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जब सब एटमी देश भिड़ जाएंगे तो क्या होगा
- Author, सिठ बाम
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
अपने करोड़ों साल लंबे इतिहास में इस धरती ने बहुत सी क़यामतें देखी हैं. जब उल्कापिंड टकराने से डायनासोरों की पूरी नस्ल ख़त्म हो गई. जब, ज्वालामुखी विस्फ़ोट से पूरी दुनिया पर अंधेरा छा गया.
पहली आलमी जंग और दूसरा विश्व युद्ध तो हमारी धरती के हालिया इतिहास के वो सुर्ख़ पन्ने हैं, जिन पर ख़ून से इंसान ने अपनी तबाही की इबारत लिखी.
ज़रा सोचिए, अगर ये घटनाएं न हुई होतीं, तो? हिटलर ने यहूदियों का क़त्लेआम न किया होता, तो? पहले विश्व युद्ध के दौरान तुर्कों ने हज़ारों बेगुनाह आर्मेनियाई नागरिकों को न मार डाला होता तो? हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा न हुआ होता तो?
तब क्या धरती का आज भी वही रूप होता, जो हम देख रहे हैं? क्या तब हम पैदा भी हुए होते? या नहीं.
जब भी लोग क़यामत के बारे में सोचते हैं, तो वो सबसे पहले लोगों की मौत का हिसाब लगाते हैं. मसलन, दूसरे विश्व युद्ध में पांच करोड़ से ज़्यादा लोग मारे गए थे. वहीं, पहले विश्व युद्ध में क़रीब 1.5 करोड़ लोगों की जान चली गई थी. तो कैरेबियाई देश हैती में 2010 में आए भूकंप में 1 लाख 60 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
पर, इन आंकड़ों से असली तबाही की तस्वीर धुंधली हो जाती है. ये वो लोग थे, जिन्हें जीने का मौक़ा नहीं मिलता. अगर वो पूरी उम्र तक जीते, तो दुनिया की तस्वीर ही अलग होती.
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इंसान की हरकत और इंसानियत पर ख़तरा
आज से 6.6 करोड़ साल पहले जब धरती से उल्कापिंड टकराया था, तो डायनासोर और दूसरे कई जानवरों की पूरी नस्ल तबाह हो गई. इसका एक फ़ायदा ये हुआ कि हम जैसे छोटे कद के जीवों के धरती पर विकसित होने का रास्ता खुला.
उससे भी पहले यानी आज से क़रीब ढाई अरब साल पहले, जब सांस में ऑक्सीजन लेने वाले जीव विकसित हुए, तो बिना ऑक्सीजन के जीने वाले जीव पूरी तरह ख़त्म हो गए. तभी तो विकास का क़ुदरती पहिया घूमता रहा और सबसे अक़्लमंद जीव यानी इंसान का विकास हुआ.
दुनिया के कई जानकार इस वक़्त ग्लोबल कैटेस्ट्रोफ़िक रिस्क यानी दुनियावी तबाही के जोखिम को समझने में मुब्तिला हैं. वो ये जानना चाहते हैं कि इंसानियत और इस धरती को किस तबाही से सबसे ज़्यादा ख़तरा है. उससे कैसे बचा जाए.
इंसान की हरकतों की वजह से इस वक़्त धरती बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही है. पिछले हज़ारों साल से इंसान ने क़ुदरती संसाधनों का जमकर दोहन किया है. नतीजा ये कि धरती की आब-ओ-हवा बिगड़ रही है. प्रदूषण फैल रहा है.
कीटनाशकों की वजह से तितलियां और दूसरे छोटे जीव ख़त्म हो रहे हैं, तो शिकार की वजह से व्हेल जैसे विशाल जीव के विलुप्त हो जाने का भी डर सिर पर आ खड़ा हुआ है.
अगर हम अब भी नहीं सुधरे तो जाने क्या होगा. पता नहीं हमारी आने वाली नस्लें ये दुनिया देख भी पाएंगी या नहीं.
कोई क़यामत आई, तो क्या पूरी इंसानियत मिट जाएगी?
दुनिया के हर कोने में इंसान की मौजूदगी का वही असर हो रहा है, जब पहली बार इस धरती पर ऑक्सीजन से ख़ुद की ख़ुराक पैदा करने वाले सियानोबैक्टीरिया पैदा हुए थे.
