर दैनिक उपयोग की सामग्री उपलब्ध करवाने वाले लोग क्यों न हों. फिर देखा जाए कि मुम्बई किसकी जागीर है. ताजा उदहारण सिंगूर से टाटा नैनो का गुजरात जाना है. जब चेला ही गुरु के पर कतरने की फिराक में हो तो गुरु तो बौखलायेगा ही. लेकिन इस बौखलाहट में अनगिनित बेक़सूर लोगों की हानि हो रही है. यही हमारे देश की राजनीति की गुरु-चेला प्रथा का अंत है. मतदान तो किसी न किसी को करना ही है. दरअसल जनता को दलबदलू नेताओं को नज़रंदाज़ करना ही चाहिए. वर्तमान केंद्रीय सरकार को अब भी जागना चाहिए और ऐसे नासूर नहीं पालने चाहिए ताकि इतिहास की पुनरावृति न हो. सरकारें अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए असंगत नेताओं का साथ ही क्यों देतीं हैं? अगर एक बार कड़वा घूँट पीकर सरकार देश विरोधी ,जनविरोधी और आलोक्तान्त्रिक प्रवृति के लोगों को जड़ों से ख़त्म करे तो जनता दिल की तहों से स्वागत करेगी. जनता की भावनाओं से खेलने वाले ,जात पात की राजनीति करने वाले नेता, अपने को किंग मेकर कहलाने वाले नेता भले ही किसी भी प्रान्त के क्यों न हों जनता को सचेत होना चाहिए. मौका देख कर दल बदलने वाले नेताओं को बिलकुल जगह नहीं देनी चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात मीडिया को ऐसे लोगों पर रत्ति भर भी ध्यान नहीं देना चाहिए ताकि ये लोग अपनी ओछी हरकतों से स्थानीय स्तर पर हीरो न बन सके.
हमारे देश की जनता कितनी भोली है...सब सामने है फिर भी कुछ देखने को तैयार नहीं...इन नेताओं को छोडिए...देश की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि इन नेताओं की सारी करतूतें जनता के सामने होने के बाद भी उसे दिखाई नहीं देता...महाराष्ट्र विधानसभा में अबु आजमी ने हिंदी में शपथ ली...अबु आजमी जो इनाम चाहते थे उन्हें वो लखनऊ में मिल गया...वहीं कल्याण सिंह को मुलायम सिंह के विश्वासघात के बाद अध्योया में राम मंदिर का निर्णाण याद आने लगा है...दरअसल कल्याण औऱ उनके बेटे राजबीर सिंह हिंदुत्व के सहारे अपना राजनीतिक पुर्नवास चाह रहे है...सवाल ये है कि इन नेताओं की सारी करतूतें सामने होने का बावजूद हमारी जनता जर्नादन इसे क्यों नहीं देखती...क्या हम इन नेताओं से कम दोषी है ?...
लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण सबक हम अगर सीख ही नहीं पाए हैं तो वर्तमान स्थिति के लिए किसी और को दोषी क्यों मानें. यह सबक़ है कि 'हम भारत के लोग' इस देश की सबसे ताकतवर और वास्तविक संस्था है जिसके ऊपर बाकी तमाम ढाँचा टिका हुआ है. लोगों के सोच में अगर यह सच्चाई नहीं उतर पाई है तो उसका लाभ रजनीतिक दल या व्यक्ति तो उठा ही ले जाएगा. बात रही राज या बाल ठाकरे(या कितने ही ऐसे) और नकारात्मक प्रवृत्तिवाले राजनीतिक व्यक्तियों का, तो यह तो लोकतन्त्र का ऐसा कमजोर पक्ष है जो एक बिखरी हुई लोकमत में सामने आ जाती है. सच तो यह है कि हमारी कानूनी-प्रशासनिक संस्थायें इस प्रकार की समस्या से निबटने के लिए सक्षम नहीं. ऐसी सक्षमता सामान्यतः एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कम ही पाई जाती है. ऐसी समस्याओं से हमें लोकमत के जरिए लड़ने की कोशिश करनी चाहिये. प्रशासन और राजनीतिज्ञों को कोसने से मसले का हल नहीं निकलेगा.
संजीव जी मैं आपके बातों से पूरी तरह सहमत हूँ, राजनीत में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न कोई स्थाई दुशमन सब अपने मौकटे के ताक़ में रहते हैं. कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे में दूध का धुला नहीं है.
