सदियों पुरानी इस भाषा को बचाने की जद्दोजहद

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इमेज कैप्शन, रोंगोरोंगो लिपि
    • Author, टॉम गार्मसन
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

दुनिया भर में ना जाने कितनी भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं. बात करें भारत की तो यहां चंद मील की दूरी पर ही भाषाएं और बोलियां बदल जाती हैं. एक ही शहर में कई भाषाएं और बोलियां बोलने वाले मिल जाएंगे.

इसमें भी कोई दो राय नहीं कि कुछ ज़बानें वक़्त के साथ ख़त्म हो गईं, तो कुछ को बोलनेवाले बहुत कम लोग बचे हैं. संस्कृत जैसी भाषा इसकी बेहतरीन मिसाल है.

लेकिन आज बात किसी हिंदुस्तानी ज़बान की नहीं बल्कि एक ऐसी ज़बान की जो सदियों पुरानी है और दुनिया के आख़िरी कोने में पली-बढ़ी है, अब ये भाषा ख़ात्मे की ओर है, लेकिन इसके चाहने वाले इसे बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

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पॉलीनेशिया की खोज

न्यूज़ीलैंड के पास प्रशांत महासागर में छोटे-छोटे जज़ीरे हैं. दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित इन द्वीपों के ग्रुप को पॉलीनेशिया कहते हैं.

सदियों पहले पॉलीनेशिया की खोज करने वाले एक नई दुनिया की तलाश में प्रशांत महासागर के इस हिस्से की तरफ़ आ गए. उनकी ये खोज ईस्टर द्वीप पर आकर ख़त्म हुई. इसे रापा नुई कहते हैं.

1200 ईस्वी तक जो लोग यहां बसे वो अपने साथ अपने रीति-रिवाज, फ़सलें और ज़बान भी लाए.

ईस्टर द्वीप दक्षिण अमरीका के आख़िरी कोने से क़रीब 3600 किलोमीटर दूर है. ये जगह इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलाकारों के लिए दिलचस्पी का मौजूं रही है. यहां बसने वाले समाज की पेचीदगियों के नमूने यहां की चट्टानों पर साफ़ नज़र आते हैं.

ज्वालामुखी से निकलने वाली राख से बनी मूर्तियां पॉलीनेशिया की मूर्तिकला की बेहतरीन मिसाल हैं. लेकिन रापा नुई की सांस्कृतिक विरासत की एक चीज़ आज भी पहेली बनी हुई है.

इस पहेली का नाम है रोंगोरोंगो.

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रोंगोरोंगो लिपि की कहानी

रोंगोरोंगो ईस्टर द्वीप पर इस्तेमाल होने वाली लिपि का नाम है. ये लिपि कब और कैसे वजूद में आई, इसके बारे में अभी तक किसी को कोई जानकारी नहीं. इस लिपि की महज़ दो दर्ज़न किताबें ही आज मौजूद हैं. ये किताबें लकड़ी की छोटी पट्टिकों पर तरह-तरह के निशान बना कर लिखी गई हैं. ये निशान शार्क के दांत या लावा कांच से उकेरे गए हैं.

पट्टिकाओं पर बने निशानों में द्वीप पर पाए जाने वाले जन्तु और वनस्पति दोनों शामिल हैं. साथ ही प्रवासी पक्षियों, मछलियों और इंसानों की तस्वीरें भी यहां उकेरी दिखती हैं. जानकारों का मानना है कि ये आकृतियां किसी पवित्र मक़सद से बनाई गई हैं.

रोंगोरोंगो को लेकर जवाब कम सवाल ज़्यादा हैं. यहां के लोगों से अभी तक जितना ज़ुबानी इतिहास पता चला है उसके मुताबिक़ लड़कों को ये लिपि सिखाने के लिए बाक़ायदा स्कूल खोले गए. इसे सिखाने के लिए मुंशी रखे जाते थे. ये लिपि नीचे बाईं हाथ की तरफ़ से ऊपर की ओर लिखी जाती थी. किताब का पन्ना ऊपर से नीचे की ओर खुलता था.

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यहां मिलती है दुर्लभ लकड़ी

ईस्टर द्वीप दुनिया के सबसे नए द्वीपों में से एक है. ये द्वीप 163 वर्ग किलोमीटर में फैला है. यहां बहुत से ज्वालामुखी और लहरदार पहाड़ी चोटियां हैं. यहां कोई नहर या नदी नहीं है. लिहाजा लोगों को ज़रूरत का पानी ज़मीन के नीचे से निकालना पड़ता है.

माना जाता है शुरुआती दौर में यहां घने जंगल रहे होंगे और यहां की मिट्टी में ज्वालामुखी से निकलने वाली राख बड़े पैमाने पर जमा रही होगी. लेकिन 18वीं सदी में जब यूरोपियन लोग यहां पहुंचे तो द्वीप के बड़े हिस्से पर हरी घास के मैदान फैले हुए थे.

माना जाता है कि जो पहला परिवार यहां पहुंचा था, उसने यहां की ज़मीन साफ़ करके उसे खेती के लायक़ बनाया था.

लेकिन जानकार इस थ्योरी को सही नहीं मानते. इनके मुताबिक़ इस द्वीप पर आने वालों ने यहां के प्राकृतिक संसाधनों का ख़ूब दोहन किया, इसीलिए यहां की ज़मीन साफ़ हो गई. कुछ जानकार पॉलीनेशियन चूहों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.