इन बैक्टीरिया के उदय के बाद आलम ये हुआ कि वो सूरज की रौशनी की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं में तोड़ने में सक्षम हो गए. इनकी तादाद इतनी बढ़ गई, कि धरती पर ऑक्सीजन की बहुतायत हो गई. नतीजा ये हुआ कि कम या बिना ऑक्सीजन के माहौल में रहने वाले दूसरे छोटे जीव पूरी तरह ख़त्म हो गए.
इसी तरह, धरती पर इंसान इकलौता जीव है, जो विज्ञान-तकनीक, खेती और उद्योगों के ज़रिए क़ुदरती संसाधनों का दोहन कर रहा है. हम ये काम इतने बड़े पैमाने पर कर रहे हैं कि हमने जीवों की कई नस्लों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया है. ख़तरा अब इंसानियत पर भी मंडरा रहा है.
इंसान ने एटमी हथियार बना लिए हैं. हमारे चलते धरती गर्म हो रही है. जंगल और समुद्रों का संतुलन बिगड़ गया है. कई ख़तरनाक बीमारियां बायोइंजीनियरिंग की वजह से पैदा हो रही हैं. तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से इंसान ख़ुद ही ख़तरे की क़तार में खड़ा हो गया है. फिर, क़ुदरती आपदाओं जैसे भूकंप, समुद्री तूफ़ान या उल्कापिंड के टकराने से तबाही का डर तो बना ही हुआ है.
किसी भी तबाही से इंसान का क्या होगा, ये बता पाना मुश्किल है. आज धरती पर 7.6 अरब इंसान आबाद हैं. हम दुनिया के कमोबेश हर कोने में मौजूद हैं.
इस बात की पूरी संभावना है कि तबाही हुई, तो कुछ इंसान तो बच ही जाएंगे. अब जो बचेंगे वो कैसे गुज़र-बसर करेंगे, इंसान की नस्ल को कैसे आगे बढ़ाएंगे? ये सवाल ऐसे हैं, जिनकी तलाश लॉन्ग टर्न ट्रैजेक्टोरीज़ ऑफ़ ह्यूमन सिविलाइज़ेशन नाम की रिसर्च के ज़रिए तलाशे जा रहे हैं.
क़यामत से गुज़रने के बाद इंसानियत का रंग-रूप कैसा होगा, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. पर, मौजूदा तकनीक के आधार पर हम ये कह सकते हैं कि तबाही के बाद बचे लोग अपनी क़िस्मत संवार लेंगे. वैसे, मानव सभ्यता का मौजूदा रूप शायद ही क़ायम रह सके.
तबाही के बाद बचे-ख़ुचे लोग खेती-बाड़ी और उद्योगों के ज़रिए मानवता में नई जान फूंक सकेंगे.
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एटमी हथियार वाले आपस में भिड़ गए तो क्या होगा
मान लीजिए कि दुनिया की सभी एटमी ताक़तों, यानी, अमरीका, रूस, चीन, भारत-पाकिस्तान, इज़राइल, ब्रिटेन, उत्तर कोरिया, दक्षिण अफ्रीका और फ्रांस के बीच परमाणु युद्ध हो गया, तो इसे रोक पाना नामुमकिन होगा. आशंका तो इसी बात की ज़्यादा है कि ऐसी जंग अमरीका और रूस के बीच हो सकती है. क्योंकि इन्हीं दोनों देशों के पास दुनिया के 90 फ़ीसद एटमी हथियार हैं.
परमाणु युद्ध होने की सूरत में लैटिन अमरीका और अफ्रीका पर सबसे कम असर पड़ेगा. क्योंकि यहां के ज़्यादातर देश ऐसे हैं, जो रूस-अमरीका की खेमेबंदी का हिस्सा नहीं हैं. यहां पर ऐसे सैन्य ठिकाने भी नहीं हैं, जो परमाणु युद्ध के दौरान निशाना बनेंगे.
एटमी तबाही के चलते दुनिया की मौजूदा सप्लाई चेन ठप पड़ जाएगी. लोग दूसरे देशों से मंगाए जाने वाले सामान नहीं हासिल कर सकें. जल्द ही तमाम देशों में कई ज़रूरी सामानों की किल्लत हो जाएगी. कल-पुर्ज़ों की कमी होगी.