संजीव जी आपसे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ, लेकिन अब समय आ चुका है और ये बात सिद्ध हो चुकी है कि जनता-जनार्धन पूरी तरह से जागरूक हो चुकी है. उसे अब और अधिक बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता है. आजकल जनता ही नेता को उल्लू बना रही है और इसका सीधा उदाहरण हाल में हुए उत्तरप्रदेश में लोकसभा के उप चुनावों में देखा जा सकता है.
संजीव साहिब ये बताएं कि आज़ादी के बाद कौन से ऐसे नेता रहें हैं या हैं, जिन्होंने देश को बचाया है. मेहरबानी करके ऐसा लिखकर पाठकों को गुमराह नहीं करें.
संजीव जी , आपने बहुत ठीक लिखा है कि हमारे देश के नेता बहुत स्वार्थी हो गए हैं, इसका सबसे ताज़ा उदाहरण आप हम देख चुके हैं. सबसे पहले तो उन नेताओं को इस देश में रहने का कोई हक़ नहीं है जो देश के पहले प्रांत की बात करते है. जैसे कि बाला साहब ठाकरे, राज ठाकरे. ये ऐसे लोग हैं जो देश में अशांति, उपद्रव फैलाने में लगे हुए हैं, मैं इनसे एक बात पूछता हूँ कि जब 26/11 को मुंबई में आतंकवादी हमला हुआ था तब ये लोग कौन से " बिल" में छुपे बैठे थे..? आज ये लोग बड़े महाराष्ट्र के सुभचिन्तक बने फिरते हैं. हिंदी में शपथ लेने पर जिस तरह का मनसे के नेताओं ने व्यवहार किया ये आप और हमसे छुपा नहीं है. संजीव जी हमे सबसे पहले ऐसे लोगों को "डीलीट" करने कि ज़रूरत है जो देश के विरोधी है, राष्ट्रभाषा के विरोधी हैं. मैं तो ये कहता हूँ कि ऐसे लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं, इनको जीने का भी हक़ नहीं है. भ्रष्ट नेता जनता की कमाई का किस तरह "सदुपयोग" करते हैं, आए दिन समाचार पत्रों में पढने को मिलता हैं. मंहगी होटल में जाना, हवाई यात्रा करना और अगर सब कुछ लिखने लगूंगा तो लिस्ट बहुत लम्बी हो जाएगी. नेता बनते ही पहले "अपनी झोली भरने" में लग जाते हैं, देश जाए भाड़ में, अरे भाई बहुत "पैसा ख़र्च" करके मंत्री या नेता बने हैं तो पहले "मूल रक़म" वसूल करेंगे और बाद में देश और आम जनता की सोचेंगे.
तेज़ी से बदलते परिवेश के कारण, अब उन नेताओं को ये ख़तरा महसूस हो रहा है कि आने वाले समय में जनता उनसे हिसाब माँगेगी कि विकास के लिए क्या-क्या किया. जनता का पैसा कहाँ गया. ये आशा सभी नेताओं के लिए ख़तरे की घंटी है.
संजीव जी बहुत अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया. इसपर बलवंत सिंह ने बहुत सटीक शब्दों में बयान किया है. मैं खुछ जोड़ना चाहता हूँ. इसमें ग़लती नेता और मीडिया दोनों का है. राजनीति में भ्रष्ट नेताओं का जमावड़ा है जबकि मीडिया अपनी भूमिक भूल चूका है.
आपकी हर बात से सहमत हूं संजीव जी. सवाल मन में एक ही उठता है, कि क्या इस देश की सारी जनता बहुत भोली और सारे राजनेता बहुत चालाक हैं? क्या जनता को अपने नेताओं की धूर्तता ज़रा भी समझ में नहीं आती? और अगर ऐसा ही है तो फिर जो हो रहा है उसका अफ़सोस भी नहीं होना चाहिए. असल में, मुझे तो यह लगता है कि भोली तो जनता भी नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि अपने क्षुद्र स्वार्थों के चलते वह इन नेताओं की चालों का शिकार हो जाती है. जब मराठी मानुस की बात की जाती है तो महाराष्त्र की जनता को अपना हित सधता नज़र आता है और जब हिंदुत्व की बात की जाती है तो औसत हिन्दू को लगता है कि उसका क़द बढ़ रहा है. जब तक हम अपने ओछे स्वार्थों से नहीं उबरेंगे, ऐसा ही चलता रहेगा.
संजीव जी, अब इन बातो को बार बार नही लिखा जाना चाहिए.
संजीव जी मैं आपकी राय से पूरी तरह से सहमत हूँ.
संजीव जी! आपने बड़ी सटिक बात कही है जो दिख रहा है वस्तुत: नहीं है. इस हक़ीकत को झुठलाया नहीं जा सकता. इस मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
आप ने बिल्कुल सच कहा.