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चाँद पर इंसान भेजने से अमरीका को क्या मिला था
- Author, रिचर्ड हॉलिंघम
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
1960 के दशक में अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चरम पर था.
अंतरिक्ष में भी एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ लगी हुई थी. अंतरिक्ष की इस रेस में सोवियत संघ, अमरीका से आगे चल रहा था.
उसने अंतरिक्ष में अमेरिका से पहले इंसान भेजने में क़ामयाबी हासिल की थी. इसलिए, अमरीकी सरकार भी सोवियत संघ से पहले चांद पर इंसान को भेजना चाहती थी.
अमरीकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने नासा के सामने लक्ष्य रखा था कि वो इंसान को चांद पर सोवियत संघ से पहले भेजने के मिशन को अंजाम दे.
लिहाज़ा नासा ने चांद पर इंसान को तो भेजा ही. साथ ही अमरीकी स्पेस एजेंसी ने ये भी साबित करने की कोशिश की कि जब उसके अंतरिक्ष यात्री चांद पर गए तो उन्होंने कुछ नायाब काम किया.
अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजने से पहले उन्हें भूगर्भ शास्त्र की जानकारी ज़रूरी थी. इसके लिए उन्हें हवाई द्वीप, मेक्सिको, आइसलैंड और जर्मनी जैसे देशों का दौरा कराया गया. यहां, अंतरिक्ष यात्रियों को चट्टानों, ज्वालामुखी के बनने-बिगड़ने और उल्का पिंडों की वजह से होने वाले गड्ढों के बारे में जानकारी दी गई.
अपोलो 15 कमांड मॉड्युल के पायलट अल वर्डेन का कहना है कि इन दौरों से मिली जानकारी उनके लिए काफ़ी महत्वपूर्ण थी.
चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री अपने साथ हथौड़े, ड्रिल मशीन और कुदाल ले गए गए थे ताकि खुदाई करने की सूरत में उनका इस्तेमाल किया जा सके.
लेकिन अल वर्डेन लूनर ऑर्बिट में ज़्यादा बड़े पैमाने पर अवलोकन कर रहे थे. वो ऐसी चीज़ें तलाश करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे वो साबित कर सकें कि उन्होंने सबसे अलग काम किया है.
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ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियां हासिल की गईं
अपोलो 17 मिशन के तहत चांद पर जाने वाले पहले और इकलौते भूगर्भशास्त्री हैं, हैरिसन श्मिट. चांद पर उन्हें चट्टानों के छोटे-छोटे मोती जैसे टुकड़े मिले जो इस बात के सबूत हैं कि चांद पर भी चट्टानों के बनने और टूटने की प्रक्रिया चलती रहती है.
वो 741 टुकड़े नमूने के तौर पर साथ लाए थे जिनका वज़न 111 किलो था. चांद से क़रीब 2200 चट्टानों और मिट्टी के बहुत से नमूने लाकर अमरीका के ह्यूस्टन की प्रयोगशाला में रखे गए जिन पर अब तक रिसर्च हो रही है.
नासा ने चांद से लाए गए बहुत से नमूने दुनिया भर के म्यूज़ियम और वैज्ञानिकों को भी दान किए जबकि बहुत से नमूने आज भी सील बंद रखे हैं.
लेकिन जिन सैम्पल पर रिसर्च की गई उससे चांद और धरती के बनने का इतिहास पता चला. साथ ही ये भी साबित हो गया कि धरती और चांद का निर्माण दो बड़े ग्रहों और खगोलीय पिंडों के टकराने से हुआ है.
चांद पर पहुंचने वाले पहले दो इंसान, नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन अपने अंतरिक्ष यान से बहुत ज़्यादा दूर तक नहीं गए थे.
वो चांद पर आधे मील की दूरी पर ही गए थे. लेकिन जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ता गया, अंतरिक्ष यात्री चांद पर पहुंचने के बाद दूर-दूर तक जाने लगे. वो चांद की सतह के ढेर सारे नमूने लेकर लौटते थे.
चांद पर धरती का महज़ एक छठवां हिस्सा ही गुरुत्वाकर्षण बल है. यानी जो चीज़ धरती पर 6 किलोग्राम वज़न की है, वो चांद पर केवल एक किलोग्राम होगी. ऐसे में वहां की सतह पर संतुलन बनाए रखना मुश्किल काम होता था. फिर भी, वहां जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियां हासिल कीं.
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सोने में दिक़्क़त
1972 में अपोलो 15 मिशन के तहत चांद पर गए, डेव स्कॉट और जिम इर्विन चांद पर रोवर चलाने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री थे. इस रोवर की रफ़्तार 16 किमी प्रति घंटा थी. रोवर की मदद से वो अपने लूनर मॉड्युल से 14 मील दूर तक गए थे.