जल्द ही धरती पर एटमी युद्ध से पर्यावरण के कुप्रभाव दिखने लगेंगे. परमाणु धमाके इतने ताक़तवर होते हैं कि उनसे उठी धूल और धुआं ध्रुवों तक पर अंधेरा कर देगा. कुछ महीनों के भीतर ही जलते हुए शहरों से उठा धुआं पूरी दुनिया पर छा जाएगा और शायद ये कई महीनों या कई साल तक नहीं हटेगा.
इससे दुनिया भर में खेती प्रभावित हो जाएगी. इसकी वजह से देश अकाल के शिकार होंगे. परमाणु युद्ध से ज़्यादा लोग अकाल से मारे जाने की आशंका है.
फिर भी, उम्मीद यही है कि कुछ लोग बच जाएंगे. दुनिया में कई जगह अन्न के ऐसे भंडार हैं जो कुछ लोगों को आसमान साफ़ होने तक ज़िंदा रहने में मदद करेंगे.
फिर, बनावटी रोशनी से भी कुछ खेती इंसान कर सकेगा.
पहले परमाणु युद्ध और उसके बाद अकाल की वजह से मौजूदा मानव सभ्यता का रंग-रूप पूरी तरह से बदल जाएगा. मानव सभ्यता के बिखर जाने का अंदेशा होगा.
अक्सर एक तबाही का दूसरी तबाही से वास्ता होता है. जैसे परमाणु युद्ध के बाद अकाल की आशंका. एटमी युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी. खेती करना मुश्किल होगा. इसके बाद के हालात इतने बुरे होंगे कि मानव सभ्यता पर बहुत ज़्यादा दबाव होगा. स्वास्थ्य सेवाएं बर्बाद होंगी तो महामारियों की आशंका बढ़ जाएगी.
यानी एक आफ़त से दूसरी आपदा का सिलसिला शुरू होने का डर होता है.
अगर इन तबाहियों से कुछ लोग ही बचेंगे, तो सभ्यता ख़ात्मे के मुहाने पर खड़ी होगी. बचे हुए लोगों को इंसानियत को बचाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी. आज दुनिया की ज़्यादातर आबादी शहरों में रहती है. वो अपना खाना ख़ुद नहीं उगाते.
ऐसी सूरत में तबाही के बाद वो लोग बेहतर स्थिति में होंगे, जो गांवों में रहते हैं. खेती करते हैं. आज की तारीख़ में वही लोग दुनिया में सबसे ग़रीब हैं.
सबसे बड़ी चुनौती होगी, इंसान की नई पीढ़ी पैदा करना. इसलिए किसी भी तबाही के बाद इतनी तादाद में इंसानों का बचना ज़रूरी है कि नई पीढ़ी को जन्म दिया जा सके.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 150 से लेकर 40 हज़ार लोग भी अगर क़यामत के बाद बच गए, तो वो इंसान की नस्ल को बचा ले जाएंगे.
तबाही के बाद की दुनिया में तेल जैसे ज़रूरी सामान की भारी कमी होगी. बहुत से प्रदूषक केमिकल, धरती से साफ़ होने में कई साल का वक़्त लेंगे.
हां, तबाह हुए शहरों से लोहा मिल जाएगा. फिर हवा और पानी से बिजली बनाने के विकल्प तो होंगे ही.
ऐसी तबाही का अनुमान लगाना अलग बात है. और इसके लिए मानव सभ्यता को तैयार करना अलग. क्योंकि हम अभी सामने खड़ी चुनौतियों से ही जूझ रहे हैं. ऐसे में किसी काल्पनिक क़यामत से लड़ने की तैयारी के लिए शायद ही संसाधन लगाएं.
पर, ऐसे अनुमानों का मक़सद ये होता है कि हम आज जो भी क़दम उठा रहे हैं, उनके दूरगामी असर को भी समझ लें. तभी हम संभलकर चलेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी दुनिया छोड़ जाएंगे, जिस में जीना आसान होगा.
हम अपने माज़ी को तो नहीं बदल सकते. पर, मुस्तकबिल ज़रूर संवार सकते हैं.
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