वजह चाहे जो भी रही हो, फ़िलहाल तो यहां की सबसे क़ीमती चीज़ यहां पाई जाने वाली दुर्लभ क़िस्म की लकड़ी है.

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सभी ने किया दोहन

यहां के लोगों ने रॉक गार्डन बना लिए हैं और बारिश के पानी से खाने का बंदोबस्त करते हैं.

1722 में डच खोचकर्ता जैकब रोगेवीन यहां सबसे पहले पहुंचे थे. वो यहां थोड़े समय के लिए ही रुके. लेकिन उनके बाद दो सदियों तक जितने भी बाहरी लोग यहां आए, उन सभी ने इस द्वीप को नुक़सान पहुंचाया.

1860 में पेरू के गुलामों के सौदागर यहां से क़रीब एक हज़ार लोग अपने साथ महाद्वीप ले गए. कुछ लोग जो बचकर वापस आ गए थे, वो अपने साथ चेचक जैसी भयंकर बीमारी ले आए थे. जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हो गई. जो इस महामारी से बच गए थे वो तहिती चले गए.

1888 में रापा नुई समाज के सिर्फ़ सौ लोग ही बचे थे. इसके बाद चिली ने इस द्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसी दौरान रोंगोरोंगो लिपि की बहुत-सी पट्टिकाएं खो गईं.

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कम हो रहे रापा नुई बोलने वाले

रापा नुई इतिहासकार क्रिस्टेन मोरेनो पकाराती का कहना है कि, ईस्टर द्वीप पर जितने भी लोग आए उन सभी की ज़बान का असर रोंगोरोंगो पर भी पड़ा. इस पर तहितियन, फ़्रेंच, स्पेनिश और अंग्रेज़ी का भरपूर असर है.

आज बोली जाने वाली रापा नुई 1860 में लिखी गई रंगोरंगो लिपि से बिल्कुल अलग है. रोंगोरोंगो पढ़ने और समझने वालों की तादाद आज बहुत कम है. यही वजह है कि इस भाषा को डिकोड करने की संभावनाएं काफ़ी कम हैं.

ईस्टर द्वीप के मेयर पेड्रो एडमंड्स पाओ का कहना है कि चिली के क़ब्ज़े में आने से पहले तक ये द्वीप दुनिया से कटा हुआ था, लेकिन 1967 में चिली के एयर फ़ोर्स ने यहां मनूकेना रेडियो स्थापित किया जिससे यहां के हालात बदल गए. हालांकि अब चिली के टेलीविजन चैनल और इंटरनेट सेवा भी शुरू हो चुकी है. लेकिन रेडियो लोगों की पहली पसंद है.

बाहरी दुनिया से तार जुड़ जाने से जहां एक ओर कई फ़ायदे हुए तो वहीं कई नुक़सान भी हुए. हाल के दशकों में चिली के लोग बड़ी संख्या में इस द्वीप पर आए हैं. ईस्टर द्वीप की नई नस्ल पढ़ाई के लिए स्पेन और चिली जा रही है.

नतीजा ये है कि अब लोग स्पेनिश ज़बान ज़्यादा बोलने लगे हैं और रापा नुई बोलने वालों की संख्या कम से कमतर होती जा रही है. जो लोग रापा नुई बोलते भी हैं, उसमें स्पेनिश शामिल होती है.

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लुप्तप्राय भाषाओं में रापा नुई

यूनेस्को ने रापा नुई को गंभीर रूप से लुप्तप्राय भाषाओं की फ़ेहरिस्त में शामिल कर लिया है. 2016 की एक स्टडी के मुताबिक़ 70 फ़ीसदी लोग फ़र्राटेदार रापा नुई बोलते हैं जबकि 8-12 साल की उम्र के 16.7 फ़ीसदी बच्चे ही ये ज़बान बोल पाते हैं.

ज़बान की घटती लोकप्रियता इस द्वीप के मूल निवासियों के लिए चिंता का विषय बन गई है. वो इसे ज़िंदा रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. ऐसे ही शुभचिंतकों में से एक हैं कार्डिनली जिन्होंने अपना जीवन अपनी मातृभाषा की हिफ़ाज़त में लगा दिया है.

2017 में उन्होंने एक नर्सरी स्कूल शुरू किया जहां सिर्फ़ रापा नुई ज़बान बोली जाती है. यहां दाखिले की एक ही शर्त है- बच्चे के घर में कोई एक मेम्बर सिर्फ़ रापा नुई ज़बान बोलता हो. उनका सपना है कि किसी दिन इस द्वीप पर ऐसा स्कूल बने जहां सिर्फ़ उनकी जन्मजात ज़बान बोली, लिखी और पढ़ी जाए.

ईस्टर द्वीप के लोग ख़ुद को चिली के असर से आज़ाद करना चाहते हैं. चिली सरकार द्वीप के स्थानीय लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार देने को तैयार है.

2017 में नेशनल पार्क का कंट्रोल स्थानीय रापा नुई लोगों को दे दिया गया है. इसके अलावा द्वीप के आसपास मरीन प्रोटेक्शन ज़ोन बनाया गया है. लेकिन लोगों का कहना है कि ईको सिस्टम बचाने के साथ-साथ यहां की संस्कृति बचाना भी ज़रूरी है.

हालांकि वो ये भी मानते हैं कि लोगों में अपनी ज़बान के लिए दिलचस्पी कम ज़रूर हुई है, लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है. लिहाजा उन्हें उम्मीद है कि एक ना एक दिन उनकी ज़बान फिर से फलेगी क्योंकि जोश अभी बाक़ी है.

(नोटःये टॉम गार्मसन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

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