पुरानी याद ताज़ा करते हुए मिशन कंट्रोलर स्कॉट बताते हैं कि उनका रोवर चांद की सतह पर बने गड्ढों से बचते हुए आगे चल रहा था. लेकिन उन्हें इतने धक्के लग रहे थे कि सीट बेल्ट की ज़रूरत महसूस हो रही थी. लेकिन लूनर ड्राइविंग का रिकॉर्ड अभी भी जीन सर्नेन के नाम है.
वो अपने मिशन अपोलो-17 में हैरिसन श्मिट के साथ गए थे. उन्होंने अपने अंतरिक्ष यान से क़रीब चार किलोमीटर ज़्यादा दूरी तय करके 35 किलोमीटर का दायरा घूमा था.
चांद की सतह पर ढाई घंटे चलने के बाद नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एड्रिन ने लूनर लैंडर को बंद कर लिया था, क्योंकि वो बहुत ज़्यादा थक चुके थे. ऑर्बिट में वापस आने से पहले उन्हें सोने को कह दिया गया था. अपनी मिशन रिपोर्ट में इसका ज़िक्र करते हुए आर्मस्ट्रॉन्ग ने लिखा था कि शोर, रौशनी और कम तापमान की वजह से उन्हें झुंझलाहट हो रही थी.
लूनर मॉड्यूल, अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता थी. लेकिन ये एक बहुत ही ग़ैर आरामदेह मॉड्युल था. भारी भरकम इंजन के सिलिंडर की वजह से केबिन में फ़्लोर स्पेस बहुत कम थी.
आर्मस्ट्रॉन्ग कहते हैं कि उन्होंने इंजन के कवर पर सोने की कोशिश की और उनका साथी फ़्लोर पर सोया. मॉड्युल की खिड़कियों से भी परछाइयां, और मॉड्युल की तरह-तरह की लाइट की रोशनी अंदर आ रही थी.
पंप का शोर भी नींद में बाधा डाला रहा था. इतनी सारी मुश्किलों के बीच पायलट बज़ एल्ड्रिन दो घंटे सो पाए जबकि, कमांडर नील आर्मस्ट्रॉन्ग तो सोए ही नहीं.
लेकिन बाद में नासा ने चांद पर जो मिशन भेजे, उसमें मॉड्युल को और बेहतर बनाया गया. वो तो इतने आरामदायक थे कि अंतरिक्ष यात्री चांद पर झुला डालकर सो सकते थे.
चांद से धरती की सही दूरी पता करना
27 दिसंबर 1968 को भेजा गया अपोलो 8 मिशन सबसे तेज़ गति से चांद की कक्षा में पहुंचा था. इस की रफ़्तार क़रीब सात मील प्रति सेकेंड की थी.
अपोलो कमांड मॉड्युल का ये अब तक का सबसे अद्भुत मॉड्युल था जिसकी रेज़िन हीट शील्ड की मोटाई इतनी थी कि वो क्रू मेम्बर्स को तीन हज़ार डिग्री सेल्सियस की गर्मी से बचाने के लिए सक्षम थी.
मई 1968 को अपोलो-10 के अंतरिक्ष यात्रियों ने धरती से चांद की दूरी को और भी तेज़ी से तय किया था. वो 39 हज़ार 705 किलो मीटर प्रति घंटा से अपना सफ़र तय करके धरती पर वापस आए थे.
अपोलो-15 कमांड मॉड्युल के पायलट अल वर्डेन का कहना है कि चांद तक पहुंचने का सफ़र बहुत नीरस होता था. साढ़े तीन दिन तक उनके पास करने को कोई भी काम नहीं था.
इस बीच सभी अंतरिक्ष यात्री या तो आपस में एक दूसरे से बातें करते रहे, या फिर किताब पढ़ने और संगीत सुन कर वक़्त बिताया करते. इसी बीच उन्होंने टीवी प्रसारण में भी हिस्सा लेना होता था.
अगर आज हमें धरती से चांद की सटीक दूरी पता चल पाई है, तो उसके लिए हमें वर्डेन का शुक्रिया अदा करना चाहिए. उनके मिशन के दौरान ही चांद पर ऐसा लेज़र उपकरण छोड़ा गया था जिसे रेंजिंग रेट्रोरिफ़्लेक्टर कहा जाता है.
ये ख़ास तरह के आईने हैं, जिन्हें इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि इन्हें धरती से टेलिस्कोप की मदद से लेज़र रिफ्लेक्ट करके पृथ्वी से चांद तक की सही दूरी आंकी जा सकी.
इनका इस्तेमाल आज भी किया जाता है. इन्हीं की वजह से खगोलविदों को चांद की कक्षा की बेहतर समझ हो पाई है. इन्हीं के ज़रिए हमें ये जानकारी भी मिली है कि चांद हर साल हमसे 38 मिलीमीटर दूर होता जा रहा है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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