अपोलो मिशनः चांद पर बिन हवा लहराया कैसे झंडा?

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- Author, रिचर्ड हॉलिंघम
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
आज से पचास साल पहले नासा का अपोलो 11 मिशन दो इंसानों को लेकर चांद पर पहुंचा था. मानव के चंद्रमा पर पहुंचने की पचासवीं सालगिरह पर हम आपको इस मिशन से जुड़े क़िस्से बता रहे हैं.
अपोलो मिशन के तहत कई स्पेसक्राफ़्ट अंतरिक्ष में गए. अंतरिक्ष यात्रियों ने अपनी-अपनी पसंद के मुताबिक़, इनके उपनाम रखे. जैसे कि अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे अमरीकी अंतरिक्षयात्री गस ग्रिशम ने अपने मर्करी स्पेसक्राफ्ट का नाम लिबर्टी बेल 7 रखा था.
ये अमरीका की आज़ादी का प्रतीक था. उन्होंने सात नंबर इसलिए जोड़ा ताकि पहले सात अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों का सम्मान कर सकें.
ग्रिशम जुलाई 1961 में पंद्रह मिनट के लिए अंतरिक्ष में गए थे. हालाकि वापसी के बाद जब उनका कैप्सूल समंदर में गिरा, तो उनके बोल्ट खोलने वाले विस्फोटक में पहले ही धमाका हो गया. और कैप्सूल में पानी भर गया.
इसकी वजह से ग्रिशम को बचाव के लिए हेलीकॉप्टर पहुंचने से पहले ही बाहर आना पड़ा. इस घटना की वजह से ग्रिशम की जान पर बन आई थी.
इसके बाद, दो अंतरिक्षयात्रियों को लेकर जाने वाले 1965 के जेमिनी मिशन के लिए ग्रिशम ने मौली ब्राउन नाम चुना था. जो अमरीकी थिएटर की एक बहुत लोकप्रिय किरदार थी. हालांकि नासा इसका नाम जेमिनी 3 रखना चाहता था. मगर, ग्रिशम ने टाइटैनिक नाम सुझाया, तो नासा की टीम इस पर राज़ी हो गई.

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ग्रिशम को अपोलो 1 मिशन पर भी जाने के लिए चुना गया था. लेकिन, उससे पहले ही एक हादसे में उनकी मौत हो गई. उनके साथ दो और एस्ट्रोनॉट रोजर शैफी और एड व्हाइट भी मारे गए थे.
इंसानों को लेकर अंतरिक्ष में जाने वाले पहले दो अपोलो मिशन थे 7 और 8. इस दौरान इन्हें कोई उपनाम नहीं दिए गए. वाल्ट कनिंघम कहते हैं कि अपोलो 7 नाम भी अच्छा लगा था. इसलिए उपनाम रखने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई.
लेकिन, अपोलो 9 मिशन में दो अंतरिक्षयान थे. एक कमांड मॉड्यूल और दूसरा लूनर लैंडर. इसलिए दोनों के अलग-अलग उपनाम रखने ज़रूरी हो गए.
जैसे कि अपोलो 11 के लूनर लैंडर का नाम ईगल और कमांड मॉड्यूल का नाम कोलंबिया था. जिसे जूल्स वर्न के काल्पनिक स्पेसशिप कोलंबियाड के नाम पर चुना गया था.
अपोलो 14 के कमांड मॉड्यूल का नाम किटी हॉक था, जहां पर राइट बंधुओं ने दुनिया की पहली हवाई उड़ान भरी थी. चांद पर जाने वाले आख़िरी दो इंसान चैलेंजर नाम के लूनर मॉड्यूल से उतरे थे. इसका इशारा भविष्य की चुनौतियों की तरफ़ था.
अपोलो मिशन के दौरान उस दौर के कुछ मशहूर प्रतीक चिह्नों के नाम पर भी स्पेसक्राफ्ट के नाम रखे गए थे. जैसे कि, अपोलो 10 के कमांड मॉड्यूर और लूनर लैंडर के नाम स्नूपी और चार्ली ब्राउन थे.
ये पीनट्स नाम के कार्टून के किरदार थे. इसी तरह, अपोलो 16 के कमांड मॉड्यूल का नाम कैस्पर रखा गया था. ये भी एक भुतहा कार्टून था, जो दोस्ताना रवैये के लिए मशहूर था.

