ज़मीन से तीन हज़ार फ़ुट नीचे बसा ये अद्भुत गांव

- Author, रूबेन हर्नेनडेज़ और इलियट स्टेन
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
गांव-देहात की अपनी ख़ूबसूरती होती है. हालांकि देहाती ज़िंदगी, शहरी रहन-सहन के मुक़ाबले में नहीं टिकती क्योंकि वहां शहरों जैसी सुख सुविधाएं नहीं होतीं. इसीलिए लोग गांव छोड़ शहरों की ओर भागते हैं.
लेकिन आज हम आपको दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क अमरीका के ऐसे गांव की सैर पर ले चलेंगे, जो ज़मीन की सतह से तीन हज़ार फ़ुट नीचे आबाद है.
अमरीका की मशहूर ग्रैंड कैनियन को देखने के लिए दुनिया भर से क़रीब 55 लाख लोग एरिज़ोना जाते हैं. मगर इसी में से एक गहरी खाई हवासू कैनियन के पास 'सुपाई' नाम का एक बहुत पुराना गांव बसा है. यहां की कुल आबादी 208 है.
ये गांव ज़मीन की सतह पर नहीं बल्कि ग्रैंड कैनियन के भीतर क़रीब तीन हज़ार फ़ुट की गहराई पर बसा है. पूरे अमरीका में ये इकलौता ऐसा गांव है, जहां आज भी ख़तों को लाने और ले जाने में लंबा वक़्त लगता है. मिर्ज़ा ग़ालिब के दौर की तरह यहां आज भी लोगों के ख़त खच्चर पर लाद कर गांव तक लाए और ले जाए जाते हैं.
ख़त ले जाने के लिए खच्चर गाड़ी का इस्तेमाल कब शुरू हुआ, यक़ीनी तौर पर कहना मुश्किल है. खच्चर गाड़ी पर यूनाइटेड स्टेट पोस्टल सर्विस की मोहर रहती है.
गांव पहुंचने के लिए खच्चर या सीधा हेलिकॉप्टर
सुपाई गांव के तार आज तक शहर की सड़कों से नहीं जुड़ पाए हैं. यहां तक पहुंचने का रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ है. गांव की सबसे नज़दीकी सड़क भी क़रीब आठ मील दूर है. यहां तक पहुंचने के लिए या तो हेलिकॉप्टर की मदद ली जाती है या फिर खच्चर की. अगर हिम्मत हो तो पैदल चल कर भी यहां पहुंचा जा सकता है.
सुपाई गांव में ग्रैंड कैनियन के गहरे राज़ छिपे हैं. ये गांव चारों ओर से बड़ी और ऊंची चोटियों से घिरा है. क़रीब पांच आबशार गांव की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. गहरी खाई में छुपा ये गांव क़रीब एक हज़ार साल से आबाद है. यहां पर अमरीका के मूल निवासी रेड इंडियन रहते हैं.
गांव में रहने वाली जनजाति का नामकरण गांव की ख़ूबसूरती की बुनियाद पर हुआ है. हवासुपाई का अर्थ है नीले और हरे पानी वाले लोग. यहां के लोग गांव के पानी को पवित्र मानते हैं. मान्यता है कि यहां निकलने वाले फ़िरोज़ी पानी से ही इस जनजाति का जन्म हुआ है.
गांव तक पहुंचने के लिए ख़ारदार झाड़ियों के बीच से, भूल-भुलैया जैसी खाइयों से होकर गुज़रना पड़ता है. ऐसे ऊबड़-खाबड़ रास्ते से गुज़रते हुए ये एहसास भी नहीं होता कि आगे स्वर्ग जैसी जगह का दीदार होने वाला है. सामने ही आपको एक बड़ा-सा बोर्ड नज़र आएगा जिस पर लिखा होगा 'सुपाई में आपका स्वागत है'.

20वीं सदी तक बाहरी लोगों पर थी रोक
गांव पूरी तरह ट्रैफ़िक के शोर से आज़ाद है. खच्चर और घोड़े गांव की गलियों और पगडंडियों पर नज़र आ जाएंगे. इस गांव में भले ही शहरों जैसी सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन एक तसल्लीबख़्श ज़िंदगी गुज़ारने वाली तमाम सहूलते हैं. यहां पोस्ट ऑफिस है, कैफ़े हैं, दो चर्च हैं, लॉज हैं, प्राइमरी स्कूल हैं, किराने की दुकानें हैं.
यहां के लोग आज भी हवासुपाई भाषा बोलते हैं, सेम की फली और मकई की खेती करते हैं. रोज़गार के लिए लच्छेदार टोकरियां बुनते हैं और शहरों में बेचते हैं. टोकरियां बनाना यहां का पारंपरिक व्यवसाय है.
गांव से शहर को जोड़ने का काम खच्चर गाड़ियों से होता है. गांववालों की ज़रूरत का सामान इन खच्चर गाड़ियों पर लाद कर यहां लाया जाता है.
कई सदियों से लोग इस अजीबो-ग़रीब गांव को देखने आते रहे है.
बीसवीं सदी तक इस गांव के लोगों ने बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा रखी थी, लेकिन आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने क़रीब सौ साल पहले अपने गांव के दरवाज़े बाहरी दुनिया के लिए खोल दिए.

