ईरान की घर ठंडा रखने वाली हज़ारों साल पुरानी तकनीक बादगीर

ईरान

इमेज स्रोत, Shervin Abdolhamidi

    • Author, शेरविन अब्दुल्लाहमदी
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

ईरान के यज़्द शहर के रहने वाले साबेरी कहते हैं कि 'मेरे यहां पानी वाले एयर कंडिशनर भी हैं. मगर मुझे यहां, इस क़ुदरती एसी में बैठना पसंद है. ये मुझे पुराने दिनों की याद दिलाता है.'

साबेरी का इशारा बादगीर (हवा पकड़ने वाला) की तरफ़ है. हम उसी के साये तले बैठे हैं.

रेगिस्तान में बसे यज़्द शहर में भयंकर गर्मी पड़ती है. पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है.

इतने गर्म मौसम में चाय का ख़याल आना अजूबा ही होगा.

लेकिन बादगीर के हवादार आंगन में बैठने के बाद तपता सूरज भी मद्धम जान पड़ता है.

इतना आराम मिलता है कि अपने मेज़बान को अलविदा कहने का मन नहीं होता.

यहां बैठ कर आप जब आस-पास की चीज़ों को निहारते हैं, तब एहसास होता है कि इंसान ने इस गर्म माहौल में ख़ुद को सुकून देने की ये तकनीक हज़ारों बरस पहले ही ईजाद कर ली थी.

ईरान के हज़ारों साल पुराने एसी

बादगीर यानी हवा पकड़ने वाले ये ढांचे चिमनी जैसे हैं, जो यज़्द और ईरान के रेगिस्तानी शहरों की पुरानी इमारतों के ऊपर दिखते हैं.

ये ठंडी हवा को पकड़ कर इमारत में नीचे की तरफ़ ले जाने का काम करते हैं. इनकी मदद से मकानों को भी ठंडा किया जाता है.

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और उन चीज़ों को बचाने का काम भी होता है, जो गर्मी में ख़राब हो सकती हैं.

तमाम रिसर्च से साबित हुआ है कि बादगीर की मदद से तापमान को दस डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है.

प्राचीन काल में फ़ारस से लेकर, मिस्र, अरब और बेबीलोन की सभ्यताओं तक, ऐसे आर्किटेक्चर को बनाने की कोशिश की गई जो मौसम की मार से बचा सके.

ऐसे ज़्यादाचर ढांचों को क़ुदरती तौर पर हवादार बनाने की कोशिश की गई.

बादगीरों या हवादार ढांचों की ऐसी मिसालें मध्य-पूर्व से लेकर मिस्र और भारत-पाकिस्तान तक देखी जा सकती हैं.

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कैसे बनाए जाते हैं ये बादगीर

बादगीर, इमारतों के सबसे ऊंचे हिस्से में बने होते हैं. इसलिए इनकी देख-रेख बड़ी चुनौती होती है.

इनकी टूट-फूट का ख़तरा ज़्यादा होता है. ईरान की कई इमारतों के ऊपर बने ये ढांचे यानी बादगीर चौदहवीं सदी तक पुराने हैं.

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फ़ारसी कवि नासिर ख़ुसरो की नज़्मों में भी बादगीर का ज़िक्र मिलता है. ये नज़्में तो डेढ़ हज़ार साल पुरानी हैं.

वहीं, मिस्र के लक्सर शहर में ईसा से 1300 साल पुरानी कुछ पेंटिंग मिली हैं.

इन चित्रों में भी बादगीर जैसी संरचनाएं देखने को मिलती हैं.

डॉक्टर अब्दुल मोनिम अल-शोरबागी सऊदी अरब के जेद्दा स्थित इफ़त यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर और डिज़ाइन के प्रोफ़ेसर हैं.

डॉक्टर शोरबागी कहते हैं कि मध्य-पूर्व के देशों से लेकर, पाकिस्तान और सऊदी अरब तक बादगीर मिलते हैं.

ये इराक़ के अब्बासी ख़लीफ़ाओं के दौर के महलों की चौकोर इमारतों से मिलते-जुलते हैं.

ये महल इराक़ के उखैदर इलाक़े में आठवीं सदी में बनाए गए थे.

वैसे एक थ्योरी ये भी है कि बादगीर का विकास अरब देशों में हुआ. जब अरबों ने ईरान पर जीत हासिल की, तो उनके साथ ये फ़ारस भी पहुंचा.

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क्या अरब देशों में हुआ बादगीर का जन्म

यज़्द शहर की ज़्यादातर इमारतों पर बने ये बादगीर आयताकार हैं. चारों तरफ़ हवा आने के लिए खांचे बने हुए हैं.

लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि छह और आठ मुंह वाले बादगीर भी मिलते हैं.

यज़्द की पुरानी इमारत में चलने वाले एक कैफ़े के कर्मचारी मोइन कहते हैं कि, 'बादगीर में हर दिशा से आने वाली हवा पकड़ने के लिए खांचे बने होते हैं. जबकि यज़्द से कुछ दूर स्थित क़स्बे मेबूद में सिर्फ़ एक तरफ़ खांचे वाले बादगीर मिलते हैं क्योंकि वहां तो एक ही तरफ़ से हवा आती है.'

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बादगीर के ढांचे को ऐसे बनाया गया है जो वातावरण की हवा को खींचकर संकरे रास्तों से होते हुए नीचे की तरफ़ ले जाता है.

ठंडी हवा के दबाव से गर्म हवा इमारत के बाहर निकल जाती है.

इस हवा के निकलने के लिए बादगीर के उल्टी तरफ़ एक खिड़की जैसी जगह खोली जाती थी.