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चांद पर अमरीकी झंडे की कहानी
अपोलो मिशन की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक वो भी है, जिसमें अंतरिक्ष यात्री चांद पर अमरीकी झंडा फ़हराते हुए दिखते हैं. लेकिन, अपोलो कार्यक्रम के दौरान पहले अमरीकी झंडा ले जाने की कोई योजना नहीं थी. नासा का इरादा संयुक्त राष्ट्र का झंडा चांद पर ले जाने का था.
हालांकि अपोलो 11 मिशन लॉन्च होने से तीन महीने पहले अमरीकी झंडा चांद पर फहराने का फ़ैसला किया गया. इसके बाद नासा ने सरकारी कंपनी से एक अमरीकी झंडे का ऑर्डर दिया.
इसकी क़ीमत 5.50 डॉलर थी. और ये नाइलॉन का बना था. इसे लगाने के लिए धातु के पोल को भी ख़रीदा गया, जो 75 डॉलर का पड़ा. इसे ऐसे डिज़ाइन किया गया था कि चंद्रमा की सतह पर इसे लगाने में परेशानी न हो.
अगला बड़ा सवाल ये आया कि आख़िर झंडे और डंडे को स्पेसक्राफ्ट में रखा कहां जाए? क्योंकि झंडा ले जाने का फ़ैसला बहुत देर में हुआ था. और तब तक यान के भीतर के एक-एक इंच के इस्तेमाल की प्लानिंग कर ली गई थी. फिर इसे लूनर लैंडर की सीढ़ी से लगाकर भेजा गया.
इसे ऐसे बनाया गया था ताकि इंजन की गर्मी से आग न लग जाए. अपोलो 11 के साथ भेजे गए झंडे को उस वक़्त लूनर लैंडर पर लगाया गया, जब वो रॉकेट में बंध चुका था.
धरती पर अभ्यास के दौरान नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एल्ड्रिन ने झंडा लगाने की भी प्रैक्टिस की थी. लेकिन, जब असल में वो झंडा लगाने लगे, तो दिक़्क़त आई और ये सिकुड़ा ही रह गया. जिसकी वजह से लोगों ने ये आरोप लगाया कि चांद पर हवा नहीं है तो झंडा लहराता हुआ कैसे दिख रहा है?
सवाल उठे कि क्या वाक़ई नासा ने इंसान को चांद पर भेजा भी या नहीं?
चंद्रमा से लौटते वक़्त एल्ड्रिन ने कहा कि झंडा गिर गया. हालांकि बाद के अपोलो मिशन के लगाए हुए झंडे अभी भी चांद पर मौजूद हैं. चांद का चक्कर लगाने वाले नासा के एलआरओ सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों ने इस बात की तस्दीक़ की है. उन्होंने ये भी सच पाया है कि वाक़ई नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एल्ड्रिन का लगाया झंडा गिर गया है.

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अंतरिक्ष यान में जुगाड़
नासा के मून मिशन की सबसे ख़ास चीज़ थी, टेप. इनकी वजह से बहुत से बिगड़े काम बने. अपोलो 17 मिशन के दौरान इसकी मदद से लूनर रोवर से पहिये को बांधा गया था. वहीं, इससे पहले के मिशन के दौरान टेप की मदद से स्विच से लेकर दूसरे औज़ार तक स्पेसक्राफ्ट में रखने के लिए टेप बहुत कारगर साबित हुआ.
अपोलो 13 के दौरान जब यात्रियों के कमांड मॉड्यूल में आग लग गई, तो डक्ट टेप ने अंतरिक्ष यात्रियों की जान भी बचाई. क्योंकि, जान बचाने के लिए जब एस्ट्रोनॉट लूनर मॉड्यूल में गए, तो कार्बन डाई ऑक्साइड निकालने वाले चौकोर डिब्बे, लूनर मॉड्यूल में फिट नहीं हो रहे थे. नतीजा ये कि इन्हें टेप की मदद से लूनर मॉड्यूल में फिट किया गया.
हर अंतरिक्ष यात्री अपने साथ कुछ न कुछ निजी सामान चांद पर ले गया. अपोलो 15 मिशन तक तो नासा इसकी तरफ़ ध्यान भी नहीं देता था. कोई परिवार की तस्वीर ले गया, तो कोई मेडल ले गया. किसी ने छोटी सी मूर्ति चंद्रमा पर छोड़ी तो किसी ने अपनी दूसरी निजी चीज़ यादगार के तौर पर चांद पर रहने दी.
लेकिन, अपोलो 15 मिशन के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया. इस मिशन के यात्री डेव स्कॉट, अल वोर्डेन और जिम इर्विन अपने साथ कुछ डाक टिकट ले गए. जिनकी बाद में नीलामी होनी थी. ये नीलामी तभी होनी थी, जब वो तीनों अंतरिक्ष यात्री स्पेस मिशन से पूरी तरह अलग हो जाते. इससे मिले पैसे उनके परिवारों को मिलने थे.
लेकिन डाक टिकटों की नीलामी उनके अंतरिक्ष पर लौटने के कुछ दिन बाद ही कर दी गई. ये नीलामी कंपनी ने बिना तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को बताए हुए की. नासा का प्रशासन इस बात से नाराज़ हो गया. मामला अमरीकी संसद तक गया. इसके बाद तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को नासा से निकाल दिया गया.

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जब चांद पर ले जाए गए बीज
अंतरिक्ष में जाने से पहले स्टुअर्ट रूसा एक फायर फाइटर थे. वो जंगलों में लगी आग बुझाने का काम करते थे. जब वो चांद पर जाने लगे, तो वैज्ञानिकों ने उनसे कहा कि वो कुछ बीज भी अपने साथ ले जाएं.
असल में वैज्ञानिक इन बीजों पर अंतरिक्ष की भारहीनता के असर को समझना चाहते थे.
अपोलो 14 मिशन के साथ गए स्टुअर्ट रूसा अपने साथ कई अमरीकी पेड़-पौधों के 500 बीज ले गए. मिशन से लौटने के बाद वैज्ञानिकों ने इनका परीक्षण किया, तो बीजों पर अंतरिक्ष की भारहीनता का कोई असर नहीं देखने को मिला था.
इन बीजों को जब बोया गया, तो दूसरे बीजों की तरह इनसे भी नए पौधे उग आए. बाद में इन पेड़ों की क़लम से दूसरे पेड़ भी उगाए गए. इन्हें मून ट्री के नाम से जाना जाता है.
ये पेड़ पूरे अमरीका में कई जगह लगाए गए हैं. इनमें से एक नासा के केनेडी स्पेस सेंटर में है, तो एक और पेड़ व्हाइट हाउस के बागीचे में भी लगाया गया है.
इन बीजों को चांद की सैर कराने वाले स्टुअर्ट रूसा की क़ब्र के पास भी एक पेड़ लगाया गया है.
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