खच्चरों की सेहत पर असर
हर साल गांव में क़रीब बीस हज़ार लोग यहां की क़ुदरती ख़ूबसूरती और यहां की ज़िंदगी देखने के लिए आते हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए सभी सैलानियों को हवासुपाई की ट्राइबल काउंसिल की इजाज़त लेनी पड़ती है. फ़रवरी महीने से नवंबर तक सैलानी यहां के लोगों के साथ उनके घरों में रह सकते हैं. चांदनी रात में झरनों से गिरते पानी की आवाज़ के साथ गांव की ख़ूबसूरती का मज़ा ले सकते हैं.
हवासुपाई गांव के लोगों की ज़िंदगी आसान बनाने वाले खच्चरों के लिए बीते कई दशकों से आवाज़ उठ रही है. सैलानियों की बढ़ती तादाद के साथ इन खच्चरों पर दबाव बढ़ने लगा है. इनसे ज़रूरत से ज़्यादा काम लिया जा रहा है. साईस घोड़े और खच्चरों को सेहत को नज़रअंदाज़ कर बिना खाना-पानी के आठ मील दूर तक चलाते रहते हैं. हालांकि ऐसा हर कोई नहीं करता.
इसीलिए हवासुपाई ट्राइबल काउंसिल ने ऐसे साईसों की टीम बना दी है, जो कारोबार में इस्तेमाल होने वाले सभी जानवरों की देखभाल करते हैं. ये 1 से 10 नंबर के पैमाने पर जानवरों को सेहत का सर्टिफ़िकेट देते हैं.
एरिज़ोना यूं ही सूखा राज्य है. यहां की ग्रैंड कैनियन में बारिश बहुत कम होती है. सालाना बारिश नौ इंच से भी कम रिकॉर्ड की जाती है है, लेकिन यहां के तीस हज़ार साल पुराने पानी के चश्मी कभी पानी की क़िल्लत नहीं होने देते.

फ़िरोज़ी पानी का राज़
वैज्ञानिक पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस रेगिस्तानी इलाक़े में फ़िरोज़ी पानी के झरने इतने सालों से कैसे रवां हैं. पानी में ये फ़िरोज़ी रंग आता कहां से है. दरअसल यहां की चट्टानों और ज़मीन में चूना पत्थर प्रचूर मात्रा में पाया जाता है. पत्थर पर पानी गिरने के साथ जब हवा मिलती है तो एक तरह की रसायनिक प्रतिक्रिया होती है और कैल्शियम कार्बोनेट बनने लगता है. सूरज की रोशनी पड़ने पर यही पानी फ़िरोज़ी रंग का नज़र आता है.
यूरोपीय लोगों के अमरीका आकर बसने से पहले हवासुपाई का रक़बा लगभग 16 लाख एकड़ था, लेकिन इस इलाक़े के क़ुदरती ज़ख़ीरे पर जब सरकार और सरहदी लोगों की नज़र पड़ी तो उन्होंने यहां कब्ज़ा करना शुरू कर दिया. व्यापारियों ने यहां रहने वाली बहुत-सी जनजातियों को जबरन उखाड़ फेंका. इनके हक़ लिए हवासुपाई के आदिवासियों ने लंबी लड़ाई लड़ी है. 1919 में अमरीका के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने ग्रैंड कैनियन को नेशनल पार्क सर्विस का हिस्सा बनाया. सरकारी योजना के तहत यहां के बहुत से लोगों को रोज़गार मिला. लेकिन इसके बावजूद अपनी ज़मीन के लिए इनकी लड़ाई जारी रही.
1975 में राष्ट्रपति जेराल्ड फ़ोर्ड ने क़रार के तहत 1,85,000 एकड़ ज़मीन का कंट्रोल हवासुपाई के लोगों को दे दिया. आज यहां के लोग सिर्फ़ कैनियन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां के जंगलों में शिकार करने का हक भी इन्हें मिल गया है.
आज हवासुपाई की पहचान एक ख़ुदमुख़्तार सूबे के तौर पर है. यहां के लोग अपनी सरकार खुद चलाते हैं. ट्राइबल काउंसिल का चुनाव गांव के लोग करते हैं और अपने क़ानून ख़ुद बनाते हैं.

हाल के सालों में हवासुपाई पर सबसे बड़ा ख़तरा सैलाब का मंडरा रहा है. 2008 और 2010 में यहां ज़बरदस्त बारिश हुई थी जिसमें बहुत से सैलानी फंस गए थे. सुपाई को बाहर के इलाक़े से जोड़ने वाली पगडंडी भी पूरी तरह से तबाह हो गई थी. 2011 में यहां के लोगों ने एरिज़ोना के गवर्नर के साथ अमरीकी सरकार से आर्थिक मदद मांगी. सरकार ने इन्हें क़रीब 16 लाख डॉलर की आर्थिक मदद दी.
हज़ार साल से यहां सैलाब और सरहद पर रहने वाले लोग आते और जाते रहे, लेकिन हवासुपाई के लोग यहां सब्र के साथ रहते रहे. यहां के लोग मानते हैं कि वो अपने पूर्वजों के घर में रहते हैं. यहां के झरनों और ज़मीन में उनके बुज़ुर्ग वास करते हैं. लिहाज़ा वो यहीं रहेंगे.
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