अगर ठंडी हवा नहीं भी बह रही होती, तो भी बादगीर गर्म हवा पर दबाव बनाकर उसे धकेल कर घर से बाहर निकालने का काम करता था.

इससे घर के भीतर ठंडक बनी रहती थी.

सर्दी और गर्मी वाले घर

यज़्द शहर में क़जारी युग के कई मकान अब भी अच्छी हालत में हैं.

इन्हीं में से एक है मशहूर लारिहा हाउस. उन्नीसवीं सदी में बनी ये इमारत फ़ारसी आर्किटेक्चर का शानदार नमूना है.

इसके बीचो-बीच आयताकार आंगन है. इमारत में गर्मी और सर्दी के मौसम के हिसाब से अलग-अलग हिस्से बने हैं.

इमारत को दो हिस्सों में बांटने का मक़सद है सर्दी में सूरज की गर्मी का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल और गर्मी में सूरज से दूरी.

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बादगीर इस इमारत के गर्मी वाले हिस्से में बनाया गया है.

बादगीर से होकर आने वाली हवा एक मेहराबदार ताखे से होकर गुज़रती है, जो इमारत के बेसमेंट तक जाती है.

तहख़ाने में वो चीज़ें रखी जाती हैं, जो जल्दी ख़राब हो सकती हैं. इस इमारत की 38 सीढ़ियों से उतर कर और गहराई में जाएं, तो सर्दी का एहसास होने लगता है.

इस हिस्से को सर्दाब यानी ठंडा पानी कहते हैं. यहां पर क़नात यानी नहरों से लाया गया पानी गुज़ारा जाता है.

ठंडी हवा और पानी मिल कर इस कोठरी को रेफ्रिजरेटर बना देते हैं. एक ज़माने में ऐसी कोठरियों में बर्फ़ रखी जाती थी.

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कोल्ड स्टोरेज या क़नात

आज जैसे क़नात सिस्टम पुराना पड़ गया है. वैसे ही ये बादगीर भी तकनीक की तरक़्क़ी की वजह से पुराने पड़ गए हैं. एसी ने इनकी जगह ले ली है.

यज़्द के पुराने बाशिंदे 85 बरस के अब्बास फ़रोग़ी कहते हैं कि उनके मुहल्ले के बहुत से लोगों ने नए अपार्टमेंट में अपना आशियाना बना लिया है.

फ़रोग़ी कहते हैं कि, 'पुराने घर या तो ख़ाली पड़े हैं, या बाहर से आए कामगारों-मज़दूरों को किराए पर चढ़ा दिए गए हैं. जो घर बड़े और अच्छी हालत में थे, उन्हें तेहरान और शिराज़ से आए रईसों ने ख़रीदकर उनमें होटल खोल दिए हैं.'

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यज़्द के पुराने मुहल्ले कूचा हाना की रहने वाली मिसेज़ फ़ारुक़ी ने हाल ही में अपना घर बेचा है. वो कुछ ही दूर बने अपार्टमेंट में रहने लगी हैं.

मिसेज़ फ़ारुक़ी अक्सर पुराने दिनों को याद करती हैं.

वो कहती हैं कि, 'पहले सारे मुहल्ले के बच्चे एक जगह इकट्ठे होकर खेलते थे. लोग बादगीर के नीचे बैठकर चैन की सांस लिया करते थे. शाम के वक़्त वहीं पर खाना-पीना होता था. गप्पें लड़ाई जाती थीं.'

मिसेज़ फ़ारुक़ी के पुराने घर में रॉयय घदीम यानी 'पुराना ख़्वाब' नाम से होटल खोल दिया गया है.

मिसेज़ फ़ारुक़ी बताती हैं कि, 'मैं अब भी कभी-कभी अपने पुराने घर जाती हूं. वो अब अच्छा दिखता है. मुझे ख़ुशी है कि उसे सहेज कर रखा गया है.'

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विश्व धरोहर बना यज़्द शहर

यूनेस्को ने 2017 में यज़्द शहर को विश्व धरोहर घोषित किया था.

इसके बाद कल्चरल हेरिटेज इंस्टीट्यूट ने इसे क़र्ज़ देना शुरू किया.

जिन लोगों ने यहां के पुराने घर ख़रीदे थे, वो इस मदद की बदौलत उनकी मरम्मत करके उनमें होटल खोलने लगे.

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इससे पुराने मकान सहेजे जा सके. पर स्थानीय टूर एजेंसी चलाने वाले फ़रसाद ओस्तादान कहते हैं कि अब क़र्ज़ मिलना मुश्किल हो रहा है.

सरकार के पास पुरानी विरासत को सहेजने के लिए पैसे ही नहीं हैं.

फिर भी ओस्तादान को उम्मीद है कि यज़्द की ऐतिहासिक इमारतों को बचाया जा सकेगा.

ख़ास तौर से बादगीर को. वो बचपन के दिनों को याद कर के बताते हैं कि कभी वो अपने दादा के घर में बादगीर के नीचे लेट कर गर्मी की दोपहर बिताया करते थे.

ओस्तादान कहते हैं कि, 'वो दिन अलग ही थे. बादगीर से आती हवा आज के एसी जैसा एहसास कराती थी. हमें तो उन दिनों में पता ही नहीं था कि एसी क्या बला होती है.'

ओस्तादान कहते हैं कि, 'जब तक यहां सैलानी आते रहेंगे, हालात ठीक रहेंगे. पर्यटन से आने वाला पैसा, यहां की पुरानी इमारतों की मरम्मत और रख-रखाव में काम आता है.

यहां आने वाले सैलानियों को पुरानी इमारतों और बादगीर की फ़िक्र होती है. हमें भी इनका ख़याल रखना है. उम्मीद है कि हम इसमें कामयाब होंगे.'

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